सरकारी नीतियां प्रवासियों को शहर के बाहरी इलाकों में रहने के लिए मजबूर करती हैं

मुंबई: बड़े शहरों में प्रवासियों के लिए रहना अक्सर कठिनाईयों से भरा होता है। उनमें से ज्यादातर शहरों के बाहरी इलाक़ों में ही रहते हैं। 2011 की जनगणना पर आधारित हाल ही में आए राज्यों के माइग्रेशन डेटा के विश्लेषण के अनुसार, भारत के छह सबसे बड़े शहरों के बाहरी इलाके में प्रवासी रहते हैं। इसके मुख्य कारणों में प्रवासी-विमुख नीतियां,सामाजिक भेदभाव, खराब शहरी व्यवस्था और महंगा रहन-सहन शामिल है।

ये प्रवासी आमतौर पर ड्राइवर, माली और घरेलू कामकाज करते हैं । इससे शहरों की अर्थव्यवस्थाओं को भी बढ़ावा मिलता है। मुंबई स्थित एक गैर-लाभकारी संस्था, >इंडिया माइग्रेशन नाउ के विश्लेषण में पाया गया कि वर्ष 2011 में मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद, चेन्नई, बेंगलुरु और दिल्ली में 6.26 करोड़ प्रवासी आबादी में से 3.34 करोड़ शहरों के बाहरी इलाकों में रहने वाले थे।

शहर के इन बाहरी इलाकों में अक्सर सीमित नागरिक सुविधाएं होती हैं, जो प्रवासियों को मुख्य शहर में अपने लिए अवसर तलाशने में बाधा उत्पन्न करते हैं। और इन्हें ख़राब सेहत और सुविधाओं से दूर वाले इलाकों में रहने के लिए मजबूर करते हैं। 

राज्य के भीतर और दूसरे राज्यों में, प्रवासियों के परिवारों की सामाजिक आर्थिक स्थिति में सुधार करता है । इससे दोनों क्षेत्रों को फायदा पहुंचाता है,  एक, जहां से लोग पलायन करते हैं और दूसरा, जिस राज्य में पलायन करते हैं। इस संबंध में अगस्त 2019 में इंडियास्पेंड की रिपोर्ट में विस्तार से बताया गया है। प्रवासियों की भेजी हुई रकम, उनके के मूल स्थान में गरीबी कम करने में मदद कर सकते हैं।

सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों का शहरों में पलायन समावेशी विकास को बढ़ावा देने के सबसे अच्छे तरीकों में से एक है। यह विकास कम लागत पर शहरी केंद्रों में इन्फ़्रास्ट्रक्चर खड़ा करके, रोजगार पैदा करके, और सुदूर और दुर्गम क्षेत्रों से आबादी की आवाजाही को सुगम बना कर हो सकता है।

लेकिन अध्ययन के अनुसार, आर्थिक विकास के समान पैमाने पर भारत में अंतरराज्यीय पलायन अन्य देशों की तुलना में कम है। 2016 के विश्व बैंक के एक अध्ययन में देश के कई हिस्सों में प्रवासी-विमुख नीतियों को आंशिक रूप से इसके लिए जिम्मेदार ठहराया है, जिससे प्रवासी शहरों के बाहरी इलाकों में रहने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

शहरी समूह

जनगणना के अनुसार, भारी आबादी वाले महानगरो और उनके आसपास के शहरों का लागातार विस्तार हो रहा है।  जैसे मुंबई में सेंट्रल रेलवे कॉलोनी  या दिल्ली के मामले में नोएडा।

70 लाख तक की शहरी जनसंख्या का ये फैलाव आमतौर पर कई जिलों में फैला होता है, जो अलग अलग शहरी निकायों के अंतर्गत आते हैं। 

शहरी समूह में एक बड़ा शहर और इसके आस-पास के क्षेत्र शामिल होते हैं

‘द इंडिया माइग्रेशन नाउ’ ने 2011 की जनगणना पर आधारित इस विश्लेषण को दो भागों में बांटा है। नगर और उपनगर। जिन्हें शहरी से दूरी, जनसंख्या, शहरी निकाय, गैर-कृषि गतिविधियों में लगे श्रमिकों के अनुपात और शहरीकरण की प्रकृति के आधार पर बांटा गया है।

उदाहरण के लिए, कोलकाता महानगर क्षेत्र में, कोलकाता और हावड़ा जिलों को शहरी केंद्र के रूप में वर्गीकृत किया गया था, क्योंकि वहां नगर निगम हैं, निर्मित क्षेत्र का उच्च प्रतिशत है और कम ग्रामीण आबादी है। निर्मित क्षेत्र के कम प्रतिशत, उच्च ग्रामीण आबादी और कोई नगर निगम नहीं होने पर उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, नादिया और हुगली जिलों को उपनगर के तौर पर वर्गीकृत किया गया था।

भीड़ वाले शहर

2001 और 2011 में, हैदराबाद, चेन्नई, कोलकाता और मुंबई में शहर के बाहरी हिस्सों में बसने वाले प्रवासियों का अनुपात, शहरी में बसने वाले प्रवासियों से ज्यादा था।

केवल दो शहरी क्षेत्रों में ऐसा नहीं था। दिल्ली में 1.25 करोड़ प्रवासी शहर में बसे हुए थे और 13 लाख बाहरी क्षेत्र में बेंगलुरु में 51 लाख प्रवासी शहर में और 859,030 लोग बाहरी क्षेत्र में बसे हुए थे।   

