लॉकडाउन की वजह से बच्चों में बढ़ सकते हैं कुपोषण के मामले

उत्तर प्रदेश के बहराइच ज़िले के खादैरपुर गांव का नौ साल का बाल गोविंद (बीच में) अपने भाई-बहनों के साथ। इन्हें आजकल सिर्फ़ आलू और चावल ही खाने को मिलता है। इन्हें इंतज़ार है कि कब इनके स्कूल खुलेंगे और कब ये मिड-डे मील खा पाएंगे। जो इनके माता-पिता दे पाते हैं उससे कहीं ज़्यादा पौष्टिक भोजन।

नई दिल्ली और लखनऊ: चीनी या नमक के साथ मुट्ठी भर चावल ही आजकल 10 साल की आशा यादव का भोजन है। बेहतर दिनों में, उसकी मां उसे उसे चावल के साथ कुछ आलू या दाल भी खिलाती थी। राज्य में कृषि में सबसे पिछड़े और ग़रीब पूर्वी उत्तर प्रदेश के ज़िले गोंडा की रहने वाली आशा उत्तर प्रदेश के उन 1.8 करोड़ बच्चों में शामिल है, जो लॉकडाउन के दौरान स्कूल में दोपहर के भोजन से वंचित हैं।

स्कूल के दिनों में, आशा को मिड-डे मील योजना के तहत कम से कम एक वक़्त का पौष्टिक खाना - चावल, सब्ज़ियां, दूध और फल मिलता था। 24 मार्च, 2020 के बाद से, कोविड-19 और लॉकडाउन की वजह से स्कूल बंद हो गए, और इसके साथ ही स्कूली बच्चों को दोपहर मिलने वाला खाना भी।

इस दौरान, आंगनबाड़ी केंद्र भी बंद हो गए और आंगनबाड़ी और दूसरे स्वास्थ्य कर्मचारियों को विभिन्न स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रमों से हटाकर, कोरोनावायरस से संबंधित कामों में लगा दिया गया। 

पौष्टिक भोजन ना मिलने से बच्चों में कुपोषण बढ़ेगा, जिससे उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और दशकों से बच्चों में कुपोषण कम करने के लिए चल रहे काम में रुकावटें आएंगी।

भारत में साल 2017 में पांच साल से कम उम्र के 10.4 लाख बच्चों की मौतें हुईं। उत्तर प्रदेश में यह संख्या सबसे ज़्यादा (312,800, जिसमें से 165,800 नवजात बच्चे थे) थी, दूसरे नंबर पर बिहार (141,500, जिसमें से 75,300 नवजात बच्चे थे) था। मातृ-कुपोषण के साथ-साथ बाल कुपोषण, इन मौतों की मुख्य वजह थी, पब्लिक हेल्थ फ़ाउंडेशन ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष के. श्रीनाथ रेड्डी ने कहा, “इसमें सुधार के लिए इसे सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।"

इंडियास्पेंड ने स्थिति के आंकलन के लिए उत्तर प्रदेश के चार ज़िलों - गोंडा, बलरामपुर, बहराइच और बाराबंकी के 10 गांवों का दौरा किया। बच्चों, गर्भवती महिलाओं, दिहाड़ी मज़दूरों, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और शिक्षकों, सभी ने हमें बताया कि स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों के बंद होने से बच्चों को पौष्टिक भोजन मिलना बंद हो गया है।

मौजूदा संकट

बाल विकास की विफ़लता को तीन मापदंडों में मापा जाता है- स्टंटिंग (उम्र के हिसाब से छोटा क़द), वेस्टिंग (क़द के हिसाब से कम वज़न) और अंडरवेट (उम्र के हिसाब से कम वज़न)। भारत में 2017 में, पांच साल से कम उम्र के 39% बच्चों का क़द उनकी उम्र के हिसाब से कम था, 16% का वज़न उनके क़द के हिसाब से कम था और 33% का वज़न उनकी उम्र के अनुपात में कम था। उम्र के हिसाब से छोटे क़द के मामले में बिहार और उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा मामले थे, 2000 से 2017 के बीच हुए अध्ययन के रुझानों पर आधारित द लांसेट में प्रकाशित इस तरह के पहले अनुमानों के अनुसार। 

