कितने सफ़ल हैं दिल्ली सरकार के मोहल्ला क्लीनिक

नई दिल्ली: दक्षिण दिल्ली के पंचशील विहार इलाक़े में रहने वाले 64 साल के चमन का कहना है कि अगर मोहल्ला क्लीनिक नहीं होता तो वह समय और ख़र्च के डर से शायद कभी अस्पताल नहीं जाते और उन्हें पता भी नहीं चलता कि इन्हें दिल की बीमारी है।

“मैं मोहल्ला क्लीनिक गया वहां डॉक्टर ने मुझे एंजियोग्राफ़ी के लिए बोला, फिर मेरी सफ़दरजंग अस्पताल में जांच हुई तो मुझे पता चला कि मेरे हार्ट में कोई दिक्कत है, आज ज़िंदा बैठा हूं, मोहल्ला क्लीनिक जाने से मुझे आगे के लिए रास्ता मिला, मार्गदर्शन मिला,” चमन ने बताया, जिनकी पंचशील विहार में बिजली की दुकान है और इनकी दुकान से 500 मीटर दूर ही एक मोहल्ला क्लीनिक खुला है। 

“जो ग़रीब हैं, इलाज नहीं करा पाते थे, बिना जांच के बीमरिया बढ़ जाती थी, कोई देखने वाला नहीं था, कोई सुविधा नहीं थी, कोई समझाने वाले नहीं, अब यह मोहल्ला क्लीनिक इतना अच्छा खोला है केजरीवाल जी ने कि अब हर आदमी अपनी प्रॉब्लम ले कर डॉक्टर के पास जाता है,” चमन ने बताया। पश्चिम विहार के मोहल्ला क्लीनिक में रोज़ाना औसतन 130 मरीज़ आसपास के इलाक़ों से आते हैं। 

चमन दिल्ली के उन लाखों लोगों में से हैं जो मोहल्ला क्लीनिक के लाभार्थी हैं। दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार ने जुलाई 2015 में आम आदमी मोहल्ला क्लीनिक योजना की शुरुआत की और पहला क्लीनिक पश्चिमी दिल्ली के पीरागढ़ी इलाक़े में खोला गया। मक़सद था स्वास्थ्य व्यवस्था और मुफ़्त जांच और दवाएं दिल्ली के हर घर तक पहुंचाने का। हालांकि सरकार अपने 1000 मोहल्ला क्लीनिक के लक्ष्य से अभी काफ़ी पीछे है और यहां पर अभी भी कई ज़रूरी सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं।

90 साल के धर्मनाथ, दक्षिण दिल्ली के पंचशील विहार के डीडीए फ़्लैट में अपने बेटे के साथ रहते हैं, यह मोहल्ला क्लीनिक से खांसी की दवा लेने आए है, “यहां अकेले आ जाता हूं, पास में है, पहले डिस्पेन्सरी या अस्पताल जाना पड़ता था, वहां जाने के लिए बेटे का इंतज़ार करना पड़ता था”

समय और पैसे की बचत 

दिल्ली के अलग-अलग इलाक़ों में फ़िलहाल ऐसे 450 क्लीनिक मौजूद हैं। यह क्लीनिक सोमवार से शनिवार सुबह 8 बजे से दोपहर दो बजे तक काम करते हैं, कुछ क्लीनिक डबल शिफ़्ट में सुबह सात से एक और दोपहर एक से शाम सात बजे तक भी काम करते हैं और यहां मुफ़्त जांच और दवाइयां दे जाती हैं। हर क्लीनिक में चार कर्मचारी होते हैं, एक डॉक्टर, नर्स, ऑफ़िस सहायक और फ़ार्मासिस्ट। 

42 साल की मीनू, दक्षिण दिल्ली के शेख़ सराय इलाक़े में रहती हैं, यह पिछले दो साल से पंचशील विहार के मोहल्ला क्लीनिक में ही अपना इलाज करवा रही हैं, और हर बीस दिन में क्लीनिक आकर थाइरॉइड और सांस फूलने की दवाई लेती हैं। “मुझे तो रोज़ एक गोली खानी ही होती है, पहले यह बाहर से ख़रीदती थी, अब तो यहीं से मिल जाती है, यह पास में भी है,” मीनू के तीन बच्चे हैं और इनके पति ऑटो चलाते हैं। 

“मुझे बहुत फ़ायदा हुआ है, मैंने अपनी बहनों को भी यहां बुला-बुलाकर उनकी जांच करवाई है, डॉक्टर ने हमारी आयरन, विटामिन डी, कैल्शियम सबकी जांच की है,” मीनू ने बताया।

अस्पताल में आम बीमरियां जैसे बुख़ार, डयरिया, त्वचा, सांस से जुड़ी बीमारियां, चोट और जलने के लिए फ़र्स्ट एड की सुविधा उपलब्ध है। दवाइयों की एक सूची तैयार की गई है जिसमें मौजूद 109 ज़रूरी दवाइयां मुफ़्त दी जाती है। इसके साथ ही एमपैनेल्ड प्रयोगशालाओं में 212 तरह की जांच मुफ़्त की जाती हैं। 

