2017 में हिरासत में मौत के 100 मामले दर्ज, लेकिन किसी को कोई सजा नहीं

मुंबई: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार 2017 में पुलिस हिरासत में 100 से ज्यादा लोगों की मौत हुई। इनमें से 58 लोग रिमांड पर नहीं थे यानी उन्हें गिरफ्तार तो किया गया लेकिन अदालत में पेश नहीं किया गया। सिर्फ़ जबकि 42 पुलिस या न्यायिक हिरासत में थे।

हिरासत में हुई मौतों से संबंधित 62 मामलों में, 33 पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया गया, 27 के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई, चार को बरी कर दिया गया और लेकिन सज़ा किसी को भी नहीं मिली।

एक गैर लाभकारी संस्था, पुलिस रिफ़ॉर्म्स एट द कॉमलवेल्थ ह्युमन राइट्स इनिशिएटिव की प्रोग्राम हेड, देविका प्रसाद ने इंडियास्पेंड के साथ बातचीत में कहा, ”एक साल में एक सौ हिरासत में मौत होना, मेरे विचार में गंभीर चिंता का विषय है। यह संकेत देता है कि हिरासत में हालात ऐसे नहीं हैं कि वहां लोग सुरक्षित या ज़िंदा रह सकें। हिरासत में होने वाली मौतों के लिए पुलिस को जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।”

ऐसी घटनाओ के आंकड़ो के प्रकाशन का भी कोई असर नहीं होता हैं, जैसा कि 21 अक्टूबर को एनसीआरबी डेटा जारी होने के बाद भी हिरासत में मौत की कई खबरें सामने आई है।

27 अक्टूबर, 2019 को, मुंबई के वडाला ट्रक टर्मिनल पुलिस स्टेशन में 26 साल के एक युवक विजय सिंह की पुलिस हिरासत में मौत हो गई। 30 अक्टूबर 2019 की द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक इस घटना के बाद पांच पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया।

सिंह को एक युगल की शिकायत के बाद हिरासत में लिया गया था। युगल का आरोप था कि जब वे दोनों एक साथ बैठे थे तब सिंह अपनी बाइक की हेडलाइट जला कर उन्हें परेशान कर रहा था।

सिंह के परिवार और रिश्तेदारों का आरोप है कि उसे बुरी तरह पीटा गया था और सीने में दर्द की शिकायत के बावजूद डॉक्टर के पास नहीं ले जाया गया।

उत्तर प्रदेश में भी एक ऐसी ही घटना हुई है। द ट्रिब्यून ने 30 अक्टूबर, 2019 की रिपोर्ट में बताया कि 50 वर्षीय सत्य प्रकाश शुक्ला की पुलिस हिरासत में मौत हो गई। शुक्ला के परिवार ने पुलिस हिरासत में उसे टॉर्चर करने का आरोप लगाया है। शुक्ला पर सुल्तानपुर के पीपरपुर इलाके में एक बैंक कर्मचारी को लूटने का आरोप था।

भारत के पूर्व मुख्य सूचना अधिकारी और भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी, यशोवर्धन आजाद ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए कहा, "हिरासत में हर मौत, टॉर्चर के हर मामले की निंदा होनी चाहिए, इनका विश्लेषण होना चाहिए, सही जांच के साथ निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए और इसके बाद सुधार की कार्रवाई करनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के बुनियादी निर्देशों [पुलिस सुधारों पर] का पालन करने की जरुरत है, बुनियादी ढांचे में सुधार की आवश्यकता है, क्षमता में सुधार किया जाना चाहिए और कर्मचारियों पर निवेश किया जाना चाहिए।”

प्रसाद कहते हैं कि किसी भी गिरफ्तार व्यक्ति की सेहत और सुरक्षा पुलिस की ज़िम्मेदारी है। उन्होंने कहा, "यही कारण है कि जब किसी व्यक्ति की हिरासत में मौत हो जाती है तो कानून के अनुसार न्यायिक जांच ज़रुरी है ताकि उसकी मौत का कारण और उसके आस-पास की परिस्थितियों का पता चल सके। पुलिस को घटना के 24 घंटे के अंदर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को हिरासत में मौत की सूचना देनी होती है, जो आगे बढ़ाते हुए वीडियोग्राफ़ पोस्टमॉर्टम करवाती है। अत्यधिक बल या हिरासत में ग़ैरक़ानूनी हथकंड़ों के खिलाफ सुरक्षा के लिए ये जवाबदेही उपाय हैं।”

