पटना: कुछ महीने पहले दरभंगा ज़िले के बहादुरपुर ब्लॉक की देसली पंचायत की एक गर्भवती महिला की जांच रिपोर्ट स्थानीय प्राइमरी हेल्थ सेंटर (पीएचसी) में जमा होने के कुछ देर बाद ही पंचायत की आक्ज़लरी नर्स मिडवाइफ (एएनएम) मोनालीसा देवी के पास हेल्थ सेंटर से एक आपातकालीन फोन आया। मोनालिसा को बताया गया कि उस गर्भवती महिला के शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी का पता चला है अतः वे उनसे तुरंत संपर्क करें।

"जब मैंने पता लगाया, तो पता चला कि वह कहीं और गई हुई हैं। फिर हमने उनसे फोन पर बात की और पूछा कि उन्हें किसी तरह की दिक्कत तो नहीं आ रही है, तो महिला ने बताया कि कोई दिक्कत नहीं है। हमने हेल्थ सेंटर की तरफ से दी गई आयरन फ़ोलिक एसिड और कैल्शियम की गोलियां नियमित खाने की सलाह दी," मोनालीसा देवी ने इंडियास्पेंड को बत

मोनालिसा की तरह दरभंगा ज़िले की अन्य एएनएम के पास भी अक्सर पीएचसी से इस तरह के फ़ोन आते हैं और उनके इलाकों की गर्भवती महिलाओं के शरीर में आयरन, ख़ून में हीमोग्लोबिन की कमी व अन्य गंभीर समस्याओं के बारे में बताकर तुरंत संपर्क करने को कहा जाता है। अगर स्थिति गंभीर होती है, तो तुरंत स्थानीय सरकारी अस्पताल में भर्ती कराने का निर्देश दिया जाता है।

गर्भवती महिलाओं में समस्याओं की जानकारी पीएचसी के चिकित्सकों को वुमेन्स ऑब्सटेट्रिकल नियोनेटल डेथ इवैल्यूएशन एंड रिएक्शन यानी वंडर ऐप के ज़रिये मिलती है, जिसे दरभंगा ज़िले के डीएम त्यागराजन एसएम की पहल पर पिछले साल दरभंगा में लांच किया गया था। राज्य सरकार अब इस ऐप को पूरे राज्य में शुरू करने की तैयारी कर रही है।

बिहार में मातृत्व मृत्यु दर के आंकड़े

मातृत्व मृत्यु पूरे देश के लिए एक बड़ी समस्या है। बिहार में हालात बहुत अच्छे नहीं हैं। साल 2016-2018 में बिहार में मातृ मृत्यु दर 149 थी। इससे पहले 2015-2017 में यह दर 165 थी, लोकसभा में इस साल 18 सितंबर को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की तरफ से दी गई जानकारी के मुताबिक़।

वर्ष 2015-2017 में अकेले बिहार में 4,900 गर्भवती महिलाओं की मौत हुई थी, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की तरफ से पिछले साल 22 नवंबर को लोकसभा में पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार।

बिहार में हर साल 3,171,910 महिलाएं गर्भवती होती हैं। इनमें से 432,533 महिलाओं को प्रसव में दिक्कत आने की आशंका रहती है। 288,355 गर्भवती महिलाओं को ऑपरेशन कराना पड़ता है, दरभंगा ज़िला प्रशासन की तरफ से दिए गए पूरे राज्य के आंकड़ों के मुताबिक़।

कैसे काम करता है ऐप

इस ऐप को लांच करने में सबसे बड़ी भूमिका डीएम त्यागराजन एसएम की है। डीएम एक कार्यक्रम के सिलसिले में तमिलनाडु गये हुए थे, जहां उन्हें पता चला कि मातृत्व मृत्यु दर कम करने के लिए यहां इरोड ज़िले में साल 2017 में वंडर ऐप शुरू किया गया था, लेकिन वह फ़ेल हो गया। इस ऐप को जानी-मानी गायनोकोलॉजिस्ट डॉ नर्मदा कुप्पुस्वामी ने तैयार किया है।