“सरकारी अस्पताल में तो सुबह सात बजे लाइन में लगते हैं तो नम्बर क़रीब दो बजे आता है।यहां डॉक्टर अच्छे हैं, दवाई भी देते हैं और खाने पीने की सलाह दे देते हैं,” पंचशील विहार में रहने वाले रेमी थापा बताते हैं कि जबसे इनके घर के पास मोहल्ला क्लीनिक खुला है, तबसे वह यहीं आते हैं। इसके पहले वह मदन मोहन मालवीय या सफ़दरजंग अस्पताल जाया करते थे।

“डायबिटीज़, थायरॉइड और हायपर्टेन्शन के सबसे ज़्यादा मरीज़ आते हैं, हम इन्हें एक बार में 20 दिन की दवाई देते हैं, हमारे पास स्टॉक भी इतना ही होता है,” दक्षिण दिल्ली के पंचशील विहार के मोहल्ला क्लीनिक की फ़ार्मसिस्ट नेहा बताती हैं।

दवाइयां बढ़ाने की ज़रूरत

“ख़र्च भी बहुत बचता है, ब्लड प्रेशर की गोली यहां से लेता हूं, पर यहां सारी दवाई नहीं मिलती। मेरी रीढ़ की हड्डी में चोट लगी थी, मैं अभी भी दर्द की दवाई लेता हूं, 145 रुपए की 10 गोली पर वो गोली यहां नहीं मिलती,” थापा ने बताया। 

109 मुफ़्त दवाइयों की सूची जो सरकार ने जारी की है, यह थोड़ी सीमित मालूम पड़ती है। कई मरीज़ों की समस्या है कि उन्हें बाज़ार से दवाएं ख़रीदनी पड़ती हैं, कई दवाइयां जो लम्बे समय तक चलने वाली बीमारियों में दी जाती है वो स्टॉक से ख़त्म भी हो जाती हैं। साथ ही डॉक्टरों को ऐसा लगता है कि कई बार वो मरीज़ को कोई बेहतर दवाई इसलिए नहीं दे पाते हैं क्योंकि वो सूची में मौजूद नहीं हैं।

“डायबिटीज़, थायरॉइड और हायपर्टेन्शन के सबसे ज़्यादा मरीज़ आते हैं, हम इन्हें एक बार में 20 दिन की दवाई देते हैं, हमारे पास स्टॉक भी इतना ही होती है,” दक्षिण दिल्ली के पंचशील विहार के मोहल्ला क्लीनिक की फ़ार्मसिस्ट नेहा के बताया। “ख़ांसी, ज़ुकाम जैसी बीमारियों के लिए हम सिर्फ़ तीन दिन की दवा ही देते हैं।”

 

“हमको दवाई इसी लिस्ट में से देनी होती है, अक्सर हमें पता होता है कि मरीज़ को कोई दूसरी दवाई ज़्यादा सूट करेगी पर हम बाहर की कोई दवाई पर्चे में नहीं लिख सकते,” मोहल्ला क्लीनिक की एक डॉक्टर ने बताया जो अपना नाम नहीं बताना चाहती थीं। 

दिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्था 

प्रजा संस्थान के एक शोध के अनुसार, दिल्ली में सबसे ज़्यादा मौतें पानी से होने वाली बीमारियों जैसे डायरिया और टाइफ़ाइड की वजह से होती हैं। साल 2018-19 में दिल्ली में डायरिया के 5,14,052 और टाइफ़ाइड के 51,266 मामले सामने आए।

पब्लिक हेल्थ फ़ाउंडेशन ऑफ़ इंडिया की ग्लोबल बर्डेन ऑफ़ डिज़ीज़ की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में रहने वाले पुरुषों की औसत आयु 70.8 वर्ष और महिलाओं की औसत आयु है 74.7 वर्ष है। औसतन, 41.2% लोगों की मौत 40 से 69 साल की उम्र के बीच और 33.2% लोगों की मौत 70 साल की उम्र के बाद हो जाती है। इस उम्र के लोगों में मौत का सबसे बड़ा कारण है लम्बे समय तक चलने वाली सांस से जुड़ी बीमारियां।

दक्षिण दिल्ली के पंचशील विहार का आम आदमी मोहल्ला क्लीनिक जहां रोज़ाना औसतन 120 से 130 मरीज़ आस पास के इलाक़ों से आते हैं।

कमाई का 10% हिस्सा इलाज पर ख़र्च

दिल्ली में 38 अस्पताल राज्य सरकार के अधीन, 7 अस्पताल एमसीडी के अधीन, 258 डिस्पेंसरी राज्य सरकार के अधीन, 92 डिस्पेन्सरी एमसीडी के अधीन, 4 डिस्पेन्सरी नई दिल्ली म्युनिसिपल काउंसिल के अधीन हैं। इसके अलावा यहां 10 चेस्ट क्लीनिक और 450 मोहल्ला क्लीनिक हैं जिसमें से 152 मोहल्ला क्लीनिक का 4 जनवरी 2020 को दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येन्द्र जैन ने उदघाटन किया। 