रिपोर्ट किए गए मामलों में आत्महत्या सबसे ज्यादा कारण

एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, भारत में हिरासत में होने वाली मौतों में 9% की वृद्धि हुई है। यह आंकड़े 2016 में 92 से बढ़कर 2017 में 100 तक पहुंच गए हैं। 2017 में, आंध्र प्रदेश में हिरासत में सबसे ज्यादा मौतें (27) हुईं। इसके बाद महाराष्ट्र (15) और गुजरात (10) का नम्बर रहा। हिरासत में होने वाली मौतों में इन तीन राज्यों की हिस्सेदारी आधे से ज्यादा रही।

2017 में, हिरासत में हुई मौतों का रिपोर्ट किया गया सबसे बड़ा कारण आत्महत्या (37) था। इसके बाद बीमारी से या अस्पताल में इलाज के दौरान मौत (28) जैसे कारण बताए गए हैं। कुछ कारण हिरासत में पुलिस की मारपीट से लगी चोटें (5) भी बताई गई है। 22 मौतों के लिए ‘अन्य कारण’ बताया गया है और ये कारण साफ़ नहीं है।

निर्भया मामले का उदाहरण देते हुए आजाद ने कहा कि एक हद तक हिरासत में आत्महत्याएं सच हैं। उन्होंने कहा कि राम सिंह (निर्भया केस का मुख्य आरोपी) जेल में था। जब उसने आत्महत्या की, वो पुलिस हिरासत में नहीं था। ऐसा शर्म या अन्य कारणों से हो सकता है।

मानव अधिकारों का हनन

एनसीआरबी ने 2017 में मानव अधिकारों के उल्लंघन के लिए पुलिसकर्मियों के खिलाफ 56 मामले दर्ज किए हैं। 57 पुलिसकर्मी गिरफ्तार किए गए, 48 को चार्जशीट किया गया और तीन को दोषी करार दिया गया। इस श्रेणी के तहत दर्ज अधिकांश मामले 'टॉर्चर या चोट' (17) के थे। इसके बाद 'हिरासत में मौत' के (7) मामले रहे। ‘मुठभेड़ या हत्या’ और 'जबरन वसूली', के छह-छह मामले दर्ज किए गए।

प्रसाद ने कहा, "अत्याचार एक गंभीर अपराध है और मानव अधिकारों के हनन को कभी भी अपरिहार्य नहीं माना जाना चाहिए। अगर पुलिस आरोपी व्यक्तियों से जानकारी हासिल करने के लिए टॉर्चर पर भरोसा कर रही है, तो वो अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है।" टॉर्चर या अत्याचार से कुछ भी उपयोगी या उदेश्यपूर्ण जानकारियाँ बाहर नहीं आ सकती हैं।

प्रसाद ने कहा कि सटीक और उपयोगी जानकारी प्राप्त करने का तरीका केवल जांच है, सुराग़ ढूंढना और उनका पीछा करना, जानकारी इकट्ठा करना, सुबूत इकट्ठे करना और और पूछताछ और जांच की नई तकनीक सीखना है। उन्होंने आगे कहा, ”भारत में टॉर्चर ग़ैरक़ानूनी है: “ज़बरदस्ती अपराध कबूल करवाना कानून के खिलाफ है।”

जमीनी हकीकत

आजाद ने कहा कि अपराध के मामलों और संपत्ति से जुड़े मामलों (घर का ताला तोड़ना) को सुलझाने की कोशिश के दौरान आमतौर पर चोटें लग जाती है। "ताला तोड़कर घर में घुसने के मामलों में दोष साबित होने के आसार कम होते हैं, पुलिस पर कम वक्त में मामलों को सुलझाने का दबाव होता है, जिसके दौरान पुलिस इसका शिकार हो जाती है।"

लंबे समय से फ़रार अपराधी या संदिग्ध को पकड़ने के लिए बल प्रयोग किया जाता है। आज़ाद कहते हैं कि ग्रामीण इलाकों में, जांच की प्रक्रिया कठिन हैं क्योंकि वहां सीसीटीवी जैसी सुविधाएँ नहीं हैं और ऐसे मामलों में, पुलिस बल करती है। कम बजट की वजह से उपकरण बुरी हालत में हैं।

