Women Representatives_620

मुंबई: अपने राष्ट्रीय संसदों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के प्रतिशत के आधार पर 193 देशों की 2019 सूची में भारत 149 वें स्थान पर रहा है। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान को पीछे छोड़ते हुए देश वर्ष 2018 के बाद से तीन स्थान गिरा है।

जैसा कि अप्रैल 2019 में भारत अपने 17 वें आम चुनाव के लिए तैयार है, विधानसभाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व का मुद्दा जोर पकड़ रहा है। कांग्रेस प्रमुख राहुल गांधी ने पार्टी के सत्ता में आने पर संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का वादा किया है ; ओडिशा में बीजू जनता दल 33 फीसदी लोकसभा सीटों पर महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारेगा; और बंगाल की तृणमूल कांग्रेस द्वारा जारी उम्मीदवारों की सूची में 41 फीसदी उम्मीदवार महिलाएं हैं।

लोकसभा में 66 महिला सांसद हैं, और इसकी 524 सीटों में से 12.6 फीसदी पर कब्जा है, जबकि 1 जनवरी, 2019 तक विश्व औसत 24.3 फीसदी था।

पिछले छह दशकों से 2014 तक, जैसा कि भारत की जनसंख्या में महिलाओं की हिस्सेदारी 48.5 फीसदी पर रही, पहली (1952) और 16 वीं लोकसभा (2014) के बीच महिला सांसदों की हिस्सेदारी आठ प्रतिशत अंक बढ़कर 12.6 फीसदी हो गई है। 1952 में लगभग 80 लाख भारतीय महिलाओं के लिए एक महिला सांसद थी। 2014 तक यह 90 लाख से अधिक महिलाओं के लिए एक थी (ऑस्ट्रिया की आबादी के बराबर)।

रवांडा ( वर्तमान में दुनिया में पहले स्थान पर है ) इसके 80 सीटों वाले निचले सदन में 49 महिला सांसद हैं या 111,000 महिलाओं पर एक महिला सांसद है, जैसा कि एक मल्टिलैटरल एजेंसी इंटर-पार्लियामेंट्री यूनियन ( आईपीयू ) द्वारा 1 जनवरी 2019 को जारी आंकड़ों से पता चलता है।

5 मार्च, 2019 को जारी की गई वार्षिक रिपोर्ट पर आईपीयू की प्रेस बयान के अनुसार, 2018 में राष्ट्रीय संसदों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग एक प्रतिशत बढ़कर 24.3 प्रतिशत हो गई है। संसद में महिलाओं की वैश्विक हिस्सेदारी में वृद्धि जारी है; रिपोर्ट के अनुसार 2008 में यह 18.3 फीसदी और 1995 में 11.3 फीसदी थी।

सूची में 50 देश हैं, जहां 2018 में चुनाव हुए हैं।

आईपीयू के अध्यक्ष और मैक्सिकन सांसद गैब्रिएला क्यूवास बैरोन ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा, "संसद में अधिक महिलाओं का मतलब बेहतर, मजबूत और अधिक प्रतिनिधि लोकतंत्र है, जो सभी लोगों के लिए काम करता है। 2018 में हमने जो एक फीसदी वृद्धि देखी, वह महिलाओं के संसदीय प्रतिनिधित्व पर एक छोटे से सुधार का प्रतिनिधित्व करती है। इसका मतलब है कि हमें अभी भी वैश्विक लिंग समानता को प्राप्त करने के लिए एक लंबा रास्ता तय करना है।इस कारण से, हमें अच्छी तरह से डिजाइन किए गए कोटा और चुनावी प्रणालियों को अपनाने के लिए अधिक राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। उन सभी कानूनी बाधा को खत्म करने की जरूरत है, जो महिलाओं के संसद में प्रवेश के अवसरों में बाधा बन सकते हैं। "

1 जनवरी, 2019 तक संसद में महत्वपूर्ण महिला प्रतिनिधित्व वाले टॉप 10 देशों की सूची में तीन अफ्रीकी ( रवांडा, नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका ) हैं और कोई भी एशियाई देश नहीं हैं।

