बेंगलुरू: तमाम परेशानियों के बावजूद शाहिद कुरैशी की सुरमा लगी आंखों में उम्मीदों के कुछ निशान अभी बाकी थे। यह जानते हुए भी कि वह अब कभी अपने पुराने काम पर नहीं लौट पाएंगे।

पूर्वी बेंगलुरु के टेनरी रोड के बूचड़खाने में दशकों से उनके हाथ मांस के इस मुश्किल और मेहनत से भरे काम को अंजाम देते आ रहे थे। काम करते-करते उनकी हथेलियां सख्त और खुरदरी हो गईं हैं। ये उनका पारिवारिक पेशा है, जिसे पहले उनके पिता किया करते थे। जब कुरैशी ने किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रखा तो उन्होंने भी इसे अपना लिया।

शिवाजीनगर में शाहिद और कुरैशी समुदाय (एक मुस्लिम उपसमूह) के लिए गोमांस व्यापार आमदनी का एकमात्र जरिया था। एक यही काम है जिसे वह करना जानते हैं। लेकिन 2021 की शुरुआत में कर्नाटक में मवेशियों की हत्या पर पाबंदी लगाने वाले नए कानून के लागू हो जाने के बाद से शाहिद जैसे ज्यादातर लोग बेरोजगार हो गए हैं। कुछ खुशकिस्मत रहे जिन्हें मीट की दुकान पर काम मिल गया है। छह बच्चों के पिता 55 साल के शाहिद ने कहा - "मुझे नहीं पता कि हम कैसे अपना गुजारा करेंगे।"

आमदनी न होने की वजह से उन्होंने अपने तीन बच्चों की पढ़ाई बंद करा दी है।

शाहिद के हमउम्र चचेरे भाई बदर कुरैशी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वह कहते हैं, "घर के हालात बहुत अच्छे नहीं हैं।" उन्होंने आगे कहा, " मेरे पास कोई काम नहीं हैं। मैं खाली बैठा हूं। मेरा बेटा एक मीट स्टॉल में काम करता है। बस उसकी कमाई से गुजारा चल रहा है।" उनके परिवार में एक पत्नी, बेटा, दो बेटियों और एक बड़ी बहन सहित छह लोग हैं, जो अब पूरी तरह से बेटे पर निर्भर हैं।

फरवरी 2021 में कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली सरकार ने कर्नाटक पशु वध रोकथाम और संरक्षण विधेयक- 2020 को लागू किया था। इसने गोमांस में लगे उन लोगों के व्यवसाय को पूरी तरह से खत्म कर दिया जो पहले से ही महामारी की मार झेल रहे थे। पहले भी गोहत्या पर प्रतिबंध था, लेकिन नए कानून में गाय, बछड़े, बैल, सांड और 13 साल से कम उम्र की भैंस की हत्या पर भी रोक लगा दी है।

गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में संविधान के अनुच्छेद 48 के तहत गायों की हत्या पर पूरी तरह से पाबंदी लगी हुई है। अरुणाचल प्रदेश, केरल, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और लक्षद्वीप को छोड़कर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी गोहत्या पर कानून हैं। लगभग आधे राज्यों में गोहत्या पर रोक लगाने वाले ये कानून तकरीबन 50 साल पुराने हैं और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कार्यकाल के समय से चले आ रहे हैं। जैसा कि इंडियास्पेंड ने अप्रैल 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

राष्ट्रीय कामधेनु आयोग (राष्ट्रीय गाय आयोग) के अध्यक्ष वल्लभ कथिरिया ने 2019 में इंडियास्पेंड से कहा था, "हम यह भी सुनिश्चित करेंगे कि उन राज्यों में जहां गोहत्या अभी भी वैध है, उन्हें बंद कर दिया जाए।"

भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने 2010 और 2012 (1964 के अधिनियम में संशोधन) में दो विधेयक पेश किए थे। राज्य में सरकार बदलने के बाद 2014 में बिल वापस ले लिए गए थे। वर्तमान में प्रभावी कानून 2012 में पारित किया गया था। कर्नाटक के 1964 के अधिनियम में बैल, सांड और भैंसों के हत्या की अनुमति थी, लेकिन नया कानून ठीक इसके उलट "गाय, गाय के बछड़े और बैल, सभी उम्र के बैल (पूरी तरह से), और तेरह वर्ष से कम उम्र की भैंस की हत्या पर प्रतिबंध लगाता है।"