इस महामारी के दौरान नियमित स्वास्थ्य सेवाओं में कमी से दुनिया भर में हर रोज़ पांच साल से कम उम्र के 6,000 बच्चों की मौत हो सकती है, यूनिसेफ़ ने मई 2020 की शुरुआत में यह चेतावनी दी थी। साथ ही यह भी कहा था कि इससे बच्चों में क़द के हिसाब कम वज़न के मामलों में भी बढ़ोत्तरी होगी जो बच्चों की मृत्यु दर का एक बड़ा सूचक है।

इन आंकड़ों ने बाल रोगियों और उनकी मौत के मामले में भारत को कई विकासशील देशों के पीछे खड़ा कर दिया है, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के एक प्रोजेक्ट टूवर्ड्स एडवोकेसी नेटवर्किंग एंड डवेलेपमेंट एक्शन के प्रोजेक्ट फ़ील्ड कॉर्डिनेटर योगेंद्र घोरपड़े ने कहा। "अगर हम कोविड-19 के संक्रमण के दौरान कुपोषण पर ध्यान नहीं देते हैं, तो बच्चों की बीमारियों और उनकी मृत्यु दर को कम करने के हमारे प्रयासों को एक बड़ा झटका लगेगा," उन्होंने आगे कहा।

कोविड से पैदा हुए आर्थिक संकट की वजह से भारत, 2012 से 2030 तक उम्र के हिसाब से छोटे क़द के मामलों को कम करने के विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के लक्ष्य से पीछे रह सकता है, विशेषज्ञों ने कहा। भारत में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत में से 68% मौतों का एक कारण मातृ और बाल कुपोषण भी है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 15 मई, 2020 की अपनी इस रिपोर्ट में बताया था। कोविड-19, कुपोषित बच्चों में मौत का ख़तरा पैदा कर सकता है, यूनिसेफ़ के मुताबिक़

कुपोषण, बच्चों की प्रतिरक्षा प्रणाली को कमज़ोर करता है, जिससे उनके संक्रमित होने का ख़तरा ज़्यादा हो जाता है और इसीलिए "कुपोषण को कोमोरबिडिटी माना जाना चाहिए", योगेंद्र घोरपड़े ने कहा। भारत में कई बच्चे ऐसे कई अन्य संक्रामक रोगों के कारण मर जाते हैं जो सीधे कुपोषण से जुड़े होते हैं। "लॉकडाउन के दौरान भोजन की कमी के कारण, कुपोषण की दर बढ़ेगी और अंततः बच्चों के कोरोनावायरस से संक्रमित होने की आशंका रहेगी", उन्होंने आगे कहा। कुपोषण, बाल मृत्यु में वृद्धि और उत्पादकता में बाधा पैदा करेगा, जो भारत के लिए अच्छी ख़बर नहीं है। जिन बच्चों को ज़रूरी पोषक तत्वों वाला भोजन नहीं मिलता, वह अधिक बीमार पड़ते हैं और कम कमाते हैं। कुपोषण उन्हें ग़रीबी के जाल में फंसाए रखता है, अक्टूबर 2019 की इंडियास्पेंड की इस रिपोर्ट के मुताबिक़।

आंगनबाड़ी केंद्र बंद, आशा और एएनएम को कोविड-19 में लगाया गया 

एकीकृत बाल विकास योजना (आईसीडीएस) द्वारा स्थापित केंद्रों को "बंद कर दिया गया है और पोषण अब सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं है", योगेंद्र ने कहा। इन केंद्रों पर छह साल से कम उम्र के बच्चों और उनकी माताओं को भोजन, प्रीस्कूल शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा, टीकाकरण और स्वास्थ्य चेकअप आदि सेवाएं दी जाती हैं।

