देहरादून: देहरादून के फतेहपुर टांडा गांव की निवासी मंजीत कौर (55) को अपने सात महीने के पोते को सुलाने में आज कल काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, कारण है घर के पास लगे स्क्रीनिंग प्लांट और बड़े वाहनों से होने वाला शोर। इस शोर की वजह से मंजीत और उनके पोते की नींद पूरी नहीं हो पाती है और दोनों को ही चिड़चिड़ाहट होती है।

उत्तराखंड में देहरादून के डोईवाला तहसील के जीवनवाला ग्राम पंचायत के फतेहपुर टांडा गांव राजाजी नेशनल पार्क की कांसरो रेंज से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर सौंग नदी के किनारे बसा है। गांव के इस छोटे से इलाके में सात स्क्रीनिंग प्लांट लगे हुए हैं जहां नदी से निकाले गए पत्थर और रेत को धोया और अलग किया जाता है। स्क्रीनिंग प्लांट में नदी से खनन कर लाए गए उपखनिज जैसे रेत, बजरी और पत्थर को उनके आकार और भार जैसे गुणों के आधार पर अलग-अलग छांट धुलाई करके रखा जाता है।

सौंग नदी के किनारे बढ़ती स्क्रीनिंग प्लांट की संख्या और इनसे होने वाले ध्वनि और वायु प्रदूषण के चलते आसपास के ग्रामीणों के सामान्य जीवन और स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। वहीं दूसरी ओर इन उद्योगों के नियमों और प्रदूषण के मानकों पर निगरानी रखने वाले विभाग जैसे राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और खनन विभाग इन उद्योगों से जुड़ी अनियमितताओं के लिए एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराते हैं।

फतेहपुर टांडा गांव के लोगों की शिकायत है कि क्षेत्र के 7 स्क्रीनिंग प्लांट रात में भी चलते रहते हैं और भारी वाहनों की आवाजाही लगी रहती है। रात के समय का शोर उन्हें बेहद परेशान करता है।

फतेहपुर टांडा गांव के लोगों की शिकायत है कि क्षेत्र के 7 स्क्रीनिंग प्लांट रात में भी चलते रहते हैं और भारी वाहनों की आवाजाही लगी रहती है। रात के समय का शोर उन्हें बेहद परेशान करता है।

सेहत पर शोर का असर

"फतेहपुर टांडा हमारा पुश्तैनी गांव है। यहां सौंग नदी से खनन कर निकाले गए पत्थरों की छंटाई-धुलाई के इतने प्लांट लग गए हैं कि हमारी दिक्कत बढ़ती जा रही है। इनसे हर समय शोर-शराबा होता रहता है। दिन हो या रात, हमारी नींद खराब हो गई है। हमारा ये छोटा बच्चा जल्दी सोता ही नहीं है। अचानक तेज़ आवाज़ आती है और ये चिल्ला पड़ता है। हम इसे गोद में लेकर घूमते रहते हैं। इन प्लांट के चलने की कोई समय ही तय नहीं है," मंजीत कहती हैं।

वहीं मंजीत अपने पति जरनैल सिंह (58) के बारे में बताते हुए कहती हैं, "मेरे पति ब्लड प्रेशर और डाइबिटीज़ के मरीज हैं। कई बार अचानक पत्थरों के गिरने की आवाज़ आती है और वह ज्यादा ही हड़बड़ा जाते हैं। फिर हम उन्हें शांत करते हैं।"

पर्यावरण संरक्षण अधिनियम-1986 के तहत ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 के मुताबिक आवासीय क्षेत्र में दिन में आवाज का स्तर 55 डेसिबल और रात में 45 डेसिबल होना चाहिए।

