नई दिल्ली: 38 वर्षीय रामकुमार अपना घर चलाने के लिए हर दिन लगभग 12 घंटे दिल्ली के सदर बाजार बाजार में रिक्शॉ चलाते हैं। हालांकि रात होने पर उनके पास सोने के लिए कोई घर नहीं होता है। उनकी कम कमाई और महंगाई के कारण वह एक कमरा भी किराए पर लेने में सक्षम नहीं हैं।

गर्मियों के दौरान कंक्रीट का फुटपाथ देर रात तक गर्म रहता है और उन पर सोना असहनीय हो जाता है। रामकुमार अपनी रिक्शे की सीट पर रात बिताते हैं। वह कहते हैं, ''गर्मी के कारण मैं पूरी रात अपने रिक्शे पर जागता रहता हूं। भोर में जब कुछ ठंडक होती है, तभी मुझे नींद आ पाती है।"

रामकुमार का अनुभव शहरी गरीबी में रहने वाली आबादी के एक महत्वपूर्ण हिस्से के दैनिक संघर्ष को दर्शाता है। जलवायु परिवर्तन के कारण दिल्ली का बढ़ता तापमान अब एक आम बात हो गई है। अप्रैल से जुलाई तक का महीना भीषण गर्मी लेकर आता है। 2022 में भारत में 203 हीटवेव दिन दर्ज किए गए, जो हाल के इतिहास में सबसे अधिक है। इसमें से लगभग 17 हीटवेव वाले दिन दिल्ली में दर्ज किए गए। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा मार्च 2022 को भारत में अब तक का सबसे गर्म महीना दर्ज किया गया, जबकि दिल्ली में उस वर्ष 72 वर्षों में दूसरा सबसे गर्म अप्रैल रहा।

आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए आवास तक ना पहुंच होना जलवायु परिवर्तन के कठोर प्रभावों को बढ़ाता है। इससे वंचित समुदाय के बेघर लोगों की बढ़ते तापमान के अनुकूल ढलने की क्षमता में बाधा भी पहुंचती है। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की 2021 की रिपोर्ट के अनुसार भारत जलवायु संकट के परिणामों के प्रति सबसे संवेदनशील देशों में से एक है। अनुमानों से संकेत मिलता है कि भविष्य में भारत में लंबे समय तक और अधिक तीव्रता वाली हीटवेव्स देखने को मिलेंगी, जिससे गरीबी में रहने वाले लोगों के लिए जोखिम और भी बढ़ जाएगा।

स्वतंत्र विशेषज्ञों के अनुमानों के अनुसार दिल्ली में कम से कम 200,000-250,000 व्यक्ति बेघर हैं, जिनमें महिलाएं, बच्चे, ट्रांसजेंडर, वृद्ध, विकलांग और अन्य वंचित समूह शामिल हैं। दिल्ली में बेघरों के मामले को संबोधित करने वाली प्रमुख एजेंसी दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (डीयूएसआईबी), 195 आश्रयों का एक नेटवर्क संचालित करती है, जिसमें मौजूदा सरकारी भवनों में 82 स्थायी संरचनाएं (आरसीसी भवन), टिन शीट से बने 103 पोर्टा केबिन और 'विशेष अभियान' के तहत बने 10 नवनिर्मित शेल्टर होम शामिल हैं। इन प्रयासों के बावजूद इन 195 आश्रयों की कुल क्षमता लगभग 16,675 बिस्तरों की है, जो शहर में बेघर व्यक्तियों की अनुमानित आबादी से लगभग 92% कम है।

बेघर लोगों को सरकारी आवास योजनाओं (उदाहरण के लिए प्रधान मंत्री आवास योजना) का लाभ भी बहुत ही कठिनाई से मिल पाता है, क्योंकि वे योजनाओं में निर्धारित पात्रता आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ होते हैं। पहचान दस्तावेज (जैसे-आधार आदि) और स्थायी पते की कमी के कारण ये लोग व्यवस्थित रूप से योजना से बाहर हो जाते हैं। इसके अलावा इन योजनाओं में बेघर लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं है। इस कारण एक बड़ी आबादी के पास सड़कों पर रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है।

