सांस की तकलीफ़? मॉर्निंग वॉक से बचें, डॉक्टरों की सलाह

लखनऊ के गोमतीनगर के एक चेस्ट क्लीनिक पर इलाज कराने पहुंचे मयंक अग्रवाल। फ़ोटो: रणविजय सिंह

लखनऊ: कोरोनावायरस का प्रकोप जारी और सर्दियों का मौसम भी दस्तक दे रहा है ऐसे में सांस की तकलीफ़ के मरीज़ों को डॉक्टरों और विशेषज्ञों की सलाह है कि वो बाकी लोगों से ज़्यादा सतर्क रहें। डॉक्टरों की सलाह है कि ऐसे मरीज़ मॉर्निंग वॉक पर न जाएं, ज़ुकाम-बुख़ार या खांसी को नज़रअंदाज़ न करें और कोरोनावायरस के बचाव के सभी उपायों जैसे कि हाथ धोना और मास्क पहनने का कड़ाई से पालन करें। 

"इस बार कोरोना भी है इसलिए इस साल खांसी, ज़ुकाम और सांस फूलने की समस्या को हल्के में न लिया जाए। ज़रा सी लापरवाही भी भारी पड़ सकती है। वैसे तो अपर रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन दवाइयों, गर्म पानी, काढ़ा आदि से ठीक हो जाता है, लेकिन अगर यह वक्त रहते कंट्रोल न किया गया तो संक्रमण लोवर रेस्पिरेट्री तक फैल सकता है, जो ज़्यादा घातक है। लोवर रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन में मरीज़ की मौत भी हो जाती है," लखनऊ के बलरामपुर ज़िला अस्पताल के चेस्ट फ़िज़ीशियन हरगोविंद सिंह ने कहा।

यह मौसम सांस से संबंधित संक्रामक बीमारियों का है जिसे 'एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन' कहा जाता है। एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन में इंसान को कुछ दिन या हफ्ते में ही रोग अपनी गिरफ़्त में ले लेता है, एक्यूट का मतलब ही 'तीव्र' है। इस संक्रमण के लक्षणों में खांसी, बलगम, बुख़ार, सांस फूलना, सीने में दर्द आदि शामिल हैं। डॉक्टर्स का कहना है, इस साल ऐसे शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे लक्षण होने पर डॉक्टर से सलाह ली जाए और कोशिश रहे कि रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन से बचा जा सके।

“अपर रेस्पिरेट्री सिस्टम यानी साइनस से लेकर वोकल कॉर्ड तक और लोवर रेस्पिरेट्री सिस्टम यानी वोकल कॉर्ड से लेकर फेफड़ों तक। यह संक्रमण आठ साल से कम उम्र के बच्चों, 65 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों और जिन्हें डायबिटीज़, हाइपरटेंशन या किडनी की बीमारी है उन पर घातक असर करता है। यह वायरस और बैक्टीरिया के ज़रिए फैलता है,” लखनऊ की किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के रेस्पिरेट्री मेडिसीन विभाग के प्रोफ़ेसर, आर.एस. कुशवाहा ने बताया।

सर्दियों की शुरुआत होते ही उत्तर प्रदेश के अस्पतालों में सांस से संबंधित मरीज़ों की संख्या भी बढ़ने लगी है। उत्तर प्रदेश में एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन के मामले हर साल बढ़ रहे हैं। साल 2018 में राज्य में लगभग 30 लाख लोग एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन से पीड़ित पाए गए थे जिसमें से लगभह 700 लोगों की मौत हो गई थी। इस बार कोरोना भी है ऐसे में रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन के मद्देनज़र राज्य का स्वास्थ्य विभाग और अधिक सतर्क है। "हमने अस्पतालों को रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन के मरीजों का बेहतर इलाज करने के निर्देश दिए हैं। इस साल कोरोना भी है ऐसे में इसपर खासा ध्यान है। इसके अलावा अस्पतालों में H1N1 के लिए अलग से बेड भी रिज़र्व किए गए हैं," यूपी के चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशक, देवेंद्र सिंह नेगी ने बताया। 

 

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने भी हाल ही में कहा था कि सर्दियों में और अधिक सजग रहने की ज़रूरत है। “आगामी त्यौहारों के सीज़न और सर्दियों के कारण अगले दो या ढाई महीने कोरोना को लेकर हमारी लड़ाई के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। जब तक वैक्सीन नहीं आती सोशल वैक्सीन का पालन करें,” डॉ. हर्षवर्धन ने 16 अक्टूबर को एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा।