"वहां वो ऐप सफल नहीं हो पाई, लेकिन मुझे वो आइडिया पसंद आया। दरभंगा में चूंकि मातृत्व मृत्यु दर ज़्यादा है, इसलिए मैंने ये ऐप यहां शुरू करने पर विचार किया," डीएम त्यागराजन ने इंडियास्पेंड से कहा।

इस साल फ़रवरी तक वंडर ऐप पर 18,277 अलर्ट आये, जिनमें से 91% येलो और 9% रेड अलर्ट थे।

"सबसे पहले दो ब्लॉक बहादुरपुर और बेनीपुर में पिछले साल जून में इस सेवा की शुरुआत हुई, जिसे 23 जुलाई को सभी 20 ब्लॉकों में लागू किया गया," वंडर ऐप की नोडल अफसर डॉ श्रद्धा ने इंडियास्पेंड को जानकारी दी।

इस ऐप में दरभंगा ज़िले की हर गर्भवती महिला का प्रोफाइल बनाया जाता है और 9 महीने की अवधि में एक नियमित अंतराल पर वज़न, लंबाई, ब्लड प्रेशर, शुगर, हीमोग्लोबिन, ग्लूकोज़, एचआईवी आदि की जांच रिपोर्ट ऐप में अपलोड की जाती है।

"हम लोग सभी गर्भवती महिलाओं को बुलाते हैं और उन्हें पीएचसी में ले जाकर सभी तरह की जांच करवाते हैं। जांच रिपोर्ट में जो डाटा मिलता है, उसे फॉर्म में भरकर पीएचसी में जमा करते हैं। पीएचसी में आईटी कर्मचारी ये डाटा अपलोड करते हैं," दरभंगा ज़िले के जाले ब्लॉक में काम कर रही एएनएम रूबी देवी ने इंडियास्पेंड को बताया।

पहले ये डाटा कागज़ों में रह जाता था, लेकिन वंडर ऐप के आने से इसे ऑनलाइन किया गया है और कुछ भी सामान्य से कम होने पर अलर्ट आ जाता है, बहादुरपुर में काम कर रही एएनएम मोनालीसा देवी ने कहा।

ऐप से मिलते हैं दो तरह के अलर्ट

किसी गर्भवती महिला में हीमोग्लोबिन, आयरन या अन्य तत्वों की कमी है, तो डाटा अपलोड करते ही पीएचसी के चिकित्सकों के मोबाइल में मौजूद ऐप में संकेत आने लगता है।

"टेस्ट रिपोर्ट में जो आंकड़े मिलते हैं, उन्हें ऐप डालते हैं। अगर कोई भी आंकड़ा नॉर्मल से कम हुआ, तो तुरंत अलार्म बजता है और एक अलर्ट जारी होता है। अगर रिपोर्ट में किसी तत्व में एकदम मामूली कमी है और दवा की ज़रूरत नहीं है, लेकिन देखभाल की ज़रूरत है, तो येलो (पीला) अलर्ट आता है," डॉ श्रद्धा बताती हैं, "अगर रिपोर्ट में आये आंकड़े सामान्य से काफी कम होते हैं और गर्भवती महिलाओं को तत्काल इलाज की जरूरत होती है, तो अलार्म के साथ रेड (लाल) अलर्ट आता है। इससे हमें पता चल जाता है कि किन गर्भवती महिलाओं को ज़्यादा देखभाल की ज़रूरत है। दो अलर्ट के अलावा एक और फ़ीचर है, जिससे अलर्ट के साथ ही एक मैसेज भी मोबाइल स्क्रीन पर आ जाता है, जिसमें बताया जाता है कि गर्भवती महिलाओं को तुरंत राहत देने के लिए क्या किया जाना चाहिए। सब कुछ सामान्य होने पर ग्रीन सिग्नल आता है।"

अलर्ट आने पर सुविधा ये होती है कि हमें पता चल जाता है कि किन गर्भवती महिलाओं पर ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है और उसी हिसाब से हम लोग एएनएम, आशा व जीविका दीदियों को निर्देश दे देते हैं कि इन महिलाओं का विशेष ध्यान रखा जाए, डॉ श्रद्धा ने बताया।

दरभंगा के सिंघवाड़ा की रहने वाली साइमा परवीन काफी समय से दिल्ली में थी। पिछले साल गर्भवती थी, तो वह गांव लौट आईं। यहां लौटते ही आशा और एएनएम ने उनसे संपर्क किया और वंडर ऐप में उनका रजिस्ट्रेशन कराकर जांच करवाई और सारे डाटा की एंट्री कराई।