बेघर व्यक्तियों की मौत का कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं होता है, लेकिन विशेषज्ञों का अनुमान है कि लगभग 60% 'अज्ञात शव' बेघर व्यक्तियों के ही होते हैं। दिल्ली में इनमें से अधिकांश मौतें (4,424 मौतें) पिछले पांच वर्षों में गर्मी के महीनों के दौरान हुईं।
क्षेत्रीय एकीकृत पुलिस नेटवर्क डेटा पर आधारित हाउसिंग एंड लैंड राइट्स नेटवर्क का विश्लेषण

क्षेत्रीय एकीकृत पुलिस नेटवर्क डेटा पर आधारित हाउसिंग एंड लैंड राइट्स नेटवर्क का विश्लेषण

इस क्षेत्र में 25 वर्षों से काम कर रहे एक गैर-लाभकारी संगठन हाउसिंग एंड लैंड राइट्स नेटवर्क (एचएलआरएन) ने मई और जून 2023 के बीच दिल्ली के बेघर लोगों पर बढ़ते तापमान के प्रभाव का दस्तावेजीकरण करने के लिए एक त्वरित-मूल्यांकन अध्ययन किया ताकि जलवायु परिवर्तन के बारे में उनकी जागरूकता और अनुकूलनशीलता को समझा जा सके।

कुल मिलाकर दिल्ली के 102 बेघर व्यक्तियों ने इस अध्ययन में भाग लिया, जिसमें महिलाएं, वृद्ध, विकलांग और अन्य वंचित समूहों का विविध प्रतिनिधित्व था। इस अध्ययन में लगभग 40% महिलाओं और 60% पुरुषों ने भाग लिया, जिनकी आयु 16 से 70 वर्ष के बीच थी। इस अध्ययन में बेघर लोगों की संख्या भी विविध थी। अध्ययन के दौरान 5.9% स्थायी आश्रयों में, 17.6% पोर्टा केबिन में, 8.8% तिरपाल झोपड़ियों में और 67.7% सड़कों पर रह रहे थे।

इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन सेटलमेंट्स की वरिष्ठ शोधकर्ता और इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की प्रमुख लेखिका चांदनी सिंह कहती हैं, "हम जानते हैं कि किसी शहर में हीटवेव्स हर किसी को समान रूप से प्रभावित नहीं करती हैं। गरीबी, अनिश्चित आजीविका, लैंगिक विविधता और उम्र से संबंधित कमजोरियों के कारण सब पर इसका प्रभाव भी अलग-अलग होता है।”

जलवायु परिवर्तन की अवधारणा

मूलचंद (50 वर्ष) जमुना बाजार में हनुमान मंदिर के पास एक शेल्टर होम में रहते हैं। वह बदलते समय को दर्शाते हुए कहते हैं, "दस साल पहले हम कूलर, पंखे और पेड़ों की सहायता से गर्मियों को सहन कर सकते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं रह गया है। "

एचएलआरएन की रिपोर्ट के अनुसार 91.2% उत्तरदाताओं ने गर्मी में बढ़ोतरी की बात कही, जिसमें से 80% ने कहा कि पिछले दशक से इस दशक में बढ़ते तापमान के कारण चुनौतियां भी बहुत बढ़ी हैं।

अध्ययन में भाग लेने वालों ने तापमान में वृद्धि के कई कारणों पर प्रकाश डाला है। शहरी विकास के प्रभाव की ओर इशारा करते हुए निज़ामुद्दीन और खान मार्केट में कचरा बीनने वाले मिंटू कहते हैं कि बड़ी इमारतों और बस यातायात के कारण भी गर्मी का प्रभाव बढ़ रहा है। मिंटू निज़ामुद्दीन के पास ही एक पार्क में रहते हैं।