हालाँकि, ध्वनि का स्तर मापने वाली मोबाइल ऐप 'साउंड मीटर' पर मंजीत के घर के दरवाजे पर दोपहर के समय ध्वनि का स्तर 65 से 78 डेसीबल के बीच रिकॉर्ड हुआ। इस ही दौरान ध्वनि का अधिकतम स्तर 98 डेसिबल रिकॉर्ड किया गया जो कि रिहायशी इलाकों में ध्वनि प्रदूषण के मानकों से बहुत अधिक था। मंजीत के घर पर ध्वनि का स्तर औद्योगिक क्षेत्र के मानकों से भी कई अधिक है। औद्योगिक क्षेत्र में दिन के समय 75 डेसिबल और रात के समय 70 डेसिबल ध्वनि सीमा तय की गई है। आपको बताते चलें कि इण्डिया स्पेंड थर्ड पार्टी साउंड एप्लीकेशन के द्वारा ध्वनि की तीव्रता की प्रमाणिकता को सत्यापित नहीं करता है।

लगातार तेज ध्वनि के बीच रहना सेहत के लिए भी नुकसानदायक है। द्वारका रिवर बेसिन पर की गयी एक रिसर्च के मुताबिक मुताबिक खनन की वजह से हो रही तेज़ आवाज़ की वजह से न सिर्फ सुनने की छमता पर असर पड़ता है बल्कि स्वास सम्बन्धी बीमारिया भी बढ़ती है। वर्ष 2000 में छपी एक रिसर्च के मुताबिक अधिक शोर सुनने की क्षमता को प्रभावित करता है, हाइपर टेंशन, ह्रदय संबंधी बीमारियां, चिड़चिड़ापन, नींद में बाधा जैसी समस्याएं बढ़ता है और स्कूली बच्चों के विकास और उनकी बौद्धिक क्षमता पर असर डाल सकता है।

उत्तराखंड की खनन नीति के मुताबिक आबादी से 300 मीटर की दूरी पर स्क्रीनिंग प्लांट लगाए जा सकते हैं। ग्रामीण कहते हैं कि इतने नजदीक लगे प्लांट से होने वाला शोर उनके रोजमर्रा के कामों में बाधा डालता है। इसका असर उनकी सेहत पर भी है।

उत्तराखंड की खनन नीति के मुताबिक आबादी से 300 मीटर की दूरी पर स्क्रीनिंग प्लांट लगाए जा सकते हैं। ग्रामीण कहते हैं कि इतने नजदीक लगे प्लांट से होने वाला शोर उनके रोजमर्रा के कामों में बाधा डालता है। इसका असर उनकी सेहत पर भी है।

इस ही गाँव की माला देवी, मधुबाला भंडारी, आशा बडोनी, राजमती देवी की शिकायतें एक जैसी ही हैं। "दिन का शोर तो हम बर्दाश्त भी कर लेते हैं। लेकिन रात का शोर बहुत परेशान करता है। बच्चे पढ़ नहीं पाते। कानों पर हाथ रखते हैं। वे रात को सो नहीं पाते। हमें सिर दर्द होता रहता है। चिड़चिड़ापन होता है," उन सभी का कहना है।

राजमती देवी चार महीने पहले ही अपने 11 और 14 वर्ष के दो बच्चों को पढ़ाने के लिए टिहरी गढ़वाल से यहाँ आयी हैं, अब वह कहती हैं, "हम यहां नए-नए आए हैं। हमें नहीं पता था कि यहां इतना शोर होता है। जब पता चला तो बहुत अफसोस हुआ।"

वहीं पर्यावरणीय शोर से होने वाली बीमारियों को लेकर यूरोप के संदर्भ में आई विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) की रिपोर्ट के मुताबिक पर्यावरणीय शोर लोगों की सेहत के लिए एक जोखिम है। सेंटर्स फॉर डिज़ीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के मुताबिक अचानक तेज़ आवाज़ से सुनने की क्षमता बाधित हो सकती है। साथ ही लंबे समय तक 70 डेसिबल से अधिक रहने वाला शोर आपकी सुनने की शक्ति को नुकसान पहुंचा सकता है।