"एएनएम की तत्परता और जांच और वंडर ऐप में एंट्री से मुझे भरोसा हुआ कि सरकारी व्यवस्था ठीक है," उन्होंने बताया।

उन्होंने निजी अस्पताल की जगह सिंघवाड़ा कम्युनिटी हेल्थ सेंटर में भर्ती होना उचित समझा और वहां उनकी डिलीवरी हुई।

वंडर ऐप से गर्भवती महिलाओं के रेफरल के 85 मामले आये, जिनमें से 44 मामलों में महिलाओं को दरभंगा मेडिकल कॉलेज ले जाया गया।

रेफ़रल मामलों में सहूलियत

दरभंगा में मातृत्व मृत्यु दर के आंकड़ों से पता चलता है कि ज़्यादातर मामलों में गर्भवती महिलाओं की मृत्यु इसलिए हो जाती है, क्योंकि वे समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाती हैं, डीएम त्यागराजन ने कहा।

इसे ध्यान में रखते हुए मोबाइल ऐप में रेफरल मामलों के लिए भी विशेष फीचर है, जो बहुत कारगर है। मसलन, अगर एक गर्भवती महिला को पीएचसी लाया गया है, लेकिन मामला संगीन है और उसे दरभंगा मेडिकल कॉलेज व अस्पताल में रेफर किया जाना है, तो मोबाइल ऐप में महिला की बीमारी का ज़िक्र करते हुए रेफर का विकल्प डाल दिया जाता है। ये अलर्ट दरभंगा मेडिकल कॉलेज व अस्पताल के अधीक्षक व अन्य अधिकारियों के मोबाइल पर पहुंच जाता है, डॉ श्रद्धा ने बताया।

"मान लीजिये कि किसी महिला को ख़ून की ज़रूरत है, तो इसका ज़िक्र वंडर ऐप में कर दिया जाता है। अस्पताल के अधीक्षक व अन्य अधिकारियों के पास ये अलर्ट महज़ तीन सेकेंड में पहुंच जाता है कि एक महिला कुछ देर में अस्पताल आ रही है और उसे खून चाहिए, तो वे पहले से ही खून का इंतजाम कर लेते है," उन्होंने बताया।

जून 2019 से 11 फरवरी 2020 तक वंडर ऐप पर 43,450 गर्भवती महिलाओं का रजिस्ट्रेशन किया गया, जिनमें से 18,277 महिलाओं को लेकर स्वास्थ्य अधिकारियों के पास अलर्ट आया। इनमें 91% यानी 13,678 येलो अलर्ट और 1,420 (9%) रेड अलर्ट थे। ऐप के जरिये 85 महिलाओं को बेहतर इलाज के लिए रेफर किया गया, दरभंगा डीएम कार्यालय से मिले आंकड़ों के अनुसार।

दरभंगा ज़िले में वंडर ऐप से गर्भवती महिलाओं को ट्रैक करने और समुचित इलाज में मिल रही मदद को देखते हुए बिहार सरकार इस ऐप को अब बिहार के अन्य जिलों में भी लागू करने की तैयारी कर रही है।

"ये ऐप निश्चित तौर पर मातृत्व मृत्यु दर कम करने में मदद करेगा। राज्य स्वास्थ्य प्रशासन की कोशिश रहेगी कि इस ऐप को पूरे राज्य में लागू किया जाए, जिससे दरभंगा की तरह पूरे राज्य में मातृत्व मृत्यु दर में कमी आए," 3 दिसंबर को दरभंगा में ऐप से मिल रही सहूलियतों को लेकर एक पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन देखने के बाद राज्य के स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव प्रत्यय अमृत ने कहा था।

वंडर ऐप से मिल रहे फायदे को लेकर बैठक में शामिल डीएम त्यागराजन एस एम (कत्थई जैकेट में)। उनकी पहल पर ही पिछले साल दरभंगा में इस ऐप को लांच किया गया था, जिसे पूरे बिहार में शुरू करने की तैयारी है।