शहर से बाहर जनसंख्या का फैलाव बेंगलुरु के लिए नया प्रचलन है ।आबादी का फैलाव,  बेंगलुरु शहर से बाहर बेंगलुरु ग्रामीण और रामनगर जिलों तक हाल ही में फैला है। यह समझा सकता है कि प्रवासियों को आकर्षित करने के मामले में यह शहर अभी तक अपने अंतिम पड़ाव तक क्यों नहीं पहुंच पाया है।

एनसीआर प्लानिंग बोर्ड के अनुसार नेशनल कैपिटल रीजन (एनसीआर) में और नेशनल कैपिटल टेरेटरी ( एनसीटी) के साथ हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के 23 अन्य शहर शामिल हैं। इस विश्लेषण में दिल्ली शहरी समूह में केवल एनसीटी, दिल्ली और इससे लगे सीमावर्ती जिले शामिल हैं। दिल्ली एनसीटी से ही एनसीआर के विभिन्न शहरी केंद्रों (गुरुग्राम, गाजियाबाद, गौतम बुद्ध नगर) की ओर लोगों के जाने से एनसीआर के शहरी भागों में पलायन की 6.3% (783,474) हिस्सेदारी है।

वर्ष 2001 औऱ 2011 के बीच, मुंबई के मूल में, पलायन ज्यादातर स्थिर रहा (52 लाख से 55 लाख तक)। लेकिन 2001 में इसके उपनगरोंं में पलायन 56 लाख था जो 2011 में बढ़कर 89 लाख तक पहुंच गयाहै। एक दशक में, किसी भी दसूरे बड़े शहर में इतना कम पलायन नहीं हुआ।

आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय की 2009 की मुंबई मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार, 19वी शताब्दि के बाद  से मुंबई के शहरीकरण और उसके विकास में प्रवासियों की अहम भागीदारी रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि, हाल के वर्षों में,  रहने की जगह और जनसंख्या का अनुपात मुख्य शहर में अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहा है, जिससे झुग्गियां और भीड़-भाड़ बढ़ती जा रही है।

Source: India Migration Now

इंडिया माइग्रेशन नाउ का यह डैशबोर्ड 2001 और 2011 में मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, हैदराबाद, चेन्नई और बेंगलुरु के शहरी और उपनगरों में पलायन को दिखाता है।

प्रवासियों से भेदभाव

दिल्ली के एक टिंक टैंक, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के एक 2019 के पेपर के अनुसार उपनगरों में अधिक से अधिक प्रवासियों और कुछ स्थानीय लोगों के जाने के कारणों में से एक है मुख्य शहर में रहने की बढ़ती लागत, खासकर रहने के लिए घर पर जो खर्च होता है, उसे वहन करना अक्सर मुश्किल होता है।

राज्य के बाहर के प्रवासियों के लिए राज्य-स्तरीय नीतियों का विश्लेषण करने वाले, इंडिया माइग्रेशन नाउ के इंटरस्टेट माइग्रेंट पॉलिसी इंडेक्स 2019 (IMPEX 2019) के अनुसार, रहने की उच्च लागत के अलावा अस्थायी और स्थायी आवास के लिए सरकारी योजनाएं अंतरराज्यीय प्रवासियों के लिए नहीं हैं। प्रवासी अक्सर झुग्गियों और अस्थायी आवासों में रहते हैं और किसी भी तरह के पुनर्वास, मुआवजा या नोटिस के बिना उन्हें अक्सर बाहर निकलने के लिए मजबूर किया जाता है। यह भी एक कारण है कि वे बाहरी इलाके में रहने के लिए मजबूर होते हैं।

दिल्ली के कानूनी सहायता संगठन, ‘ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क’ की इस 2018 रिपोर्ट के अनुसार, प्राइम सिटी प्रॉपर्टी को लेकर यह धारणा कि शहरी गरीब ग़ैरक़ानूनी हैं और ज़मीनों पर कब्ज़ा करते हैं। इस पर राज्य की तरफ़ से बड़े पैमाने पर "शहर सौंदर्यीकरण" ड्राइव और झुग्गी पुनर्वास परियोजनाओं शुरु की गईं। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे प्रमुख शहरों से बड़ी संख्या में लोग बाहर जाने को मजबूर हुए हैं।

2012 में ‘इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली’ में प्रकाशित एक अध्ययन और बेंगलुरु के ‘इंडियन इंस्ट्यूट ऑफ मैनेजमेंट’ के 2018 के एक वर्किंग पेपर में कहा गया कि जाति और धर्म के आधार पर आवासों को बांटना अक्सर प्रवास की स्थिति में होता है। यह भी प्रवासियों को उपनगरीय क्षेत्रों में जाने के लिए मजबूर करता है। 

मुस्लिमों और हिंदू दलितों (ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदाय मानी जाने वाली जातियां) के बीच पलायन की प्रवृत्ति, शहरी इलाकों में कम पहुंच की तरफ़ इशारा करती है। जर्नल एरिया डेवलप्मेंट एंड पॉलिसी’ में प्रकाशित 2019 के एक अध्ययन के विश्लेषण में बताया गया है कि इसके पीछे कई कारण हैं, उसमें से एक है हाउसिंग सोसाइटी का भेदभाव करना।

