छतरपुर, पन्ना (मध्य प्रदेश): "इस असहनीय गर्मी में भी हमें पानी के ल‍िए रोज 10-15 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है।" मध्य प्रदेश के पन्ना जिले की एक आदिवासी सुमिंत्रा देवी अपना दर्द साझा करते हुए कहती हैं।

बुजुर्ग सुमिंत्रा देवी (65) बुन्देलखण्ड के लक्ष्मीपुर ग्राम पंचायत के सूखाग्रस्त गांव नई बस्ती में रहती हैं। वे एक बार में प्लास्टिक के चार ड‍िब्‍बे में लगभग 80 लीटर पानी लाती है। उनके घर में कुल चार लोग हैं। मतलब प्रत‍ि व्‍यक्‍त‍ि ह‍िस्‍से 20 लीटर पानी आया जबकि भारतीय दिशानिर्देशों के अनुसार यह 40 लीटर होना चाह‍िए। मतलब जरूरत के ह‍िसाब आधा पानी ही म‍िल रहा।

सुमित्रा देवी जिस क्षेत्र में रहती हैं वह बुन्देलखण्ड है जो पानी की कमी और सूखे के ल‍िए जाना जाता है। 13 ज‍िलों वाले इस क्षेत्र में उत्तर प्रदेश के झाँसी, जालौन, ललितपुर, महोबा, हमीपुर, बांदा और चित्रकूट जिले आते हैं जबकि मध्‍य प्रदेश वाले बुंदेलखंड क्षेत्र में दतिया, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, दमोह और सागर आते हैं।

विशेषज्ञ बताते हैं कि पहले से ही पानी की कमी वाला यह क्षेत्र कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहा है, जैसे बढ़ता तापमान, कम दिनों में अधिक बार‍िश जिसकी वजह से पानी बह जा रहा और उसका संचयन नहीं हो पा रहा। इसके अलावा मौजूदा भूजल संसाधनों का अत्यधिक उपयोग और कुप्रबंधन भी एक चुनौती है।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के आंकड़ों के आधार पर डेवलपमेंट अल्टरनेटिव्स के एक विश्लेषण में पाया गया कि इस जलवायु हॉटस्पॉट में औसत अधिकतम तापमान 1960 और 1990 के बीच की अवधि की तुलना में 1980 से 2005 तक 0.28 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया। आने वाला समय और बुरा होने वाला है। संयुक्त राष्ट्र प्रशिक्षण और अनुसंधान संस्थान (यूएनआईटीएआर) के जलवायु मॉडलिंग प्रयोगों का अनुमान है कि इस सदी के अंत तक तापमान लगभग 2 से 3.5 डिग्री सेल्सियस अधिक हो जाएगा।

आईएमडी के आंकड़ों से पता चलता है कि चालू मानसून में भी 1 जून से 23 अगस्त के बीच छतरपुर में सामान्य से 18% कम बारिश हुई थी, जबकि पन्ना में 3% कम बारिश हुई थी।

भारत के जलवायु हॉटस्पॉट पर हमारी सीरीज के इस खबर में हम बुन्देलखण्ड के पन्ना और छतरपुर जिलों में गये और वहां देखा क‍ि लोग जीवन जीने के लिए आवश्यक संसाधन पानी के लिए कैसे संघर्ष कर रहे हैं।

पानी की व्‍यवस्‍था करना महिलाओं और बच्चों की जिम्मेदारी

पानी की कमी का खामियाजा सबसे ज्यादा महिलाओं को ही भुगतना पड़ता है। पूरे भारत में महिलाएं हर साल पानी ले आने, ले जाने में लगभग 150 मिलियन दिन खर्च करती हैं जो 10 अरब रुपये या 160 मिलियन डॉलर की राष्ट्रीय आय के नुकसान के बराबर है।

