लॉकडाउन का असर: ऑनलाइन शिक्षा से वंचित ग्रामीण लड़कियां

इंटरनेट ना होने की वजह से रोशनी एमए का फ़ॉर्म नहीं भर पाई और स्मार्ट फ़ोन ना होने की वजह से उसकी छोटी बहन ऑनलाइन क्लास अटेंड नहीं कर पा रही। फ़ोटो: जिज्ञासा मिश्रा

लखनऊ: उत्तर प्रदेश के चित्रकूट ज़िले के चित्रा ब्लॉक की रोशनी साहू (22) ने बीए पास किया है और अब एमए में दाख़िला लेना चाहती हैं, लेकिन उनके पास इंटरनेट कनेक्शन नहीं है और साइबर कैफ़े अभी तक खुले नहीं हैं। वक़्त बीता जा रहा है और रोशनी एमए का फ़ार्म नहीं भर पा रही हैं।

"मैं बीए कर चुकी हूं, अब एमए करना है लेकिन साइबर कैफ़े नहीं खुले तो फ़ॉर्म नहीं भर पा रही हूं। दाखिला कब ले पाउंगी पता नहीं," रोशनी इतना कह कर चुप हो जाती हैं।

रोशनी अपने माता-पिता, एक बहन और दो भाइयों के साथ रहती हैं। यह पूछने पर कि फ़ोन के ज़रिए भी तो अर्ज़ी भर सकती हो तो कहती है, "मेरे पास मोबाइल नहीं है। घरवालों से नहीं बोलते सकते ... लड़की हैं न!" 

 

कोरोनावायरस के प्रसार को रोकने के लिए सरकार ने 24 मार्च से पूरे देश में लॉकडाउन का एलान किया था। इसकी वजह से सभी शिक्षण संस्थानों को भी बंद कर दिया गया था लेकिन लंबे समय तक छात्रों की पढ़ाई में रुकावट न आए इसके लिए सभी स्कूलों और कॉलेजों में ऑनलाइन कक्षाओं का प्रावधान किया गया। ऐसे में शिक्षक वीडियो कॉल के ज़रिए कक्षाएं ले रहे हैं लेकिन इन कक्षाओं का लाभ वही उठा सकते हैं जिनके पास स्मार्ट फ़ोन है। जिनके पास स्मार्ट फ़ोन नहीं हैं वह पिछड़ रहे हैं। इसमें सबसे ज़्यादा पिछड़ रही हैं ग्रामीण इलाकों में रहने वाली लड़कियां।

उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में कक्षा एक से 12वीं तक 8,425,790 लड़कियां नामांकित हैं जो राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में नामांकित कुल छात्रों का 46.6% जबकि लड़कों में यह प्रतिशत 53.3% है। देश भर के स्तर पर ग्रामीण क्षेत्रों की नामांकित लड़कियों की संख्या 63,057,935 है, ग्रामीण क्षेत्रों के कुल नामांकित छात्रों का लगभग 45%। देश भर के ग्रामीण क्षेत्रों में नामांकित छात्रों में लड़कों का प्रतिशत 55% है। 

इंटरनेट तक पहुंच के मामले में महिलाएं बहुत पीछे

दुनिया भर में, महिलाओं की तुलना में 20 करोड़ अधिक पुरुषों की इंटरनेट तक पहुंच है, और महिलाओं के पास मोबाइल होने की संभावना 21% कम है। 

भारत में पांच साल से अधिक उम्र के कुल 45.1 करोड़ लोगों के पास इंटरनेट की सुविधा है। इसमें से पुरुषों की संख्या 25.8 करोड़ है जबकि महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में आधी है। देश के 67% पुरुषों की इंटरनेट तक पहुंच हैं जबकि इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाली महिलाएं सिर्फ़ 33% हैं। ग्रामीण इलाक़ों में पुरुषों और महिलाओं के बीच का यह अंतर और बढ़ जाता है। देश के गांवों में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों में 72% पुरुष और 28% महिलाएं हैं, इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (आईएएमएआई) की 2019 की एक रिपोर्ट के अनुसार। यह रिपोर्ट बताती है कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में इंटरनेट की सुविधा वाले 31% लोग हैं।

महिलाओं और पुरुषों के बीच का यह अंतर सिर्फ़ इंटरनेट के इस्तेमाल में ही नहीं है। साक्षरता दर में भी यह साफ़ दिखाई देता है। साल 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में महिला साक्षरता दर 59.26% है जबकि पुरुष साक्षरता दर 79.24% है।