कईं बड़े राज्यों ने तो प्रवासी विरोधी नीतियां अपनाई हुई हैं। जैसे रोजगार, शिक्षा और सरकारी सुविधाओं में राज्य के के मूल निवासियों के लिए आरक्षण आदि। उदाहरण के लिए, जुलाई 2019 में, आंध्र प्रदेश ने उद्योग और कारखाना विधेयक पारित किया, जिसके तहत कारखानों में स्थानीय लोगों के लिए नौकरियों में 75% आरक्षण देने का प्रावधान किया गया।

महाराष्ट्र में, 2008 के बाद से 80% गैर-सुपरवाइजर नौकरियां और 50% सुपरवाइजर नौकरियां राज्य के मूल निवासियों के लिए आरक्षित हैं। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी-शिवसेना गठबंधन ने कोटा आधारित कानून को बेहतर तरीके से लागू करने और अनुबंध आधारित नौकरियों के लिए कानून के विस्तार की संभावना बताई है, और अगस्त 2019 में प्रकाशित द टाइम्स ऑफ इंडिया की इस रिपोर्ट में ये बताया गया है।

दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए अपने घोषणापत्र में लिखा था कि वह स्थानीय लोगों के लिए 85% नौकरियों को आरक्षित करेगी। द टाइम्स ऑफ इंडिया की फरवरी 2019 की एक रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक सरकार ने कहा कि वह निजी कंपनियों में राज्य के मूल निवासियों के लिए 100% आरक्षण को लागू करेगी। ये सभी राज्य बड़ी संख्या में प्रवासियों के ठिकाने हैं, जो शहरी क्षेत्रों के बाहरी हिस्सों में रहते हैं और काम करते हैं।

स्वास्थ्य और स्वच्छता की सुविधाओं का समान ना होना

2019 इम्पेक्स विश्लेषण में पाया गया है कि राज्य सरकारों की स्वास्थ्य योजनाओं और केंद्र सरकार के स्वास्थ्य कार्यक्रमों मे प्रवासियों की हिस्सेदारी नहीं है और प्रवासियों की स्वास्थ्य सुविधाओं तक अपर्याप्त पहुंच है।

2016 के एक अध्ययन के अनुसार, मुंबई में आंतरिक महिला प्रवासियों ने प्रसव के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं का कम उपयोग किया। उन्हें प्रसवपूर्व देखभाल की सुविधा भी कम मिली है।

अहमदाबाद में एक निर्माण स्थल पर प्रवासियों पर किए गए 2019 के अध्ययन के अनुसार, सब्सिडी वाले भोजन की कमी के कारण प्रवासी परिवार पोषण वाला भोजन नहीं मिल पाता है और सरकार की उपलब्ध बाल विकास सेवाओं तक पहुंच न होने के कारण उनके बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।

विश्व बैंक की 2013 की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि, इंफ्रास्ट्रक्चर्ल तक पहुंच जैसे कि पानी की आपूर्ति, कचरे के प्रबंधन, स्वच्छता और परिवहन सुविधाएं, शहर से दूर होने के कारण कम हो जाती हैं। इस इन्फ़्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण बाहरी इलाकों में रहने वाले पारिस्थितिक, मनोवैज्ञानिक और आर्थिक रुप से प्रभावित होते हैं। उदाहरण के लिए, बेंगलुरु में, नेटवर्क सेवाएं जैसे कि पाइप्ड पानी तक पहुंच मुख्य शहर तक सीमित है और और पाइप्ड पानी की पहुंच का स्तर बाहरी क्षेत्र में तेजी से गिर रहा है, जैसा कि रिपोर्ट में कहा गया है।

हैदराबाद स्थित एक पॉलिसी इंस्टिट्यूट, ‘साउथ एशिया कंसोर्शियम फॉर इंटरडिसिप्लिनरी वाटर रिसोर्स स्टडीज’ के एक अध्ययन अनुसार, "हैदराबाद में, पानी के संसाधनों के मामले में उपनगरों के समृद्ध होने के बावजूद, यहां रहने वाले लोग, अमीर शहरी मूल आबादी से पीछे रह जाते हैं, क्योंकि समृद्ध लोगों के पास पानी खरीदने की ज्यादा शक्ति होती है।”

चेन्नई के उपनगरों में भी इसी तरह के मुद्दे मौजूद हैं। विशेष रूप से कचरे का प्रबंधन, भूजल की कमी और खारापन। जैसा कि अमेरिका की एक गैर-लाभकारी संस्था, ‘यूनाइटेड स्टेट्स ईस्ट-वेस्ट सेंटर’ के 2014 के एक अध्ययन में बताया गया है।

‘ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन’ की 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, उपनगरों में पुलिस और यातायात की स्थिति भी खराब है।

उपेक्षित उपनगरीय क्षेत्र

उपनगरीय क्षेत्रों में, जो बड़े पैमाने पर शहरी और ग्रामीण दोनों प्रशासनों से उपेक्षित हैं, अक्सर इस बात को लेकर असमंजस की स्थिति बनी रहती है कि सार्वजनिक सेवाओं के लिए कौन जिम्मेदार है: पंचायत या नगरपालिका या सरकार? इन मुद्दों का उल्लेख ‘इंटरनेशनल जर्नल ऑफ इंजीनियरिंग रिसर्च एंड टेक्नोलोजी’ में प्रकाशित 2015 के एक पेपर में किया गया है।

