रायबरेली/उन्‍नाव: उत्तर प्रदेश में मॉनसून पहुंच गया है और इसके साथ ही गंगा किनारे रहने वाले लोगों के मन में डर भी बैठ गया है। इस साल यह डर बाढ़ को लेकर नहीं है, बल्कि गंगा किनारे 2 से 3 फीट के गड्ढों में दफनाई गई लाशों को लेकर है। प्रयागराज के कुछ घाटों पर दफनाए गए शव बारिश के बाद पानी में दिखाई दिए जिसे प्रशासन ने बाहर निकलवाकर उनका अंतिम संस्कार करवाया।

लोगों को डर है कि गंगा में पानी बढ़ते ही यह लाशें पानी में तैरने लगेंगी और किनारे उनके घरों के पास लग जाएंगी।


रायबरेली जिले के गेगासो घाट के किनारे प‍िछले पांच साल से चाय की दुकान लगाने वाली लक्ष्‍मी को भी यही चिंता सता रही है। लक्ष्‍मी कहती हैं, "हमने इतनी लाशें कभी नहीं देखीं। घाट पर जहां देखो वहां लाश गड़ी है। अब गंगा जी में पानी बढ़ने लगा है, जैसे ही पानी घाट की ओर बढ़ेगा बालू में गड़ी लाशें ऊपर आ जाएंगी। इस बारे में कोई बात ही नहीं कर रहा, कोई अध‍िकारी देखने तक नहीं आया है।"

रायबरेली के गेगासो घाट के किनारे चाय की दुकान चलाने वाली लक्ष्‍मी। फोटो: रणव‍िजय स‍िंह

यह हाल सिर्फ रायबरेली के गेगासो घाट का नहीं है। इंड‍ियास्‍पेंड की टीम जब उत्तर प्रदेश के उन्‍नाव, रायबरेली और प्रयागराज जिले के गंगा घाटों पर गई तो बालू में दफनाई गई सैकड़ों लाशें देखने को मिली। इन लाशों पर रामनामी चादरें पड़ी थीं। आधी गड़ी इन लाशों को देख कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि गंगा का पानी जैसे ही इन लाशों तक पहुंचेगा यह तैरने लगेंगी। गंगा किनारे रहने वाले लोगों को भी यही डर सता रहा है।

उन्नाव जिले के कोलुहागाड़ा गाँव के गंगा घाट पर भी हालात ऐसे ही हैं। घाट के किनारे रहने वाले संदीप का कहना है कि मॉनसून के पहले की दो दिन की बारिश में भी इस घाट पर दफनाए गए कुछ शव खुल गए थे जिन्हे बाद में फिर से दफनाना पड़ा।

इस ही गाँव के रहने वाले सन्तु पाल इन शवों के नदी के किनारे पर लग जाने के सवाल पर कहते हैं, "जब गंगा जी बढ़ेंगी तो यहां पर जो दफनाई गयी लाशें हैं वो पता ही नहीं कहाँ जाएँगी।"


मॉनसून का जल्दी आना और ज़्यादा बारिश

उत्‍तर प्रदेश में इस साल पिछले एक दशक के मुकाबले मॉनसून करीब सात दिन पहले आ चुका है। 13 जून को मॉनसून ने यूपी में दस्‍तक दी और पूर्वांचल और मध्‍य के ज्‍यादातर क्षेत्रों में बारिश शुरू हो गई है। इस बार बारिश सामान्‍य से ज्‍यादा रिकॉर्ड की जा रही है।

उत्तर प्रदेश के राहत आयुक्‍त रणवीर प्रसाद के मुताबिक, "19 जून तक उत्तर प्रदेश में कुल 111.7 मिलीमीटर बारिश हुई जो सामान्‍यत: 40.5 मिलीमीटर के मुकाबले 176% ज्‍यादा है।" वहीं, अकेले 20 जून को सामान्‍य से 399% ज्‍यादा बारिश हुई। भारी बारिश के इस पैटर्न का मतलब है कि नदियों का जलस्‍तर भी बढ़ेगा और गंगा में भी पानी चढ़ना शुरू होगा। ऐसे में आने वाले कुछ दिनों में पानी किनारे गड़ी लाशों तक पहुंच सकता है।

कोरोना की दूसरी लहर के दौरान जहां मामले तेजी से बढ़े वहीं अंतिम संस्‍कार के लिए लोगों को जद्दोजहद करते भी देखा गया। इसी दौरान गंगा घाटों से ऐसी तस्वीरें आने लगी जिसमें किनारों पर रामनामी चादरों में लिपटी लाशें दफनाई गई थीं। इस बारे में गेगासो घाट के पास ही रहने वाले रायबरेली के पत्रकार अमरेश पटेल बताते हैं, "कोरोना की दूसरी लहर के बीच मैं गेगासो घाट पर सात दिन रहा था। उस वक्‍त लकड़‍ियां महंगी हो गई थीं, लोगों के पास पैसे नहीं थे कि अंतिम संस्‍कार कर सकें। ऐसे में एक हजार, पंद्रह सौ रुपये में लाशों को गंगा किनारे गड़वा रहे थे।"