 

यूपी में हर साल बढ़ रहे मामले

लखनऊ के गोमतीनगर के मयंक अग्रवाल (34) घर के पास के ही एक प्राइवेट चेस्ट क्लीनिक में अपना इलाज करा रहे हैं। "करीब एक महीने पहले मयंक को कोरोना हुआ था। होम आइसोलेशन में रहते हुए वो ठीक हो गए। कोरोना रेस्पिरेट्री फ़ंक्शन को प्रभावित करता है, ऐसे में अब उन्हें अपर रेस्पिरेट्री में हल्का इन्फ़ेक्शन है। मयंक की तरह दूसरे मरीज़ भी रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन की शिकायत लेकर आ रहे हैं। इस मौसम में ऐसे मामले बढ़ते हैं," इस चेस्ट क्लीनिक के डॉक्टर प्रसूनकांत ने बताया। 

 

"अक्टूबर की शुरुआत से ही रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन के मरीज़ों की संख्या बढ़ गई है। जब तक सर्दियों का मौसम रहेगा रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन के मरीज़ आते रहेंगे। इस बार कोरोना भी है तो लोग हल्के बुखा़ार या खांसी होने पर भी जांच करा रहे हैं, इस वजह से भी मरीज़ बढ़े हैं," लखनऊ के बलरामपुर ज‍़िला अस्पताल के चेस्ट फ़िज़ीशियन, डॉ. हरगोविंद सिंह ने बताया। 

लखनऊ के बलरामपुर ज‍़िला अस्पताल के फ़िज़ीशियन डॉ. हरगोविंद सिंह। फ़ोटो: रणविजय सिंह 

उत्तर प्रदेश में एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन के मामले साल दर साल बढ़ रहे हैं। राज्य में साल 2016 में मरीज़ों की संख्या 23.6 लाख थी जो 2017 में बढ़कर 28.3 लाख हो गई। 2018 में एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन के 29.8 लाख मरीज़ दर्ज किए गए, 13 मार्च 2020 को लोकसभा में पेश आंकड़ों के अनुसार। 

देश में इस संक्रमण से सबसे ज़्यादा मौत दो राज्यों में होती है, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश। यूपी में 2014 से लेकर 2017 तक लगातार मौत के आंकड़े बढ़े हैं, हालांकि 2018 में यह कम हुए हैं। यूपी में इस संक्रमण से 2014 में 619 लोगों की मौत हुई, 2015 में 655, 2016 में 868, 2017 में 897 और 2018 में 699 लोगों की मौत हुई, 18 सितंबर 2020 को लोकसभा में पेश आंकड़ों के मुताबिक। 

"इस मौसम में रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन की दिक्कत बढ़ती है। इस बार कोरोना भी है तो लोगों को ज़्यादा सावधान रहने की जरूरत है। सांस से संबंधित किसी भी दिक्कत को नज़रअंदाज़ नहीं करना है। कोई भी दिक्कत महसूस हो तुरंत जांच कराएं। बच्चों और बुजुर्गों का खास ध्‍यान रखना चाहिए। उम्रदराज़ लोग मॉर्निंग वॉक पर न जाएं," यूपी के चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशक, देवेंद्र सिंह नेगी ने कहा। रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन के मद्देनज़र अस्पतालों को निर्देश दिए गए हैं, उन्होंने बताया।

यूपी के चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशक, देवेंद्र सिंह नेगी। 

भारत में एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन 

एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन से मौत के आंकड़ों को देखें तो भारत में बड़ी संख्या में संक्रामक रोग के मरीज़ों की इससे मौत हो जाती है। यह संक्रामक रोगों से होने वाली मौतों में दूसरी सबसे बड़ी वजह है। 2018 में संक्रामक रोगों से हुई मौतों में से 27.21% मौतें एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन से हुई। सबसे ज़्यादा मौतें निमोनिया से हुईं जो कुल संक्रामक रोगों से हुई मौतों का 30.65% है। डायरिया से 10.55% और H1N1 से 8.03% मौतें हुई, नेशनल हेल्थ प्रोफ़ाइल 2019 के मुताबिक। 