बेंगलुरु के ‘इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल एंड इकोनॉमिक चेंज’ की मृणालिनी गोस्वामी के 2018 वर्किंग पेपर के अनुसार, “भारतीय शहरों के लिए मास्टर प्लान अक्सर उपनगरों को मान्यता तो देते हैं, लेकिन उन्हें अनियंत्रित छोड़ देते हैं। इसका एक कारण शहरी प्लानिंग और स्थानीय प्रशासन के बीच एकरूपता की कमी है।”

उदाहरण के लिए, 1985 के मॉडल रिजनल और टाउन प्लानिंग एंड डेवलपमेंट लॉ के तहत, मेट्रोपॉलिटन प्लानिंग कमेटी (एमपीसी) के निर्वाचित अधिकारियों को शहरी क्षेत्रों के लिए क्षेत्रीय विकास योजनाओं को तैयार करना चाहिए। संविधान का 74 वां संशोधन कहता है कि कम से कम दो-तिहाई एमपीसी का चुनाव होना चाहिए या इसमें क्षेत्र में नगर पालिकाओं और पंचायतों के चुने सदस्य शामिल होने चाहिए।

फिर भी, बेंगलूरु विकास प्राधिकरण की गैर-निर्वाचित नौकरशाही मास्टर प्लान तैयार करने के लिए ख़ुद ही इंचार्ज बनी रही। नतीजतन, योजना सार्वजनिक भागीदारी के बिना बनी और  शहरों के बाहरी हिस्सों में बसे लोगों की तेजी से बदलती जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ है। 2013 के विश्व बैंक के एक अध्ययन के अनुसार, विभिन्न सरकारी निकायों के बीच समन्वय की कमी भी नागरिकों तक सेवाओं की पहुंच को प्रभावित करता है।

सामाजिक भेदभाव

अक्सर, उपनगरीय क्षेत्रों की वजह से जाति या धार्मिक भेदभाव और बढ़ गए हैं, भले ही मुख्य शहर अधिक सहिष्णु हुए हैं। उदाहरण के लिए, अप्रैल 2019 में प्रकाशित इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, मुंबई के बाहरी इलाक़े में स्थित रायगढ़ जिले में जाति-आधारित संघर्ष और भेदभाव के मामले हुए हैं।

इसी तरह, ठाणे जिले में, जो मुंबई के बाहरी हिस्से में आता है, जब उम्मीदवार चुनने की बात आती है तो राजनीतिक दल, अन्य सभी मापदंडों की तुलना में जाति को ज्यादा महत्व देते हैं, जैसा कि अप्रैल 2019 में टाइम्स ऑफ इंडिया की इस रिपोर्ट से पता चलता है।

अंतरराज्यीय प्रवास की गति धीमी

आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि 1991 से 2011 के बीच, पहले के दशक की तुलना में अधिक भारतीयों ने पलायन किया है। 2011 में, 45.36 करोड़ लोगों ने पलायन किया था, जो कि 2001 के 31.45 करोड़ लोगों की तुलना में 1.4 गुना है।

फिर भी, भारत में अंतरराज्यीय पलायन पिछले दो दशकों में धीमा हो गया, जो 2011 में 5.4 करोड़ था। अगर तुलनात्मक रुप से देखा जाए तो यह 1991 और 2001 के बीच पलायन में 55% की वृद्धि हुई है।

पलायन करने वाले शहर की पसंद कई कारणों पर निर्भर करती है, जैसे कि गृहनगर के लिए निकटता, काम की उपलब्धता और पहुंच। उदाहरण के लिए, कर्नाटक का गुलबर्गा, महाराष्ट्र और तेलंगाना के करीब है और यहां से लोग मुंबई, पुणे, हैदराबाद और बेंगलुरु जाते हैं। ऐतिहासिक पलायन रुझान, प्रवासी नेटवर्क और शहर के इन्फ़्रास्ट्रक्चर भी प्रवासियों को प्रभावित करते हैं। हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कई लोग दिल्ली पलायन करते हैं, उत्तर प्रदेश और बिहार से मुंबई, और राजस्थान से चेन्नई और कोलकाता तक जाते हैं, जैसा कि जनगणना के आंकड़ों से पता चलता है।

नई नीतियों की आवश्यकता

प्रवासी-विमुख नीतियों के साथ, गरीबों का शहरी केंद्रों में शिफ़्ट होना कठिन हो गया है। इससे निपटने के लिए भारत को दीर्घकालिक समावेशी नीति की जरुरत है जो शहरों और उपनगरीय क्षेत्रों में प्रवासियों के मुद्दों का हल निकाले।

किराये के घर जैसी सेवाओं का प्रावधान, शहरी और उपनगरीय दोनों क्षेत्रों में सेवा वितरण प्रणाली में सुधार, शहरी निकायों के बीच बेहतर समन्वय -शहरी समूहों को आर्थिक रूप से तेजी से बढ़ने और प्रवासी आबादी को अधिक सहायता प्रदान करने में मदद कर सकता है।

(मित्रा, दामले और वार्ष्णेय रिसर्चर हैं और मुंबई स्थित गैर-लाभकारी संस्था, ‘इंडिया माइग्रेज नाउ ’ के साथ जुड़े हैं।)