सर्वेक्षण में शामिल पांच में से दो बेघर लोगों ने वाहनों की बढ़ती संख्या को गर्मी बढ़ने का प्रमुख कारण बताया है। यह आईपीसीसी के पांचवें मूल्यांकन के निष्कर्षों के अनुरूप है, जो बढ़ते तापमान पर वाहनों द्वारा मानवजनित ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (14.3%) के प्रभाव को रेखांकित करता है। 'जलवायु परिवर्तन' शब्द से परिचित न होने के बावजूद अत्यधिक गर्मी के कारकों के बारे में बेघर व्यक्तियों की बातें और टिप्पणियां वैश्विक रुझानों के साथ निकटता से मेल खाती हैं।

बढ़ते वायु प्रदूषण, तेजी से औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, वनों की कटाई और समृद्ध लोगों के बीच विशिष्ट खपत जैसे कारकों को भी बढ़ते तापमान में योगदान का कारक माना जाता है। पोर्टेबल केबिन के 42 वर्षीय निवासी सुनील कहते हैं, "ऊंची इमारतों के निर्माण के कारण गर्मी रोजाना तेज हो जाती है और रात में केवल 2.00 बजे के बाद ही थोड़ी ठंडक मिलती है। सच तो यह है कि दिल्ली में बारिश का पानी सोखने के लिए पर्याप्त खुली ज़मीन नहीं है, जिससे समस्या और भी बदतर हो जाती है।”

बेघर लोगों पर भीषण गर्मी का असर

जबकि अत्यधिक गर्मी का प्रभाव मानव शरीर पर स्पष्ट है, बेघर व्यक्तियों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव और भी अधिक स्पष्ट है। एचएलआरएन द्वारा की गए अनुसंधान से पता चला है कि सड़कों पर रहने वाले लगभग सभी लोगों (99% व्यक्तियों) ने नींद न आने की समस्या का अनुभव किया।

अत्यधिक गर्मी के कारण बेघर आबादी पर हीटस्ट्रोक, कमजोरी, वेक्टर जनित बीमारियां, आंखों से संबंधित समस्याएं, दस्त, त्वचा संबंधी समस्याएं (जैसे चकत्ते और जलन), बेचैनी, सांस लेने में कठिनाई, मतली, चक्कर आना, उल्टी आदि जैसी बीमारियों में वृद्धि होती है। पर्याप्त नींद की कमी ऐसी समस्याओं को और बढ़ाते हैं, साथ ही भोजन के खराब होने और संदूषण से स्वास्थ्य जोखिम भी बढ़ जाते हैं। इसके अलावा 45.1% व्यक्तियों ने अत्यधिक गर्मी के प्रतिकूल प्रभावों के कारण अपनी मौजूदा स्वास्थ्य स्थितियों में गिरावट की सूचना दी।

बुनियादी ढांचे और कूलिंग मैकेनिज्म की अपर्याप्तता बेघर व्यक्तियों पर गर्मी के प्रभाव को और बढ़ा देती है। दरियागंज में रहने वाली 28 वर्षीय नज़मा ने कहा, "शाम तक तिरपाल की चादर गर्म हो जाती है और फट जाती है। यहां तक कि रोटी बनाने जैसा आसान काम भी तेज गर्मी के कारण चुनौतीपूर्ण हो जाता है।"

गर्मी में शेल्टर होम भी बेअसर साबित होते हैं। जमुना बाजार शेल्टर होम के मूलचंद कहते हैं, "शेल्टर होम में लगे पंखे गर्म हवा फेंकते हैं और अंदर की गर्मी के कारण रात भर नींद नहीं आती।"

पोर्टा केबिन भी मोटी टिन की चादरों से बने होते हैं, जो शेल्टर होम को और भी गर्म कर देते हैं। दिल्ली के मयूर विहार के एक पोर्टा केबिन में रहने वाले 50 वर्षीय व्यक्ति ने कहा, “जैसे-जैसे दिन चढ़ता है, पोर्टा केबिन बहुत गर्म हो जाता है और अंदर रहना संभव नहीं होता है। हमें दिन में पास के पार्क में पेड़ के नीचे बैठना पड़ता है।”

हानि और क्षति अक्सर जलवायु परिवर्तन के अपरिहार्य या अप्रत्याशित प्रतिकूल प्रभावों से जुड़ी होती है और इनकी चर्चा आमतौर पर आर्थिक नुकसान के संदर्भ में की जाती है। हालांकि बेघर व्यक्तियों के लिए संपत्ति के नुकसान में घर जैसी अचल संपत्ति शामिल नहीं हो सकती है, बल्कि आवश्यक दैनिक वस्तुओं, जैसे भोजन और सब्जियों आदि जैसे खराब होने वाले सामानों को नुकसान हो सकता है।