उत्तर प्रदेश के चित्रकूट ज़िले के कर्वी ब्लॉक का बंद पड़ा एक स्कूल।  फ़ोटो: जिज्ञासा मिश्रा

विश्व बैंक के एक अध्ययन में पाया गया कि लड़कियां अगर माध्यमिक स्कूली शिक्षा पूरी कर लेती हैं तो उनकी कमाई करने की क्षमता में 18% की बढ़ोत्तरी होती है। 

रोशनी की एक छोटी बहन भी है जो पांचवी क्लास में पढ़ती है। “उसकी भी ऑनलाइन क्लास शुरू हो चुकी है लेकिन मोबाइल न होने की वजह से वह भी नहीं पढ़ पा रही है,” रोशनी ने बताया।

“घर में एक मोबाइल पिताजी के पास है और वह स्मार्ट फ़ोन नहीं है, इसे केवल पिताजी ही इस्तेमाल करते हैं। दूसरा, स्मार्ट फ़ोन है जो दोनों भाइयों के पास ही रहता है। मेरा एक भाई पढ़ाई नहीं करता और दूसरा ग्यारवीं में पढ़ता है और वह अपने फ़ोन को हमें हाथ तक लगाने नहीं देते," रोशनी ने कहा। 

यूनिसेफ़ ने अप्रैल की शुरुआत में लड़कियों पर लॉकडाउन से पड़ने वाले असर पर चिंता जताई थी। "हम चिंतित हैं कि लंबे समय तक स्कूल बंद करने से लड़कियों और शारीरिक रूप से कमज़ोर लोगों को सबसे अधिक दिक्कत होगी। लड़कियों को अक्सर घर के कामों और भाई-बहनों की देखभाल करने के लिए मजबूर किया जाता है। हम लॉकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा की बढ़ती घटनाओं के बच्चों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव के बारे में भी चिंतित हैं,” यूनिसेफ़ के दक्षिण एशिया के क्षेत्रीय शिक्षा सलाहकार जिम एकर्स ने 6 अप्रैल 2020 को एक प्रेस रिलीज़ में कहा था।

ऑनलाइन शिक्षा में पिछड़ रही हैं गांव की लड़कियां

राजधानी लखनऊ के गोसाईगंज ब्लॉक के सुन्दर नगर गांव की रहने वाली अंजली भी अपनी पढ़ाई को लेकर चिंतित हैं। "पहले तो कॉलेज जाते थे, वहां पढ़ लेते थे। अब भी ज़ूम ऐप पर क्लासें तो चल रही हैं लेकिन मेरे पास 4-जी फ़ोन नहीं हैं तो क्लासें अटेंड नहीं कर पा रही हूं। किताबों की दुकानें अभी बंद हैं इसलिए किताबें भी नहीं मिल पा रही हैं," लाला महादेव प्रसाद वर्मा बालिका महाविद्यालय में एमए (प्रथम वर्ष) की छात्रा अंजली वर्मा ने बताया। 

“मैंने पास के गांव, महमूदपुर में किसी से ऑनलाइन परीक्षा फार्म तो भरवा लिया है लेकिन बिना पढ़े परीक्षा कैसे दें," अंजलि का सवाल था। जब अंजलि ने अपनी टीचर से कहा कि वह क्लासेज़ अटेंड नहीं पा रही हूं और कोई उपाय बताइए तो उन्होंने कहा कि कॉलेज खुलने करने का इंतज़ार करना पड़ेगा।

उत्तर प्रदेश के चित्रकूट ज़िले की सीमाएं मध्य प्रदेश से लगती हैं। ऑनलाइन शिक्षा के मामले में यहां की लड़कियों की समस्या भी उत्तर प्रदेश से अलग नहीं हैं। मध्यप्रदेश के सतना ज़िले की 21 वर्षीय रश्मि घरवालों के विरोध के बावजूद पढ़ाई कर रही है। वह बताती हैं कि बीए का फ़ॉर्म ऑनलाइन भरने के लिए उन्हें दस किलोमीटर पैदल चलना पड़ा।

"फ़ॉर्म तो मैंने जैसे-तैसे भर दिया है लेकिन अगर कॉलेज नहीं खुला तो पढ़ाई कहां होगी? मेरे भाई के पास फ़ोन है लेकिन वह दिन भर बाहर रहता है। वह मुझे अपना फ़ोन नहीं देता। अब इंटरनेट और स्मार्ट फ़ोन किताबों से ज़्यादा ज़रूरी ज़रूरी हो गया है," रश्मि ने कहा।