पर अब भी शहर के ज़्यादतर लोग प्राइवेट स्वास्थ्य सेवाओं का ही इस्तेमाल करते हैं, और इसपर अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा भी ख़र्च करते हैं। भारत के 70% लोग इलाज के लिए प्राइवेट सुविधाओं पर निर्भर हैं। 

“हमें बुखार, ख़ांसी, ज़ुकाम, बीपी, शुगर सबकी दवा मिल जाती है, पहले प्राइवेट में जाते थे, सरकारी तो दूर था, इस वजह से नहीं जाते थे, प्राइवेट ही जाते थे,” खिड़की गांव में रहने वाली 60 साल की किरण बताती हैं, जिनके घर से चार घर दूर एक मोहल्ला क्लीनिक खुला है। “अब पैसे और टाइम दोनो बचते हैं, हमारे बेटे, बहु, पोते सब यहीं जाते हैं,” किरण ने बताया।

प्रजा संस्थान के एक हंसा रिसर्च के शोध में दिल्ली में, 25,041 घरों का सर्वे किया गया। इस सर्वे में सामने आया कि साल 2019 में 41% लोगों ने प्राइवेट स्वास्थ्य सुविधाओं का इस्तेमाल किया, 47% ने सरकारी सुविधाओं का इस्तेमाल किया और 12% ने प्राइवेट और सरकारी दोनो सुविधाओं का इस्तेमाल किया। 

दिल्ली के लोग अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य सुविधाओं पर ख़र्च करते हैं। इस सर्वे के अनुसार घरेलू आय का लगभग 10% हिस्सा स्वास्थ्य पर ख़र्च होता है यानी सिर्फ़ एक साल (2018-19) में, प्रति घर, स्वास्थ्य पर होेने वाला ख़र्च है 1,16,887 रुपए। 

यह ख़र्च इसलिए भी ज़्यादा है क्योंकि ज़्यादातर लोग इन्श्योरेन्स या बीमा का इस्तेमाल नहीं करते हैं। सर्वे किए गए सिर्फ़ 6% लोगों के पास स्वास्थ्य बीमा था था जिसमें से 69% ने यह बीमा किसी प्राइवेट योजना के तहत लिया था। 14% लोगों को किसी ना किसी सरकारी बीमा योजना के बारे में जानकारी थी। 85% लोग केंद्र की महत्वाकांक्षी, आयुष्मान भारत योजना के बारे में जानते थे, लेकिन इसके बावजूद सिर्फ़ 6% लोगों ने इस योजना के तहत पंजीकरण करवाया। 

दिल्ली की प्रति व्यक्ति आय, देश की प्रति व्यक्ति आय से तीन गुना ज़्यादा है। साल 2018-19 में दिल्ली की प्रति व्यक्ति आय थी 3,65,529 रुपए यानी मासिक लगभग 30,000 रुपए जबकि इसका राष्ट्रीय औसत है 10,000 रुपए। आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना का लाभ सिर्फ़ वो लोग उठा सकते हैं जिनकी आमदनी 10,000 रुपए महीना से कम है। 

इंडियन जर्नल ऑफ़ कम्यूनिटी मेडिसीन में मोहल्ला क्लीनिक पर छपे एक शोध के अनुसार दुनिया भर में प्रति व्यक्ति- प्रति साल ओपीडी विज़िट 3 है, यानी दुनिया भर में लोग एक साल में कम से कम तीन बार अस्पताल जाते हैं जबकि भरत में यह दर एक साल में एक बार है। मोहल्ला क्लीनिक खुलने के बाद से दिल्ली में यह आंकड़ा बढ़कर 5.6 हो गया है। यानी दिल्ली का हर नागरिक साल में औसतन 6 बार अस्पताल जाता है। 

इसी शोध के एक लेखक और वरिष्ठ जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ, चंद्रकांत लहरिया का कहना है कि आबादी में आयी बढ़त के मुक़ाबले में ओपीडी विज़िट्स की संख्या तेज़ी से बढ़ी है। “यह दर्शाता है कि बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की ज़रूरत है, अगर लोगों तक सुविधाएं पहुँचेगी, तो वो उनका लाभ उठाएंगे।”

औरतें, बच्चें और बुज़ुर्ग जो पहले अस्पताल नहीं जाते थे वो अब अस्पताल जाने लगे हैं। “हमने पाया कि ख़ासकर औरतें जो दूरी या पैसे की कमी की वजह से अस्पताल नहीं जाती थी, वो अब अपने आप अस्पताल जाने लगी हैं,” लहरिया ने बताया।

निचली आय की श्रेणी से आने वाले यह लोग सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था का सही लाभ नहीं उठा पाते हैं और अक्सर अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा प्राइवेट अस्पतालों में ख़र्च करते हैं। इन मोहल्ला क्लीनिक में जाने वाले ज़्यादातर लोग इसी आय श्रेणी से आते हैं।