उदाहरण के लिए 56% लोगों ने भोजन खराब होने को एक समस्या बताया। सराय काले खां शेल्टर होम में रहने वाले 23 वर्षीय बेबी कुमार ने कहा, "गर्मी के कारण सब्जियां खराब हो जाती हैं, टमाटर और प्याज सड़ जाते हैं और सुबह हम जो खाना बनाते हैं, वह शाम तक खराब हो जाता है। यहां तक कि पानी भी गर्म हो जाता है।"

आजीविका और श्रम

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने 2019 में अनुमान लगाया था कि यदि मौजूदा ग्लोबल वार्मिंग प्रवृत्ति जारी रहती है, तो 2030 तक काम के घंटों का नुकसान 2.2% तक बढ़ जाएगा। इससे 80 मिलियन पूर्णकालिक नौकरियों या 2.4 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान होगा। एचएलआरएन के अध्ययन के निष्कर्ष भी इन अनुमानों के अनुरूप हैं क्योंकि ये बेघर व्यक्ति दैनिक मजदूरी, शारीरिक श्रम, रिक्शा चलाना, ट्रैफिक सिग्नल पर सामान बेचना, कचरा उठाना, निर्माण कार्य, स्ट्रीट वेंडिंग और भीख मांगने के काम में लगे रहते हैं।

सुनहरी मस्जिद के पास सड़क पर रहने वाले और रिक्शा चालक के रूप में काम करने वाले 56 वर्षीय शराफत ने कहा, "एक सवारी के बाद दूसरी सवारी की तलाश करना बहुत फ्रस्टेटिंग है। कई बार रिक्शे का पहिया कमजोर और पंक्चर हो जाता है, जिससे अतिरिक्त समस्याएं होती हैं। हम गर्मी में रोटियां पकाते हैं तो और काम करना मुश्किल हो जाता है और गर्मी के कारण हमें मिचली आने लगती है। ऐसे माहौल में लगातार काम करना चुनौतीपूर्ण होता है।"
बुनियादी ढांचे और कूलिंग मैकेनिज्म की अपर्याप्तता बेघर व्यक्तियों पर गर्मी के प्रभाव को बढ़ा देती है। रोटी बनाने जैसा साधारण काम भी भीषण गर्मी के कारण चुनौतीपूर्ण हो जाता है। क्रेडिट: साहिबा चौधरी

बुनियादी ढांचे और कूलिंग मैकेनिज्म की अपर्याप्तता बेघर व्यक्तियों पर गर्मी के प्रभाव को बढ़ा देती है। रोटी बनाने जैसा साधारण काम भी भीषण गर्मी के कारण चुनौतीपूर्ण हो जाता है। क्रेडिट: साहिबा चौधरी

गर्मी के कारण उत्पादकता में कमी बेघरों की सभ्य जीवन जीने की क्षमता को और अधिक बाधित करती है। सर्वे के उत्तरदाता औसतन प्रति माह $100 (8,000 रुपये) से कम कमाते हैं, जिससे अत्यधिक गर्मी के प्रभाव से निपटने की उनकी क्षमता सीमित हो जाती है।

निज़ामुद्दीन की सड़कों पर रहने वाली दिहाड़ी मजदूर 23 वर्षीय अफसाना ने कहा, "जब हम बीमार पड़ते हैं तो इलाज के लिए पैसे नहीं होते हैं या कभी-कभी हम दवा का कोर्स पूरा नहीं कर पाते हैं।"

इंडियास्पेंड ने बेघर आबादी के लिए स्वास्थ्य विभाग द्वारा की गई पहल पर टिप्पणी लेने के लिए दिल्ली में स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय से संपर्क किया है। प्रतिक्रिया मिलने पर हम इस स्टोरी को अपडेट करेंगे।