मध्य प्रदेश के सतना ज़िले की प्रीति वर्मा और उसकी बहन के पास स्मार्ट फ़ोन नहीं है जिससे वह ऑनलाइन क्लास में हिस्सा नहीं ले पा रहीं। फ़ोटो: जिज्ञासा मिश्रा  

जूनियर और प्राइमरी विद्यालय में पढ़ने वाली प्रीती और रानी की शिकायत है कि उनका स्कूल ऑनलाइन कक्षाएं संचालित कर रहा है लेकिन उनके पास इसमें शामिल होने के लिए स्मार्ट फ़ोन नहीं हैं। 12 वर्षीय रानी वर्मा और 14 वर्षीय प्रीती वर्मा, मध्य प्रदेश के सतना ज़िले के मझगवां  ब्लॉक के रजौला गांव की रहने वाली हैं। 

"कल सर जी (रानी के शिक्षक) आए थे, हमारा नंबर ले गए। बोल रहे थे रानी की पढ़ाई के लिए चाहिए। हमारे पास छोटा वाला फ़ोन है, उसमे सिर्फ फ़ोन (कॉल) हो सकता है," रानी की मां नथिया वर्मा बताती हैं। रानी के पिता सब्ज़ी का ठेला लगाते हैं। परिवार में कुल सात लोग हैं और आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं कि बच्चों की पढ़ाई के लिए एक नया फ़ोन लिया जा सके।

रानी वर्मा अपनी मां नथिया और भाइयों के साथ। फ़ोटो: जिज्ञासा मिश्रा  

"बेशक हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे हैं कि बच्चे बिना विद्यालय आए भी पढ़ सकें। इसके लिए हम व्हाट्सएप्प पर होम-वर्क भी भेज रहे हैं, अपडेट ले रहे हैं लेकिन गांव में सब के पास यह सुविधा उपलब्ध नहीं है। तो हम उनके दूर-दराज़ के रिश्तेदारों (जिनके पास मल्टीमीडिया फ़ोन है) उनका नंबर ऐड करके बच्चों से कांटेक्ट करने की कोशिश में हैं,” चित्रकूट के बेसिक शिक्षा अधिकारी प्रकाश सिंह ने बताया। 

(जिज्ञासा, उत्तर प्रदेश में स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

लखनऊ: उत्तर प्रदेश के चित्रकूट ज़िले के चित्रा ब्लॉक की रोशनी साहू (22) ने बीए पास किया है और अब एमए में दाख़िला लेना चाहती हैं, लेकिन उनके पास इंटरनेट कनेक्शन नहीं है और साइबर कैफ़े अभी तक खुले नहीं हैं। वक़्त बीता जा रहा है और रोशनी एमए का फ़ार्म नहीं भर पा रही हैं।

"मैं बीए कर चुकी हूं, अब एमए करना है लेकिन साइबर कैफ़े नहीं खुले तो फ़ॉर्म नहीं भर पा रही हूं। दाखिला कब ले पाउंगी पता नहीं," रोशनी इतना कह कर चुप हो जाती हैं।

रोशनी अपने माता-पिता, एक बहन और दो भाइयों के साथ रहती हैं। यह पूछने पर कि फ़ोन के ज़रिए भी तो अर्ज़ी भर सकती हो तो कहती है, "मेरे पास मोबाइल नहीं है। घरवालों से नहीं बोलते सकते ... लड़की हैं न!" 

 

कोरोनावायरस के प्रसार को रोकने के लिए सरकार ने 24 मार्च से पूरे देश में लॉकडाउन का एलान किया था। इसकी वजह से सभी शिक्षण संस्थानों को भी बंद कर दिया गया था लेकिन लंबे समय तक छात्रों की पढ़ाई में रुकावट न आए इसके लिए सभी स्कूलों और कॉलेजों में ऑनलाइन कक्षाओं का प्रावधान किया गया। ऐसे में शिक्षक वीडियो कॉल के ज़रिए कक्षाएं ले रहे हैं लेकिन इन कक्षाओं का लाभ वही उठा सकते हैं जिनके पास स्मार्ट फ़ोन है। जिनके पास स्मार्ट फ़ोन नहीं हैं वह पिछड़ रहे हैं। इसमें सबसे ज़्यादा पिछड़ रही हैं ग्रामीण इलाकों में रहने वाली लड़कियां।

उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में कक्षा एक से 12वीं तक 8,425,790 लड़कियां नामांकित हैं जो राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में नामांकित कुल छात्रों का 46.6% जबकि लड़कों में यह प्रतिशत 53.3% है। देश भर के स्तर पर ग्रामीण क्षेत्रों की नामांकित लड़कियों की संख्या 63,057,935 है, ग्रामीण क्षेत्रों के कुल नामांकित छात्रों का लगभग 45%। देश भर के ग्रामीण क्षेत्रों में नामांकित छात्रों में लड़कों का प्रतिशत 55% है। 

इंटरनेट तक पहुंच के मामले में महिलाएं बहुत पीछे

दुनिया भर में, महिलाओं की तुलना में 20 करोड़ अधिक पुरुषों की इंटरनेट तक पहुंच है, और महिलाओं के पास मोबाइल होने की संभावना 21% कम है। 

भारत में पांच साल से अधिक उम्र के कुल 45.1 करोड़ लोगों के पास इंटरनेट की सुविधा है। इसमें से पुरुषों की संख्या 25.8 करोड़ है जबकि महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में आधी है। देश के 67% पुरुषों की इंटरनेट तक पहुंच हैं जबकि इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाली महिलाएं सिर्फ़ 33% हैं। ग्रामीण इलाक़ों में पुरुषों और महिलाओं के बीच का यह अंतर और बढ़ जाता है। देश के गांवों में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों में 72% पुरुष और 28% महिलाएं हैं, इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (आईएएमएआई) की 2019 की एक रिपोर्ट के अनुसार। यह रिपोर्ट बताती है कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में इंटरनेट की सुविधा वाले 31% लोग हैं।

महिलाओं और पुरुषों के बीच का यह अंतर सिर्फ़ इंटरनेट के इस्तेमाल में ही नहीं है। साक्षरता दर में भी यह साफ़ दिखाई देता है। साल 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में महिला साक्षरता दर 59.26% है जबकि पुरुष साक्षरता दर 79.24% है।

उत्तर प्रदेश के चित्रकूट ज़िले के कर्वी ब्लॉक का बंद पड़ा एक स्कूल।  फ़ोटो: जिज्ञासा मिश्रा

विश्व बैंक के एक अध्ययन में पाया गया कि लड़कियां अगर माध्यमिक स्कूली शिक्षा पूरी कर लेती हैं तो उनकी कमाई करने की क्षमता में 18% की बढ़ोत्तरी होती है। 

रोशनी की एक छोटी बहन भी है जो पांचवी क्लास में पढ़ती है। “उसकी भी ऑनलाइन क्लास शुरू हो चुकी है लेकिन मोबाइल न होने की वजह से वह भी नहीं पढ़ पा रही है,” रोशनी ने बताया।

“घर में एक मोबाइल पिताजी के पास है और वह स्मार्ट फ़ोन नहीं है, इसे केवल पिताजी ही इस्तेमाल करते हैं। दूसरा, स्मार्ट फ़ोन है जो दोनों भाइयों के पास ही रहता है। मेरा एक भाई पढ़ाई नहीं करता और दूसरा ग्यारवीं में पढ़ता है और वह अपने फ़ोन को हमें हाथ तक लगाने नहीं देते," रोशनी ने कहा। 

यूनिसेफ़ ने अप्रैल की शुरुआत में लड़कियों पर लॉकडाउन से पड़ने वाले असर पर चिंता जताई थी। "हम चिंतित हैं कि लंबे समय तक स्कूल बंद करने से लड़कियों और शारीरिक रूप से कमज़ोर लोगों को सबसे अधिक दिक्कत होगी। लड़कियों को अक्सर घर के कामों और भाई-बहनों की देखभाल करने के लिए मजबूर किया जाता है। हम लॉकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा की बढ़ती घटनाओं के बच्चों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव के बारे में भी चिंतित हैं,” यूनिसेफ़ के दक्षिण एशिया के क्षेत्रीय शिक्षा सलाहकार जिम एकर्स ने 6 अप्रैल 2020 को एक प्रेस रिलीज़ में कहा था।