दक्षिण दिल्ली के खिड़की गांव का मोहल्ला क्लीनिक जहां रोज़ाना 60 से 70 मरीज़ आते हैं, यहां की डॉक्टर बताती हैं कि बच्चों में खांसी-ज़ुकाम और 12 साल के ऊपर की उम्र के लोगों में त्वचा संक्रमण के मरीज़ सबसे ज़्यादा आते हैं।

लक्ष्य से काफ़ी पीछे 

मोहल्ला क्लीनिक योजना के विकास की गति धीमी रही है, नए क्लीनिक के उदघाटन के बावजूद भी सरकार अपने लक्ष्य से काफ़ी पीछे है। सरकार का लक्ष्य दिल्ली में हर 5 किलोमीटर पर एक मोहल्ला क्लीनिक खोलने का था यानी कुल 1000 क्लीनिक। योजना के धीमा पड़ना इसके लिए आवंटित बजट में भी नज़र आता है। 

एमसीडी और राज्य का बजट मिलाकर दिल्ली के पास स्वास्थ्य व्यवस्था पर ख़र्च करने के लिए साल 2017-18 में कुल 6,590 करोड़ रुपए उपलब्ध थे और साल 2018-19 में स्वास्थ्य पर ख़र्च करने के लिए 8,549 करोड़ रुपए आवंटित किए गए। साल 2018-19 में मोहल्ला क्लीनिक के लिए 403 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे पर इस साल यानी 2019-20 के लिए दिल्ली सरकार के 60,000 करोड़ रुपए के कुल बजट में से स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए इसका 14% रखा गया जिसमें से 6.9% यानी 375 करोड़ रुपए मोहल्ला क्लीनिक के लिए आवंटित किए गए। 

“दिल्ली जैसे शहर में ज़मीन का नियंत्रण अर्बन लोकल बॉडीज़ के पास होता है, मोहल्ला क्लीनिक के लिए ज़मीन की पहचान कर, उसपर मंज़ूरी मिलना और फिर ज़मीन मिलना एक बड़ी समस्या रही है। योजना में दो साल की रुकावट भी आयी क्योंकि उप-राज्यपाल से इजाज़त नहीं मिल रही थी,” लहरिया ने बताया। “देरी के ज़्यादतर कारण प्रशासनिक ही रहे हैं।”

इन क्लीनिक का डिजिटाईज़ेशन करने की कोशिश भी की गई जिसका मक़सद था इन क्लीनिक में काग़ज़ का इस्तेमाल बंद करना। मरीज़ का पंजीकरण, परामर्श, जांच का इतिहास और डॉक्टर के पर्चे का हर मरीज़ का रिकॉर्ड एक टैब्लेट पर रखा जाता है। पर प्रजा की रिपोर्ट के अनुसार यह व्यवस्था सिर्फ़ कुछ ही क्लीनिक में ठीक से काम कर रही है। उत्तर दिल्ली ज़िले के सीडीएमओ या चीफ़ डिस्ट्रिक्ट मेडिकल ऑफ़िसर का कहना है कि इन टैब्लेट पर रखा गया कोई भी डाटा और रिकॉर्ड उनके पास नहीं है। 

टीकाकरण और एंटी-नेटल जांच उपलब्ध नहीं 

मोहल्ला क्लीनिक में दो बड़ी और महत्वपूर्ण सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, टीका-करण और एंटी-नेटल जांच यानी गर्भवती महिलाओं के लिए प्रसव पूर्व देखभाल की सुविधाएं।

“गर्भवती मांओं की जांच हमारे काम का हिस्सा नहीं है, पर ऐसी कोई मनाही भी नहीं है। अगर कोई गर्भवती महिला अस्पताल आती है तो मैं उसकी प्राथमिक जांच कर देती हूं,” मोहल्ला क्लीनिक की एक डॉक्टर ने बताया, जो अपना नाम नहीं बताना चाहती हैं। “आयरन, फ़ॉलिक एसिड (की गोलियां) वग़ैरह दे देती हूं और उसको बोल देती हूं कि टीका लगवा ले। इस से ज़्यादा हम कुछ नहीं कर सकते,” उन्होंने बताया।

“यह बात साफ़ है कि मोहल्ला क्लीनिक एक व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा नहीं दे पा रहे हैं। स्वास्थ्य व्यवस्था का प्रिवेंटिव, क्यूरटिव और कम्यूनिटी बेस्ड होना बहुत ज़रूरी है। पर मोहल्ला क्लीनिक इन सुविधाओं के लिए बने ही नहीं थे, वो वही सुविधाए दे रहे हैं जिनके लिए इन्हें बनाया गया था,” लहरिया ने बताया। “पर दिल्ली की पूरी स्वास्थ्य प्रणाली मिलकर लगभग हर इलाक़े में सभी सुविधाएं पहुंचा पा रही है, आने वाले समय में ज़रूरी है कि इन सभी सुविधाओं में तालमेल हो,” उन्होंने कहा।