शोधकर्ता सिल्विया करपगम और सिद्धार्थ के. जोशी ने अपनी नवंबर 2021 की रिपोर्ट में कहा था, "हालांकि अधिनियम में मवेशियों की स्वदेशी नस्लों के संरक्षण और सुधार का ध्यान रखा गया है। लेकिन 2020 अधिनियम के प्रावधान न केवल राज्य में मीट उद्योग को अपरिवर्तनीय रूप से बरबाद कर देंगे, बल्कि स्वदेशी मवेशियों की आबादी में गिरावट को भी तेज करेंगे।"

बेंगलुरु में इस व्यवसाय से जुडे लोगों ने इंडियास्पेंड को बताया कि कानून के उल्लंघन के लिए सजा और दंड बढ़ाने, गोमांस की परिभाषा का विस्तार करने, अंतरराज्यीय परिवहन पर प्रतिबंध लगाने और पुलिस और अन्य अधिकारियों को मिले विशेष अधिकारों से उनकी आजीविका प्रभावित हुई है। नए कानून से मवेशियों के मांस के कारोबार का अपराधीकरण किया जा रहा है।

भैंस के मीट की कम मांग

नया कानून पारित होने के बाद, कुछ समय तक, शाहिद ने शिवाजीनगर में एक मीट स्टॉल पर काम किया था, जहां उन्हें रोजाना ₹300 से ₹400 मिल रहे थे। लेकिन यह बूचड़खाने में उनकी रोजाना होने वाली कमाई के आधे से भी कम था। कम आमदनी की वजह से उन्हें महीने का ₹2,000 किराया दे पाना भी मुश्किल हो रहा है। वह कहते हैं, "पहले बैल और सांड की हत्या पर कोई रोक नहीं थी। हम मांग के आधार पर एक दिन में लगभग दो जानवरों और कई बार इससे भी ज्यादा का मांस बेच देते थे।"

पशुचिकित्सा विज्ञानी सागरी आर. रामदास कहते हैं कि तमिलनाडु और केरल जैसे कुछ राज्यों में उम्र की पाबंदी है कि गायों और भैंसों को कितने साल का होने पर मांस के लिए काटा जा सकता है, जबकि ज्यादातर राज्यों में भैसों को लेकर ऐसी कोई पाबंदियां नहीं हैं। वह कहते हैं कि कर्नाटक में भैंसों को काटने की उम्र बढ़ाकर 13 साल करना बिल्कुल ही "समझ से परे" है क्योंकि इस उम्र तक पहुंचने से काफी पहले ही भैंस अपनी उपयोगिता खो देती हैं। उनके अनुसार, "जिन राज्यों में गायों को काटने पर सबसे सख्त नियम हैं, वे भैंसों के बारे में कुछ भी नहीं कहते। असल में पंजाब, यूपी, राजस्थान और हरियाणा में तो भैंसों को बिना किसी परेशानी के काटा जा सकता है।"

कुरैशी समुदाय के संगठन, ऑल इंडिया जमीयतुल कुरैश (एआईजेक्यू), कर्नाटक के अध्यक्ष खासिम शोएब-उर-रहमान कुरैशी के अनुसार, कर्नाटक और खासकर बेंगलुरु में भैंस के मीट की कोई मांग नहीं है, जिसे कैराबीफ कहते हैं। उन्होंने कहा," रातों-रात हमारे समुदाय का काम प्रभावित हो गया। रोजाना खाने-कमाने वाले लोग संघर्ष कर रहे हैं।"