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) की पेयजल, स्वच्छता, स्वच्छता और आवास पर 76वें दौर की रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश में केवल 28% घरों में या उनके घरों के ठीक बाहर पीने के पानी का स्रोत था। से सर्वे र‍िपोर्ट जुलाई और दिसंबर 2018 के बीच की है। बाकी के बचे लोगों में से लगभग 48 फीसदी लोग 200 मीटर और 1.5 किमी (0.2%) से अधिक की दूरी तय करते हैं।

भारत के सभी घरों में नल कनेक्‍शन के लिए योजना चल रही है। लेकिन जल जीवन के डैशबोर्ड के अनुसार 22 अगस्त तक पन्ना जिले में केवल 30% घरों में नल कनेक्शन था, जबकि छतरपुर में 33% घरों में नल कनेक्शन था।

शांतिबाई, अपने मिट्टी के घर के सामने वाले गेट पर नंगे पैर बैठी हैं। फोटो साभार: ज्योत्सना रिछारिया

पन्ना के देवेन्द्र नगर के बसई गांव की 65 वर्षीय शांतिबाई को गुजार-बसर के लिए संघर्ष करना पड़ता है। बारिश की कमी और नियमित जल आपूर्ति नहीं होने के कारण क्षेत्र में खेती के अवसर भी बहुत कम हैं। शांतिबाई और पूरा गांव 3 किमी दूर एक छोटे से जलाशय पर निर्भर हैं। उनकी पीठ में लगातार दर्द रहता है और इनका इकलौता बेटा शहर में मजदूरी करता है। इसलिए वह हर दिन पानी लाने के लिए संघर्ष करती हैं। इसका असर गांव की उन लड़कियों पर भी पड़ता है जो अपने परिवार और पड़ोसियों को पानी ढोने में मदद करती हैं। शांताबाई कहती हैं, "मेरे पड़ोस में 12 साल की एक छोटी लड़की पानी ढोने में मेरी मदद करती है।"

“गांव में महिलाएं अपने सिर पर घड़े या बाल्टियां रखकर पानी ढोती हैं। दबाव और जल स्रोतों से दूरी के कारण पीठ, पैर और उठने-बैठने में द‍िक्‍कत होने लगती है। गर्मी में ये द‍िक्‍कत और बढ़ जाती है क्‍योंक‍ि तब उन्‍हें कड़ी धूप में भी पानी ढोना पड़ता है। पानी के लिए बहुत समय खर्च हो जाता है ज‍िसका उपयोग क‍िसी और काम के लिए भी क‍िया जा सकता है।” लक्ष्मीपुर गांव की सरपंच नीलम राय ने कहा। “तथ्य यह है कि इन महिलाओं को अपना दिन पानी ढोने में बिताना पड़ता है। सही मायनों में यह उनके लिए बहुत बड़ा नुकसान है। इसकी वजह से वे पैसे कमाने के लिए दूसरा कोई काम नहीं कर पातीं, अपने बच्‍चों की अच्‍छी तरह से देखभाल नहीं कर पातीं, वहीं दूसरी ओर युवा लड़कियों की बात करें तो इसकी वजह से वे उचित शिक्षा नहीं ग्रहण कर पाती हैं।”

ग्रामीणों का कहना है कि पन्ना जिले के मडली गांव में हर बच्चा स्कूल नहीं जाता है, इसका एक कारण यह भी है कि स्कूल में बच्चों को ठीक से पढ़ाया नहीं जाता है। वहीं पानी के लिए संघर्ष से समस्या और बढ़ जाती है। जब हमने पन्ना और छतरपुर जिले के गांवों का दौरा किया तो ज्यादातर महिलाएं और बच्चे ही हैंडपंप, कुओं और अन्य जल स्रोतों के पास देखे गए। स्कूल समय में कई बच्चे नंगे पैर या स्कूल ड्रेस में पानी भर रहे थे।

कुसुम रानी अपने घर के बाहर बैठी है, दिन भर पानी के ड्रम के साथ अपनी बहू के लौटने का इंतजार कर रही हैं। फोटो साभार: अमन बीरेंद्र जयसवाल

