सुनारा (चम्बा): हिमाचल प्रदेश के शिक्षा मंत्री श्री रोहित ठाकुर के अनुसार राज्य का नाम साक्षरता दर में केरल के बाद देश के अग्रणी राज्यों में प्रदेश का नाम शुमार है। हालांकि, नीति आयोग द्वारा फरवरी, 2025 को जारी रिपोर्ट के बताती है कि, तमिलनाडु, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और केरल उच्च शिक्षण संस्थानों में सकल नामांकन अनुपात (GER) के मामले में वर्ष 2021-22 के शीर्ष प्रदर्शन करने की "उपलब्धि हासिल करने वाले" राज्य बनकर उभरे हैं।

हिमाचल प्रदेश में यू-डीआईएसई 2023-24 रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में कुल 17,826 स्कूल हैं, जिनमें 14,26,412 छात्र नामांकित हैं और 1,01,131 शिक्षक कार्यरत हैं। प्रदेश का प्यूपिल-टीचर अनुपात 14 है, यानी औसतन प्रत्येक शिक्षक के पास 14 छात्र हैं। प्रत्येक स्कूल में औसतन 6 शिक्षक हैं और एक स्कूल में औसतन 80 छात्र नामांकित हैं। हालांकि, 6 स्कूलों में एक भी छात्र नामांकित नहीं है, लेकिन इन स्कूलों में 10 शिक्षक अध्यापन कार्य कर रहे हैं।

वहीं यू-डीआईएसई 2023-24 रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि प्रदेश में 3,473 ऐसे स्कूल हैं जहां केवल एक ही शिक्षक कार्यरत है, और इन एकल-शिक्षक स्कूलों में कुल 65,819 छात्र पढ़ रहे हैं। यदि ड्रॉपआउट दर की बात करें, तो प्राथमिक स्तर (प्रिपरेटरी) पर यह शून्य है, मध्य (मिडिल) स्तर पर 0.56% और माध्यमिक स्तर (सेकेंडरी) पर 4.60% दर्ज की गई है। ये आंकड़े प्रदेश में गिरती छात्र संख्या, शिक्षकों की असमान तैनाती और शिक्षा व्यवस्था की विभिन्न चुनौतियों को उजागर करते हैं, जो सरकारी स्कूलों में साइंस और कॉमर्स संकायों को विदड्रॉल करने के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण हो सकते हैं।

उच्च शिक्षा निदेशालय का फरमान: सुनारा स्कूल से हटाए गए साइंस और कामर्स संकाय

25 फरवरी 2025 हिमाचल प्रदेश के उच्च शिक्षा निदेशालय से एक आदेश जारी किया जाता है। जिसके अंतर्गत हिमाचल प्रदेश के 62 स्कूलों से विज्ञान (साइंस) और 67 स्कूलों से वाणिज्य (कॉमर्स) संकायों को बंद कर दिया गया है। इस तरह, कुल मिलाकर 129 स्कूलों से दोनों संकायों की मान्यता वापस ले ली गई है। आदेश के अनुसार, प्रदेश के जिन सरकारी वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालयों में साइंस और कॉमर्स स्ट्रीम में कोई छात्र नामांकित नहीं है, वहां दोनों संकायों को तत्काल प्रभाव से बंद किया जाता है तथा दोनों संकाय से जुड़े लेक्चरर पदों को स्थगित कर दिया गया है। हिमाचल सरकार के उच्च शिक्षा निदेशालय के इस ऑर्डर की चपेट में राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय सुनारा भी आ गया जहां कई सालों से विज्ञान और वाणिज्य जैसे महत्वपूर्ण विषय सालों से बेहतरीन तरीके से पढ़ाए जा रहे थे।

जिला चम्बा मुख्यालय से लगभग 30-35 किमी की दूरी पर राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, सुनारा जहां कई वर्षों तक विज्ञान (मेडिकल/नॉन-मेडिकल) और वाणिज्य के विषय पढ़ाए जाते थे। चार-पांच पंचायतों के लगभग 350-400 छात्र-छात्राएं यहां अब सिर्फ केवल मानविकी के विषय ही कम स्टाफ के चलते पढ़ पाएंगे।

सुबह के समय गुआं गाँव की पगडंडी पर जमा दो की छात्रा वंदना कुमारी अपना क्लिपबोर्ड लिए राजनीतिक विज्ञान का पेपर देने सुनारा स्कूल जा रही है। उसके पिता, कर्मचंद हाथ में कुदाल लिए खेत की ओर बढ़ रहे है। दोनों की चाल धीमी है, लेकिन रास्ता वही है – एक स्कूल की तरफ, दूसरा खेत की तरफ।