यह आलेख> मूलत: अंग्रेजी में 26 अक्टूबर 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है। 

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मुंबई: बड़े शहरों में प्रवासियों के लिए रहना अक्सर कठिनाईयों से भरा होता है। उनमें से ज्यादातर शहरों के बाहरी इलाक़ों में ही रहते हैं। 2011 की जनगणना पर आधारित हाल ही में आए राज्यों के माइग्रेशन डेटा के विश्लेषण के अनुसार, भारत के छह सबसे बड़े शहरों के बाहरी इलाके में प्रवासी रहते हैं। इसके मुख्य कारणों में प्रवासी-विमुख नीतियां,सामाजिक भेदभाव, खराब शहरी व्यवस्था और महंगा रहन-सहन शामिल है।

ये प्रवासी आमतौर पर ड्राइवर, माली और घरेलू कामकाज करते हैं । इससे शहरों की अर्थव्यवस्थाओं को भी बढ़ावा मिलता है। मुंबई स्थित एक गैर-लाभकारी संस्था, >इंडिया माइग्रेशन नाउ के विश्लेषण में पाया गया कि वर्ष 2011 में मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद, चेन्नई, बेंगलुरु और दिल्ली में 6.26 करोड़ प्रवासी आबादी में से 3.34 करोड़ शहरों के बाहरी इलाकों में रहने वाले थे।

शहर के इन बाहरी इलाकों में अक्सर सीमित नागरिक सुविधाएं होती हैं, जो प्रवासियों को मुख्य शहर में अपने लिए अवसर तलाशने में बाधा उत्पन्न करते हैं। और इन्हें ख़राब सेहत और सुविधाओं से दूर वाले इलाकों में रहने के लिए मजबूर करते हैं। 

राज्य के भीतर और दूसरे राज्यों में, प्रवासियों के परिवारों की सामाजिक आर्थिक स्थिति में सुधार करता है । इससे दोनों क्षेत्रों को फायदा पहुंचाता है,  एक, जहां से लोग पलायन करते हैं और दूसरा, जिस राज्य में पलायन करते हैं। इस संबंध में अगस्त 2019 में इंडियास्पेंड की रिपोर्ट में विस्तार से बताया गया है। प्रवासियों की भेजी हुई रकम, उनके के मूल स्थान में गरीबी कम करने में मदद कर सकते हैं।

सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों का शहरों में पलायन समावेशी विकास को बढ़ावा देने के सबसे अच्छे तरीकों में से एक है। यह विकास कम लागत पर शहरी केंद्रों में इन्फ़्रास्ट्रक्चर खड़ा करके, रोजगार पैदा करके, और सुदूर और दुर्गम क्षेत्रों से आबादी की आवाजाही को सुगम बना कर हो सकता है।

लेकिन अध्ययन के अनुसार, आर्थिक विकास के समान पैमाने पर भारत में अंतरराज्यीय पलायन अन्य देशों की तुलना में कम है। 2016 के विश्व बैंक के एक अध्ययन में देश के कई हिस्सों में प्रवासी-विमुख नीतियों को आंशिक रूप से इसके लिए जिम्मेदार ठहराया है, जिससे प्रवासी शहरों के बाहरी इलाकों में रहने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

शहरी समूह

जनगणना के अनुसार, भारी आबादी वाले महानगरो और उनके आसपास के शहरों का लागातार विस्तार हो रहा है।  जैसे मुंबई में सेंट्रल रेलवे कॉलोनी  या दिल्ली के मामले में नोएडा।

70 लाख तक की शहरी जनसंख्या का ये फैलाव आमतौर पर कई जिलों में फैला होता है, जो अलग अलग शहरी निकायों के अंतर्गत आते हैं। 

शहरी समूह में एक बड़ा शहर और इसके आस-पास के क्षेत्र शामिल होते हैं

‘द इंडिया माइग्रेशन नाउ’ ने 2011 की जनगणना पर आधारित इस विश्लेषण को दो भागों में बांटा है। नगर और उपनगर। जिन्हें शहरी से दूरी, जनसंख्या, शहरी निकाय, गैर-कृषि गतिविधियों में लगे श्रमिकों के अनुपात और शहरीकरण की प्रकृति के आधार पर बांटा गया है।

उदाहरण के लिए, कोलकाता महानगर क्षेत्र में, कोलकाता और हावड़ा जिलों को शहरी केंद्र के रूप में वर्गीकृत किया गया था, क्योंकि वहां नगर निगम हैं, निर्मित क्षेत्र का उच्च प्रतिशत है और कम ग्रामीण आबादी है। निर्मित क्षेत्र के कम प्रतिशत, उच्च ग्रामीण आबादी और कोई नगर निगम नहीं होने पर उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, नादिया और हुगली जिलों को उपनगर के तौर पर वर्गीकृत किया गया था।

भीड़ वाले शहर

2001 और 2011 में, हैदराबाद, चेन्नई, कोलकाता और मुंबई में शहर के बाहरी हिस्सों में बसने वाले प्रवासियों का अनुपात, शहरी में बसने वाले प्रवासियों से ज्यादा था।

केवल दो शहरी क्षेत्रों में ऐसा नहीं था। दिल्ली में 1.25 करोड़ प्रवासी शहर में बसे हुए थे और 13 लाख बाहरी क्षेत्र में बेंगलुरु में 51 लाख प्रवासी शहर में और 859,030 लोग बाहरी क्षेत्र में बसे हुए थे।   