बच्चों के स्वास्थ्य पर ध्वनि प्रदूषण के दुष्प्रभावों के बारे में बात करते हुए इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के उत्तराखंड के प्रेसिडेंट और बाल रोग चिकित्सक डॉ राजीव श्रीवास्तव कहते हैं कि ध्वनि प्रदूषण छोटे बच्चों के समग्र विकास को प्रभावित करता है। "ज्यादा शोर से बच्चा चिड़चिड़ा होगा, सो नहीं पाएगा और बार-बार चौंकेगा। इस सबका असर उसके विकास पर पड़ेगा। छोटे बच्चों के आसपास ज्यादा शोर नहीं होना चाहिए। इससे उनके कान के पर्दे को भी नुकसान पहुंच सकता है," डॉक्टर श्रीवास्तव ने बताया।

मंजीत का दावा है कि एक प्लांट आबादी के बहुत करीब निर्धारित 300 मीटर की दूरी से भी कम में चल रहा है।

ग्रामीणों का अनुमान है कि स्क्रीनिंग प्लांट्स से ट्रक-ट्रैक्टर समेत 400-500 वाहनों की आवाजाही गांव के रास्तों से दिन-रात होती

ग्रामीणों का अनुमान है कि स्क्रीनिंग प्लांट्स से ट्रक-ट्रैक्टर समेत 400-500 वाहनों की आवाजाही गांव के रास्तों से दिन-रात होती

अवैध खनन, भारी वाहनों का उत्पात और बढ़ता वायु प्रदुषण

मंजीत के बेटे वीरेंद्र सिंह, 30, उनके क्षेत्र में बढ़ते भारी वाहनों के यातायात की समस्या के बारे में भी बताते हैं। वह हिसाब लगाते हैं कि एक प्लांट से रोजाना करीब 60-70 छोटे-बड़े वाहन चक्कर लगाते हैं। इस हिसाब से सात प्लांट से रोजाना 400-500 वाहनों की आवाजाही गांव के रास्तों से होती है जिसकी वजह से सभी काफी परेशान हैं।

वीरेंद्र सौंग नदी से अवैध खनन की शिकायत भी करते हैं। "यहां पूरी रात अवैध खनन चलता है। ट्रैक्टर-ट्रॉली समेत छोटे-बड़े वाहनों में नदी से लाकर रात भर माल गिरवाया जाता है। इनमें छोटे-बड़े पत्थर और बोल्डर सब होते हैं। इनका शोर बहुत ज्यादा होता है और अवैध खनन के चलते भी रात को वाहनों की आवाजाही होती रहती है। हमने इस सबको लेकर जिला प्रशासन, तहसील प्रशासन, खनन अधिकारी सबको शिकायत की है। हम गांव वालों ने खुद नदी से रेत-बजरी ले जा रहे चार ट्रैक्टर पुलिस को पकड़वाए। एक बार सड़क भी बंद की। लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ता"।

फतेहपुर टांडा के तहसीलदार मोहम्मद शादाब ने इण्डिया स्पेंड से हुई बातचीत में नदी में हुए अवैध खनन की पुष्टि की और बताया, "समय-समय पर औचक निरीक्षण किया जाता है। ग्रामीण भी हमें सूचना देते हैं। जिस पर कार्रवाई की जाती है।"

ध्वनि या वायु प्रदूषण को लेकर स्थानीय प्रशासन ने यहां कभी कोई कार्रवाई नहीं की है। लेकिन अवैध खनन जैसी शिकायतों को लेकर कार्रवाई की गई है। मोहम्मद शादाब बताते हैं कि डोईवाला तहसील में इस वर्ष अप्रैल से लेकर 24 नवंबर तक 150 वाहन जब्त किए गए हैं और रुपए 152 लाख का जुर्माना लगाया गया है। इसमें रुपए 88 लाख का जुर्माना सिर्फ एक कंपनी पर लगा है। ये जुर्माना सिर्फ तहसील स्तर पर लगाया गया है। इसके अलावा खनन विभाग, उप-जिलाधिकारी, पुलिस विभाग की कार्रवाइयां अलग हैं।