जब वंदना से पूछा गया कि क्या उसने हमेशा से आर्ट्स ही पढ़ने की इच्छा थी? तो उसने हल्की मुस्कान के पीछे छिपी उदासी के साथ जवाब दिया – "पढ़ना तो साइंस चाहती थी, लेकिन यहाँ साइंस पढ़ाने वाला कोई टीचर नहीं था। तो फिर क्या करते? मजबूरी में आर्ट्स लेना पड़ा।"

वंदना के पिता ने एक गहरी सांस लेते हुए कहा – "अगर स्कूल में साइंस होती, तो मेरी बेटी भी खेतों में मिट्टी से खेलने की बजाय लैब में केमिकल्स से प्रयोग कर रही होती?”

इंडियास्पेंड हिंदी ने उसी सुबह अंग्रेजी का पेपर देने जाती हुई, साल 2023 की सुनारा स्कूल की दसवीं की कक्षा में चौथा रैंक हासिल करने वाली, यमुना (अदरौंद) से बात की तो उन्होंने बताया कि जब स्कूल में साइंस स्ट्रीम थी। तो मैंने सोचा था कि मैं 11वीं-12वीं में साइंस पढूंगी। लेकिन जब मेरा समय आया तो स्टाफ ही नहीं था ऐसा लगता था कि साइंस स्ट्रीम बंद हो गई है, और अब धीरे-धीरे, स्कूल में साइंस स्ट्रीम ही खत्म कर दी गई" – यमुना दुखी होकर बताती है। इसके अलावा बाकी छात्राओं ने भी इन दोनों संकायों के विदड्रॉल होने के संदर्भ में मिली-जुली प्रतिक्रियाएं दी।

स्नेहा शर्मा (मुकाणथा) ने बताया कि दसवीं कक्षा पास करने के पश्चात वो साइंस पढ़ना चाहती थी लेकिन यहाँ अब साइंस नहीं पढ़ाई जाती क्योंकि स्टाफ नहीं था। गाँव से 30 किमी दूर किसी और स्कूल में दाखिला लेना नामुमकिन था।

सेना में अफसर बनने का सपना लिए वैष्णवी ने 11वीं में साइंस चुनना चाहा, लेकिन सरकारी स्कूल की दीवारें जवाब दे चुकी थीं – "यहाँ अब होकर भी साइंस नहीं है।" घर की हालत ऐसी नहीं थी कि किसी प्राइवेट स्कूल में दाखिला ले सके, और विज्ञान के बिना सेना की राह मुश्किल हो गई।

"मुझे यकीन नहीं होता कि सिर्फ मेरे स्कूल में साइंस होते हुए भी नहीं पढ़ाई जा रही थी, स्टाफ नहीं होने की बजह से मुझे अपने करियर से समझौता करना पड़ा!" एक जज़्बे को उड़ान देने से पहले ही काट दिया गया।

समीक्षा पठानिया के लिए विज्ञान सिर्फ एक विषय नहीं, बल्कि सोचने और समझने की एक अलग नई दुनिया थी। उसे फिजिक्स के सिद्धांतों में तर्क दिखता था, केमिस्ट्री के प्रयोगों में उत्सुकता, और गणित के सवालों में चुनौती। लेकिन जब उसने 11वीं में विज्ञान लेने की सोची, तो उसने बताया कि– "तब तक यहाँ साइंस नहीं पढ़ाई जा रही थी, क्योंकि टीचर्स नहीं थे।"

आगे उन्होंने बताया कि "जिस राह पर चलकर मुझे आगे बढ़ना था, वो रास्ता मुझसे पहले ही छीन लिया गया।”

उच्च शिक्षा निदेशक हिमाचल प्रदेश ने क्या कहा?