शहर से बाहर जनसंख्या का फैलाव बेंगलुरु के लिए नया प्रचलन है ।आबादी का फैलाव,  बेंगलुरु शहर से बाहर बेंगलुरु ग्रामीण और रामनगर जिलों तक हाल ही में फैला है। यह समझा सकता है कि प्रवासियों को आकर्षित करने के मामले में यह शहर अभी तक अपने अंतिम पड़ाव तक क्यों नहीं पहुंच पाया है।

एनसीआर प्लानिंग बोर्ड के अनुसार नेशनल कैपिटल रीजन (एनसीआर) में और नेशनल कैपिटल टेरेटरी ( एनसीटी) के साथ हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के 23 अन्य शहर शामिल हैं। इस विश्लेषण में दिल्ली शहरी समूह में केवल एनसीटी, दिल्ली और इससे लगे सीमावर्ती जिले शामिल हैं। दिल्ली एनसीटी से ही एनसीआर के विभिन्न शहरी केंद्रों (गुरुग्राम, गाजियाबाद, गौतम बुद्ध नगर) की ओर लोगों के जाने से एनसीआर के शहरी भागों में पलायन की 6.3% (783,474) हिस्सेदारी है।

वर्ष 2001 औऱ 2011 के बीच, मुंबई के मूल में, पलायन ज्यादातर स्थिर रहा (52 लाख से 55 लाख तक)। लेकिन 2001 में इसके उपनगरोंं में पलायन 56 लाख था जो 2011 में बढ़कर 89 लाख तक पहुंच गयाहै। एक दशक में, किसी भी दसूरे बड़े शहर में इतना कम पलायन नहीं हुआ।

आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय की 2009 की मुंबई मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार, 19वी शताब्दि के बाद  से मुंबई के शहरीकरण और उसके विकास में प्रवासियों की अहम भागीदारी रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि, हाल के वर्षों में,  रहने की जगह और जनसंख्या का अनुपात मुख्य शहर में अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहा है, जिससे झुग्गियां और भीड़-भाड़ बढ़ती जा रही है।

Source: India Migration Now

इंडिया माइग्रेशन नाउ का यह डैशबोर्ड 2001 और 2011 में मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, हैदराबाद, चेन्नई और बेंगलुरु के शहरी और उपनगरों में पलायन को दिखाता है।

प्रवासियों से भेदभाव

दिल्ली के एक टिंक टैंक, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के एक 2019 के पेपर के अनुसार उपनगरों में अधिक से अधिक प्रवासियों और कुछ स्थानीय लोगों के जाने के कारणों में से एक है मुख्य शहर में रहने की बढ़ती लागत, खासकर रहने के लिए घर पर जो खर्च होता है, उसे वहन करना अक्सर मुश्किल होता है।

राज्य के बाहर के प्रवासियों के लिए राज्य-स्तरीय नीतियों का विश्लेषण करने वाले, इंडिया माइग्रेशन नाउ के इंटरस्टेट माइग्रेंट पॉलिसी इंडेक्स 2019 (IMPEX 2019) के अनुसार, रहने की उच्च लागत के अलावा अस्थायी और स्थायी आवास के लिए सरकारी योजनाएं अंतरराज्यीय प्रवासियों के लिए नहीं हैं। प्रवासी अक्सर झुग्गियों और अस्थायी आवासों में रहते हैं और किसी भी तरह के पुनर्वास, मुआवजा या नोटिस के बिना उन्हें अक्सर बाहर निकलने के लिए मजबूर किया जाता है। यह भी एक कारण है कि वे बाहरी इलाके में रहने के लिए मजबूर होते हैं।

दिल्ली के कानूनी सहायता संगठन, ‘ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क’ की इस 2018 रिपोर्ट के अनुसार, प्राइम सिटी प्रॉपर्टी को लेकर यह धारणा कि शहरी गरीब ग़ैरक़ानूनी हैं और ज़मीनों पर कब्ज़ा करते हैं। इस पर राज्य की तरफ़ से बड़े पैमाने पर "शहर सौंदर्यीकरण" ड्राइव और झुग्गी पुनर्वास परियोजनाओं शुरु की गईं। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे प्रमुख शहरों से बड़ी संख्या में लोग बाहर जाने को मजबूर हुए हैं।

2012 में ‘इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली’ में प्रकाशित एक अध्ययन और बेंगलुरु के ‘इंडियन इंस्ट्यूट ऑफ मैनेजमेंट’ के 2018 के एक वर्किंग पेपर में कहा गया कि जाति और धर्म के आधार पर आवासों को बांटना अक्सर प्रवास की स्थिति में होता है। यह भी प्रवासियों को उपनगरीय क्षेत्रों में जाने के लिए मजबूर करता है। 

मुस्लिमों और हिंदू दलितों (ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदाय मानी जाने वाली जातियां) के बीच पलायन की प्रवृत्ति, शहरी इलाकों में कम पहुंच की तरफ़ इशारा करती है। जर्नल एरिया डेवलप्मेंट एंड पॉलिसी’ में प्रकाशित 2019 के एक अध्ययन के विश्लेषण में बताया गया है कि इसके पीछे कई कारण हैं, उसमें से एक है हाउसिंग सोसाइटी का भेदभाव करना।