आईसीडीएस के तहत, स्थानीय आंगनबाड़ी केंद्रों (राज्य सरकार के ग्रामीण शिशु देखभाल केंद्रों) में कार्यकर्ता बच्चों, गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं और किशोरियों को घर ले जाने के लिए राशन देते हैं।

“इन कठिन परिस्थितियों में कुपोषण के ख़िलाफ लड़ाई में इन महिलाओं [आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की] की भूमिका और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गई है,” अप्रैल 2020 में आई विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया।

आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को कोविड-19 के दौरान संक्रमण फैलने से रोकने के काम में लगाया गया है और पोषण कार्यक्रम पीछे छूट गए हैं। चार ज़िलों के आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने इंडियास्पेंड को बताया कि कोरोनावायरस की वजह से उनके ऊपर काम का इतना बोझ है कि वह पोषण कार्यक्रमों पर ध्यान ही नहीं दे पा रही हैं।

हज़ारों प्रवासी कामगारों के घर लौटने के बाद, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और स्थानीय आशा कार्यकर्ताओं को वापस आए प्रवासी कामगारों का रिकॉर्ड रखने और क्वारंटाइन केंद्रों की निगरानी करने के लिए कहा गया है।

उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले के क़ाज़ीदेवर गांव में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और स्थानीय मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता हाथ धोने का सही तरीक़ा बताते हुए। इस महामारी के दौरान दूसरे कामों की ज़िम्मेदारी की वजह से इन कार्यकर्ताओं के पास पोषण कार्यक्रमों पर ध्यान देने के लिए बहुत कम समय बचता है।

"कई परिवार ऐसे हैं जो नमक और चपाती खाकर गुज़ारा कर रहे हैं", गोंडा के पंडरी कृपाल ब्लॉक के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में एएनएम रचना मिश्रा ने बताया। लेकिन केवल भोजन की उपलब्धता ही समस्या नहीं है। छोटे बच्चों को स्कूलों की तरह, बैठाकर खाना खिलाना चाहिए, लेकिन माता-पिता अक्सर इसका महत्व नहीं समझते। पोषण सेवाओं के लिए डोर-टू-डोर जाने, सलाह देने और समझाने की आवश्यकता होती है, जो काम के इस बोझ के साथ करना मुश्किल है, रचना ने कहा।

"हम क्या खा रहे हैं?"

उत्तर प्रदेश के इन 10 गांवों में, इंडियास्पेंड ने पाया कि अधिकांश कमाने वाले प्रवासी मज़दूर थे, जो हरियाणा, दिल्ली, गुजरात और महाराष्ट्र से लौटे थे और अब उनकी आमदनी का कोई ज़रिया नहीं है।

डब्ल्यूएचओ ने महामारी के दौरान शिशुओं और छोटे बच्चों के भोजन के रूप में ताज़े फल, सब्ज़ियां, फलियां, प्रोटीन और दूध की सलाह दी है।

“अगर कोई मुझे अपने बच्चों को फल और दूध देने के लिए कहता है, तो मैं कैसे दे सकती हूं? गांव में कोई काम नहीं है,” तीन बच्चों की मां किरन देवी (30) ने पूछा। किरन के पति दिल्ली में एक दिहाड़ी मज़दूर हैं, जिनके पास अब कोई काम नहीं है। "मैं केवल उन्हें वह दे सकती हूं जो मेरे बस में है।"

उत्तर प्रदेश के बलरामपुर की रहने वाली किरन देवी पर तीन बच्चों समेत 8 सदस्यों के परिवार को खिलाने-पिलाने की ज़िम्मेदारी है। कोविड-19 के कारण हुए लॉकडाउन में उनके पति का काम छिन गया और अब वह दो वक़्त के खाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

“मैं राजकोट (गुजरात) में एक आटा मिल में काम करता था; लॉकडाउन में जब नौकरी चली गई तो हम लौट आए। मेरे पास राशन कार्ड नहीं है,” बहराइच ज़िले के बारगांव के रामबचन (45) ने बताया। रामबचन को गांव लौटने पर क्वारंटाइन की 14 दिन की अवधि के लिए 15 किलो चावल मिला। उनको अब तक बस यही मिला है जिसके सहारे उनके परिवार के छह सदस्यों ने एक महीना गुज़ारा किया। “हमारे पास बस यही है। हम क्या ख़ुद खाएं और क्या अपने बच्चों को क्या खिलाएं?" रामबचन का सवाल था।