बेहतर बुनियादी ढांचे और कर्मियों की क्षमता की बात करते हुए, आजाद ने कहा, "जर्जर ढांचे और मामूली सुविधाओं के साथ, आप बेहतर पुलिस सिस्टम की उम्मीद नहीं कर सकते"। उन्होंने कहा, "पुलिस मुख्यालयों के कुछ स्थानों को छोड़कर, पुलिस की कोई उचित इंट्रोगेशन सेल नहीं हैं। संदिग्ध या आरोपी को पूछताछ के लिए 80-100 किमी दूर मुख्यालय नहीं लाया जा सकता है। इसलिए केस जल्दी हल करने के लिए, निचले स्तर के अधिकारी कई बार बल प्रयोग करते हैं जिससे आकस्मिक चोट लग सकती है या गंभीर क्षति हो सकती है। यह हमारे पुलिस सिस्टम की वास्तविकता है।

ग्रामीण क्षेत्रों के पुलिस स्टेशनों में दूरसंचार सिग्नल या नेटवर्क, इंटरनेट कनेक्टिविटी, गाड़ियो और मोटर रोड जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी है। आजाद ने कहा कि, हवालात की स्थितियां इतनी खराब हैं कि बस ऐसी परिस्थितियों में रहना ही अपने आप में टॉर्चर है।

"जीरो टॉलरेंस"

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 12 अक्टूबर, 2019 को दिल्ली में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के 26वें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए कहा, "हमारी ग़ैरक़ानूनी मौतों और पुलिस अत्याचारों ज़ीरो टॉलरेंस की नीति है लेकिन हमें आतंकवाद पर भी समान रूप से ध्यान केंद्रित करना चाहिए क्योंकि यह मानव अधिकारों के खिलाफ सबसे बड़ा हमला है।

अमित शाह ने कहा, “एक भी व्यक्ति अकारण पुलिस कस्टडी में न मरे, एक भी व्यक्ति एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल किलिंग का भोगी न बने, वो हमारा दायित्व तो है ही, मगर साथ ही हर व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने की व्यवस्था मिले ये भी हमें करना पड़ेगा।”

कुछ सुधार

आज़ाद ने कहा, "हिरासत में मौतों के मामलों से निपटने के लिए आज सिस्टम में साधन मौजूद हैं।" हिरासत में होने वाली हर मौत की एक मजिस्ट्रियल जांच होनी चाहिए। यहां तक ​​कि अगर कोई कहता है कि मजिस्ट्रेट पुलिस के साथ मिले हुए हैं या दोनों साथ मिल कर काम कर रहे हैं, तो किसी को भी शिकायत दर्ज करने और अदालत में जाने का अधिकार है। आजाद ने कहा, “कई मामलों में, अदालत ने आरोपी पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की है। सिर्फ पुलिस ही नहीं, अन्य कारणों, उपकरण का काम ना करना, मैजिस्ट्रेट या कोर्ट के फ़ैसलों और अधिकारियों को भी सवालों के दायरे में लाना चाहिए।

"

आजाद ने कहा, "पुलिसकर्मियों को जांच और तकनीक के मामलों पर सीबीआई की ट्रेनिंग की जरूरत है। उन्हें मनोविज्ञान सहित विभिन्न विषयों पर कोर्स करने की जरूरत है, जो नहीं होता है। साधन काम नहीं कर रहे हैं, इसलिए ये मूल कारण हैं जिन पर हमें गौर करना होगा।”

हिरासत में मौतों को रोकने के लिए सुधारों और उपायों के बारे में बात करते हुए, प्रसाद ने कहा, “रोकथाम के लिए पुलिस हिरासत मेे किसी भी तरह की हिंसा के जीरो टॉलरेंस की ज़रूरत है। और टॉर्चर और हिरासत में मौत के लिए दोषी पुलिसकर्मियो के ख़िलाफ़ मुकदमा चलाने की भी गारंटी होनी चाहिए। ताकि यह सुनिश्चित किया जाए कि पुलिस के काम की आड़ में अमानवीय कार्यों और प्रथाओं के लिए कोई जगह नहीं है। फ़िलहाल ऐसा नहीं है।”

प्रसाद ने आगे बताया कि इसके अलावा यह भी जरूरी है कि पहले से ही हर कानूनी सुरक्षा को लागू किया जाए – मेडिकल परीक्षा का अधिकार, न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने का अधिकार, और पुलिस हिरासत की अवधि के दौरान दुर्व्यवहार या टॉर्चर की शिकायत करना, एक वकील का अधिकार, गिरफ्तार या हिरासत में लेने के बारे किसी दोस्त या परिवार को सूचित करने का अधिकार।

(चैतन्य सीनियर एनालिस्ट हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं।)