जीवनवाला ग्राम पंचायत में गुरजीत सिंह, 32, समाजसेवी के तौर पर कार्य करते हैं। गुरजीत बताते हैं कि गांव में करीब 300 परिवार रहते हैं। इनमें से 100 परिवार प्लांट से ज्यादा करीब हैं। "शोर के साथ माल ले जाने वाले ट्रक, ट्रैक्टर इतनी धूल-मिट्टी उड़ाते हैं कि हमारे घरों में धूल की चादर चढ़ी रहती है। खेतों में लगी फसल पर धूल की परत चढ़ जाती है। गांव की सड़कें, सोलर लाइट, डस्टबिन इनसे टूट गए," वह बताते हैं।

गुरजीत यह भी कहते हैं कि बजरी-बोल्डर की धुलाई के लिए लगातार भूजल का दोहन किया जाता है। इससे गांव का भूजल स्तर नीचे गिर गया है। "गांव में पहले 120-130 फीट पर पानी आता था वह अब 200 फीट के पास पहुंच गया है। घरों में बोरिंग करवाने के दौरान ग्रामीणों ने ये नोटिस किया कि भूजल स्तर गिर रहा है," वह बताते हैं।

सौंग नदी के किनारे अवैध रेत खनन से बने गढ्ढे दिखाते ग्रामीण

सौंग नदी के किनारे अवैध रेत खनन से बने गढ्ढे दिखाते ग्रामीण

इंडिया वाटर रिसोर्सेज इनफॉर्मेशन सिस्टम के डाटा के मुताबिक उत्तराखंड में गिरता भूजल स्तर एक बड़ी चिंता का विषय है। रुड़की के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी के निदेशक रह चुके और वर्तमान में आईआईटी रुड़की में विजिटिंग प्रोफेसर डॉ शरद जैन भी इसकी पुष्टि करते हैं।

डॉ जैन कहते हैं, "भूजल स्तर की मॉनिटरिंग अब भी एक बड़ी समस्या है। हमारे पास लंबे समय का विश्वसनीय डाटा नहीं है जिससे हम किसी जगह के भूजल स्तर की तुलना कर सकें कि किसी जगह भूजल स्तर प्रतिवर्ष बारिश या नदी से कितना रिचार्ज होता है और इसका कितना दोहन किया जा रहा है।"

फतेहपुर टांडा गांव में लगे गौरव स्क्रीनिंग प्लांट और ओम स्क्रीनिंग प्लांट को 8-8 केएलडी (किलो लीटर प्रतिदिन) पानी बोरवेल से लेने की अनुमति दी गई है। सात स्क्रीनिंग प्लांट मोटे तौर पर 56 केएलडी पानी प्रतिदिन धरती से ले रहे हैं। ये स्क्रीनिंग प्लांट अनुमति के आधार पर ही भूजल स्तर का दोहन कर रहे हैं या उससे अधिक, इसकी कोई निगरानी भी नहीं की जा रही है। इसके साथ ही लोग भी खेती और अपने इस्तेमाल के लिए भूजल का दोहन करते हैं। इस अनुमान के आधार पर डॉ जैन कहते हैं कि यह सब मिलाकर प्रतिदिन भारी मात्रा में भूजल लिया जा रहा है।

केंद्रीय भूजल बोर्ड के क्षेत्रीय निदेशक प्रशांत राय कहते हैं कि ऐसे उद्यम में वाटर मीटर लगाए जाते हैं और उसका डाटा वेरीफाई किया जाता है। अनुमति की सीमा से अधिक पानी का इस्तेमाल करने पर जुर्माना लगाया जाता है। डोईवाला के स्क्रीनिंग प्लांट्स के बारे में पूछने पर वह आश्वस्त करते हैं कि इन प्लांट्स की जांच करेंगे और अनुमति से अधिक भूजल दोहन करने पर कार्रवाई की जाएगी।