राज्य विधानसभाओं में महिला प्रतिनिधित्व संसद से भी कम

एक ओर तो लोकसभा में महिला प्रतिनिधित्व कम है, वहीं राज्य विधानसभाओं में तो प्रतिनिधित्व और भी कम है। ‘मिनिस्ट्री ऑफ स्टटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इंप्लिमेंटेशन’ द्वारा जारी-2017 के आंकड़ों के अनुसार, पांच वर्षों में 2017 तक, राज्य विधानसभाओं में महिला प्रतिनिधित्व बिहार, हरियाणा और राजस्थान (14 फीसदी) में सबसे अधिक था। मिजोरम, नागालैंड और पुदुचेरी के विधानसभाओं में कोई निर्वाचित महिला प्रतिनिधि नहीं थी। राज्य विधानसभाओं और राज्य परिषदों में महिलाओं का राष्ट्रीय औसत क्रमशः 9 फीसदी और 5 फीसदी था।

विधानसभा में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व से भारतीय राजनीति की पितृसत्तात्मक संरचना का पता लगाया जा सकता है, जैसा कि ‘इंकोनोमिक एंड पलिटिकल वीकली’ के जनवरी 2011 के एक विश्लेषण से पता चलता है। विश्लेषण के अनुसार, इसके पीछे के कुछ मुख्य कारणों में संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण का अभाव, महिलाओं को टिकट देने के लिए राजनीतिक दलों के बीच अनिच्छा, महिलाओं के बीच चुनावी राजनीति के बारे में जागरूकता की एक सामान्य कमी और परिवार के समर्थन की कमी शामिल है।

लोकसभा में संसद की महिला सदस्य, 1952 से 2014 तक

Source: Ministry of Statistics and Programme Implementation, 2017; Economic and Political Weekly, 2011

लोकसभा और राज्य विधान सभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटों (एक सौ और आठवां संशोधन या महिला आरक्षण बिल) को आरक्षित करने के लिए बिल पर कोई प्रगति नहीं हुई है, हालांकि यह एक दशक पहले पेश किया गया था।

ओडिशा की बीजू जनता दल सरकार ने राज्य विधानसभा में एक प्रस्ताव पेश किया, जिसमें संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का प्रस्ताव किया गया, जैसा कि द इंडियन एक्सप्रेस ने 20 नवंबर, 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

पटनायक ने 20 नवंबर, 2018 को कहा था, "कोई भी घर, कोई समाज, कोई राज्य, कोई भी देश अपनी महिलाओं को सशक्त बनाए बिना आगे नहीं बढ़ा है।"

ओडिशा राज्य विधानसभा में निर्वाचित महिला प्रतिनिधि, 9 फीसदी की राष्ट्रीय औसत से दो प्रतिशत कम हैं। विधानसभा ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया।

महिला प्रतिनिधि अपने निर्वाचन क्षेत्रों में आर्थिक विकास लाती हैं

‘यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी वर्ल्ड इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट इकोनॉमिक्स’ रिसर्च द्वारा 2018 के एक अध्ययन के अनुसार महिलाओं का चुनाव करने वाले निर्वाचन क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों में काफी अधिक वृद्धि के सबूत हैं।

इसमें 4,265 राज्य विधानसभा क्षेत्रों के आंकड़ों की जांच की गई ( दो दशक से 2012 तक ) जहां "राज्य विधान सभा सीटों की हिस्सेदारी महिलाओं द्वारा जीती गई 4.5 फीसदी से बढ़कर 8 फीसदी के करीब" हुई और इन क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधि के लिए एक प्रॉक्सी के रूप में प्रकाश की वृद्धि या रात की रोशनी पर ध्यान केंद्रित किया गया।

अध्ययन के अनुसार, भारत में महिला विधायकों ने अपने निर्वाचन क्षेत्रों में पुरुष विधायकों की तुलना में प्रति वर्ष लगभग 1.8 प्रतिशत अंकों से आर्थिक प्रदर्शन किया। अध्ययन में कहा गया है कि, "हम अनुमान लगाते हैं कि भारत में महिला विधायक पुरुष विधायकों की तुलना में अपने निर्वाचन क्षेत्रों में प्रति वर्ष 15 प्रतिशत अंक बढ़ाते हैं।"

जबकि संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या में काफी वृद्धि नहीं हुई है, महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित की गई हैं, जो स्थानीय सरकारों में 1993 के बाद से, संविधान के 73 वें और 74 वें संशोधन से संभव हुआ है।

इस कदम के कारण पंचायतों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की वर्तमान राष्ट्रीय औसत 44 फीसदी हो गई है। राजस्थान, उत्तराखंड में पंचायतों में सबसे अधिक महिला प्रतिनिधित्व है।