लॉकडाउन में बंद रही सेवा

कोविड-19 को लेकर मार्च से लगे लॉकडाउन के कारण इस ऐप में एंट्री भी प्रभावित हुई थी। लॉकडाउन के कारण ऐप पूरी तरह संचालित नहीं हो पा रहा था। इससे बहुत सारी महिलाओं को ऐप का लाभ नहीं मिल सका।

दरभंगा ज़िले के केवटी ब्लॉक के असराहा गांव की रहने वाली रुखसाना परवीन लॉकडाउन के दौरान गर्भवती थीं। जुलाई में जब बाढ़ आई हुई थी, तो उसी दौरान उनके पेट में दर्द होने लगा। लेकिन, उन्हें ऐप से कोई मदद नहीं मिली। मजबूरन स्थानीय लोगों ने केले के पत्तों की नाव बनाई और उसे अस्पताल पहुंचाया।

"हमें नहीं पता कि कोई ऐप भी है। जब बेटी को दर्द हुआ, तो हम लोग स्थानीय अस्पताल ले गये, जहां उसे दवा दी गई। तीन महीने पहले ही उसने बच्चा जना है, लेकिन डिलीवरी भी घर में ही करवानी पड़ी," रुखसाना की मां कनीज़ा ख़ातून ने इंडियास्पेंड से कहा।

लॉकडाउन में ऐप का काम बंद होने की बात डॉ श्रद्धा ने भी स्वीकार की। "कोविड-19 के वक्त ऐप सेवा बंद थी, लेकिन हम लोगों ने मोबाइल फ़ोन के जरिये गर्भवती महिलाओं का हालचाल जाना। अब ऐप सेवा दोबारा शुरू हो गई है," उन्होंने कहा।

अन्य राज्यों में भी गर्भवती महिलाओं की ट्रैकिंग

ओडिशा के संबलपुर जिले में वंडर ऐप तो नहीं लेकिन, ऐसा ही एक मोबाइल ऐप हाई रिस्क मदर ट्रैकिंग इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे मातृत्व व शिशु मृत्यु दर में काफी गिरावट आई है।

संबलपुर में ये मोबाइल ऐप 2017 में लांच किया गया था। साल 2018-2019 में 19,262 गर्भवती महिलाओं की डिलीवरी हुई, जिनमें से 284 नवजात शिशुओं की मौत हो गई। साल 2017-2018 में ये आंकड़ा 356 था। साल 2018-2019 में 18 गर्भवती महिलाओं की मौत हुई जबकि वित्त वर्ष 2017-2018 में 46 महिलाओं की जान चली गई थी," द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की इस रिपोर्ट में ज़िले के अतिरिक्त ज़िला मेडिकल ऑफिसर (फैमिली वेलफेयर) डॉ कुबेर चंद्र मोहंता ने बताया।

हरियाणा में गर्भवती महिलाओं को ट्रैक करने के लिए राज्य सरकार सरकार ने 2017 में एक पोर्टल शुरू किया था। इस पोर्टल के ज़रिए ये सुनिश्चित किया जाता है कि गर्भवती महिला को प्रसव पूर्व सभी चेक अप, सप्लीमेंट्स मिलें और ज़रूरत पड़ने पर सामुदायिक या ज़िला चिकित्सा केंद्र में विशेषज्ञों की सुविधा आसानी से मिल सके, नवंबर 2019 की इंडियास्पेंड की इस रिपोर्ट के अनुसार।

जानकारों का कहना है कि ऐप कुछ हद तक मददगार हो सकता है, लेकिन ये हर समस्या का इकलौता समाधान नहीं हो सकता है। "ऐप से निश्चित तौर पर मातृत्व मृत्यु दर में कमी लाने में मदद मिलेगी, लेकिन इसके साथ ही बुनियादी ढांचों को विकसित करना भी ज़रूरी है। अगर ऐप में ये पता भी चल गया कि किसी गर्भवती महिला को क्या इलाज चाहिए, तो इलाज तब ही संभव हो पायेगा, जब प्राइमरी हेल्थ सेंटर या कम्युनिटी हेल्थ सेंटर में इलाज की व्यवस्था होगी," जन स्वास्थ्य अभियान से जुड़े डॉ शकील ने इंडियास्पेंड से कहा।