ढाई साल की ज़ोया परवीन अपनी मां, नसीम ख़ानम (24) के साथ पास के जगदम्बा कैम्प इलाक़े से, पंचशील विहार के मोहल्ला क्लीनिक में आई है। नसीम बताती है कि वो अपनी बच्ची को सर्दी-ज़ुकाम की वजह से यहां लाई है और साथ में अपनी दवाई भी लेनी है। ”मेरी सर दर्द की दावा चलती है, कभी प्राइवेट से ले लेती हूं वरना अस्पताल में तो लंबी लाइन में लगना पड़ता है सुबह सात बजे से, पूरा दिन निकल जाता है भीड़ में खड़े-खड़े, यहां आराम से गोली मिल जाती है,” नसीम ने बताया।

चंद्रकांत लहरिया ने इस व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कई सुझाव भी दिए। “हर नागरिक को एक मोहल्ला क्लीनिक से जोड़ना, उसका वहां रजिस्ट्रेशन करवाना ज़रूरी है। क्लीनिक को हर मरीज़ का एक रिकॉर्ड रखना ज़रूरी है ताकि बाद में इस जानकारी को प्रिवेंटिव या निवारक स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के लिए इस्तेमाल किया जा सके।”

अगर शहर के हर इलाक़े में बड़ी बीमारियों की पहचान संभव हो जाए तो इन बीमारियों को रोकना और उनका बेहतर इलाज कर पाना आसान होगा।

देश के 12 दूसरे राज्यों ने मोहल्ला क्लीनिक पर आधारित इसी तरह के क्लीनिक खोलने शुरू कर दिए हैं। “मोहल्ला क्लीनिक ने सबसे बड़ा काम यह किया है कि स्वास्थ्य व्यवस्था पर राजनैतिक ध्यान आकर्षित करना शुरू किया है। लोगों को लगने लगा है कि प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था पहुंचाना सरकार की ज़िम्मेदारी है, और यह एक बड़ा परिवर्तन है। अभी तक देश में स्वास्थ्य व्यवस्था सरकार के नज़रिए से बनाई गई थी, सुविधा देने वाले के दृष्टिकोण से बनाई गई थी, मोहल्ला क्लीनिक ने स्वास्थ्य व्यवस्था की परिकल्पना बदल दी है, यह जनता के हिसाब से, उनकी ज़रूरतों को ध्यान में रख कर बनाए गए हैं,” लहरिया ने बताया।

“प्राइवेट में जाते थे तो नम्बर जल्दी आ जाता था, पर पैसे ख़र्च करने पड़ते थे, अब यह सुविधा घर के पास है आज बुख़ार आया तो दवाई लेने आ गए, कहीं दूर नहीं जाना पड़ा,” खिड़की एक्सटेंशन में रहने वाले 43 साल के विकास अरोड़ा ने बताया। ”ऐसे और क्लीनिक खुलने चाहिए बड़े अस्पतालों में भीड़ कम हो जाएगी, प्राइवेट अस्पतालों में पैसे बचेंगे और ग़रीब आदमी का भला हो जाएगा,“ विकास कहते हैं।

(साधिका, इंडियास्पेंड के साथ प्रिन्सिपल कॉरेस्पॉंडेंट हैं।) 

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नई दिल्ली: दक्षिण दिल्ली के पंचशील विहार इलाक़े में रहने वाले 64 साल के चमन का कहना है कि अगर मोहल्ला क्लीनिक नहीं होता तो वह समय और ख़र्च के डर से शायद कभी अस्पताल नहीं जाते और उन्हें पता भी नहीं चलता कि इन्हें दिल की बीमारी है।

“मैं मोहल्ला क्लीनिक गया वहां डॉक्टर ने मुझे एंजियोग्राफ़ी के लिए बोला, फिर मेरी सफ़दरजंग अस्पताल में जांच हुई तो मुझे पता चला कि मेरे हार्ट में कोई दिक्कत है, आज ज़िंदा बैठा हूं, मोहल्ला क्लीनिक जाने से मुझे आगे के लिए रास्ता मिला, मार्गदर्शन मिला,” चमन ने बताया, जिनकी पंचशील विहार में बिजली की दुकान है और इनकी दुकान से 500 मीटर दूर ही एक मोहल्ला क्लीनिक खुला है। 

“जो ग़रीब हैं, इलाज नहीं करा पाते थे, बिना जांच के बीमरिया बढ़ जाती थी, कोई देखने वाला नहीं था, कोई सुविधा नहीं थी, कोई समझाने वाले नहीं, अब यह मोहल्ला क्लीनिक इतना अच्छा खोला है केजरीवाल जी ने कि अब हर आदमी अपनी प्रॉब्लम ले कर डॉक्टर के पास जाता है,” चमन ने बताया। पश्चिम विहार के मोहल्ला क्लीनिक में रोज़ाना औसतन 130 मरीज़ आसपास के इलाक़ों से आते हैं। 