साल 2021 में, भारत में 2.41 मिलियन टन गोजातीय मांस का उत्पादन होने का अनुमान लगाया गया था। ये एशिया में चीन के बाद सबसे ज्यादा गौमांस निर्यात करने वाला देश है। भारत में, 2019-20 में हुए कुल मीट उत्पादन में गोमांस की हिस्सेदारी 3.6% रही जबकि इसमें भैंस के मीट का योगदान 18.4% रहा। कर्नाटक में कुल मीट उत्पादन में गोमांस की हिस्सेदारी 6.8% और भैंस के मीट की हिस्सेदारी 2% रही।

कुरैशी समुदाय के संगठन, ऑल इंडिया जमीयतुल कुरैश (एआईजेक्यू), कर्नाटक के अध्यक्ष खासिम शोएब-उर-रहमान कुरैशी। फोटो: श्रीहरि पलिअथ

दक्षिणी राज्यों में, कर्नाटक में जनसंख्या के मुकाबले सबसे अधिक दूध देने वाले और युवा मवेशी हैं। इनकी उम्र 18 से 24 महीनों के बीच हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, हर 100 घरों में 28.8 'दूध देने वाले' और 29.9 युवा मवेशी हैं। 1986-87 से गाय के दूध ने राज्य के दूध उत्पादन में आधे से अधिक का योगदान दिया है, और 2019-20 में सबसे अधिक 76% के साथ, कृषि अर्थव्यवस्था में गाय और अन्य पशुओं के महत्व को दर्शाता है।


रामदास ने कहा कि भैंस के मांस की तुलना में गौ-मांस की अधिक मांग कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना सहित डेक्कन के अधिकांश राज्यों के लिए सही है, क्योंकि यहां की खाद्य प्राथमिकताएं पशुपालन से जुड़ी हुई हैं। वह आगे कहते हैं, "स्वदेशी मवेशियों की नस्लें डेक्कन के शुष्क, अर्द्ध शुष्क इलाके और पारिस्थितिकी में उगने वाली इन बारहमासी घास के मैदानों पर पनपती हैं, जबकि भैंस की नस्लें जल निकायों के पास ही पनपती हैं।"

इंडियास्पेंड ने कर्नाटक में पशुपालन और मत्स्य पालन विभाग के अधिकारियों से भैंसों की हत्या की उम्र को 13 साल से ऊपर तक सीमित करने के फैसले और इससे होने वाले आजीविका के नुकसान के लिए मुआवजे और समर्थन के बारे में उनकी प्रतिक्रिया मांगी है। उनका जवाब मिलने के बाद आर्टिकल अपडेट किया जाएगा।

गाय का मीट भैंस के मीट के मुकाबले मुलायम होता है। रामदास कहते हैं, "इसलिए ब्राह्मणवादी विचारधारा के चलते और विज्ञान की अनदेखी करते हुए लोगों से यह कहना कि 'तुम भैंस के मीट से काम चला सकते हो', यह उन पर अपनी बात थोपना है।"

बेंगलुरु के अधिकांश इलाकों में मांस की बिक्री में गिरावट और यहां तक ​​कि दुकानों को बंद करने की सूचना मिली है। एक स्वतंत्र शोधकर्ता और नवंबर 2021 की रिपोर्ट के एक लेखक सिद्धार्थ जोशी ने बताया कि शिवाजीनगर क्षेत्र में, जहां पहले बीफ की बिक्री, रोजाना लगभग 5,000 किलोग्राम हुआ करती थी, स्थानीय व्यापारी संघ के अनुसार अब यह सिर्फ 2000 किलोग्राम रह गई है। उन्होंने कहा, "बीफ व्यापारी सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ हैं। क्योंकि उनके व्यवसाय को रातों-रात अपराध घोषित कर दिया गया।"

कई समुदायों पर अपनी खाने की आदतों पर थोपने के अलावा, प्रतिबंध से न केवल कुरैशी जैसे हाशिए के समुदाय के लिए रोजगार और आजीविका के अवसर सीमित हुए हैं, बल्कि दलितों पर भी इसका खासा असर पड़ा है, जो मवेशियों की खाल की सफाई और इसके रोजगार से जुड़े हैं। चमड़ा उद्योग देश भर में 25 लाख लोगों को रोजगार देता है, जिनमें से अधिकतर मुस्लिम या दलित हैं। 2018-19 में, कर्नाटक में गाय और भैंस की खाल के उत्पादों का अनुमानित मूल्य क्रमशः ₹8.3 करोड़ ($1.1मिलियन) और ₹4.8 करोड़ ($640,000) आंका गया था।