Source: नेशनल हेल्‍थ प्रोफ़ाइल 2019

संक्रामक रोगों से हुई मौत के मामलों में एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन दूसरे नंबर पर है, जबकि मरीज़ों की संख्या में यह पहले नंबर पर है। 2018 में संक्रामक रोगों में सबसे ज़्यादा मरीज़ एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन के दर्ज किए गए। उस साल भारत में कुल 4.19 करोड़ मामले दर्ज किए गए, जो संक्रामक रोगों का 69.47% था। इस साल एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन से 3,740 लोगों की मौत हुई थी, नेशनल हेल्‍थ प्रोफ़ाइल 2019 के मुताबिक।

Source: नेशनल हेल्‍थ प्रोफ़ाइल 2019

बढ़ते वायु प्रदूषण के साथ बढ़ती सांस की तकलीफ़

पिछले कुछ वर्षों से सर्दियों में वायु प्रदूषण की समस्या भी बढ़ती जा रही है। प्रदूषण की वजह से सांस के मरीज़ों को दिक्कत होती है। यूपी में गाज़ियाबाद, नोएडा, मुरादाबाद, वाराणसी, आगरा, मेरठ, मुज़फ़्फरनगर, लखनऊ और कानपुर जैसे कई शहर हैं जहां की हवा बहुत दूषित हो जाती है। अक्टूबर के शुरुआती हफ्तों से ही एयर क्वालिटी इंडेक्स में यूपी को अनहेल्‍थी बताया जा रहा है। रोज़ाना खराब होती हवा को लेकर ख़बरें भी हो रही हैं और प्रशासन ठोस कदम उठाने की बात भी कर रहा है। हालांकि इन तमाम बातों के बीच सांस के मरीज़ों की समस्या बढ़ने वाली है, यह बात तय है। 

"प्रदूषण की वजह से एलर्जी, अस्थमा, स्नोफ़ीलिया के मरीज़ों की समस्या बढ़ जाती है। हालांकि एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन का सीधा संबंध प्रदूषण से नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह एक कारक हो सकता है। इस मौसम में वायरल तेजी से फैलता है और एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन भी वायरस और बैक्टीरिया के ज़रिए फैलता है। सांस से संबंधित कोई समस्या हल्की होने पर प्रदूषण और खराब हवा उसे और गंभीर बना सकती हैं। ऐसे में लोगों को अपना ज़्यादा ख़्याल रखने की ज़रूरत है," केजीएमयू के रेस्पिरेट्री मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर आर.एस. कुशवाहा ने कहा। 

लोकसभा और राज्यसभा में वायु प्रदूषण और रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन से जुड़े सवाल कई बार पूछे जाते रहे हैं। लोकसभा में 13 मार्च 2020 को ऐसा ही एक सवाल पूछा गया जिसके जवाब में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने कहा, "सांस संबंधी बीमारियों और वायु प्रदूषण के बीच संभावित लिंक को देखते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कई कदम उठाए हैं।" 

“प्रदूषण को लेकर राज्य सरकार के स्वास्थ्य विभाग हेल्थ एडवाइज़री जारी करते हैं। राज्य सरकारों की ओर से प्रदूष‍ित शहरों के अस्पतालों में एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन का सर्विलांस कराया जाता है। अस्पतालों को सांस से संबंधित मरीज़ों को बेहतर इलाज देने को कहा जाता है,” अश्विनी कुमार चौबे ने लोकसभा को बताया।

क्या करें-क्या न करें

केजीएमयू के पल्मोनरी विभाग के अध्यक्ष डॉ. वेद प्रकाश ने इस मौसम में क्या करें और क्या न करें से संबंधित जानकारी दी है। उनके मुताबिक: 

- मॉर्निंग वॉक पर न जाएं। उम्र दराज़ लोग कोहरा छंटने के बाद ही घर से निकलें।

- ज़ुकाम-बुख़ार या खांसी को नज़रअंदाज़ न करें। ऐसे लक्षण आने पर डॉक्टर की सलाह ज़रूर लें। खासकर बच्चों और बुजुर्गों को आइसोलेट रखें।

- सर्दियों में ठंडा पानी ना पिएं, यह इन्फ़ेक्शन को बढ़ा सकता है। 

- हल्का सर्दी-जुकाम होने पर स्टीम लें, लेकिन समस्या बढ़ने पर डॉक्टर की सलाह ज़रूर लें।

- रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन वायरस और बैक्टीरिया से फैलता है, ऐसे में हाथ धोने, मास्क पहनने जैसे उपायों का पालन करें। 

- कोरोनावायरस से बचने के सारे उपायों का पालन किया जाए।

- डॉक्टर की सलाह से कोरोना जांच कराना भी बेहतर है। क्योंकि रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन के साथ कोरोना होने पर यह मरीज़ की परेशानी बढ़ा सकता है।