5 अप्रैल, 2018 को लोकसभा के इस उत्तर के अनुसार, 14 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पंचायतों में 50 फीसदी या अधिक निर्वाचित महिला प्रतिनिधि हैं। राजस्थान और उत्तराखंड में 56 फीसदी प्रतिनिधित्व है, जो देश में सबसे अधिक है।

पंचायतों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधि

Source: Lok Sabha (unstarred Q No. 6343)

शोध संगठन, टअब्दुल लतीफ जमील पॉवर्टी एक्शन लैबट (J-PAL) द्वारा पश्चिम बंगाल और राजस्थान (2000-2002 के बीच) के गांवों में नीति निर्माण पर महिलाओं के आरक्षण के प्रभाव पर अक्टूबर 2018 के एक अध्ययन का उल्लेख किया है कि, “ महिलाओं के लिए आरक्षित पश्चिम बंगाल में ग्राम सभाओं ने नौ अन्य पेयजल सुविधाओं और सड़क की स्थिति में 18 फीसदी सुधार पर निवेश किया है।”

अध्ययन में पाया गया कि, पुरुषों की तुलना में महिलाएं, पानी की आपूर्ति और सड़क संपर्क जैसे मुद्दों के बारे में अधिक चिंतित थी। पश्चिम बंगाल में 31 फीसदी महिलाओं की शिकायतें पीने के पानी के बारे में थीं, और 31 फीसदी सड़क सुधार के बारे में थीं, जबकि इसी संबंध में पुरुषों के लिए आंकड़े क्रमशः 17 फीसदी और 25 फीसदी थे।

राजस्थान में, महिलाओं की 54 फीसदी शिकायतें पीने के पानी के बारे में थीं और 19 फीसदी कल्याण कार्यक्रमों के बारे में थी, जबकि पुरुषों के लिए आंकड़े 43 फीसदी और 3 फीसदी थे, जैसा कि अध्ययन में कहा गया है।

पश्चिम बंगाल के विपरीत, राजस्थान में महिलाओं ने सड़कों के बारे में कम शिकायत की। महिलाओं के लिए आरक्षित ग्राम सभाओं ने औसतन 2.62 फीसदी पेयजल सुविधाओं अधिक निवेश किया, और सड़क की स्थिति में कम सुधार किए, जो "8 फीसदी गिरावट का कारण" बना, जैसा कि महिलाओं के आरक्षण पर प्रभाव पर अध्ययन में बताया गया है।

अन्य राज्यों में, कोटा ने बाल स्वास्थ्य और पोषण में सुधार, महिला उद्यमशीलता में वृद्धि और महिलाओं के खिलाफ अपराधों के लिए पुलिस की जिम्मेदारी बढ़ाई है, जैसा कि जे-पीएएल ने बताया है।

पिछले पांच श्रृंखला के लिए तमिलनाडु के छह जिलों में इंडियास्पेंड ने जिन 32 महिलाओं के नेतृत्व वाली पंचायतों का सर्वेक्षण किया, वहां 30 फीसदी महिलाओं ने कहा कि वे अपनी पंचायत चुनाव तब भी लड़ना चाहेंगी, जब उनकी सीट अनारक्षित होगी।

साथ ही, 15 फीसदी महिलाओं ने कहा कि अगर उन्हें मौका दिया गया तो वे मुख्यधारा की चुनावी पार्टी की राजनीति में उतरना चाहेंगी। सभी जिलों में महिलाओं ने पितृसत्तात्मक माहौल और जातिगत पूर्वाग्रह की शिकायत की।नए उम्मीदवारों की तलाश में, तमिलनाडु में राजनीतिक दल बड़ी संख्या में सफल महिला पंचायत नेताओं की उपेक्षा करते हैं और जो महिला पंचायत नेता सक्रिय राजनीति में शामिल होती हैं, उन्हें शायद ही पद में ऊपर बढ़ पाती हैं, जैसा कि हमारी जांच में पाया गया है।

( पलियथ विश्लेषक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं। ) यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 15 मार्च 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। हमसे respond@indiaspend.org पर संपर्क किया जा सकता है। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार रखते हैं।

"क्या आपको यह लेख पसंद आया ?" Indiaspend.com एक गैर लाभकारी संस्था है, और हम अपने इस जनहित पत्रकारिता प्रयासों की सफलता के लिए आप जैसे पाठकों पर निर्भर करते हैं। कृपया अपना अनुदान दें :Women Representatives_620