चमन दिल्ली के उन लाखों लोगों में से हैं जो मोहल्ला क्लीनिक के लाभार्थी हैं। दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार ने जुलाई 2015 में आम आदमी मोहल्ला क्लीनिक योजना की शुरुआत की और पहला क्लीनिक पश्चिमी दिल्ली के पीरागढ़ी इलाक़े में खोला गया। मक़सद था स्वास्थ्य व्यवस्था और मुफ़्त जांच और दवाएं दिल्ली के हर घर तक पहुंचाने का। हालांकि सरकार अपने 1000 मोहल्ला क्लीनिक के लक्ष्य से अभी काफ़ी पीछे है और यहां पर अभी भी कई ज़रूरी सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं।

90 साल के धर्मनाथ, दक्षिण दिल्ली के पंचशील विहार के डीडीए फ़्लैट में अपने बेटे के साथ रहते हैं, यह मोहल्ला क्लीनिक से खांसी की दवा लेने आए है, “यहां अकेले आ जाता हूं, पास में है, पहले डिस्पेन्सरी या अस्पताल जाना पड़ता था, वहां जाने के लिए बेटे का इंतज़ार करना पड़ता था”

समय और पैसे की बचत 

दिल्ली के अलग-अलग इलाक़ों में फ़िलहाल ऐसे 450 क्लीनिक मौजूद हैं। यह क्लीनिक सोमवार से शनिवार सुबह 8 बजे से दोपहर दो बजे तक काम करते हैं, कुछ क्लीनिक डबल शिफ़्ट में सुबह सात से एक और दोपहर एक से शाम सात बजे तक भी काम करते हैं और यहां मुफ़्त जांच और दवाइयां दे जाती हैं। हर क्लीनिक में चार कर्मचारी होते हैं, एक डॉक्टर, नर्स, ऑफ़िस सहायक और फ़ार्मासिस्ट। 

42 साल की मीनू, दक्षिण दिल्ली के शेख़ सराय इलाक़े में रहती हैं, यह पिछले दो साल से पंचशील विहार के मोहल्ला क्लीनिक में ही अपना इलाज करवा रही हैं, और हर बीस दिन में क्लीनिक आकर थाइरॉइड और सांस फूलने की दवाई लेती हैं। “मुझे तो रोज़ एक गोली खानी ही होती है, पहले यह बाहर से ख़रीदती थी, अब तो यहीं से मिल जाती है, यह पास में भी है,” मीनू के तीन बच्चे हैं और इनके पति ऑटो चलाते हैं। 

“मुझे बहुत फ़ायदा हुआ है, मैंने अपनी बहनों को भी यहां बुला-बुलाकर उनकी जांच करवाई है, डॉक्टर ने हमारी आयरन, विटामिन डी, कैल्शियम सबकी जांच की है,” मीनू ने बताया।

अस्पताल में आम बीमरियां जैसे बुख़ार, डयरिया, त्वचा, सांस से जुड़ी बीमारियां, चोट और जलने के लिए फ़र्स्ट एड की सुविधा उपलब्ध है। दवाइयों की एक सूची तैयार की गई है जिसमें मौजूद 109 ज़रूरी दवाइयां मुफ़्त दी जाती है। इसके साथ ही एमपैनेल्ड प्रयोगशालाओं में 212 तरह की जांच मुफ़्त की जाती हैं। 

“सरकारी अस्पताल में तो सुबह सात बजे लाइन में लगते हैं तो नम्बर क़रीब दो बजे आता है।यहां डॉक्टर अच्छे हैं, दवाई भी देते हैं और खाने पीने की सलाह दे देते हैं,” पंचशील विहार में रहने वाले रेमी थापा बताते हैं कि जबसे इनके घर के पास मोहल्ला क्लीनिक खुला है, तबसे वह यहीं आते हैं। इसके पहले वह मदन मोहन मालवीय या सफ़दरजंग अस्पताल जाया करते थे।

“डायबिटीज़, थायरॉइड और हायपर्टेन्शन के सबसे ज़्यादा मरीज़ आते हैं, हम इन्हें एक बार में 20 दिन की दवाई देते हैं, हमारे पास स्टॉक भी इतना ही होता है,” दक्षिण दिल्ली के पंचशील विहार के मोहल्ला क्लीनिक की फ़ार्मसिस्ट नेहा बताती हैं।

दवाइयां बढ़ाने की ज़रूरत

“ख़र्च भी बहुत बचता है, ब्लड प्रेशर की गोली यहां से लेता हूं, पर यहां सारी दवाई नहीं मिलती। मेरी रीढ़ की हड्डी में चोट लगी थी, मैं अभी भी दर्द की दवाई लेता हूं, 145 रुपए की 10 गोली पर वो गोली यहां नहीं मिलती,” थापा ने बताया। 