इंडियास्पेंड हिंदी को डॉ अमरजीत के शर्मा, निदेशक उच्च शिक्षा हिमाचल प्रदेश ने बताया कि, जब हमने पूरे प्रदेश का डेटा इकट्ठा किया कि कितने स्कूल ऐसे हैं जहां तीन-चार या लगभग पांच सालों से किसी विषय में कोई भी स्टूडेंट नहीं पढ़ रहा है, तो हमें पता चला कि हमारे प्रदेश में लगभग 62 ऐसे स्कूल हैं, जहां विज्ञान विषय में पिछले 3-4 सालों से कोई भी बच्चा पढ़ाई नहीं कर रहा था। इसी तरह, कॉमर्स के लगभग 67 स्कूलों में भी पिछले 3-4 सालों से कोई छात्र पढ़ाई नहीं कर रहा था।

“इस स्थिति को देखते हुए यह निर्णय लिया गया कि जब तक इन स्कूलों में बच्चे नहीं हैं, तब तक इनको होल्ड पर डाला जा रहा हैं, हमारे पास सरप्लस स्कूल में हमने अपने पास पूरी फोर्स वापस कर ली है और वे स्कूल अब सिर्फ कला (आर्ट्स) विषय के रूप में फंक्शन करते रहेंगे। लेकिन यह भी ज़रूर है कि यदि भविष्य में किसी स्कूल में अचानक 10, 20 या 50 बच्चे विज्ञान या कॉमर्स में प्रवेश लेते हैं, तो विभाग पूरी तरह से तैयार है कि वहां उन विषयों के लिए आवश्यक शिक्षकों को तुरंत नियुक्त किया जाएगा,” डॉक्टर शर्मा ने बताया।

उच्चा शिक्षा निदेशक आगे बताते है, “हमारी सरकार और विभाग द्वारा यह सभी कदम इसलिए उठाए जा रहे हैं ताकि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान की जा सके। हमारा उद्देश्य है कि जहां भी छात्रों की आवश्यकता होगी, वहां सही समय पर उचित संसाधन उपलब्ध कराए जाएं।”

डायरेक्टर ऑफ़ हाईयर एजूकेशन ने स्टाफ की कमी संबंधी विषय के बारे में बताया कि बहुत से ऐसे कारण होते हैं। “जब कोई स्थिति बनती है इसमें कई जगह हो सकता है कि कुछ ऐसे स्कूल हो जहां किन्हीं कारणों से पूरी तरह स्टाफ भी पिछले सालों से ना रहा हो लेकिन धीरे-धीरे जैसे ही पूरे प्रदेश में डेवलपमेंट हो रही है तो बच्चों का रुझान भी कुछ प्रोफेशनल कोर्सेज की तरफ कुछ स्किल ओरिएंटेड कोर्सेज की तरफ कुछ वोकेशनल कोर्सेज की तरफ हो रहा है तो यह जो हमारे साइंस कॉमर्स या ट्रेडिशनल आर्ट्स के सब्जेक्ट्स हैं इससे हटके कई बार बच्चे आईटीआई करना पसंद करते हैं या कोई ऐसा कोर्स करना पसंद करते हैं कोई डिप्लोमा कोई इंजीनियरिंग या कुछ ऐसा कोर्स करते हैं जिससे बाहर निकलते ही उनका कोई ना कोई मार्केट में जॉब मिलती है एक तो सबसे बड़ा रीजन यह रहा है।”

वे आगे कहते है “ अब समय आ गया है कि कंसोलिडेशन आफ इंस्टीट्यूशन, स्कूल और कॉलेज इन सब बातों की तरह पूरा विभाग व सरकार का ध्यान है और मैं कहूं यह सिर्फ हमारे ही प्रदेश में नहीं गवर्नमेंट आफ इंडिया लेवल पर भी ऐसा है।”

उन्होंने आगे बताया कि सरकार व विभाग गांव की परिस्थितियों से पूर्णता परिचित है कल को यह लगता है कि अगर किसी स्कूल में बच्चे अपनी रुचि इन विषयों की ओर कर रहे हैं तो इसमें एक प्रतिशत का भी संशय नहीं होना चाहिए कि वहां (सुनारा स्कूल)में दोबारा साइंस स्टार्ट ना किया जाए।” पिछले सालों 2021-25 तक, जो डिप्टी डायरेक्टर चंबा से बात करके मैंने पता किया तो साइंस और कॉमर्स में एक भी बच्चे ने एडमिशन नहीं लिया खासकर एक स्कूल की बात कर रहा हूं मैं - सुनारा स्कूल बाकी स्कूलों स्कूलों का डाटा लेकर ही हमने विदड्रॉल किया है क्योंकि बजाय इसके की टीचर बिना स्टूडेंट के वहां बैठ रहे ...इसलिए हमने वहां से विदड्रॉल किया है। हमारे बहुत से स्कूलों में ऐसा हुआ है जहां पर टीचर थे लेकिन स्टूडेंट नहीं थे,” उन्होंने बताया।

राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय सुनारा: जहां विज्ञान और कामर्स संकाय की कक्षाओं पर लगे ताले।

क्या कहते हैं आंकड़े

UDISE+ 2023-24 रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल में 17,826 स्कूल और 14.26 लाख छात्र हैं।

राज्य का प्यूपिल-टीचर अनुपात (14:1) जो भारत में सबसे अच्छा माना जाता है। बावजूद इसके 3,473 स्कूलों में केवल एक ही शिक्षक है।असर ( ASER 2024) की रिपोर्ट में जाहिर हुआ है कि 60 से कम छात्रों वाले स्कूलों की संख्या बढ़कर 52.1% हो गई है, जिससे वे बंद होने के खतरे में हैं। 75% सरकारी अपर प्राइमरी स्कूल छोटे स्कूल बन चुके हैं, जहां अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को एक साथ पढ़ाया जा रहा है।

इसी रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण भारत में निजी स्कूलों में नामांकन बढ़ रहा है। गरीब परिवार भी अपने बच्चों को निजी स्कूल भेज रहे हैं, क्योंकि वे सरकारी स्कूलों की तुलना में बेहतर शिक्षा और सुविधाएं प्रदान कर रहे हैं। हिमाचल प्रदेश में भी यह ट्रेंड बड़ रहा है। लेकिन उन ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों का भी सोचा जाना चाहिए जो खेती बाड़ी व दिहाड़ी पर गुजर बसर करके कैसे अपने बच्चों के भविष्य को संवारने के सपने देख पाएंगे।

शिक्षकों की सीमित भर्ती

हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग (HPPSC) द्वारा विज्ञापन संख्या: 3-26/2023 - PSC (R-I) के तहत 16 अक्टूबर 2023 को सीनियर सेकेंडरी स्कूलों (11वीं-12वीं) में प्रवक्ता (PGT) के 585 पदों के 10 विषयों के लिए आयोजित की गई थी। जिसमें विषयवार पदों का विवरण है: अंग्रेज़ी – 63 पद, हिंदी – 117 पद, इतिहास – 115 पद, राजनीति विज्ञान – 102 पद, अर्थशास्त्र – 17 पद, गणित – 41 पद, भौतिकी – 45 पद, रसायन विज्ञान – 29 पद, जीवविज्ञान – 9 पद, वाणिज्य – 47 पद। जिसमें से लगभग सब विषयों के परिणाम घोषित हो चुके हैं, कई विषयों के शिक्षकों की ज्वाइनिंग हो चुकी है।

इसके अलावा हिमाचल प्रदेश में टीजीटी शिक्षकों की अंतिम भर्ती परीक्षा 2 अप्रैल 2020 को अधिसूचित हुई थी, जिसकी आवेदन की अंतिम तिथि 4 अप्रैल 2020 थी। इस भर्ती में कुल 554 पद शामिल थे, जिनमें टीजीटी (आर्ट्स) के 307, टीजीटी (नॉन-मेडिकल) के 143 और टीजीटी (मेडिकल) के 104 पद थे। यदि शिक्षकों की भर्तियों को समग्र रूप में देखा जाए, तो यह बीते वर्षों में राज्य सरकार द्वारा शिक्षकों की बेहद सीमित भर्ती को दर्शाती है।

हिमाचल प्रदेश सरकार ने 2024-25 के बजट में शिक्षा, खेल, कला और संस्कृति के लिए ₹9,812 करोड़ (कुल व्यय का 18.5%) आवंटित किया, जिसमें बीते वर्ष की तुलना में 7% की वृद्धि देखने को मिली। कुल आबंटन में समग्र शिक्षा अभियान के तहत प्रारंभिक शिक्षा के लिए ₹893 करोड़ और माध्यमिक शिक्षा के लिए ₹236 करोड़ निर्धारित किए गए थे। लेकिन इसके बावजूद भी राज्य के ग्रामीण सरकारी स्कूलों से विज्ञान और वाणिज्य (कॉमर्स) संकाय बंद किया जा रहा है। यह स्थिति सरकार के शिक्षा क्षेत्र में किए गए खर्च की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करती है। क्या आवंटित बजट का सही उपयोग हो रहा है, या यह केवल कागज़ी बढ़ोतरी है, जिसका राज्य में ज़मीनी स्तर पर कोई ठोस असर नहीं दिख रहा?