रोजगार ढूंढने की कशमकश

शाहिद और बदर कुरैशी, दोनों पढ़े-लिखे नहीं हैं। रोजगार ढूंढने के लिए वे जुलाई 2021 में पड़ोसी राज्य तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश की ओर चले गए।

लेकिन वे वहां ज्यादा दिन तक टिक नहीं पाए। उन्हें वहां बूचड़खानों में सफाई का काम सौंपा गया था। ये वो काम था जो यहां उनके नीचे काम करने वाले मजदूर किया करते थे। शाहिद ने कहा, "यह काम मजदूरों का है। हम जैसे कुशल कसाईयों का नहीं। हमारे काम की वहां कोई वैल्यु नहीं थी। हमें काम करना अच्छा नहीं लगा।"

उनके चचेरे भाई ने कहा, " बेंगलुरु में हमारे पास एक जानवर को मारने और सफाई करने समेत चार लोगों के लिए काम हुआ करता था। हम दोनों यहां अन्य लोगों के साथ मिलकर काम करते और जो भी आमदनी होती उसे आपस में बांट लेते थे।"

बेंगलुरु से 130 किलोमीटर दूर आंध्र प्रदेश के हिंदूपुर से एक महीने से भी कम समय के बाद लौटे बदर कुरैशी ने कहा, "जब मैं बीमार पड़ा तो मेरी देखभाल करने वाला कोई नहीं था।" वह आगे कहते हैं, "मुझसे तकरीबन ₹400 (प्रतिदिन) देने का वादा किया गया था, लेकिन समय पर पैसा नहीं मिलता था। हालांकि वो खाना ठीक-ठाक देते थे। एक छोटे से कमरे में छह लोगों के साथ रहना पड़ा था, इसलिए मैं वहां ठीक से सो नहीं सका।"

बेंगलुरु में वे पहले मारे गए जानवरों का कुछ मांस घर भी ले जा सकते थे। लेकिन अब फ्री में मीट मिलने का ये जरिया भी नहीं रहा। दलित, मुस्लिम, ईसाई, अन्य पिछड़ा वर्ग और आदिवासियों सहित तकरीबन 1 करोड़ 80 लाख लोग यानी आबादी का लगभग 15 % हिस्सा बीफ का सेवन करता है। ये मीट बाकी की तुलना में सस्ता है और पोषक तत्वों से भरपूर भी।

पाबंदियों का असर सिर्फ शाहिद और बदर जैसे उन अशिक्षित कामगारों पर ही नहीं पड़ा है जिनके पास दूसरे रोजगार की तरफ जाने का कोई विकल्प नहीं है। बल्कि इस व्यवसाय से जुड़े पढ़े-लिखे युवा भी इस कानून का दंश झेलने के लिए मजबूर हैं।

चार भाई-बहनों में सबसे बड़े, कुरैशी समुदाय के 24 साल के एम अब्दुल्ला को अपने पिता इमरान उद्दीन को फ्रेज़र टाउन में अपना मीट स्टॉल चलाने में मदद करने के लिए कॉलेज छोड़ना पड़ा था। नए कानून और महामारी के कारण आमदनी में कमी के चलते उनके दोनों भाइयों को अपनी स्कूली शिक्षा कुछ समय के लिए रोक देनी पड़ी। परिवार ने अपनी आय का 60 % से ज्यादा हिस्सा खो दिया है। फिलहाल छह लोगों के इस परिवार की कमाई सिर्फ ₹1,000 रोजाना है। जिस दिन बीफ पसंद करने वाले ग्राहक भैंस का मांस नहीं लेते तो पूरे दिन उनकी कोई बिक्री नहीं होती है। अब्दुल्ला के पास विकल्प था। वह इस व्यवसाय में नहीं आना चाहते थे। लेकिन आज वह भैंस के मांस को काटने की एकरसता और कठोरता के आदी हो चुके हैं। वह कहते हैं, "आप जानते हैं, मैंने लॉकडाउन से पहले बिरयानी बेचने का एक छोटा व्यवसाय शुरू किया था, लेकिन यह काम नहीं किया।"