जलवायु अनुकूलन

बेघर व्यक्तियों के पास पीने योग्य पानी, पौष्टिक भोजन और स्वास्थ्य सुविधाओं जैसे आवश्यक संसाधनों तक पहुंच नहीं है। सर्वेक्षण में शामिल बेघर लोगों में से लगभग 35% ने कहा कि उनके पास पीने के पानी, बिजली, भोजन, शौचालय और अन्य कूलिंग डिवाइस तक पहुंच नहीं है।

व्यक्तियों को गर्मी और जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से बचाने में आवास केंद्रीय भूमिका निभाता है। हालांकि आवास की अनुपलब्धता, पानी, भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा और यहां तक कि आजीविका जैसे आवश्यक संसाधनों तक पहुंच को सीमित करता है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत पर्याप्त आवास के मानवाधिकार को जीवन जीने के अधिकार के अभिन्न अंग के रूप में न्यायपालिका द्वारा भी पुष्टि की गई है। इस प्रकार पर्याप्त आवास तक पहुंच की कमी से एक व्यक्ति के अन्य मानवाधिकार भी प्रभावित होते हैं।

जब अत्यधिक गर्मी और मौसम से सुरक्षा प्रदान करने के लिए रहने के स्थानों की पर्याप्तता के बारे में पूछा गया, तो सर्वे में शामिल किसी भी व्यक्ति ने यह नहीं कहा कि उनके रहने की व्यवस्था पर्याप्त थी। 4% से भी कम उत्तरदाताओं ने उल्लेख किया कि उनके स्थानों पर थोड़ी सुरक्षा प्रदान की गई। यमुना खादर के 45 वर्षीय चंदन ने कहा, "हमारे पास केवल यह झोपड़ी है जो हमें आश्रय दे रही है। इसके अलावा हमारे पास सुरक्षा का कोई अन्य साधन या सुविधाएं नहीं हैं।"

हीट स्ट्रोक रोकने के लिए पीने के पानी तक पहुंच बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन 95.1% लोग गर्मी के दौरान आवश्यक पानी प्राप्त करने में असमर्थ हैं। जिन लोगों से हमने बात की, उन्होंने बताया कि पहले सार्वजनिक नलों से पानी मिलता था, लेकिन अब इसे खरीदना पड़ता है।

स्ट्रोक रोकने के लिए पीने के पानी तक पहुंच बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन 95.1% लोग गर्मी के दौरान आवश्यक पानी प्राप्त करने में असमर्थ हैं. क्रेडिट: साहिबा चौधरी

स्ट्रोक रोकने के लिए पीने के पानी तक पहुंच बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन 95.1% लोग गर्मी के दौरान आवश्यक पानी प्राप्त करने में असमर्थ हैं. क्रेडिट: साहिबा चौधरी

सड़कों पर रहने वाले लोगों के लिए स्थिति की गंभीरता और अधिक स्पष्ट है, लेकिन आश्रयों में भी स्थितियां उतनी बेहतर नहीं हैं। शेल्टर होम और पोर्टा केबिनों में रहने वाले उत्तरदाताओं में से 12% ने पीने के पानी की अनुपलब्धता की सूचना दी और 21% ने बिजली की कमी का उल्लेख किया। इसके अलावा सड़कों पर और आश्रयों में रहने वाले 74.3% लोगों ने पंखे या कूलर जैसे उपकरणों की कमी की ओर संकेत दिए।

इसके अलावा सड़कों पर रहने वाले 85% उत्तरदाताओं ने सार्वजनिक शौचालय सुविधाओं तक पहुंच के अभाव पर जोर दिया, जिससे कभी-कभी उन्हें खुले में शौच करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

78% उत्तरदाताओं ने स्वास्थ्य देखभाल और दवाओं तक पहुंच न होने का उल्लेख किया। लगभग 74% उत्तरदाताओं ने पार्कों और खुली जगहों तक पहुंच न होने की भी जानकारी दी।