(रणविजय, लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

लखनऊ: कोरोनावायरस का प्रकोप जारी और सर्दियों का मौसम भी दस्तक दे रहा है ऐसे में सांस की तकलीफ़ के मरीज़ों को डॉक्टरों और विशेषज्ञों की सलाह है कि वो बाकी लोगों से ज़्यादा सतर्क रहें। डॉक्टरों की सलाह है कि ऐसे मरीज़ मॉर्निंग वॉक पर न जाएं, ज़ुकाम-बुख़ार या खांसी को नज़रअंदाज़ न करें और कोरोनावायरस के बचाव के सभी उपायों जैसे कि हाथ धोना और मास्क पहनने का कड़ाई से पालन करें। 

"इस बार कोरोना भी है इसलिए इस साल खांसी, ज़ुकाम और सांस फूलने की समस्या को हल्के में न लिया जाए। ज़रा सी लापरवाही भी भारी पड़ सकती है। वैसे तो अपर रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन दवाइयों, गर्म पानी, काढ़ा आदि से ठीक हो जाता है, लेकिन अगर यह वक्त रहते कंट्रोल न किया गया तो संक्रमण लोवर रेस्पिरेट्री तक फैल सकता है, जो ज़्यादा घातक है। लोवर रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन में मरीज़ की मौत भी हो जाती है," लखनऊ के बलरामपुर ज़िला अस्पताल के चेस्ट फ़िज़ीशियन हरगोविंद सिंह ने कहा।

यह मौसम सांस से संबंधित संक्रामक बीमारियों का है जिसे 'एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन' कहा जाता है। एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन में इंसान को कुछ दिन या हफ्ते में ही रोग अपनी गिरफ़्त में ले लेता है, एक्यूट का मतलब ही 'तीव्र' है। इस संक्रमण के लक्षणों में खांसी, बलगम, बुख़ार, सांस फूलना, सीने में दर्द आदि शामिल हैं। डॉक्टर्स का कहना है, इस साल ऐसे शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे लक्षण होने पर डॉक्टर से सलाह ली जाए और कोशिश रहे कि रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन से बचा जा सके।

“अपर रेस्पिरेट्री सिस्टम यानी साइनस से लेकर वोकल कॉर्ड तक और लोवर रेस्पिरेट्री सिस्टम यानी वोकल कॉर्ड से लेकर फेफड़ों तक। यह संक्रमण आठ साल से कम उम्र के बच्चों, 65 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों और जिन्हें डायबिटीज़, हाइपरटेंशन या किडनी की बीमारी है उन पर घातक असर करता है। यह वायरस और बैक्टीरिया के ज़रिए फैलता है,” लखनऊ की किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के रेस्पिरेट्री मेडिसीन विभाग के प्रोफ़ेसर, आर.एस. कुशवाहा ने बताया।

सर्दियों की शुरुआत होते ही उत्तर प्रदेश के अस्पतालों में सांस से संबंधित मरीज़ों की संख्या भी बढ़ने लगी है। उत्तर प्रदेश में एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन के मामले हर साल बढ़ रहे हैं। साल 2018 में राज्य में लगभग 30 लाख लोग एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन से पीड़ित पाए गए थे जिसमें से लगभह 700 लोगों की मौत हो गई थी। इस बार कोरोना भी है ऐसे में रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन के मद्देनज़र राज्य का स्वास्थ्य विभाग और अधिक सतर्क है। "हमने अस्पतालों को रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन के मरीजों का बेहतर इलाज करने के निर्देश दिए हैं। इस साल कोरोना भी है ऐसे में इसपर खासा ध्यान है। इसके अलावा अस्पतालों में H1N1 के लिए अलग से बेड भी रिज़र्व किए गए हैं," यूपी के चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशक, देवेंद्र सिंह नेगी ने बताया। 

 

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने भी हाल ही में कहा था कि सर्दियों में और अधिक सजग रहने की ज़रूरत है। “आगामी त्यौहारों के सीज़न और सर्दियों के कारण अगले दो या ढाई महीने कोरोना को लेकर हमारी लड़ाई के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। जब तक वैक्सीन नहीं आती सोशल वैक्सीन का पालन करें,” डॉ. हर्षवर्धन ने 16 अक्टूबर को एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा।

 