ऑनलाइन शिक्षा में पिछड़ रही हैं गांव की लड़कियां

राजधानी लखनऊ के गोसाईगंज ब्लॉक के सुन्दर नगर गांव की रहने वाली अंजली भी अपनी पढ़ाई को लेकर चिंतित हैं। "पहले तो कॉलेज जाते थे, वहां पढ़ लेते थे। अब भी ज़ूम ऐप पर क्लासें तो चल रही हैं लेकिन मेरे पास 4-जी फ़ोन नहीं हैं तो क्लासें अटेंड नहीं कर पा रही हूं। किताबों की दुकानें अभी बंद हैं इसलिए किताबें भी नहीं मिल पा रही हैं," लाला महादेव प्रसाद वर्मा बालिका महाविद्यालय में एमए (प्रथम वर्ष) की छात्रा अंजली वर्मा ने बताया। 

“मैंने पास के गांव, महमूदपुर में किसी से ऑनलाइन परीक्षा फार्म तो भरवा लिया है लेकिन बिना पढ़े परीक्षा कैसे दें," अंजलि का सवाल था। जब अंजलि ने अपनी टीचर से कहा कि वह क्लासेज़ अटेंड नहीं पा रही हूं और कोई उपाय बताइए तो उन्होंने कहा कि कॉलेज खुलने करने का इंतज़ार करना पड़ेगा।

उत्तर प्रदेश के चित्रकूट ज़िले की सीमाएं मध्य प्रदेश से लगती हैं। ऑनलाइन शिक्षा के मामले में यहां की लड़कियों की समस्या भी उत्तर प्रदेश से अलग नहीं हैं। मध्यप्रदेश के सतना ज़िले की 21 वर्षीय रश्मि घरवालों के विरोध के बावजूद पढ़ाई कर रही है। वह बताती हैं कि बीए का फ़ॉर्म ऑनलाइन भरने के लिए उन्हें दस किलोमीटर पैदल चलना पड़ा।

"फ़ॉर्म तो मैंने जैसे-तैसे भर दिया है लेकिन अगर कॉलेज नहीं खुला तो पढ़ाई कहां होगी? मेरे भाई के पास फ़ोन है लेकिन वह दिन भर बाहर रहता है। वह मुझे अपना फ़ोन नहीं देता। अब इंटरनेट और स्मार्ट फ़ोन किताबों से ज़्यादा ज़रूरी ज़रूरी हो गया है," रश्मि ने कहा।

मध्य प्रदेश के सतना ज़िले की प्रीति वर्मा और उसकी बहन के पास स्मार्ट फ़ोन नहीं है जिससे वह ऑनलाइन क्लास में हिस्सा नहीं ले पा रहीं। फ़ोटो: जिज्ञासा मिश्रा  

जूनियर और प्राइमरी विद्यालय में पढ़ने वाली प्रीती और रानी की शिकायत है कि उनका स्कूल ऑनलाइन कक्षाएं संचालित कर रहा है लेकिन उनके पास इसमें शामिल होने के लिए स्मार्ट फ़ोन नहीं हैं। 12 वर्षीय रानी वर्मा और 14 वर्षीय प्रीती वर्मा, मध्य प्रदेश के सतना ज़िले के मझगवां  ब्लॉक के रजौला गांव की रहने वाली हैं। 

"कल सर जी (रानी के शिक्षक) आए थे, हमारा नंबर ले गए। बोल रहे थे रानी की पढ़ाई के लिए चाहिए। हमारे पास छोटा वाला फ़ोन है, उसमे सिर्फ फ़ोन (कॉल) हो सकता है," रानी की मां नथिया वर्मा बताती हैं। रानी के पिता सब्ज़ी का ठेला लगाते हैं। परिवार में कुल सात लोग हैं और आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं कि बच्चों की पढ़ाई के लिए एक नया फ़ोन लिया जा सके।

रानी वर्मा अपनी मां नथिया और भाइयों के साथ। फ़ोटो: जिज्ञासा मिश्रा  

"बेशक हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे हैं कि बच्चे बिना विद्यालय आए भी पढ़ सकें। इसके लिए हम व्हाट्सएप्प पर होम-वर्क भी भेज रहे हैं, अपडेट ले रहे हैं लेकिन गांव में सब के पास यह सुविधा उपलब्ध नहीं है। तो हम उनके दूर-दराज़ के रिश्तेदारों (जिनके पास मल्टीमीडिया फ़ोन है) उनका नंबर ऐड करके बच्चों से कांटेक्ट करने की कोशिश में हैं,” चित्रकूट के बेसिक शिक्षा अधिकारी प्रकाश सिंह ने बताया। 

(जिज्ञासा, उत्तर प्रदेश में स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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