चुरू, झुंझुनूं (राजस्थान): “उस परिवार ने यह स्पष्ट कर दिया था कि अगर वे (नीतू के सास-ससुर) चाहते हैं कि मेरा चचेरा भाई उनकी बेटी से शादी करे, तो मुझे उनके बेटे से शादी करनी होगी,” नीतू कहती हैं।

वह बारहवीं कक्षा में पढ़ रही थी जब अदला-बदली तय हो गया था और उसकी मर्जी के खिलाफ उसकी शादी कर दी गई थी। "मैं लगभग 16 साल की थी और तब मैं वास्तव में आगे पढ़ना चाहती थी। लेकिन मेरी शादी एक बहुत ही अजीब तरीके से कर दी गई," नीतू याद करती हैं जो अब 30 साल की एक कामकाजी महिला हैं और चूरू की रहने वाली हैं। लेकिन अब राजस्थान के झुंझुनूं जिले में रहती हैं। "यह एक तिरकुटा आटा-साटा था।"

इस रिवाज के अनुसार एक परिवार अपनी बेटी की शादी अपने बेटे या भतीजे की दुल्हन के परिवार में किसी से करता है। नीतू बताती हैं, "तिरकुटा का मतलब त्रिकोणीय होता है। इसलिए इस मामले में तीन परिवारों के बीच आटा-साटा का पालन किया जाता है और तीन जोड़े एक-दूसरे के बदले में शादी करेंगे।"

राजस्थान में प्रचलित यह सदियों पुरानी प्रथा सामाना के बदले सामान जैसे न‍ियमों की तरह काम करती है और इसके कई नकारात्मक परिणाम हैं। झुंझुनूं स्थित एनजीओ शिक्षित रोजगार केंद्र प्रबंधक समिति (एसआरकेपीएस) के संस्थापक राजन चौधरी इंडियास्पेंड को बताते हैं, “यह राजस्थान की सबसे पुरानी कुरीत‍ियों में से एक है ज‍िसके तहत कई तरह से मानवाधिकारों का उल्लंघन किया जाता है। 19-20 वर्ष की आयु की लड़क‍ियों की शादी 50 और 60 वर्ष के पुरुषों से की जाती है। ऐसी अधिकांश लड़कियों के परिवार आर्थिक रूप से गरीब हैं।

स्थानीय लोग इस बात की पुष्टि करते हैं कि ज्यादातर बार इस प्रथा के तहत लड़कियों की शादी अपने से ज्यादा उम्र के पुरुषों से कर दी जाती है। उदाहरण के लिए नीतू की शादी अपने से 15 साल बड़े एक व्यक्ति से हुई थी जो अनपढ़ था जबकि वह पढ़ना चाहती थीं। उनकी अपनी ने स्नातक तक की पढ़ाई पूरी की थी।

वह कहती हैं, ''मेरी मां ने शादी करने और मुझे जन्म देने के बाद पढ़ाई की। “मेरा एक छोटा भाई और एक बहन भी है। मम्मी ने मेरी शादी में देरी कराने की पूरी कोशिश की थी। लेकिन मेरे चाचा (पिता के भाई) ने मेरे पिता पर मेरी शादी करने का दबाव डाला ताकि वह अपने बेटे की शादी मेरे ससुराल की लड़की से कर सकें।

इस प्रकार नीतू के चचेरे भाई अंकित की शादी उसके पति की बहन रेखा से हुई जबकि रेखा के चाचा ने अंकित की मौसी से शादी की और यह सब समझौते के तहत हुआ। वह हंसती हैं, ''मैं जानती हूं कि आपके लिए एक बार में इसे समझना मुश्किल है। लेकिन बच्चे भी इस बारे में जानते हैं। यह यहां की बहुत आम प्रथा है।

इस रिवाज के तहत शादियां हमेशा एक ही जाति, आर्थिक पृष्ठभूमि और गांव में होती हैं - मूल रूप से यह दो परिवारों के बीच आपसी समझ के बाद दो (या अधिक) परिवारों के बीच महिलाओं का आदान-प्रदान होता है, जिससे दहेज और शादी पर होने वाले खर्च जैसे व्‍यय की संभावनाएं कम हो जाती हैं।