यूपी में हर साल बढ़ रहे मामले

लखनऊ के गोमतीनगर के मयंक अग्रवाल (34) घर के पास के ही एक प्राइवेट चेस्ट क्लीनिक में अपना इलाज करा रहे हैं। "करीब एक महीने पहले मयंक को कोरोना हुआ था। होम आइसोलेशन में रहते हुए वो ठीक हो गए। कोरोना रेस्पिरेट्री फ़ंक्शन को प्रभावित करता है, ऐसे में अब उन्हें अपर रेस्पिरेट्री में हल्का इन्फ़ेक्शन है। मयंक की तरह दूसरे मरीज़ भी रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन की शिकायत लेकर आ रहे हैं। इस मौसम में ऐसे मामले बढ़ते हैं," इस चेस्ट क्लीनिक के डॉक्टर प्रसूनकांत ने बताया। 

 

"अक्टूबर की शुरुआत से ही रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन के मरीज़ों की संख्या बढ़ गई है। जब तक सर्दियों का मौसम रहेगा रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन के मरीज़ आते रहेंगे। इस बार कोरोना भी है तो लोग हल्के बुखा़ार या खांसी होने पर भी जांच करा रहे हैं, इस वजह से भी मरीज़ बढ़े हैं," लखनऊ के बलरामपुर ज‍़िला अस्पताल के चेस्ट फ़िज़ीशियन, डॉ. हरगोविंद सिंह ने बताया। 

लखनऊ के बलरामपुर ज‍़िला अस्पताल के फ़िज़ीशियन डॉ. हरगोविंद सिंह। फ़ोटो: रणविजय सिंह 

उत्तर प्रदेश में एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन के मामले साल दर साल बढ़ रहे हैं। राज्य में साल 2016 में मरीज़ों की संख्या 23.6 लाख थी जो 2017 में बढ़कर 28.3 लाख हो गई। 2018 में एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन के 29.8 लाख मरीज़ दर्ज किए गए, 13 मार्च 2020 को लोकसभा में पेश आंकड़ों के अनुसार। 

देश में इस संक्रमण से सबसे ज़्यादा मौत दो राज्यों में होती है, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश। यूपी में 2014 से लेकर 2017 तक लगातार मौत के आंकड़े बढ़े हैं, हालांकि 2018 में यह कम हुए हैं। यूपी में इस संक्रमण से 2014 में 619 लोगों की मौत हुई, 2015 में 655, 2016 में 868, 2017 में 897 और 2018 में 699 लोगों की मौत हुई, 18 सितंबर 2020 को लोकसभा में पेश आंकड़ों के मुताबिक। 

"इस मौसम में रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन की दिक्कत बढ़ती है। इस बार कोरोना भी है तो लोगों को ज़्यादा सावधान रहने की जरूरत है। सांस से संबंधित किसी भी दिक्कत को नज़रअंदाज़ नहीं करना है। कोई भी दिक्कत महसूस हो तुरंत जांच कराएं। बच्चों और बुजुर्गों का खास ध्‍यान रखना चाहिए। उम्रदराज़ लोग मॉर्निंग वॉक पर न जाएं," यूपी के चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशक, देवेंद्र सिंह नेगी ने कहा। रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन के मद्देनज़र अस्पतालों को निर्देश दिए गए हैं, उन्होंने बताया।

यूपी के चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशक, देवेंद्र सिंह नेगी। 

भारत में एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन 

एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन से मौत के आंकड़ों को देखें तो भारत में बड़ी संख्या में संक्रामक रोग के मरीज़ों की इससे मौत हो जाती है। यह संक्रामक रोगों से होने वाली मौतों में दूसरी सबसे बड़ी वजह है। 2018 में संक्रामक रोगों से हुई मौतों में से 27.21% मौतें एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन से हुई। सबसे ज़्यादा मौतें निमोनिया से हुईं जो कुल संक्रामक रोगों से हुई मौतों का 30.65% है। डायरिया से 10.55% और H1N1 से 8.03% मौतें हुई, नेशनल हेल्थ प्रोफ़ाइल 2019 के मुताबिक। 

Source: नेशनल हेल्‍थ प्रोफ़ाइल 2019

संक्रामक रोगों से हुई मौत के मामलों में एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन दूसरे नंबर पर है, जबकि मरीज़ों की संख्या में यह पहले नंबर पर है। 2018 में संक्रामक रोगों में सबसे ज़्यादा मरीज़ एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन के दर्ज किए गए। उस साल भारत में कुल 4.19 करोड़ मामले दर्ज किए गए, जो संक्रामक रोगों का 69.47% था। इस साल एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन से 3,740 लोगों की मौत हुई थी, नेशनल हेल्‍थ प्रोफ़ाइल 2019 के मुताबिक।