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 02 नवंबर 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

मुंबई: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार 2017 में पुलिस हिरासत में 100 से ज्यादा लोगों की मौत हुई। इनमें से 58 लोग रिमांड पर नहीं थे यानी उन्हें गिरफ्तार तो किया गया लेकिन अदालत में पेश नहीं किया गया। सिर्फ़ जबकि 42 पुलिस या न्यायिक हिरासत में थे।

हिरासत में हुई मौतों से संबंधित 62 मामलों में, 33 पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया गया, 27 के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई, चार को बरी कर दिया गया और लेकिन सज़ा किसी को भी नहीं मिली।

एक गैर लाभकारी संस्था, पुलिस रिफ़ॉर्म्स एट द कॉमलवेल्थ ह्युमन राइट्स इनिशिएटिव की प्रोग्राम हेड, देविका प्रसाद ने इंडियास्पेंड के साथ बातचीत में कहा, ”एक साल में एक सौ हिरासत में मौत होना, मेरे विचार में गंभीर चिंता का विषय है। यह संकेत देता है कि हिरासत में हालात ऐसे नहीं हैं कि वहां लोग सुरक्षित या ज़िंदा रह सकें। हिरासत में होने वाली मौतों के लिए पुलिस को जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।”

ऐसी घटनाओ के आंकड़ो के प्रकाशन का भी कोई असर नहीं होता हैं, जैसा कि 21 अक्टूबर को एनसीआरबी डेटा जारी होने के बाद भी हिरासत में मौत की कई खबरें सामने आई है।

27 अक्टूबर, 2019 को, मुंबई के वडाला ट्रक टर्मिनल पुलिस स्टेशन में 26 साल के एक युवक विजय सिंह की पुलिस हिरासत में मौत हो गई। 30 अक्टूबर 2019 की द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक इस घटना के बाद पांच पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया।

सिंह को एक युगल की शिकायत के बाद हिरासत में लिया गया था। युगल का आरोप था कि जब वे दोनों एक साथ बैठे थे तब सिंह अपनी बाइक की हेडलाइट जला कर उन्हें परेशान कर रहा था।

सिंह के परिवार और रिश्तेदारों का आरोप है कि उसे बुरी तरह पीटा गया था और सीने में दर्द की शिकायत के बावजूद डॉक्टर के पास नहीं ले जाया गया।

उत्तर प्रदेश में भी एक ऐसी ही घटना हुई है। द ट्रिब्यून ने 30 अक्टूबर, 2019 की रिपोर्ट में बताया कि 50 वर्षीय सत्य प्रकाश शुक्ला की पुलिस हिरासत में मौत हो गई। शुक्ला के परिवार ने पुलिस हिरासत में उसे टॉर्चर करने का आरोप लगाया है। शुक्ला पर सुल्तानपुर के पीपरपुर इलाके में एक बैंक कर्मचारी को लूटने का आरोप था।

भारत के पूर्व मुख्य सूचना अधिकारी और भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी, यशोवर्धन आजाद ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए कहा, "हिरासत में हर मौत, टॉर्चर के हर मामले की निंदा होनी चाहिए, इनका विश्लेषण होना चाहिए, सही जांच के साथ निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए और इसके बाद सुधार की कार्रवाई करनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के बुनियादी निर्देशों [पुलिस सुधारों पर] का पालन करने की जरुरत है, बुनियादी ढांचे में सुधार की आवश्यकता है, क्षमता में सुधार किया जाना चाहिए और कर्मचारियों पर निवेश किया जाना चाहिए।”

प्रसाद कहते हैं कि किसी भी गिरफ्तार व्यक्ति की सेहत और सुरक्षा पुलिस की ज़िम्मेदारी है। उन्होंने कहा, "यही कारण है कि जब किसी व्यक्ति की हिरासत में मौत हो जाती है तो कानून के अनुसार न्यायिक जांच ज़रुरी है ताकि उसकी मौत का कारण और उसके आस-पास की परिस्थितियों का पता चल सके। पुलिस को घटना के 24 घंटे के अंदर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को हिरासत में मौत की सूचना देनी होती है, जो आगे बढ़ाते हुए वीडियोग्राफ़ पोस्टमॉर्टम करवाती है। अत्यधिक बल या हिरासत में ग़ैरक़ानूनी हथकंड़ों के खिलाफ सुरक्षा के लिए ये जवाबदेही उपाय हैं।”