हालांकि केंद्र सरकार का आदेश है कि बिना राशन कार्ड वालों को भी सब्सिडी वाला खाद्यान्न दिया जाए। लेकिन रामबचन का कहना था कि सुबह 7 बजे से ही राशन की दुकानों के बाहर लंबी-लंबी कतारें लग जाती हैं। जिन लोगों से इंडियास्पेंड ने बात की, उन्होंने बताया कि राशन की दुकानों पर राशन कार्ड वाले स्थानीय लोगों को प्राथमिकता दी जाती हैं। जब तक बिना राशन कार्ड वाले लोगों की बारी आती है, तब तक कुछ चीजें जैसे काला चना आदि ख़त्म हो जाता है।

गोंडा की 10 साल की आशा की मां सुनीता यादव ने कहा कि 25 मार्च, 2020 को शुरू हुए लॉकडाउन के बाद से अभी तक उनके परिवार के चार लोगों को 28 अप्रैल, 2020 को 20 किलो चावल मिला है1 उन्हे एक किलो काला चना नहीं मिला है जिसके वह हक़दार थे, क्योंकि राशन की दुकान में स्टॉक ही ख़त्म हो गया। "फ़िलहाल हम आलू और चावल का ही ख़र्च उठा सकते हैं।"

उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले के लालचंदपुर के रहने वाले पांच साल के निज़ामुद्दीन को याद नहीं है कि उनके घर में आख़िरी बार दाल कब बनी थी। उन्हें और उनके भाई को हर दिन मिलने वाले उबले हुए चावल पसंद नहीं हैं।

How to tackle malnutrition during COVID-19 outbreak

India must ensure universal access to PDS and enough ration for all who are in need, said Tata Institute of Social Sciences’ Ghorpade. Frontline health workers’ primary focus must be directed back to nutrition programmes, he added.

PDS shops should distribute iron tablets, health supplements and take-home ration along with regular ration, said Aarti Devi, an accredited social health activist at Balrampur’s Nagwa sub-centre in UP. This single-point-collection will make things easier for people and the anganwadi workers a lot of time.

UNICEF’s suggestions to prevent child wasting:

  • Intensify the public awareness on COVID-19 Infection Prevention and Control measures and protect, promote and support and safe breastfeeding feeding for all children
  • Intensify pre-positioning (with a minimum buffer stock of two months) of essential commodities for nutrition programming and routine medicinal supplies
  • Scale-up preventive distribution of specialised nutritious foods (e.g. fortified flours) for all households with children under the age of two
  • Intensify efforts to strengthen the capacity of mothers and caregivers to detect and monitor their children’s nutritional status using low-literacy/numeracy tools
  • Simplify dosage and distribution schedules of ready-to-use foods and other specialised nutrition foods, as well as potential adaptations to in-patient management for complicated cases in the context of COVID-19
  • Capacity building of community health workers to provide treatment for uncomplicated wasting at the community level

इसी बीच उत्तर प्रदेश सरकार ने 30 मई 2020 के एक आदेश में कहा है कि लॉकडाउन और गर्मियों की छुट्टी के दौरान मिड-डे मील की कन्वर्ज़न राशि छात्रों के माता-पिता के अकाउंट में भेजी जाएगी। इस आदेश में सभी ज़िलों से कहा गया है कि वह 30 जून तक सभी छात्रों के माता-पिता के अकाउंट का विवरण हासिल कर लें। लॉकडाउन की शुरुआत से 30 जून तक रविवार और दूसरी छुट्टियों को छोड़कर कुल 76 दिन की कन्वर्ज़न राशि दी जाएगी। यह राशि प्राइमरी स्कूलों के छात्रों के लिए 374.29 रुपए और अपर प्राइमरी के छात्रों के लिए 581.02 रुपए होगी। 