"गांव को शोर और धूल से बचाने के लिए प्लांट वालों ने खुद कभी कोई पौधरोपण नहीं कराया। प्लांट्स लगाने के लिए ग्राम पंचायत से कोई एनओसी (अनापत्ति प्रमाण पत्र) नहीं ली गई। प्लांट से होने वाली दिक्कतों को लेकर हमने तहसील में कई बार शिकायत की है। वे कार्रवाई भी करते हैं। लेकिन फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाता है," गुरजीत बताते हैं।

इस विषय में खनन विभाग के निदेशक एस.एल. पैट्रिक कहते हैं कि प्रक्रिया के तहत जब भी किसी प्लांट को शुरू किया जाता है तो स्थानीय अखबारों में एक पब्लिक नोटिस दिया जाता है। "उद्यम से प्रभावित होने वाले किसी व्यक्ति को कोई आपत्ति हो तो वे तहसील, उपजिलाधिकारी या जिलाधिकारी के पास अपनी आपत्ति दर्ज करा सकते हैं। उनकी आपत्तियों को दूर किया जाता है। इसके बाद ही प्लांट शुरू करने की अनुमति दी जाती है," उन्होंने बताया।

जैव-विविधता के लिए भी घातक है शोर

राजाजी नेशनल पार्क से करीब एक किलोमीटर की दूरी और सौंग नदी के क्षेत्र में चल रहे इन स्क्रीनिंग प्लांट का असर जैव-विविधता पर भी पड़ता है। पर्यावरण कार्यकर्ता सुमैरा अब्दुलाली रेत खनन और ध्वनि प्रदूषण पर लंबे समय से कार्य कर रही हैं। वह कहती हैं, "स्क्रीनिंग प्लांट्स या स्टोन क्रशर औद्योगिक क्षेत्र में नहीं होते। यह ज्यादातर जंगल-नदी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के आसपास ग्रामीण क्षेत्रों के नजदीक होते हैं। जहां समृद्ध जैव-विविधता होती है। जहां पशु-पक्षियों की संख्या शहरी क्षेत्रों से तुलनात्मक तौर पर अधिक होती है। ध्वनि प्रदूषण से ये वन्यजीव भी प्रभावित होते हैं। बहुत से शोध रिपोर्ट ये साबित कर चुके हैं कि बहुत ज्यादा शोर वन्य जीवों के व्यवहार, उनके प्रजनन और प्रवास पर असर डालते हैं। खासतौर पर चिड़ियों को तेज आवाज से बहुत दिक्कत होती है क्योंकि वे अपनी ध्वनि के इस्तेमाल से गाने या संकेत देने जैसे कार्य करती हैं। हम शहरी क्षेत्र में ध्वनि प्रदूषण पर फिर भी बात करते हैं लेकिन ग्रामीण इलाकों के ध्वनि प्रदूषण पर ध्यान नहीं देते"।

ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 में लिखा गया है कि विकास योजनाएं बनाते समय ध्वनि प्रदूषण के सभी पहलुओं को जीवन की गुणवत्ता के एक पैरामीटर के रूप में ध्यान में रखना होगा। ताकि शोर से जुड़े मानकों को बरकरार रखा जा सके।

जिम्मेदारी किसकी?

स्क्रीनिंग प्लांट के ध्वनि स्तर पर उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी आर.के. चतुर्वेदी कहते हैं कि प्लांट लगाने से पहले ध्वनि और वायु प्रदूषण की जांच कर अनुमति दी जाती है। इस सवाल पर कि क्या स्क्रीनिंग प्लांट्स या क्रशर में वायु और ध्वनि प्रदूषण की मॉनिटरिंग की जाती है? वह कहते हैं, "अगर कहीं लोगों को दिक्कत है तो उन्हें हमसे शिकायत करनी होगी। इतने बड़े जिले में कहां क्या हो रहा है, इसका पता शिकायत मिलने पर ही चल सकेगा।"