मुंबई: अपने राष्ट्रीय संसदों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के प्रतिशत के आधार पर 193 देशों की 2019 सूची में भारत 149 वें स्थान पर रहा है। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान को पीछे छोड़ते हुए देश वर्ष 2018 के बाद से तीन स्थान गिरा है।

जैसा कि अप्रैल 2019 में भारत अपने 17 वें आम चुनाव के लिए तैयार है, विधानसभाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व का मुद्दा जोर पकड़ रहा है। कांग्रेस प्रमुख राहुल गांधी ने पार्टी के सत्ता में आने पर संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का वादा किया है ; ओडिशा में बीजू जनता दल 33 फीसदी लोकसभा सीटों पर महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारेगा; और बंगाल की तृणमूल कांग्रेस द्वारा जारी उम्मीदवारों की सूची में 41 फीसदी उम्मीदवार महिलाएं हैं।

लोकसभा में 66 महिला सांसद हैं, और इसकी 524 सीटों में से 12.6 फीसदी पर कब्जा है, जबकि 1 जनवरी, 2019 तक विश्व औसत 24.3 फीसदी था।

पिछले छह दशकों से 2014 तक, जैसा कि भारत की जनसंख्या में महिलाओं की हिस्सेदारी 48.5 फीसदी पर रही, पहली (1952) और 16 वीं लोकसभा (2014) के बीच महिला सांसदों की हिस्सेदारी आठ प्रतिशत अंक बढ़कर 12.6 फीसदी हो गई है। 1952 में लगभग 80 लाख भारतीय महिलाओं के लिए एक महिला सांसद थी। 2014 तक यह 90 लाख से अधिक महिलाओं के लिए एक थी (ऑस्ट्रिया की आबादी के बराबर)।

रवांडा ( वर्तमान में दुनिया में पहले स्थान पर है ) इसके 80 सीटों वाले निचले सदन में 49 महिला सांसद हैं या 111,000 महिलाओं पर एक महिला सांसद है, जैसा कि एक मल्टिलैटरल एजेंसी इंटर-पार्लियामेंट्री यूनियन ( आईपीयू ) द्वारा 1 जनवरी 2019 को जारी आंकड़ों से पता चलता है।

5 मार्च, 2019 को जारी की गई वार्षिक रिपोर्ट पर आईपीयू की प्रेस बयान के अनुसार, 2018 में राष्ट्रीय संसदों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग एक प्रतिशत बढ़कर 24.3 प्रतिशत हो गई है। संसद में महिलाओं की वैश्विक हिस्सेदारी में वृद्धि जारी है; रिपोर्ट के अनुसार 2008 में यह 18.3 फीसदी और 1995 में 11.3 फीसदी थी।

सूची में 50 देश हैं, जहां 2018 में चुनाव हुए हैं।

आईपीयू के अध्यक्ष और मैक्सिकन सांसद गैब्रिएला क्यूवास बैरोन ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा, "संसद में अधिक महिलाओं का मतलब बेहतर, मजबूत और अधिक प्रतिनिधि लोकतंत्र है, जो सभी लोगों के लिए काम करता है। 2018 में हमने जो एक फीसदी वृद्धि देखी, वह महिलाओं के संसदीय प्रतिनिधित्व पर एक छोटे से सुधार का प्रतिनिधित्व करती है। इसका मतलब है कि हमें अभी भी वैश्विक लिंग समानता को प्राप्त करने के लिए एक लंबा रास्ता तय करना है।इस कारण से, हमें अच्छी तरह से डिजाइन किए गए कोटा और चुनावी प्रणालियों को अपनाने के लिए अधिक राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। उन सभी कानूनी बाधा को खत्म करने की जरूरत है, जो महिलाओं के संसद में प्रवेश के अवसरों में बाधा बन सकते हैं। "

1 जनवरी, 2019 तक संसद में महत्वपूर्ण महिला प्रतिनिधित्व वाले टॉप 10 देशों की सूची में तीन अफ्रीकी ( रवांडा, नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका ) हैं और कोई भी एशियाई देश नहीं हैं।