सुझाव और सिफारिशें

दिल्ली सरकार सर्दियों के महीनों के दौरान बेघर लोगों के लिए विशेष कदम उठाती है, लेकिन गर्मी या मानसून के मौसम में उनके पास बेघर व्यक्तियों के लिए कोई महत्वपूर्ण योजना नहीं है। इसके कारण बेघर लोगों को कठोर मौसम के दौरान खुद की सुरक्षा करनी पड़ती है और अत्यधिक तापमान, गर्मी की लहरों, संक्रामक रोगों और पर्याप्त व सस्ती स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच की कमी से जूझना पड़ता है।

2023 में दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने एक हीट एक्शन प्लान लॉन्च किया, लेकिन वह भी बेघर व्यक्तियों की विशिष्ट आवश्यकताओं को संबोधित या समायोजित नहीं करता है।

हालांकि होम शेल्टर पूरी तरह से पर्याप्त नहीं हो सकते हैं, फिर भी वे आश्रय और सुरक्षा की भावना देते हैं। उदाहरण के लिए, इनमें से अधिकांश शेल्टर होम भोजन, पीने के पानी और पंखे जैसी सेवाओं तक बेहतर पहुंच प्रदान करते हैं। DUSIB द्वारा अस्थायी तंबू लगाकर सर्दियों के दौरान बेघरों की सुरक्षा के लिए किए गए ठोस प्रयासों के बावजूद एक गंभीर अंतर उभर कर सामने आता है क्योंकि ये लगाए गए तंबू मार्च के अंत तक हटा दिए जाते हैं, जिससे वर्ष के शेष समय में लोग फिर से बेघर हो जाते हैं और पानी, भोजन व अन्य स्वच्छता सुविधाओं जैसी आवश्यक सेवाओं से वंचित हो जाते हैं।

ऐसे समय में जब आश्रयों की कमी एक गंभीर मुद्दा है, मार्च 2023 में DUSIB ने शहर के विभिन्न हिस्सों में आठ शेल्टर होम को ध्वस्त कर दिए, जिससे कई लोग बेघर हो गए। झुग्गियों और घरों को बेदखल करने और जबरन ध्वस्त करने से समस्या और भी बढ़ जाती है।

एचएलएन द्वारा जारी ग्रीष्मकालीन कार्य योजना मौजूदा होम शेल्टर में उन्नत सुविधाओं और सेवाओं की आवश्यकता पर प्रकाश डालती है। इसमें सभी आश्रय स्थलों पर पीने के लिए पीने योग्य पानी के साथ-साथ नहाने, कपड़े धोने और अन्य व्यक्तिगत जरूरतों को पूरा करने के लिए साफ पानी की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करना शामिल है। इसके अलावा यह योजना सभी आश्रयों में एयर कूलर और पंखे की भी वकालत करती है। इसके अलावा टिन से बने शेल्टर में वेंटिलेशन में सुधार पर विशेष ध्यान देने का आग्रह किया जाता है। वहीं सभी शेल्टर होम में नियमित कीट और वेक्टर-नियंत्रण उपायों के कार्यान्वयन पर भी जोर दिया जाता है।

हालांकि ये अल्पकालिक उपाय कुछ हद तक ही गर्म मौसम के कठोर प्रभावों को कम कर सकते हैं। बेघरों पर केवल एक व्यापक राष्ट्रीय नीति ही उन्हें जलवायु परिवर्तन के वास्तविक खतरों से बचा सकती है।

साउथ एशियन पीपल्स एक्शन ऑन क्लाइमेट क्राइसिस (एसएपीएसीसी) की सह-संयोजक सौम्या दत्ता ने कहा, "जलवायु परिवर्तन का सबसे बुरा प्रभाव झोपड़ियों, झुग्गियों या बेघर लोगों पर पड़ता है। उनके जीवन के अनुभवों से सीखने और उन्हें जलवायु परिवर्तन के लिए राज्य कार्य योजनाओं में शामिल करने की बात तो दूर अभी तो इन लोगों के मुश्किलों की पहचान ही सही से नहीं की जाती है।”

इंडियास्पेंड ने डीयूएसआईबी को पत्र लिखकर मौजूदा उपायों और भविष्य की योजनाओं के बारे में अतिरिक्त विवरण मांगा है। प्रतिक्रिया मिलने पर हम इस स्टोरी को अपडेट करेंगे।