(साधिका, इंडियास्पेंड में प्रिंसिपल कॉरोसपॉंडेंट हैं, श्रंखला, स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

यह रिपोर्ट IndiaSpend पर 6 जून को प्रकाशित हुई जिसका 13 जून को अपडेट के साथ अनुवाद किया गया। 

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

नई दिल्ली और लखनऊ: चीनी या नमक के साथ मुट्ठी भर चावल ही आजकल 10 साल की आशा यादव का भोजन है। बेहतर दिनों में, उसकी मां उसे उसे चावल के साथ कुछ आलू या दाल भी खिलाती थी। राज्य में कृषि में सबसे पिछड़े और ग़रीब पूर्वी उत्तर प्रदेश के ज़िले गोंडा की रहने वाली आशा उत्तर प्रदेश के उन 1.8 करोड़ बच्चों में शामिल है, जो लॉकडाउन के दौरान स्कूल में दोपहर के भोजन से वंचित हैं।

स्कूल के दिनों में, आशा को मिड-डे मील योजना के तहत कम से कम एक वक़्त का पौष्टिक खाना - चावल, सब्ज़ियां, दूध और फल मिलता था। 24 मार्च, 2020 के बाद से, कोविड-19 और लॉकडाउन की वजह से स्कूल बंद हो गए, और इसके साथ ही स्कूली बच्चों को दोपहर मिलने वाला खाना भी।

इस दौरान, आंगनबाड़ी केंद्र भी बंद हो गए और आंगनबाड़ी और दूसरे स्वास्थ्य कर्मचारियों को विभिन्न स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रमों से हटाकर, कोरोनावायरस से संबंधित कामों में लगा दिया गया। 

पौष्टिक भोजन ना मिलने से बच्चों में कुपोषण बढ़ेगा, जिससे उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और दशकों से बच्चों में कुपोषण कम करने के लिए चल रहे काम में रुकावटें आएंगी।

भारत में साल 2017 में पांच साल से कम उम्र के 10.4 लाख बच्चों की मौतें हुईं। उत्तर प्रदेश में यह संख्या सबसे ज़्यादा (312,800, जिसमें से 165,800 नवजात बच्चे थे) थी, दूसरे नंबर पर बिहार (141,500, जिसमें से 75,300 नवजात बच्चे थे) था। मातृ-कुपोषण के साथ-साथ बाल कुपोषण, इन मौतों की मुख्य वजह थी, पब्लिक हेल्थ फ़ाउंडेशन ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष के. श्रीनाथ रेड्डी ने कहा, “इसमें सुधार के लिए इसे सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।"

इंडियास्पेंड ने स्थिति के आंकलन के लिए उत्तर प्रदेश के चार ज़िलों - गोंडा, बलरामपुर, बहराइच और बाराबंकी के 10 गांवों का दौरा किया। बच्चों, गर्भवती महिलाओं, दिहाड़ी मज़दूरों, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और शिक्षकों, सभी ने हमें बताया कि स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों के बंद होने से बच्चों को पौष्टिक भोजन मिलना बंद हो गया है।

मौजूदा संकट

बाल विकास की विफ़लता को तीन मापदंडों में मापा जाता है- स्टंटिंग (उम्र के हिसाब से छोटा क़द), वेस्टिंग (क़द के हिसाब से कम वज़न) और अंडरवेट (उम्र के हिसाब से कम वज़न)। भारत में 2017 में, पांच साल से कम उम्र के 39% बच्चों का क़द उनकी उम्र के हिसाब से कम था, 16% का वज़न उनके क़द के हिसाब से कम था और 33% का वज़न उनकी उम्र के अनुपात में कम था। उम्र के हिसाब से छोटे क़द के मामले में बिहार और उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा मामले थे, 2000 से 2017 के बीच हुए अध्ययन के रुझानों पर आधारित द लांसेट में प्रकाशित इस तरह के पहले अनुमानों के अनुसार। 