राज्य विधानसभाओं में महिला प्रतिनिधित्व संसद से भी कम

एक ओर तो लोकसभा में महिला प्रतिनिधित्व कम है, वहीं राज्य विधानसभाओं में तो प्रतिनिधित्व और भी कम है। ‘मिनिस्ट्री ऑफ स्टटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इंप्लिमेंटेशन’ द्वारा जारी-2017 के आंकड़ों के अनुसार, पांच वर्षों में 2017 तक, राज्य विधानसभाओं में महिला प्रतिनिधित्व बिहार, हरियाणा और राजस्थान (14 फीसदी) में सबसे अधिक था। मिजोरम, नागालैंड और पुदुचेरी के विधानसभाओं में कोई निर्वाचित महिला प्रतिनिधि नहीं थी। राज्य विधानसभाओं और राज्य परिषदों में महिलाओं का राष्ट्रीय औसत क्रमशः 9 फीसदी और 5 फीसदी था।

विधानसभा में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व से भारतीय राजनीति की पितृसत्तात्मक संरचना का पता लगाया जा सकता है, जैसा कि ‘इंकोनोमिक एंड पलिटिकल वीकली’ के जनवरी 2011 के एक विश्लेषण से पता चलता है। विश्लेषण के अनुसार, इसके पीछे के कुछ मुख्य कारणों में संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण का अभाव, महिलाओं को टिकट देने के लिए राजनीतिक दलों के बीच अनिच्छा, महिलाओं के बीच चुनावी राजनीति के बारे में जागरूकता की एक सामान्य कमी और परिवार के समर्थन की कमी शामिल है।

लोकसभा में संसद की महिला सदस्य, 1952 से 2014 तक

Source: Ministry of Statistics and Programme Implementation, 2017; Economic and Political Weekly, 2011

लोकसभा और राज्य विधान सभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटों (एक सौ और आठवां संशोधन या महिला आरक्षण बिल) को आरक्षित करने के लिए बिल पर कोई प्रगति नहीं हुई है, हालांकि यह एक दशक पहले पेश किया गया था।

ओडिशा की बीजू जनता दल सरकार ने राज्य विधानसभा में एक प्रस्ताव पेश किया, जिसमें संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का प्रस्ताव किया गया, जैसा कि द इंडियन एक्सप्रेस ने 20 नवंबर, 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

पटनायक ने 20 नवंबर, 2018 को कहा था, "कोई भी घर, कोई समाज, कोई राज्य, कोई भी देश अपनी महिलाओं को सशक्त बनाए बिना आगे नहीं बढ़ा है।"

ओडिशा राज्य विधानसभा में निर्वाचित महिला प्रतिनिधि, 9 फीसदी की राष्ट्रीय औसत से दो प्रतिशत कम हैं। विधानसभा ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया।

महिला प्रतिनिधि अपने निर्वाचन क्षेत्रों में आर्थिक विकास लाती हैं

‘यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी वर्ल्ड इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट इकोनॉमिक्स’ रिसर्च द्वारा 2018 के एक अध्ययन के अनुसार महिलाओं का चुनाव करने वाले निर्वाचन क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों में काफी अधिक वृद्धि के सबूत हैं।

इसमें 4,265 राज्य विधानसभा क्षेत्रों के आंकड़ों की जांच की गई ( दो दशक से 2012 तक ) जहां "राज्य विधान सभा सीटों की हिस्सेदारी महिलाओं द्वारा जीती गई 4.5 फीसदी से बढ़कर 8 फीसदी के करीब" हुई और इन क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधि के लिए एक प्रॉक्सी के रूप में प्रकाश की वृद्धि या रात की रोशनी पर ध्यान केंद्रित किया गया।

अध्ययन के अनुसार, भारत में महिला विधायकों ने अपने निर्वाचन क्षेत्रों में पुरुष विधायकों की तुलना में प्रति वर्ष लगभग 1.8 प्रतिशत अंकों से आर्थिक प्रदर्शन किया। अध्ययन में कहा गया है कि, "हम अनुमान लगाते हैं कि भारत में महिला विधायक पुरुष विधायकों की तुलना में अपने निर्वाचन क्षेत्रों में प्रति वर्ष 15 प्रतिशत अंक बढ़ाते हैं।"

जबकि संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या में काफी वृद्धि नहीं हुई है, महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित की गई हैं, जो स्थानीय सरकारों में 1993 के बाद से, संविधान के 73 वें और 74 वें संशोधन से संभव हुआ है।

इस कदम के कारण पंचायतों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की वर्तमान राष्ट्रीय औसत 44 फीसदी हो गई है। राजस्थान, उत्तराखंड में पंचायतों में सबसे अधिक महिला प्रतिनिधित्व है।