109 मुफ़्त दवाइयों की सूची जो सरकार ने जारी की है, यह थोड़ी सीमित मालूम पड़ती है। कई मरीज़ों की समस्या है कि उन्हें बाज़ार से दवाएं ख़रीदनी पड़ती हैं, कई दवाइयां जो लम्बे समय तक चलने वाली बीमारियों में दी जाती है वो स्टॉक से ख़त्म भी हो जाती हैं। साथ ही डॉक्टरों को ऐसा लगता है कि कई बार वो मरीज़ को कोई बेहतर दवाई इसलिए नहीं दे पाते हैं क्योंकि वो सूची में मौजूद नहीं हैं।

“डायबिटीज़, थायरॉइड और हायपर्टेन्शन के सबसे ज़्यादा मरीज़ आते हैं, हम इन्हें एक बार में 20 दिन की दवाई देते हैं, हमारे पास स्टॉक भी इतना ही होती है,” दक्षिण दिल्ली के पंचशील विहार के मोहल्ला क्लीनिक की फ़ार्मसिस्ट नेहा के बताया। “ख़ांसी, ज़ुकाम जैसी बीमारियों के लिए हम सिर्फ़ तीन दिन की दवा ही देते हैं।”

 

“हमको दवाई इसी लिस्ट में से देनी होती है, अक्सर हमें पता होता है कि मरीज़ को कोई दूसरी दवाई ज़्यादा सूट करेगी पर हम बाहर की कोई दवाई पर्चे में नहीं लिख सकते,” मोहल्ला क्लीनिक की एक डॉक्टर ने बताया जो अपना नाम नहीं बताना चाहती थीं। 

दिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्था 

प्रजा संस्थान के एक शोध के अनुसार, दिल्ली में सबसे ज़्यादा मौतें पानी से होने वाली बीमारियों जैसे डायरिया और टाइफ़ाइड की वजह से होती हैं। साल 2018-19 में दिल्ली में डायरिया के 5,14,052 और टाइफ़ाइड के 51,266 मामले सामने आए।

पब्लिक हेल्थ फ़ाउंडेशन ऑफ़ इंडिया की ग्लोबल बर्डेन ऑफ़ डिज़ीज़ की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में रहने वाले पुरुषों की औसत आयु 70.8 वर्ष और महिलाओं की औसत आयु है 74.7 वर्ष है। औसतन, 41.2% लोगों की मौत 40 से 69 साल की उम्र के बीच और 33.2% लोगों की मौत 70 साल की उम्र के बाद हो जाती है। इस उम्र के लोगों में मौत का सबसे बड़ा कारण है लम्बे समय तक चलने वाली सांस से जुड़ी बीमारियां।

दक्षिण दिल्ली के पंचशील विहार का आम आदमी मोहल्ला क्लीनिक जहां रोज़ाना औसतन 120 से 130 मरीज़ आस पास के इलाक़ों से आते हैं।

कमाई का 10% हिस्सा इलाज पर ख़र्च

दिल्ली में 38 अस्पताल राज्य सरकार के अधीन, 7 अस्पताल एमसीडी के अधीन, 258 डिस्पेंसरी राज्य सरकार के अधीन, 92 डिस्पेन्सरी एमसीडी के अधीन, 4 डिस्पेन्सरी नई दिल्ली म्युनिसिपल काउंसिल के अधीन हैं। इसके अलावा यहां 10 चेस्ट क्लीनिक और 450 मोहल्ला क्लीनिक हैं जिसमें से 152 मोहल्ला क्लीनिक का 4 जनवरी 2020 को दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येन्द्र जैन ने उदघाटन किया। 

पर अब भी शहर के ज़्यादतर लोग प्राइवेट स्वास्थ्य सेवाओं का ही इस्तेमाल करते हैं, और इसपर अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा भी ख़र्च करते हैं। भारत के 70% लोग इलाज के लिए प्राइवेट सुविधाओं पर निर्भर हैं। 

“हमें बुखार, ख़ांसी, ज़ुकाम, बीपी, शुगर सबकी दवा मिल जाती है, पहले प्राइवेट में जाते थे, सरकारी तो दूर था, इस वजह से नहीं जाते थे, प्राइवेट ही जाते थे,” खिड़की गांव में रहने वाली 60 साल की किरण बताती हैं, जिनके घर से चार घर दूर एक मोहल्ला क्लीनिक खुला है। “अब पैसे और टाइम दोनो बचते हैं, हमारे बेटे, बहु, पोते सब यहीं जाते हैं,” किरण ने बताया।

प्रजा संस्थान के एक हंसा रिसर्च के शोध में दिल्ली में, 25,041 घरों का सर्वे किया गया। इस सर्वे में सामने आया कि साल 2019 में 41% लोगों ने प्राइवेट स्वास्थ्य सुविधाओं का इस्तेमाल किया, 47% ने सरकारी सुविधाओं का इस्तेमाल किया और 12% ने प्राइवेट और सरकारी दोनो सुविधाओं का इस्तेमाल किया। 