आज नीतू 10 साल के बेटे की मां है जो चौथी कक्षा में पढ़ता है। उनके पास कला में परास्नातक की डिग्री है और वे झुंझुनूं में एक गैर-लाभकारी संस्था चाइल्डलाइन में काम करती हैं। हालाँकि, उनकी अब तक की यात्रा एक रोलर कोस्टर की सवारी रही है और इस पारंपरिक प्रथा की बुराइयों का उदाहरण भी हैं।

यह स्‍टोरी परंपराओं और रीति-रिवाजों पर 'ट्रैप्ड इन ट्रेडिशन' सीरीज का एक हिस्सा है। इसके वे भी शामिल हैं जो वर्षों से गैरकानूनी हैं। लेकिन अभी तक राजस्थान में महिलाओं पर ठीक-ठाक प्रभाव के साथ थोपे जाते हैं। पहला भाग बाल विवाह और उसके परिणामों के बारे में था।

इस र‍िवाज के तहत हुई शाद‍ियों की वजह से दुल्‍हनों को कई तरह की चुनौत‍ियों का सामना करना पड़ता है।

इस र‍िवाज के तहत हुई शाद‍ियों की वजह से दुल्‍हनों को कई तरह की चुनौत‍ियों का सामना करना पड़ता है।

दुल्हनों के लिए चुनौतियां

नीतू कहती हैं, ''मुश्किलें मेरी शादी के ठीक बाद शुरू हुईं। “शादी के कुछ महीने बाद मैंने अपने पति से आगे पढ़ाई करने के बारे में बात की तो उन्होंने कहा कि अगर उनके माता-पिता इसकी अनुमति देते हैं तो तुम आगे पढ़ाई कर सकती हो। मुझे अपने ससुराल वालों को समझाने में पूरा एक साल लग गया, क्योंकि उनकी अपनी बेटी, जिसकी शादी अब मेरे चचेरे भाई से हुई है, ने कक्षा पांच के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी।”

वर्ष 2011 आंकड़ों के अनुसार चूरू जिले में साक्षरता दर 66.8% थी। यह पुरुषों (78.8%) की तुलना में महिलाओं (54%) के लिए कम है।

मेरे ससुराल वालों ने मुझसे पूछा, "अगर उनकी बेटी पढ़ाई नहीं करना चाहती तो मुझे पढ़ाई की क्या जरूरत है। आखिरकार वे इस शर्त पर तैयार हो गए कि मेरी पढ़ाई का सारा खर्च मेरे माता-पिता उठाएंगे। सौभाग्य से मेरे माता-पिता इस मामले में ठीक थे,” नीतू कहती हैं।

उसकी शिक्षा के लिए धन जुटाना अपेक्षाकृत कम मुश्‍क‍िल वाला काम था। नीतू कहती हैं, "मेरे पति हर शाम शराब पीते थे और न तो घर के कामों में मदद करते थे और न ही हमारे इकलौते बच्चे की देखभाल में।" “आखिरकार उसकी पीने की आदत खराब हो गई और वैसे भी वह हमेशा बेरोजगार रहता था। वह मुझसे पैसे मांगता था और अगर मैं नहीं देती तो वह मुझे गाली देता और मारपीट करता था।

“एक और बड़ी समस्या थी जो अब भी जारी है। वह है उसकी हर बात पर शक करने की आदत। चूँकि वह पढ़ या लिख नहीं सकता है, वह नहीं जानता कि कौन मुझे फोन कर रहा है या मैसेज भेज रहा है, और मान लेता है कि यह कोई है जिसके साथ मेरा अफेयर चल रहा है। हमारे बीच गंभीर झगड़े होते थे, जब तक कि मैंने आखिरकार उसके साथ रहना छोड़ नहीं द‍िया। मैं अपने बेटे के साथ अपने माता-पिता के घर वापस आ गई। आज हम व्यावहारिक रूप से अलग हो गए हैं।

परंपरा की रक्षा

एसआरकेपीएस के समन्वयक विकास कुमार राहर कहते हैं, यह प्रथा सदियों पुरानी है। "यह प्रथा शेखावाटी क्षेत्र में प्रमुख है जिसमें चूरू, झुंझुनूं और सीकर शामिल हैं।" शोध से पता चलता है कि यह प्रथा पाकिस्तान में भी मौजूद है।