वर्षीय कुसुम रानी (68) अपने दो बेटों के साथ रहती हैं जो कभी स्कूल नहीं गए और अब पशुपालक के रूप में काम करते हैं। उनकी बहू अपने 16 वर्षीय पोते की मदद से घर के लिए पानी लाती है। “मेरा पोता भी हर दिन पानी लाने में अपनी मां की मदद करता है। हमने एक सेकेंड-हैंड साइकिल खरीदी है ज‍िस पर पानी का ड्रम ले आते हैं।''

जबकि उन्हें उम्मीद है कि उनका 16 वर्षीय पोता पढ़ाई करेगा, वह कहती हैं, “मेरे बेटों की तरह वह स्कूल नहीं जाता है। हेडमास्टर बच्चों को जूतों और डंडों से पीटते हैं। एक बार जब वह भयभीत हो गया तो फिर कभी वापस नहीं गया। वे कुछ सिखाते भी नहीं। वह 16 साल का है और अपना नाम नहीं लिख पाता।”

सरपंच राय ने कहा कि उन्हें अपने गांव में पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए और अधिक कुएं खोदने और बांध बनाने के लिए ऊपरी अधिकारियों से मदद की जरूरत है। उनके अनुसार, वर्तमान में आवंटित धनराशि पर्याप्त नहीं है।

इंडियास्पेंड ने जिलों में पानी की उपलब्धता के लिए आवंटित धन के बारे में जानकारी के लिए पन्ना और छतरपुर के जिला कलेक्टरों के साथ-साथ मध्य प्रदेश के जल संसाधन विभाग से भी संपर्क किया है और जब वे जवाब देंगे तो हम खबर अपडेट कर देंगे।

पहले से भी कम बारिश, बदल रहा है मौसम का मिजाज

बुन्देलखण्ड की 95 सेमी वार्षिक वर्षा में से लगभग 85 सेमी जून से सितंबर तक चार महीनों में औसतन 40 बरसात के दिनों में होती है। स्काईमेट वेदर के डेटा का उपयोग करते हुए आर. रंजन, योगेश पाटिल, जतिन सिंह और आरज़ू साहा के वर्षा डेटा के विश्लेषण से पता चला कि अक्सर भारी वर्षा कुछ ही घंटों में होती है जिसका अर्थ है कि पानी को मिट्टी में घुसने के लिए बहुत कम समय मिलता है और ग्राउंड वाटर र‍िचार्ज नहीं हो पाता। लेखकों ने लिखा, "कई बार तीव्रता 3-5 सेमी प्रति घंटे तक बढ़ जाती है। प्रत्येक स्पेल 15 मिनट से आधे घंटे तक रहता है।"

सितंबर 2019 में करंट साइंस में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में 1901 और 2013 के बीच बुंदेलखण्ड क्षेत्र में प्रति वर्ष 0.49 से 2.16 मिमी बार‍िश तक की गिरावट की प्रवृत्ति का विवरण दिया गया है। पन्ना में प्रति वर्ष 1.06 मिमी और छतरपुर में 0.74 मिमी प्रति वर्ष वर्षा कम हुई। अध्ययन में कहा गया है, "ऐसा बताया गया है कि पिछले दो दशकों के दौरान मानसूनी बार‍िश की मात्रा दीर्घकालिक सामान्य मात्रा से आधी हो गई है जिसके परिणामस्वरूप 4-5 वर्षों तक लगातार सूखा पड़ा है।"

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कृषि इंजीनियरिंग विभाग के शोधकर्ताओं वर्ष 2022 के एक अन्य विश्लेषण में पाया गया कि पन्ना और छतरपुर सहित बुंदेलखंड के 13 जिलों में से 12 में 1981 से 2020 की अवधि के बीच सालाना बार‍िश की प्रवृत्ति पर काम क‍िया। इसके बाद लेखकों ने लिखा, "यह क्षेत्र अधिक अनियमित बार‍िश व्यवहार के कारण के साथ सूखे की ओर बढ़ रहा है।"