अमरेश के मुताबिक, गंगा किनारे लाशों को पहले भी दफनाया जाता रहा है। यह कुछ चुनिंदा लाशें होती थीं जैसे बच्‍चों या अविवाहित लोगों की और गेगासो घाट पर इनकी संख्‍या साल में 5-10 होती थी। हालांकि इस बार कोरोना की दूसरी लहर में जितनी भारी संख्‍या में लाशें देखने को मिलीं ऐसा उन्‍होंने अपने जीवन में नहीं देखा। यह लाशें कोरोना की थी यह तय नहीं, लेकिन यह कोरोना की दूसरी लहर के दौरान दफनाई गईं।

कोरोना की दूसरी लहर के दौरान अंतिम संस्‍कार कितनी बड़ी चुनौती थी इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि श्‍मशान घाटों के बाहर लाइन लग रही थी। अंतिम संस्‍कार में हो रही दिक्‍कतों पर जब खबरें होने लगी तब उत्तर प्रदेश सरकार का ध्‍यान इस ओर गया। सरकार ने निर्देश जारी किए कि गांव में कोरोना से मौत होने पर अंतेष्टि के लिए परिवार को 5 हजार रुपए नकद दिए जाएंगे। वहीं, शहरी इलाके में निकाय अपने खर्च पर अंतिम संस्‍कार करेगा।


रायबरेली के गेगासो घाट पर प्रशासन ने कोरोना की दूसरी लहर के दौरान यह बोर्ड लगवाया। फोटो: रणव‍िजय स‍िंह

इसके अलावा स्‍थानीय प्रशासन ने घाटों पर बोर्ड भी लगवाए कि अगर किसी के पास अंतिम संस्‍कार के लिए पर्याप्‍त संसाधन नहीं हैं तो अध‍िकारियों से संपर्क करके अंतिम संस्‍कार कर सकते हैं। हालांकि इसके बावजूद गंगा के घाटों पर लाशें देखने को मिलीं, बहुत सी जगहों पर गंगा में लाशें तैरती भी द‍िखाई दीं।

गंगा में संक्रमण और अन्य बिमारियों का खतरा

गंगा में पानी चढ़ने के साथ किनारे दफनाई गई लाशों के ऊपर आ जाने के खतरे पर हेल्‍थ एक्‍सपर्ट भी चिंता जाहिर करते हैं। लखनऊ के लोकबंधु अस्‍पताल के कोव‍िड नोडल अध‍िकारी डॉ. रूपेंद्र कुमार कहते हैं, "अगर ऐसा होता है कि आधी डीकंपोज लाशें पानी में तैरने लगें तो यह बहुत खतरनाक स्‍थ‍िति होगी। गंगा किनारे जहां भी लाशें देखने को मिली हैं उसका करीब दो किलोमीटर का इलाका कंटेमिनेटेड होगा। यह लाशें अगर उतराने लगती हैं तो इससे कंटेमिनेशन का खतरा बढ़ेगा और आस पास के इलाकों में कई अन्‍य बीमारियां फैल सकती हैं।"

गंगा किनारे दफनाई गई लाशों का असर आस-पास के लोगों के साथ खुद गंगा पर भी पड़ेगा। नदी विशेषज्ञ प्रोफेसर वेंकटेश दत्‍ता का मानना है कि इससे नदी में कॉलिफोर्म बढ़ेगा। वह यह भी कहते हैं कि मॉनसून में गंगा नदी का बहाव इतना ज्‍यादा होता है कि लाशें बहकर बंगाल की खाड़ी में चली जाएंगी।

चूंकि ये शव सिर्फ दो या तीन फ़ीट के गड्ढों में ही दफनाए गए हैं ऐसे में गंगा के जल स्तर के बढ़ने के साथ ही इन शवों के बाहर आने की सम्भावना काफी ज़्यादा है। शवों को कोलुहागाड़ा घाट पर इतनी कम गहराई में गाड़ने का कारण बताते हुए संदीप कहते हैं, "यहां पर बीच में जब गंगाजी ऊपर आयी थीं तो उसके बाद गड्ढा करने पर उसमे पानी आ जा रहा था तो लोगों को लाशें आगे जाकर गाड़ने को बोला गया। कुछ लोगों ने ऐसे ही छोटे गढ्ढों में गाड़ दिया।"

कोलुहागाड़ा घाट पर संदीप का घर। फोटो: शैलेष श्रीवास्तव

प्रो. दत्‍ता कहते हैं, "गंगा किनारे जो लाशें दफनाई गई हैं वो गंगा का बाढ़ क्षेत्र है। यह ऐसी जगह है जहां गहरे गड्ढे करने पर पानी आ जाएगा। यही वजह है कि लाशों को गहरे गड्ढे करके नहीं दफनाया गया है। मेरे मुताबिक, जब हम मिट्टी की जगह रेत में बॉडी को दफनाते हैं तो उसका बैक्‍टीरियल डीकंपोजिशन धीरे होता है। ऐसे में आधी डीकंपोज लाशें बाढ़ के साथ ऊपर आ सकती हैं। इससे नदी का कॉल‍िफोर्म लेवल बढ़ेगा। हालांकि बरसात में नदियां खुद को स्‍वच्‍छ करती हैं, मॉनसून में गंगा का फ्लश‍िंग फ्लो इतना ज्‍यादा होगा कि लाशें बहकर बंगाल की खाड़ी में चली जाएंगी।"

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