रिपोर्ट किए गए मामलों में आत्महत्या सबसे ज्यादा कारण

एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, भारत में हिरासत में होने वाली मौतों में 9% की वृद्धि हुई है। यह आंकड़े 2016 में 92 से बढ़कर 2017 में 100 तक पहुंच गए हैं। 2017 में, आंध्र प्रदेश में हिरासत में सबसे ज्यादा मौतें (27) हुईं। इसके बाद महाराष्ट्र (15) और गुजरात (10) का नम्बर रहा। हिरासत में होने वाली मौतों में इन तीन राज्यों की हिस्सेदारी आधे से ज्यादा रही।

2017 में, हिरासत में हुई मौतों का रिपोर्ट किया गया सबसे बड़ा कारण आत्महत्या (37) था। इसके बाद बीमारी से या अस्पताल में इलाज के दौरान मौत (28) जैसे कारण बताए गए हैं। कुछ कारण हिरासत में पुलिस की मारपीट से लगी चोटें (5) भी बताई गई है। 22 मौतों के लिए ‘अन्य कारण’ बताया गया है और ये कारण साफ़ नहीं है।

निर्भया मामले का उदाहरण देते हुए आजाद ने कहा कि एक हद तक हिरासत में आत्महत्याएं सच हैं। उन्होंने कहा कि राम सिंह (निर्भया केस का मुख्य आरोपी) जेल में था। जब उसने आत्महत्या की, वो पुलिस हिरासत में नहीं था। ऐसा शर्म या अन्य कारणों से हो सकता है।

मानव अधिकारों का हनन

एनसीआरबी ने 2017 में मानव अधिकारों के उल्लंघन के लिए पुलिसकर्मियों के खिलाफ 56 मामले दर्ज किए हैं। 57 पुलिसकर्मी गिरफ्तार किए गए, 48 को चार्जशीट किया गया और तीन को दोषी करार दिया गया। इस श्रेणी के तहत दर्ज अधिकांश मामले 'टॉर्चर या चोट' (17) के थे। इसके बाद 'हिरासत में मौत' के (7) मामले रहे। ‘मुठभेड़ या हत्या’ और 'जबरन वसूली', के छह-छह मामले दर्ज किए गए।

प्रसाद ने कहा, "अत्याचार एक गंभीर अपराध है और मानव अधिकारों के हनन को कभी भी अपरिहार्य नहीं माना जाना चाहिए। अगर पुलिस आरोपी व्यक्तियों से जानकारी हासिल करने के लिए टॉर्चर पर भरोसा कर रही है, तो वो अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है।" टॉर्चर या अत्याचार से कुछ भी उपयोगी या उदेश्यपूर्ण जानकारियाँ बाहर नहीं आ सकती हैं।

प्रसाद ने कहा कि सटीक और उपयोगी जानकारी प्राप्त करने का तरीका केवल जांच है, सुराग़ ढूंढना और उनका पीछा करना, जानकारी इकट्ठा करना, सुबूत इकट्ठे करना और और पूछताछ और जांच की नई तकनीक सीखना है। उन्होंने आगे कहा, ”भारत में टॉर्चर ग़ैरक़ानूनी है: “ज़बरदस्ती अपराध कबूल करवाना कानून के खिलाफ है।”

जमीनी हकीकत

आजाद ने कहा कि अपराध के मामलों और संपत्ति से जुड़े मामलों (घर का ताला तोड़ना) को सुलझाने की कोशिश के दौरान आमतौर पर चोटें लग जाती है। "ताला तोड़कर घर में घुसने के मामलों में दोष साबित होने के आसार कम होते हैं, पुलिस पर कम वक्त में मामलों को सुलझाने का दबाव होता है, जिसके दौरान पुलिस इसका शिकार हो जाती है।"

लंबे समय से फ़रार अपराधी या संदिग्ध को पकड़ने के लिए बल प्रयोग किया जाता है। आज़ाद कहते हैं कि ग्रामीण इलाकों में, जांच की प्रक्रिया कठिन हैं क्योंकि वहां सीसीटीवी जैसी सुविधाएँ नहीं हैं और ऐसे मामलों में, पुलिस बल करती है। कम बजट की वजह से उपकरण बुरी हालत में हैं।