स्क्रीनिंग प्लांट के चलने का समय क्या निर्धारित है, क्या ये रात को भी चल सकते हैं? इस सवाल पर उनका कहना है, "किसी ने उद्योग लगाया है तो वह सुबह या रात की अनुमति नहीं लेगा। नियम के मुताबिक आबादी से 300 मीटर की दूरी पर वह अपना उद्योग चला सकता है। स्क्रीनिंग प्लांट्स 24 घंटे चल सकते हैं, क्योंकि इसमें पत्थर की तुड़ाई नहीं होती, छंटाई होती है। स्टोन क्रशर रात को नहीं चल सकते।"

इसी सवाल के जवाब में खनन विभाग के निदेशक एस.एल. पैट्रिक कहते हैं, "स्क्रीनिंग प्लांट्स रात 10 बजे के बाद नहीं चल सकते। इसकी निगरानी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को करनी होती है।"

वहीं इसी विभाग के ज़िला (देहरादून) खनन अधिकारी ऐश्वर्य शाह कहते हैं, "स्क्रीनिंग प्लांट्स आवश्यकतानुसार 24 घंटे चल सकते हैं।"

यानी स्क्रीनिंग प्लांट के चलने के समय को लेकर भी यह स्पष्ट नहीं है। उद्योग की श्रेणी में आने वाले स्क्रीनिंग प्लांट ज्यादातर नदी क्षेत्र में ग्रामीण आबादी के नजदीक लगाए जाते हैं। उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी आरके चतुर्वेदी ने कहा है कि स्क्रीनिंग प्लांट उद्योग की श्रेणी में आते हैं और रात को भी चल सकते हैं। जबकि खनन विभाग का कहना है कि रात 10 बजे के बाद स्क्रीनिंग प्लांट नहीं चल सकते।

आबादी क्षेत्र में स्क्रीनिंग प्लांट से हो रहे ध्वनि या वायु प्रदूषण से बचाव के लिए क्या वृक्षारोपण जैसे उपाय किए जाते हैं? इस सवाल पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और खनन विभाग एक दूसरे पर जिम्मेदारी डालते हैं । खनन विभाग के निदेशक एस.एल. पैट्रिक के मुताबिक यह जिम्मेदारी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की है। जबकि बोर्ड के सहायक वैज्ञानिक अधिकारी राजेंद्र कठैत के मुताबिक इसकी योजना खनन विभाग तैयार करता है। आपको बताते चलें की प्रदूषण विभाग इस तरह की औद्योगिक गतिविधियों के लिए जिम्मेदार संस्था होती है, अगर कोई शिकायत होती है तो विभाग की जिम्मेदारी बनती है उस शिकायत का संज्ञान लेकर कार्यवाही करने की।

क्या नीतिगत बदलाव संभव हैं?

उत्तराखंड की वर्ष 2011 की खनन नीति के तहत स्क्रीनिंग प्लांट आबादी से 500 मीटर की दूरी पर ही लगाए जा सकते थे। साल 2015 की खनन नीति में इस दूरी को घटाकर 300 मीटर कर दिया गया। साल 2021 की खनन नीति में दूरी के इस नियम को बरकरार रखा गया।

शोर की समस्या से बेहद परेशान फतेहपुर गांव के जसविंदर सिंह आबादी से 300 मीटर पर स्क्रीनिंग प्लांट के नियम को राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) में चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं। उनके साथी जे.पी. बडोनी ने प्लांट को मिलने वाली पर्यावरणीय अनुमतियों को लेकर सूचना के अधिकार के जरिए जानकारी मांगी हैं। जसविंदर कहते हैं कि स्क्रीनिंग प्लांट जैसे उद्योग आबादी से कम से कम 1 किलोमीटर की दूरी पर होने चाहिए। फतेहपुर गांव के लोग भी यही मांग कर रहे हैं।