अब्दुल्ला ने कहा, "मैंने अपने लिए दूसरे रास्तों को पूरी तरह से बंद कर दिया है। मेरे दोस्त अन्य काम कर रहे हैं। कभी-कभी अपने आपको हताश महसूस करता हूं।" अब्दुल्ला सुबह 8 बजे अपने काम पर लग जाते हैं और 12 घंटे बाद ही दुकान बंद करके घर की तरफ निकलते हैं। "मुझे अपनी इस दुकान को चलाते रहना है। क्योंकि मेरा परिवार इसी पर टिका है।"

एम अब्दुल्ला अपने पिता इमरान उद्दीन के साथ अपने मीट स्टॉल पर। फोटो: श्रीहरि पलिअथ

जिन लोगों की आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है, उन्होंने अपने कारोबार को ऑनलाइन शिफ्ट कर लिया है। वे इसके जरिए बाजार की मांग को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं। 30 साल के सुहैब-उर-रहमान कुरैशी, एआईजेक्यू के कर्नाटक प्रमुख खासिम कुरैशी के बेटे हैं। वह ऑनलाइन मीट बेचते हैं। ग्रेजुएट होने के बाद भी सुहैब ने कॉर्पोरेट नौकरी नहीं की। इसका कारण बताते हुए वह कहते हैं, "हमारा समुदाय 'तत्काल पैसा' कमाना पसंद करता है। इसी तरह से हम सालों से अपना जीवन यापन करते आए हैं।"

सुहैब ने कहा, "मवेशी हत्या पर प्रतिबंध एक धार्मिक मुद्दा होने के बावजूद, हमारे बहुत से ग्राहक हिंदू हैं। हम पूरी तरह से भैंस के मांस को बेचने के लिए ऑनलाइन चले गए हैं... कानून हमारे बाजार को छोटा कर रहा है जबकि ये हमारा पेशेवर अधिकार है।"

कानून आर्थिक चक्र को बढ़ाता है

जब सरकार ने डेयरी उद्योग को तेज करने पर ध्यान दिया तो किसानों ने दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए प्राथमिक नस्ल के रूप में क्रॉसब्रीड गायों को अपनाना शुरु कर दिया। संयुक्त राज्य अमेरिका के कृषि विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के साथ-साथ गुजरात और पश्चिम बंगाल में विशेष रूप से क्रॉसब्रीड दूध देने वाली गायों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई है।

कर्नाटक सरकार की एक मूल्यांकन रिपोर्ट के अनुसार, 2007-08 से 2014-15 तक सात साल की अवधि में दूध देने वाली संकर प्रजाति की गायों की कुल वृद्धि दर 71.2% रही, जबकि इस दौरान दूध देने वाले जानवरों में 62.6% की वृद्धि हुई। लेकिन नर क्रॉस ब्रीड जानवरों की स्थिति काफी दयनीय है। किसान अपने नर बछड़ों को जल्द से जल्द बेचना पसंद करते हैं, ताकि पशु को पालने के आर्थिक बोझ को कम कर सके। पशु चिकित्सा वैज्ञानिक रामदास ने कहा, "नए प्रतिबंधों के साथ, किसानों को इन नर क्रॉस ब्रीड बछड़ों से निपटने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।"

ये प्रतिबंध शहरी और शहर से सटे इलाकों में मांग के आर्थिक चक्र को प्रभावित करता है जहां बूचड़खाने, चमड़े के कारखाने, होटल, बीफ स्टॉल स्थित है। इसकी वजह से शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी और ग्रामीण कृषि परिवारों में आय का नुकसान होता है।

दक्षिणपंथी सोच रखने वालों की मनमानी

गायों को काटने पर प्रतिबंध जनवरी 2021 में कर्नाटक के राज्यपाल के एक अध्यादेश के जरिए लगाया गया। बाद में राज्य विधानसभा ने इस बारे में एक कानून पारित कर दिया। 1964 के कानून में ₹1,000 तक का जुर्माना और छह महीने की कैद का प्रावधान था, जबकि नए कानून में कम से कम तीन साल और अधिकतम सात साल के लिए कारावास, ₹50,000 से ₹5 लाख के बीच जुर्माना लगाया गया है।