कईं बड़े राज्यों ने तो प्रवासी विरोधी नीतियां अपनाई हुई हैं। जैसे रोजगार, शिक्षा और सरकारी सुविधाओं में राज्य के के मूल निवासियों के लिए आरक्षण आदि। उदाहरण के लिए, जुलाई 2019 में, आंध्र प्रदेश ने उद्योग और कारखाना विधेयक पारित किया, जिसके तहत कारखानों में स्थानीय लोगों के लिए नौकरियों में 75% आरक्षण देने का प्रावधान किया गया।

महाराष्ट्र में, 2008 के बाद से 80% गैर-सुपरवाइजर नौकरियां और 50% सुपरवाइजर नौकरियां राज्य के मूल निवासियों के लिए आरक्षित हैं। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी-शिवसेना गठबंधन ने कोटा आधारित कानून को बेहतर तरीके से लागू करने और अनुबंध आधारित नौकरियों के लिए कानून के विस्तार की संभावना बताई है, और अगस्त 2019 में प्रकाशित द टाइम्स ऑफ इंडिया की इस रिपोर्ट में ये बताया गया है।

दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए अपने घोषणापत्र में लिखा था कि वह स्थानीय लोगों के लिए 85% नौकरियों को आरक्षित करेगी। द टाइम्स ऑफ इंडिया की फरवरी 2019 की एक रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक सरकार ने कहा कि वह निजी कंपनियों में राज्य के मूल निवासियों के लिए 100% आरक्षण को लागू करेगी। ये सभी राज्य बड़ी संख्या में प्रवासियों के ठिकाने हैं, जो शहरी क्षेत्रों के बाहरी हिस्सों में रहते हैं और काम करते हैं।

स्वास्थ्य और स्वच्छता की सुविधाओं का समान ना होना

2019 इम्पेक्स विश्लेषण में पाया गया है कि राज्य सरकारों की स्वास्थ्य योजनाओं और केंद्र सरकार के स्वास्थ्य कार्यक्रमों मे प्रवासियों की हिस्सेदारी नहीं है और प्रवासियों की स्वास्थ्य सुविधाओं तक अपर्याप्त पहुंच है।

2016 के एक अध्ययन के अनुसार, मुंबई में आंतरिक महिला प्रवासियों ने प्रसव के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं का कम उपयोग किया। उन्हें प्रसवपूर्व देखभाल की सुविधा भी कम मिली है।

अहमदाबाद में एक निर्माण स्थल पर प्रवासियों पर किए गए 2019 के अध्ययन के अनुसार, सब्सिडी वाले भोजन की कमी के कारण प्रवासी परिवार पोषण वाला भोजन नहीं मिल पाता है और सरकार की उपलब्ध बाल विकास सेवाओं तक पहुंच न होने के कारण उनके बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।

विश्व बैंक की 2013 की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि, इंफ्रास्ट्रक्चर्ल तक पहुंच जैसे कि पानी की आपूर्ति, कचरे के प्रबंधन, स्वच्छता और परिवहन सुविधाएं, शहर से दूर होने के कारण कम हो जाती हैं। इस इन्फ़्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण बाहरी इलाकों में रहने वाले पारिस्थितिक, मनोवैज्ञानिक और आर्थिक रुप से प्रभावित होते हैं। उदाहरण के लिए, बेंगलुरु में, नेटवर्क सेवाएं जैसे कि पाइप्ड पानी तक पहुंच मुख्य शहर तक सीमित है और और पाइप्ड पानी की पहुंच का स्तर बाहरी क्षेत्र में तेजी से गिर रहा है, जैसा कि रिपोर्ट में कहा गया है।

हैदराबाद स्थित एक पॉलिसी इंस्टिट्यूट, ‘साउथ एशिया कंसोर्शियम फॉर इंटरडिसिप्लिनरी वाटर रिसोर्स स्टडीज’ के एक अध्ययन अनुसार, "हैदराबाद में, पानी के संसाधनों के मामले में उपनगरों के समृद्ध होने के बावजूद, यहां रहने वाले लोग, अमीर शहरी मूल आबादी से पीछे रह जाते हैं, क्योंकि समृद्ध लोगों के पास पानी खरीदने की ज्यादा शक्ति होती है।”

चेन्नई के उपनगरों में भी इसी तरह के मुद्दे मौजूद हैं। विशेष रूप से कचरे का प्रबंधन, भूजल की कमी और खारापन। जैसा कि अमेरिका की एक गैर-लाभकारी संस्था, ‘यूनाइटेड स्टेट्स ईस्ट-वेस्ट सेंटर’ के 2014 के एक अध्ययन में बताया गया है।

‘ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन’ की 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, उपनगरों में पुलिस और यातायात की स्थिति भी खराब है।

उपेक्षित उपनगरीय क्षेत्र

उपनगरीय क्षेत्रों में, जो बड़े पैमाने पर शहरी और ग्रामीण दोनों प्रशासनों से उपेक्षित हैं, अक्सर इस बात को लेकर असमंजस की स्थिति बनी रहती है कि सार्वजनिक सेवाओं के लिए कौन जिम्मेदार है: पंचायत या नगरपालिका या सरकार? इन मुद्दों का उल्लेख ‘इंटरनेशनल जर्नल ऑफ इंजीनियरिंग रिसर्च एंड टेक्नोलोजी’ में प्रकाशित 2015 के एक पेपर में किया गया है।