बेहतर बुनियादी ढांचे और कर्मियों की क्षमता की बात करते हुए, आजाद ने कहा, "जर्जर ढांचे और मामूली सुविधाओं के साथ, आप बेहतर पुलिस सिस्टम की उम्मीद नहीं कर सकते"। उन्होंने कहा, "पुलिस मुख्यालयों के कुछ स्थानों को छोड़कर, पुलिस की कोई उचित इंट्रोगेशन सेल नहीं हैं। संदिग्ध या आरोपी को पूछताछ के लिए 80-100 किमी दूर मुख्यालय नहीं लाया जा सकता है। इसलिए केस जल्दी हल करने के लिए, निचले स्तर के अधिकारी कई बार बल प्रयोग करते हैं जिससे आकस्मिक चोट लग सकती है या गंभीर क्षति हो सकती है। यह हमारे पुलिस सिस्टम की वास्तविकता है।

ग्रामीण क्षेत्रों के पुलिस स्टेशनों में दूरसंचार सिग्नल या नेटवर्क, इंटरनेट कनेक्टिविटी, गाड़ियो और मोटर रोड जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी है। आजाद ने कहा कि, हवालात की स्थितियां इतनी खराब हैं कि बस ऐसी परिस्थितियों में रहना ही अपने आप में टॉर्चर है।

"जीरो टॉलरेंस"

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 12 अक्टूबर, 2019 को दिल्ली में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के 26वें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए कहा, "हमारी ग़ैरक़ानूनी मौतों और पुलिस अत्याचारों ज़ीरो टॉलरेंस की नीति है लेकिन हमें आतंकवाद पर भी समान रूप से ध्यान केंद्रित करना चाहिए क्योंकि यह मानव अधिकारों के खिलाफ सबसे बड़ा हमला है।

अमित शाह ने कहा, “एक भी व्यक्ति अकारण पुलिस कस्टडी में न मरे, एक भी व्यक्ति एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल किलिंग का भोगी न बने, वो हमारा दायित्व तो है ही, मगर साथ ही हर व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने की व्यवस्था मिले ये भी हमें करना पड़ेगा।”

कुछ सुधार

आज़ाद ने कहा, "हिरासत में मौतों के मामलों से निपटने के लिए आज सिस्टम में साधन मौजूद हैं।" हिरासत में होने वाली हर मौत की एक मजिस्ट्रियल जांच होनी चाहिए। यहां तक ​​कि अगर कोई कहता है कि मजिस्ट्रेट पुलिस के साथ मिले हुए हैं या दोनों साथ मिल कर काम कर रहे हैं, तो किसी को भी शिकायत दर्ज करने और अदालत में जाने का अधिकार है। आजाद ने कहा, “कई मामलों में, अदालत ने आरोपी पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की है। सिर्फ पुलिस ही नहीं, अन्य कारणों, उपकरण का काम ना करना, मैजिस्ट्रेट या कोर्ट के फ़ैसलों और अधिकारियों को भी सवालों के दायरे में लाना चाहिए।

"

आजाद ने कहा, "पुलिसकर्मियों को जांच और तकनीक के मामलों पर सीबीआई की ट्रेनिंग की जरूरत है। उन्हें मनोविज्ञान सहित विभिन्न विषयों पर कोर्स करने की जरूरत है, जो नहीं होता है। साधन काम नहीं कर रहे हैं, इसलिए ये मूल कारण हैं जिन पर हमें गौर करना होगा।”

हिरासत में मौतों को रोकने के लिए सुधारों और उपायों के बारे में बात करते हुए, प्रसाद ने कहा, “रोकथाम के लिए पुलिस हिरासत मेे किसी भी तरह की हिंसा के जीरो टॉलरेंस की ज़रूरत है। और टॉर्चर और हिरासत में मौत के लिए दोषी पुलिसकर्मियो के ख़िलाफ़ मुकदमा चलाने की भी गारंटी होनी चाहिए। ताकि यह सुनिश्चित किया जाए कि पुलिस के काम की आड़ में अमानवीय कार्यों और प्रथाओं के लिए कोई जगह नहीं है। फ़िलहाल ऐसा नहीं है।”

प्रसाद ने आगे बताया कि इसके अलावा यह भी जरूरी है कि पहले से ही हर कानूनी सुरक्षा को लागू किया जाए – मेडिकल परीक्षा का अधिकार, न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने का अधिकार, और पुलिस हिरासत की अवधि के दौरान दुर्व्यवहार या टॉर्चर की शिकायत करना, एक वकील का अधिकार, गिरफ्तार या हिरासत में लेने के बारे किसी दोस्त या परिवार को सूचित करने का अधिकार।

(चैतन्य सीनियर एनालिस्ट हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं।)

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 02 नवंबर 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।


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