इस महामारी के दौरान नियमित स्वास्थ्य सेवाओं में कमी से दुनिया भर में हर रोज़ पांच साल से कम उम्र के 6,000 बच्चों की मौत हो सकती है, यूनिसेफ़ ने मई 2020 की शुरुआत में यह चेतावनी दी थी। साथ ही यह भी कहा था कि इससे बच्चों में क़द के हिसाब कम वज़न के मामलों में भी बढ़ोत्तरी होगी जो बच्चों की मृत्यु दर का एक बड़ा सूचक है।

इन आंकड़ों ने बाल रोगियों और उनकी मौत के मामले में भारत को कई विकासशील देशों के पीछे खड़ा कर दिया है, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के एक प्रोजेक्ट टूवर्ड्स एडवोकेसी नेटवर्किंग एंड डवेलेपमेंट एक्शन के प्रोजेक्ट फ़ील्ड कॉर्डिनेटर योगेंद्र घोरपड़े ने कहा। "अगर हम कोविड-19 के संक्रमण के दौरान कुपोषण पर ध्यान नहीं देते हैं, तो बच्चों की बीमारियों और उनकी मृत्यु दर को कम करने के हमारे प्रयासों को एक बड़ा झटका लगेगा," उन्होंने आगे कहा।

कोविड से पैदा हुए आर्थिक संकट की वजह से भारत, 2012 से 2030 तक उम्र के हिसाब से छोटे क़द के मामलों को कम करने के विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के लक्ष्य से पीछे रह सकता है, विशेषज्ञों ने कहा। भारत में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत में से 68% मौतों का एक कारण मातृ और बाल कुपोषण भी है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 15 मई, 2020 की अपनी इस रिपोर्ट में बताया था। कोविड-19, कुपोषित बच्चों में मौत का ख़तरा पैदा कर सकता है, यूनिसेफ़ के मुताबिक़

कुपोषण, बच्चों की प्रतिरक्षा प्रणाली को कमज़ोर करता है, जिससे उनके संक्रमित होने का ख़तरा ज़्यादा हो जाता है और इसीलिए "कुपोषण को कोमोरबिडिटी माना जाना चाहिए", योगेंद्र घोरपड़े ने कहा। भारत में कई बच्चे ऐसे कई अन्य संक्रामक रोगों के कारण मर जाते हैं जो सीधे कुपोषण से जुड़े होते हैं। "लॉकडाउन के दौरान भोजन की कमी के कारण, कुपोषण की दर बढ़ेगी और अंततः बच्चों के कोरोनावायरस से संक्रमित होने की आशंका रहेगी", उन्होंने आगे कहा। कुपोषण, बाल मृत्यु में वृद्धि और उत्पादकता में बाधा पैदा करेगा, जो भारत के लिए अच्छी ख़बर नहीं है। जिन बच्चों को ज़रूरी पोषक तत्वों वाला भोजन नहीं मिलता, वह अधिक बीमार पड़ते हैं और कम कमाते हैं। कुपोषण उन्हें ग़रीबी के जाल में फंसाए रखता है, अक्टूबर 2019 की इंडियास्पेंड की इस रिपोर्ट के मुताबिक़।

आंगनबाड़ी केंद्र बंद, आशा और एएनएम को कोविड-19 में लगाया गया 

एकीकृत बाल विकास योजना (आईसीडीएस) द्वारा स्थापित केंद्रों को "बंद कर दिया गया है और पोषण अब सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं है", योगेंद्र ने कहा। इन केंद्रों पर छह साल से कम उम्र के बच्चों और उनकी माताओं को भोजन, प्रीस्कूल शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा, टीकाकरण और स्वास्थ्य चेकअप आदि सेवाएं दी जाती हैं।

आईसीडीएस के तहत, स्थानीय आंगनबाड़ी केंद्रों (राज्य सरकार के ग्रामीण शिशु देखभाल केंद्रों) में कार्यकर्ता बच्चों, गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं और किशोरियों को घर ले जाने के लिए राशन देते हैं।

“इन कठिन परिस्थितियों में कुपोषण के ख़िलाफ लड़ाई में इन महिलाओं [आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की] की भूमिका और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गई है,” अप्रैल 2020 में आई विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया।

आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को कोविड-19 के दौरान संक्रमण फैलने से रोकने के काम में लगाया गया है और पोषण कार्यक्रम पीछे छूट गए हैं। चार ज़िलों के आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने इंडियास्पेंड को बताया कि कोरोनावायरस की वजह से उनके ऊपर काम का इतना बोझ है कि वह पोषण कार्यक्रमों पर ध्यान ही नहीं दे पा रही हैं।

हज़ारों प्रवासी कामगारों के घर लौटने के बाद, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और स्थानीय आशा कार्यकर्ताओं को वापस आए प्रवासी कामगारों का रिकॉर्ड रखने और क्वारंटाइन केंद्रों की निगरानी करने के लिए कहा गया है।

उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले के क़ाज़ीदेवर गांव में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और स्थानीय मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता हाथ धोने का सही तरीक़ा बताते हुए। इस महामारी के दौरान दूसरे कामों की ज़िम्मेदारी की वजह से इन कार्यकर्ताओं के पास पोषण कार्यक्रमों पर ध्यान देने के लिए बहुत कम समय बचता है।

"कई परिवार ऐसे हैं जो नमक और चपाती खाकर गुज़ारा कर रहे हैं", गोंडा के पंडरी कृपाल ब्लॉक के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में एएनएम रचना मिश्रा ने बताया। लेकिन केवल भोजन की उपलब्धता ही समस्या नहीं है। छोटे बच्चों को स्कूलों की तरह, बैठाकर खाना खिलाना चाहिए, लेकिन माता-पिता अक्सर इसका महत्व नहीं समझते। पोषण सेवाओं के लिए डोर-टू-डोर जाने, सलाह देने और समझाने की आवश्यकता होती है, जो काम के इस बोझ के साथ करना मुश्किल है, रचना ने कहा।

"हम क्या खा रहे हैं?"

उत्तर प्रदेश के इन 10 गांवों में, इंडियास्पेंड ने पाया कि अधिकांश कमाने वाले प्रवासी मज़दूर थे, जो हरियाणा, दिल्ली, गुजरात और महाराष्ट्र से लौटे थे और अब उनकी आमदनी का कोई ज़रिया नहीं है।

डब्ल्यूएचओ ने महामारी के दौरान शिशुओं और छोटे बच्चों के भोजन के रूप में ताज़े फल, सब्ज़ियां, फलियां, प्रोटीन और दूध की सलाह दी है।

“अगर कोई मुझे अपने बच्चों को फल और दूध देने के लिए कहता है, तो मैं कैसे दे सकती हूं? गांव में कोई काम नहीं है,” तीन बच्चों की मां किरन देवी (30) ने पूछा। किरन के पति दिल्ली में एक दिहाड़ी मज़दूर हैं, जिनके पास अब कोई काम नहीं है। "मैं केवल उन्हें वह दे सकती हूं जो मेरे बस में है।"

उत्तर प्रदेश के बलरामपुर की रहने वाली किरन देवी पर तीन बच्चों समेत 8 सदस्यों के परिवार को खिलाने-पिलाने की ज़िम्मेदारी है। कोविड-19 के कारण हुए लॉकडाउन में उनके पति का काम छिन गया और अब वह दो वक़्त के खाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

“मैं राजकोट (गुजरात) में एक आटा मिल में काम करता था; लॉकडाउन में जब नौकरी चली गई तो हम लौट आए। मेरे पास राशन कार्ड नहीं है,” बहराइच ज़िले के बारगांव के रामबचन (45) ने बताया। रामबचन को गांव लौटने पर क्वारंटाइन की 14 दिन की अवधि के लिए 15 किलो चावल मिला। उनको अब तक बस यही मिला है जिसके सहारे उनके परिवार के छह सदस्यों ने एक महीना गुज़ारा किया। “हमारे पास बस यही है। हम क्या ख़ुद खाएं और क्या अपने बच्चों को क्या खिलाएं?" रामबचन का सवाल था।