राघव लाल (57) इस परंपरा के गुणों में दृढ़ विश्वास रखते हैं। "ऐसा करने के पीछे कुछ कारण हैं," वह कहते हैं। देखिए, अगर हमारी लड़की को अपने ससुराल में कोई समस्या आती है तो हमें पता है कि यहां उनकी बेटी का क्या करना है, जिसकी शादी हमारे बेटे या भतीजे से हुई है। जैसा करोगे, वैसा पाओगे (जैसा बोओगे, वैसा पाओगे),” लाल हंसते हुए कहते हैं।

हालांकि व्यवहार में यह उस तरह से काम नहीं करता है, जैसा कि चूरू के असलू गांव की निवासी बसंती की कहानी दर्शाती हैं।

अनिरुद्ध ने बसंती से 2021 में एक सौदे के तहत शादी की थी जहां उनके भाई-बहनों की भी एक-दूसरे से शादी हुई थी। हालांकि, बसंती और अनिरुद्ध की शादी दो साल से ज्यादा नहीं चल पाई और उसके बाद उन्हें घर भेज दिया गया।

बसंती याद करते हुए कहती हैं, ''शादी के पहले साल में मैं गर्भवती नहीं हुई इसलिए मेरी सास मुझे ताने मारती थीं।'' "मैं इसे नहीं सह सकती थी, इसलिए मैंने इसके बारे में अपने पति से बात की और ज‍िसके बाद हमारे बीच काफी लड़ाई हुई। कुछ महीनों यह लगातार चलता रहा। इसलिए मैं कुछ समय के लिए अपने माता-पिता के घर वापस आ गई।

“मेरे पति मुझसे मिलने कभी नहीं आए,” बसंती कहती हैं। "तब से मैं अपने माता-पिता के साथ रह रही हूं।"

“हमने उनकी बेटी को वापस भेज दिया क्योंकि हमारी बेटी वापस आ गई थी,” बसंती की मां कहती हैं, जो परंपरा में दृढ़ता से विश्वास करती हैं।

बसंती निःसंतान है, लेकिन उसके पति की बहन, जिसकी शादी उसके भाई से हुई थी, का एक साल का बेटा है। संक्षेप में क्योंकि अदला-बदली का हिस्सा रहे जोड़ों में से एक को समस्या थी, इसल‍िए दूसरे परिवार ने भी र‍िश्‍ता तोड़ दिया, और यह परंपरा के साथ सबसे बड़े समस्‍या में से एक है।

राजस्थान के एक पुलिस अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, “अगर आदमी के पास सरकारी नौकरी नहीं है तो उसकी शादी होने की संभावना कम हो जाती है। वह तब होती है जब परिवार की बेटियों को वरदान के रूप में देखा जाता है, क्योंकि लड़के के लिए दुल्हन के बदले में उनका आदान-प्रदान किया जा सकता है। रिवाज के खिलाफ कोई सीधा कानून नहीं है। लेकिन अक्सर आत्महत्या या घरेलू हिंसा के मामले को सुलझाने के दौरान हमें पता चलता है कि शादी आटा-साटा प्रथा के तहत हुई थी।

वर्ष 2021 में राजस्थान की महिला और बाल विकास मंत्री ममता भूपेश ने हिंदी दैनिक दैनिक भास्कर को बताया था कि सरकार आटा-साटा प्रथा का अध्ययन कर रही है और लोगों को इसका पालन करने से रोकने के ल‍िए इसके खिलाफ एक कानून लाएगी और टीम भी बनाएगी।

झुंझुनूं में पुलिस अधीक्षक मृदुल कछवा ने इंडियास्पेंड को बताया, "जिला पुलिस विभाग के पास अभी तक किसी विशेष टीम या कानून का मसौदा तैयार करने के बारे में कोई जानकारी नहीं है।"

इस समस्या का समाधान खोजने के प्रयास में एक बड़ी समस्या उचित जानकारी का अभाव है। एसआरकेपीएस के संस्थापक चौधरी कहते हैं, "आटा-साटा के तहत शादी करने वाले लोगों या जोड़ों की संख्या को दर्शाने वाला कोई डेटा नहीं है।" उन्होंने कहा, 'इस परंपरा के खिलाफ कोई कानून भी नहीं है जो परिवारों को ऐसे जटिल रिश्तों में बंधने से रोक सके। ये दो प्रमुख कारण हैं कि क्यों हर गांव में 5 या 10 जोड़ों का विवाह आटा-साटा व्यवस्था में किया जाता है।