5 अप्रैल, 2018 को लोकसभा के इस उत्तर के अनुसार, 14 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पंचायतों में 50 फीसदी या अधिक निर्वाचित महिला प्रतिनिधि हैं। राजस्थान और उत्तराखंड में 56 फीसदी प्रतिनिधित्व है, जो देश में सबसे अधिक है।

पंचायतों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधि

Source: Lok Sabha (unstarred Q No. 6343)

शोध संगठन, टअब्दुल लतीफ जमील पॉवर्टी एक्शन लैबट (J-PAL) द्वारा पश्चिम बंगाल और राजस्थान (2000-2002 के बीच) के गांवों में नीति निर्माण पर महिलाओं के आरक्षण के प्रभाव पर अक्टूबर 2018 के एक अध्ययन का उल्लेख किया है कि, “ महिलाओं के लिए आरक्षित पश्चिम बंगाल में ग्राम सभाओं ने नौ अन्य पेयजल सुविधाओं और सड़क की स्थिति में 18 फीसदी सुधार पर निवेश किया है।”

अध्ययन में पाया गया कि, पुरुषों की तुलना में महिलाएं, पानी की आपूर्ति और सड़क संपर्क जैसे मुद्दों के बारे में अधिक चिंतित थी। पश्चिम बंगाल में 31 फीसदी महिलाओं की शिकायतें पीने के पानी के बारे में थीं, और 31 फीसदी सड़क सुधार के बारे में थीं, जबकि इसी संबंध में पुरुषों के लिए आंकड़े क्रमशः 17 फीसदी और 25 फीसदी थे।

राजस्थान में, महिलाओं की 54 फीसदी शिकायतें पीने के पानी के बारे में थीं और 19 फीसदी कल्याण कार्यक्रमों के बारे में थी, जबकि पुरुषों के लिए आंकड़े 43 फीसदी और 3 फीसदी थे, जैसा कि अध्ययन में कहा गया है।

पश्चिम बंगाल के विपरीत, राजस्थान में महिलाओं ने सड़कों के बारे में कम शिकायत की। महिलाओं के लिए आरक्षित ग्राम सभाओं ने औसतन 2.62 फीसदी पेयजल सुविधाओं अधिक निवेश किया, और सड़क की स्थिति में कम सुधार किए, जो "8 फीसदी गिरावट का कारण" बना, जैसा कि महिलाओं के आरक्षण पर प्रभाव पर अध्ययन में बताया गया है।

अन्य राज्यों में, कोटा ने बाल स्वास्थ्य और पोषण में सुधार, महिला उद्यमशीलता में वृद्धि और महिलाओं के खिलाफ अपराधों के लिए पुलिस की जिम्मेदारी बढ़ाई है, जैसा कि जे-पीएएल ने बताया है।

पिछले पांच श्रृंखला के लिए तमिलनाडु के छह जिलों में इंडियास्पेंड ने जिन 32 महिलाओं के नेतृत्व वाली पंचायतों का सर्वेक्षण किया, वहां 30 फीसदी महिलाओं ने कहा कि वे अपनी पंचायत चुनाव तब भी लड़ना चाहेंगी, जब उनकी सीट अनारक्षित होगी।

साथ ही, 15 फीसदी महिलाओं ने कहा कि अगर उन्हें मौका दिया गया तो वे मुख्यधारा की चुनावी पार्टी की राजनीति में उतरना चाहेंगी। सभी जिलों में महिलाओं ने पितृसत्तात्मक माहौल और जातिगत पूर्वाग्रह की शिकायत की।नए उम्मीदवारों की तलाश में, तमिलनाडु में राजनीतिक दल बड़ी संख्या में सफल महिला पंचायत नेताओं की उपेक्षा करते हैं और जो महिला पंचायत नेता सक्रिय राजनीति में शामिल होती हैं, उन्हें शायद ही पद में ऊपर बढ़ पाती हैं, जैसा कि हमारी जांच में पाया गया है।

( पलियथ विश्लेषक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं। ) यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 15 मार्च 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। हमसे respond@indiaspend.org पर संपर्क किया जा सकता है। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार रखते हैं।

"क्या आपको यह लेख पसंद आया ?" Indiaspend.com एक गैर लाभकारी संस्था है, और हम अपने इस जनहित पत्रकारिता प्रयासों की सफलता के लिए आप जैसे पाठकों पर निर्भर करते हैं। कृपया अपना अनुदान दें :