हालांकि केंद्र सरकार का आदेश है कि बिना राशन कार्ड वालों को भी सब्सिडी वाला खाद्यान्न दिया जाए। लेकिन रामबचन का कहना था कि सुबह 7 बजे से ही राशन की दुकानों के बाहर लंबी-लंबी कतारें लग जाती हैं। जिन लोगों से इंडियास्पेंड ने बात की, उन्होंने बताया कि राशन की दुकानों पर राशन कार्ड वाले स्थानीय लोगों को प्राथमिकता दी जाती हैं। जब तक बिना राशन कार्ड वाले लोगों की बारी आती है, तब तक कुछ चीजें जैसे काला चना आदि ख़त्म हो जाता है।

गोंडा की 10 साल की आशा की मां सुनीता यादव ने कहा कि 25 मार्च, 2020 को शुरू हुए लॉकडाउन के बाद से अभी तक उनके परिवार के चार लोगों को 28 अप्रैल, 2020 को 20 किलो चावल मिला है1 उन्हे एक किलो काला चना नहीं मिला है जिसके वह हक़दार थे, क्योंकि राशन की दुकान में स्टॉक ही ख़त्म हो गया। "फ़िलहाल हम आलू और चावल का ही ख़र्च उठा सकते हैं।"

उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले के लालचंदपुर के रहने वाले पांच साल के निज़ामुद्दीन को याद नहीं है कि उनके घर में आख़िरी बार दाल कब बनी थी। उन्हें और उनके भाई को हर दिन मिलने वाले उबले हुए चावल पसंद नहीं हैं।

How to tackle malnutrition during COVID-19 outbreak

India must ensure universal access to PDS and enough ration for all who are in need, said Tata Institute of Social Sciences’ Ghorpade. Frontline health workers’ primary focus must be directed back to nutrition programmes, he added.

PDS shops should distribute iron tablets, health supplements and take-home ration along with regular ration, said Aarti Devi, an accredited social health activist at Balrampur’s Nagwa sub-centre in UP. This single-point-collection will make things easier for people and the anganwadi workers a lot of time.

UNICEF’s suggestions to prevent child wasting:

  • Intensify the public awareness on COVID-19 Infection Prevention and Control measures and protect, promote and support and safe breastfeeding feeding for all children
  • Intensify pre-positioning (with a minimum buffer stock of two months) of essential commodities for nutrition programming and routine medicinal supplies
  • Scale-up preventive distribution of specialised nutritious foods (e.g. fortified flours) for all households with children under the age of two
  • Intensify efforts to strengthen the capacity of mothers and caregivers to detect and monitor their children’s nutritional status using low-literacy/numeracy tools
  • Simplify dosage and distribution schedules of ready-to-use foods and other specialised nutrition foods, as well as potential adaptations to in-patient management for complicated cases in the context of COVID-19
  • Capacity building of community health workers to provide treatment for uncomplicated wasting at the community level

इसी बीच उत्तर प्रदेश सरकार ने 30 मई 2020 के एक आदेश में कहा है कि लॉकडाउन और गर्मियों की छुट्टी के दौरान मिड-डे मील की कन्वर्ज़न राशि छात्रों के माता-पिता के अकाउंट में भेजी जाएगी। इस आदेश में सभी ज़िलों से कहा गया है कि वह 30 जून तक सभी छात्रों के माता-पिता के अकाउंट का विवरण हासिल कर लें। लॉकडाउन की शुरुआत से 30 जून तक रविवार और दूसरी छुट्टियों को छोड़कर कुल 76 दिन की कन्वर्ज़न राशि दी जाएगी। यह राशि प्राइमरी स्कूलों के छात्रों के लिए 374.29 रुपए और अपर प्राइमरी के छात्रों के लिए 581.02 रुपए होगी। 

(साधिका, इंडियास्पेंड में प्रिंसिपल कॉरोसपॉंडेंट हैं, श्रंखला, स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

यह रिपोर्ट IndiaSpend पर 6 जून को प्रकाशित हुई जिसका 13 जून को अपडेट के साथ अनुवाद किया गया। 

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