अध्ययन का हिस्सा रहे पीएचडी शोधकर्ता फैनाई लियानसांगपुई ने कहा, इस क्षेत्र में कठोर चट्टान वाले जलभृत हैं और इनमें पानी की स्थानांतरित क्षमता खराब है। उन्होंने कहा, ऐसे में 5 से 15 मीटर गहराई के उथले खोदे गए कुएं घरेलू और कृषि उपयोग के लिए पानी का प्राथमिक स्रोत हैं जो पर्याप्त नहीं हैं।

इंडियास्पेंड के विश्लेष‍ित किए गए आईएमडी के आंकड़ों के अनुसार पन्ना जिले में सितंबर में औसत वर्षा 1984 में 283.3 सेमी से घटकर 2014 में 80.8 सेमी हो गई है। आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले 30 वर्षों की समान अवधि में जिले में वार्षिक वर्षा में भी गिरावट आई है।


स्थानीय लोगों का कहना है कि बारिश का पैटर्न भी बदल रहा है, कम दिनों में अधिक बारिश हो रही है।

“बारिश लगभग 1-2 सप्ताह तक जारी रहती थी,” सामाजिक कार्यकर्ता दिलीप अहिरवार ने कहा जो गैर-सरकारी संगठन बावन (बाघ आप और वन) चलाते हैं। ये एनजीओ पन्ना राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र (55 बाघों का घर) के संरक्षित और उसके आसपास रहने वाले समुदायों के साथ मिलकर वन्यजीव संरक्षण को बढ़ावा देने पर काम करता है। इसके अलावा अहिरवार ने कहा, "हमें अब अत्यधिक सर्दी और अत्यधिक गर्मी लगती थी। जबकि कुछ साल पहले तक ऐसा नहीं था।"

ग्रामीण विकास पर केंद्रित गुरुग्राम स्थित गैर सरकारी संगठन, सहगल फाउंडेशन में जल, अनुसंधान और प्रशिक्षण के प्रधान वैज्ञानिक, ललित मोहन शर्मा ने कहा, “यदि कम अवधि के भीतर ज्‍यादा मात्रा में बार‍िश होती है तो पानी का भंडारण कम होता है। शर्मा ने कहा कि ऐसा तब है जब बुंदेलखण्ड में पानी की मांग बढ़ गई है, खासकर गर्मी बढ़ने के कारण।”

अधिक बार सूखा पड़ना

ज्‍यादा तापमान और कम बार‍िश के कारण लंबे समय तक सूखा पड़ता है जो जलवायु परिवर्तन के कारण और भी बदतर हो सकता है।

संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन टू कॉम्बैट डेजर्टिफिकेशन (यूएनसीसीडी) के 15वें सम्मेलन में पार्टियों के 15वें सम्मेलन में जारी संख्या में सूखा, 2022 रिपोर्ट के अनुसार पिछले दो दशकों की तुलना में 2000 के बाद से सूखे की संख्या और अवधि में 29% की वृद्धि हुई है। आकलन में कहा गया है, "गंभीर सूखे के प्रभाव से 1998 और 2017 के बीच भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 2-5 प्रतिशत की कमी होने का अनुमान है।"

सूखा कम बार‍िश, पानी की कम उपलब्धता और फसल की उपज में कमी का संयुक्त प्रभाव है। मौसम संबंधी सूखे का तात्पर्य लंबे समय तक औसत से कम वर्षा के कारण पड़ने वाले सूखे से है। 'हाइड्रोलॉजिकल सूखा' नदियों में पानी का असामान्य रूप से कम प्रवाह, झीलों, जलाशयों और भूजल के निम्न स्तर है जो आमतौर पर मौसम संबंधी सूखे के बाद आते हैं और ज‍िसे कृष‍ि सूखा भी कहते हैं। भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के एक शोध प्रोजेक्ट के अनुसार सूखे या कम बार‍िश कर वजह से फसल उत्‍पादन में कमी आ सकती है या पूरी फसल ही चौपट हो सकती है।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान द्वारा 2014 में प्रकाशित 1901 से 2001 तक के सूखे के अध्ययन से पता चलता है कि बुन्देलखण्ड में "पिछले 30 वर्षों में गंभीर सूखे के वर्षों में तेजी से वृद्धि हुई है"। “यूपी का बुन्देलखण्ड क्षेत्र और मध्‍य प्रदेश की रिपोर्ट में कहा गया है कि 18वीं और 19वीं शताब्दी में हर 16 साल में सूखा पड़ता था जो 1968 से 1992 की अवधि के दौरान तीन गुना बढ़ गया और अब यह एक वार्षिक समस्या बन गई है।