Source: नेशनल हेल्‍थ प्रोफ़ाइल 2019

बढ़ते वायु प्रदूषण के साथ बढ़ती सांस की तकलीफ़

पिछले कुछ वर्षों से सर्दियों में वायु प्रदूषण की समस्या भी बढ़ती जा रही है। प्रदूषण की वजह से सांस के मरीज़ों को दिक्कत होती है। यूपी में गाज़ियाबाद, नोएडा, मुरादाबाद, वाराणसी, आगरा, मेरठ, मुज़फ़्फरनगर, लखनऊ और कानपुर जैसे कई शहर हैं जहां की हवा बहुत दूषित हो जाती है। अक्टूबर के शुरुआती हफ्तों से ही एयर क्वालिटी इंडेक्स में यूपी को अनहेल्‍थी बताया जा रहा है। रोज़ाना खराब होती हवा को लेकर ख़बरें भी हो रही हैं और प्रशासन ठोस कदम उठाने की बात भी कर रहा है। हालांकि इन तमाम बातों के बीच सांस के मरीज़ों की समस्या बढ़ने वाली है, यह बात तय है। 

"प्रदूषण की वजह से एलर्जी, अस्थमा, स्नोफ़ीलिया के मरीज़ों की समस्या बढ़ जाती है। हालांकि एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन का सीधा संबंध प्रदूषण से नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह एक कारक हो सकता है। इस मौसम में वायरल तेजी से फैलता है और एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन भी वायरस और बैक्टीरिया के ज़रिए फैलता है। सांस से संबंधित कोई समस्या हल्की होने पर प्रदूषण और खराब हवा उसे और गंभीर बना सकती हैं। ऐसे में लोगों को अपना ज़्यादा ख़्याल रखने की ज़रूरत है," केजीएमयू के रेस्पिरेट्री मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर आर.एस. कुशवाहा ने कहा। 

लोकसभा और राज्यसभा में वायु प्रदूषण और रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन से जुड़े सवाल कई बार पूछे जाते रहे हैं। लोकसभा में 13 मार्च 2020 को ऐसा ही एक सवाल पूछा गया जिसके जवाब में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने कहा, "सांस संबंधी बीमारियों और वायु प्रदूषण के बीच संभावित लिंक को देखते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कई कदम उठाए हैं।" 

“प्रदूषण को लेकर राज्य सरकार के स्वास्थ्य विभाग हेल्थ एडवाइज़री जारी करते हैं। राज्य सरकारों की ओर से प्रदूष‍ित शहरों के अस्पतालों में एक्यूट रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन का सर्विलांस कराया जाता है। अस्पतालों को सांस से संबंधित मरीज़ों को बेहतर इलाज देने को कहा जाता है,” अश्विनी कुमार चौबे ने लोकसभा को बताया।

क्या करें-क्या न करें

केजीएमयू के पल्मोनरी विभाग के अध्यक्ष डॉ. वेद प्रकाश ने इस मौसम में क्या करें और क्या न करें से संबंधित जानकारी दी है। उनके मुताबिक: 

- मॉर्निंग वॉक पर न जाएं। उम्र दराज़ लोग कोहरा छंटने के बाद ही घर से निकलें।

- ज़ुकाम-बुख़ार या खांसी को नज़रअंदाज़ न करें। ऐसे लक्षण आने पर डॉक्टर की सलाह ज़रूर लें। खासकर बच्चों और बुजुर्गों को आइसोलेट रखें।

- सर्दियों में ठंडा पानी ना पिएं, यह इन्फ़ेक्शन को बढ़ा सकता है। 

- हल्का सर्दी-जुकाम होने पर स्टीम लें, लेकिन समस्या बढ़ने पर डॉक्टर की सलाह ज़रूर लें।

- रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन वायरस और बैक्टीरिया से फैलता है, ऐसे में हाथ धोने, मास्क पहनने जैसे उपायों का पालन करें। 

- कोरोनावायरस से बचने के सारे उपायों का पालन किया जाए।

- डॉक्टर की सलाह से कोरोना जांच कराना भी बेहतर है। क्योंकि रेस्पिरेट्री इन्फ़ेक्शन के साथ कोरोना होने पर यह मरीज़ की परेशानी बढ़ा सकता है।

(रणविजय, लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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