इंडियास्पेंड ने जिन गोमांस व्यापारियों से बात की, वे इस बात से चिंतित थे कि दक्षिणपंथी विचारधारा वाले लोग कानून अपने हाथ में लेकर इसका फायदा उठा रहे हैं। खासीम ने कहा, "हमें लूटा जा रहा है। ये लोग हमारे खरीदे गए मवेशियों को ले जाते हैं। अगर वे मवेशियों को बचाना चाहते हैं तो उन्हें हमें लूटने के बजाय किसानों के पास जाकर उन जानवरों को खरीदना चाहिए, जैसा हम करते हैं।"

1964 और 2020 दोनों कानून, संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (जी) और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करते हैं। कर्नाटक उच्च न्यायालय के एक वकील बसवा प्रसाद कुनाले ने कहा, 2020 का कानून पुलिस अधिकारियों और तहसीलदार स्तर के अधिकारियों जैसे कार्यकारी अधिकारियों को अधिकार देता है कि वे जब्त की गई सामग्री की तलाशी, जब्ती और निपटान के लिए अधिकारियों को अतिरिक्त अधिकार देकर व्यापारियों और कसाईयों को परेशान करें और डराएं।

कानून पारित होने से पहले विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी के एक वरिष्ठ रेजिडेंट फेलो आलोक प्रसन्ना कुमार ने दिसंबर 2020 के आर्थिक और राजनीतिक साप्ताहिक विश्लेषण में कहा था, जिस तरह से विधेयक का मसौदा तैयार किया गया है, उससे पता चलता है कि इस बात में सरकार की दिलचस्पी कम है कि आरोप सिद्ध हों, उसकी ज्यादा दिलचस्पी तो राज्य प्रायोजित हिंसा के लिए "गोरक्षा" को बहाना बनाने में है।

कुमार ने तर्क दिया कि कोई अन्य कानून कार्यपालिका को नागरिकों की संपत्ति को जब्त करने और निपटाने का इतना व्यापक, अनियंत्रित अधिकार नहीं देता है।

कुनाले ने कहा, पुलिस अधिकारी या सक्षम प्राधिकारी को तलाशी और जब्ती के लिए किसी से अनुमति लेने की जरूरत नहीं है, जो "स्पष्ट दिशानिर्देशों के अभाव में शक्तियों के मनमाने प्रयोग को बढ़ावा देगा"।

किसान संगठन, कसाई, दलित संगठनों और कुछ व्यक्तियों सहित आठ याचिकाओं ने कानून को चुनौती दी है। याचिका 2020 के कानून को असंवैधानिक ठहराना चाहती है, और संविधान के अनुच्छेद 14, 19 (1) (जी) और 21 के उल्लंघन की ओर देखती है और यह मानती हैं कि राज्यपाल के पास अध्यादेश जारी करने की कोई शक्ति नहीं है।

इंडियास्पेंड ने कानून के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सरकार की प्रतिक्रिया मांगी है। जवाब मिलने पर आर्टिकल को अपडेट कर दिया जाएगा।

खैर! मुकदमा तो चलता रहेगा लेकिन अब्दुल्ला को चिंता इस बात की है कि वे कब अपना बिजनेस फिर से शुरु कर पाएंगे। और क्या उन्हें कोई सरकारी सहायता मिलेगी। उन्होंने कहा, "अगर सरकार हमें अपने व्यवसाय को बंद करने के लिए कहती है, तो हम कुछ नहीं कर सकते। हमारे पास कोई विकल्प नहीं है।"

शाहिद ने कहा, "ऐसे आरोप हैं कि हम गौ माता की हत्या करते हैं। हम ऐसा नहीं करते हैं।" बदर ने कहा, "हम बस अपनी आजीविका वापस चाहते हैं। अगर ऐसा नहीं हुआ तो हम जल्द ही सड़क पर आ जाएंगे"।

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