पन्ना जिले के मादली गांव में साइकिल पर पानी के दो डब्बे ले जाता 12 साल का लड़का।फोटो साभार: अमन बीरेंद्र जयसवाल

"बुंदेलखंड क्षेत्र में औसतन वाष्पीकरण-उत्सर्जन दर [प्रक्रिया जिसके द्वारा पानी वाष्पीकरण और वाष्पोत्सर्जन के माध्यम से पृथ्वी से हवा में जाता है] लगभग 1,600 मिमी है, जबकि वर्षा का स्तर 1,000 मिमी से कम है जो स्थिति को और खराब कर देता है।" नितिन बस्सी इंडियास्पेंड को बताते हैं जो ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद (सीईईडब्ल्यू) में जल के कार्यक्रम प्रमुख हैं। इसके अलावा, "कठोर चट्टानी इलाके और काली मिट्टी और भूजल के अत्यधिक दोहन, जलवायु परिवर्तन के कारण नियमित सूखे के कारण जल स्तर साल-दर-साल कम हो रहा है।"

कम वर्षा और सूखे का मतलब है खेती का नुकसान, जिसके क्षेत्र के लोगों पर गंभीर परिणाम होंगे।

शिव देवी अपने गांव में हैंडपंप चलाती हुई। 68 वर्षीय व्यक्ति का कहना है कि क्षेत्र के अधिकांश हैंडपंप सूखे हैं। फोटो साभार: अमन बीरेंद्र जयसवाल

“मेरे दोनों बेटे बेरोजगार हैं। हमारे पास कोई ज़मीन नहीं है। हम खेत मजदूर के रूप में काम करते थे, लेकिन कम बारिश के कारण फसल का भारी नुकसान हुआ और हमें पिछले साल बिल्कुल भी भुगतान नहीं किया गया, ”पन्ना की 68 वर्षीय शिव देवी कहती हैं, जिनका परिवार छह लोगों का है।

गांवों के लोगों का कहना है कि उन्हें खेती करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। कई लोग बतौर मजदूर पशुओं की देखरेख करते हैं तो कई लोग हीरे की खदानों में काम करने लगते हैं या पास के शहरों में चले जाते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि पानी की कमी न केवल मनुष्यों को प्रभावित करती है बल्कि पन्ना टाइगर रिजर्व में मानव-बाघ संघर्ष का कारण बनती है और बाघों के आवास पर असर डालती है। सहगल फाउंडेशन के शर्मा ने कहा कि गर्मियों के दौरान, गांवों में अधिकांश हैंडपंप सूख जाते हैं और लोग नीचे की ओर स्थित जलधाराओं से पानी लेते हैं जहां वन्यजीव भी पानी के लिए आते हैं। ऐसे में इंसान और जानवरों के बीच भी संघर्ष बढ़ रहा है।

इसके अलावा, "पानी अक्सर दूषित होता है जिससे बीमारियां होती हैं और टाइगर रिजर्व के अंदर रहने वाले लोग कम जागरूक होते हैं और इसलिए आम तौर पर बिना फ‍िल्‍टर किए सीधे पानी का उपभोग करते हैं," उन्होंने कहा।

इंडियास्पेंड ने पन्ना, छतरपुर में जलवायु परिवर्तन के इन मुद्दों पर ट‍िप्‍पणी के लिए पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) में आर्थिक सलाहकार राजश्री रे के साथ-साथ एमओईएफसीसी में सचिव लीना नादान से संपर्क किया है। प्रतिक्रिया मिलने ही खबर अपडेट की जायेगी।