बेंगलुरु के ‘इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल एंड इकोनॉमिक चेंज’ की मृणालिनी गोस्वामी के 2018 वर्किंग पेपर के अनुसार, “भारतीय शहरों के लिए मास्टर प्लान अक्सर उपनगरों को मान्यता तो देते हैं, लेकिन उन्हें अनियंत्रित छोड़ देते हैं। इसका एक कारण शहरी प्लानिंग और स्थानीय प्रशासन के बीच एकरूपता की कमी है।”

उदाहरण के लिए, 1985 के मॉडल रिजनल और टाउन प्लानिंग एंड डेवलपमेंट लॉ के तहत, मेट्रोपॉलिटन प्लानिंग कमेटी (एमपीसी) के निर्वाचित अधिकारियों को शहरी क्षेत्रों के लिए क्षेत्रीय विकास योजनाओं को तैयार करना चाहिए। संविधान का 74 वां संशोधन कहता है कि कम से कम दो-तिहाई एमपीसी का चुनाव होना चाहिए या इसमें क्षेत्र में नगर पालिकाओं और पंचायतों के चुने सदस्य शामिल होने चाहिए।

फिर भी, बेंगलूरु विकास प्राधिकरण की गैर-निर्वाचित नौकरशाही मास्टर प्लान तैयार करने के लिए ख़ुद ही इंचार्ज बनी रही। नतीजतन, योजना सार्वजनिक भागीदारी के बिना बनी और  शहरों के बाहरी हिस्सों में बसे लोगों की तेजी से बदलती जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ है। 2013 के विश्व बैंक के एक अध्ययन के अनुसार, विभिन्न सरकारी निकायों के बीच समन्वय की कमी भी नागरिकों तक सेवाओं की पहुंच को प्रभावित करता है।

सामाजिक भेदभाव

अक्सर, उपनगरीय क्षेत्रों की वजह से जाति या धार्मिक भेदभाव और बढ़ गए हैं, भले ही मुख्य शहर अधिक सहिष्णु हुए हैं। उदाहरण के लिए, अप्रैल 2019 में प्रकाशित इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, मुंबई के बाहरी इलाक़े में स्थित रायगढ़ जिले में जाति-आधारित संघर्ष और भेदभाव के मामले हुए हैं।

इसी तरह, ठाणे जिले में, जो मुंबई के बाहरी हिस्से में आता है, जब उम्मीदवार चुनने की बात आती है तो राजनीतिक दल, अन्य सभी मापदंडों की तुलना में जाति को ज्यादा महत्व देते हैं, जैसा कि अप्रैल 2019 में टाइम्स ऑफ इंडिया की इस रिपोर्ट से पता चलता है।

अंतरराज्यीय प्रवास की गति धीमी

आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि 1991 से 2011 के बीच, पहले के दशक की तुलना में अधिक भारतीयों ने पलायन किया है। 2011 में, 45.36 करोड़ लोगों ने पलायन किया था, जो कि 2001 के 31.45 करोड़ लोगों की तुलना में 1.4 गुना है।

फिर भी, भारत में अंतरराज्यीय पलायन पिछले दो दशकों में धीमा हो गया, जो 2011 में 5.4 करोड़ था। अगर तुलनात्मक रुप से देखा जाए तो यह 1991 और 2001 के बीच पलायन में 55% की वृद्धि हुई है।

पलायन करने वाले शहर की पसंद कई कारणों पर निर्भर करती है, जैसे कि गृहनगर के लिए निकटता, काम की उपलब्धता और पहुंच। उदाहरण के लिए, कर्नाटक का गुलबर्गा, महाराष्ट्र और तेलंगाना के करीब है और यहां से लोग मुंबई, पुणे, हैदराबाद और बेंगलुरु जाते हैं। ऐतिहासिक पलायन रुझान, प्रवासी नेटवर्क और शहर के इन्फ़्रास्ट्रक्चर भी प्रवासियों को प्रभावित करते हैं। हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कई लोग दिल्ली पलायन करते हैं, उत्तर प्रदेश और बिहार से मुंबई, और राजस्थान से चेन्नई और कोलकाता तक जाते हैं, जैसा कि जनगणना के आंकड़ों से पता चलता है।

नई नीतियों की आवश्यकता

प्रवासी-विमुख नीतियों के साथ, गरीबों का शहरी केंद्रों में शिफ़्ट होना कठिन हो गया है। इससे निपटने के लिए भारत को दीर्घकालिक समावेशी नीति की जरुरत है जो शहरों और उपनगरीय क्षेत्रों में प्रवासियों के मुद्दों का हल निकाले।

किराये के घर जैसी सेवाओं का प्रावधान, शहरी और उपनगरीय दोनों क्षेत्रों में सेवा वितरण प्रणाली में सुधार, शहरी निकायों के बीच बेहतर समन्वय -शहरी समूहों को आर्थिक रूप से तेजी से बढ़ने और प्रवासी आबादी को अधिक सहायता प्रदान करने में मदद कर सकता है।

(मित्रा, दामले और वार्ष्णेय रिसर्चर हैं और मुंबई स्थित गैर-लाभकारी संस्था, ‘इंडिया माइग्रेज नाउ ’ के साथ जुड़े हैं।)

यह आलेख> मूलत: अंग्रेजी में 26 अक्टूबर 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है। 

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