दिल्ली के लोग अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य सुविधाओं पर ख़र्च करते हैं। इस सर्वे के अनुसार घरेलू आय का लगभग 10% हिस्सा स्वास्थ्य पर ख़र्च होता है यानी सिर्फ़ एक साल (2018-19) में, प्रति घर, स्वास्थ्य पर होेने वाला ख़र्च है 1,16,887 रुपए। 

यह ख़र्च इसलिए भी ज़्यादा है क्योंकि ज़्यादातर लोग इन्श्योरेन्स या बीमा का इस्तेमाल नहीं करते हैं। सर्वे किए गए सिर्फ़ 6% लोगों के पास स्वास्थ्य बीमा था था जिसमें से 69% ने यह बीमा किसी प्राइवेट योजना के तहत लिया था। 14% लोगों को किसी ना किसी सरकारी बीमा योजना के बारे में जानकारी थी। 85% लोग केंद्र की महत्वाकांक्षी, आयुष्मान भारत योजना के बारे में जानते थे, लेकिन इसके बावजूद सिर्फ़ 6% लोगों ने इस योजना के तहत पंजीकरण करवाया। 

दिल्ली की प्रति व्यक्ति आय, देश की प्रति व्यक्ति आय से तीन गुना ज़्यादा है। साल 2018-19 में दिल्ली की प्रति व्यक्ति आय थी 3,65,529 रुपए यानी मासिक लगभग 30,000 रुपए जबकि इसका राष्ट्रीय औसत है 10,000 रुपए। आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना का लाभ सिर्फ़ वो लोग उठा सकते हैं जिनकी आमदनी 10,000 रुपए महीना से कम है। 

इंडियन जर्नल ऑफ़ कम्यूनिटी मेडिसीन में मोहल्ला क्लीनिक पर छपे एक शोध के अनुसार दुनिया भर में प्रति व्यक्ति- प्रति साल ओपीडी विज़िट 3 है, यानी दुनिया भर में लोग एक साल में कम से कम तीन बार अस्पताल जाते हैं जबकि भरत में यह दर एक साल में एक बार है। मोहल्ला क्लीनिक खुलने के बाद से दिल्ली में यह आंकड़ा बढ़कर 5.6 हो गया है। यानी दिल्ली का हर नागरिक साल में औसतन 6 बार अस्पताल जाता है। 

इसी शोध के एक लेखक और वरिष्ठ जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ, चंद्रकांत लहरिया का कहना है कि आबादी में आयी बढ़त के मुक़ाबले में ओपीडी विज़िट्स की संख्या तेज़ी से बढ़ी है। “यह दर्शाता है कि बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की ज़रूरत है, अगर लोगों तक सुविधाएं पहुँचेगी, तो वो उनका लाभ उठाएंगे।”

औरतें, बच्चें और बुज़ुर्ग जो पहले अस्पताल नहीं जाते थे वो अब अस्पताल जाने लगे हैं। “हमने पाया कि ख़ासकर औरतें जो दूरी या पैसे की कमी की वजह से अस्पताल नहीं जाती थी, वो अब अपने आप अस्पताल जाने लगी हैं,” लहरिया ने बताया।

निचली आय की श्रेणी से आने वाले यह लोग सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था का सही लाभ नहीं उठा पाते हैं और अक्सर अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा प्राइवेट अस्पतालों में ख़र्च करते हैं। इन मोहल्ला क्लीनिक में जाने वाले ज़्यादातर लोग इसी आय श्रेणी से आते हैं।

दक्षिण दिल्ली के खिड़की गांव का मोहल्ला क्लीनिक जहां रोज़ाना 60 से 70 मरीज़ आते हैं, यहां की डॉक्टर बताती हैं कि बच्चों में खांसी-ज़ुकाम और 12 साल के ऊपर की उम्र के लोगों में त्वचा संक्रमण के मरीज़ सबसे ज़्यादा आते हैं।

लक्ष्य से काफ़ी पीछे 

मोहल्ला क्लीनिक योजना के विकास की गति धीमी रही है, नए क्लीनिक के उदघाटन के बावजूद भी सरकार अपने लक्ष्य से काफ़ी पीछे है। सरकार का लक्ष्य दिल्ली में हर 5 किलोमीटर पर एक मोहल्ला क्लीनिक खोलने का था यानी कुल 1000 क्लीनिक। योजना के धीमा पड़ना इसके लिए आवंटित बजट में भी नज़र आता है। 

एमसीडी और राज्य का बजट मिलाकर दिल्ली के पास स्वास्थ्य व्यवस्था पर ख़र्च करने के लिए साल 2017-18 में कुल 6,590 करोड़ रुपए उपलब्ध थे और साल 2018-19 में स्वास्थ्य पर ख़र्च करने के लिए 8,549 करोड़ रुपए आवंटित किए गए। साल 2018-19 में मोहल्ला क्लीनिक के लिए 403 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे पर इस साल यानी 2019-20 के लिए दिल्ली सरकार के 60,000 करोड़ रुपए के कुल बजट में से स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए इसका 14% रखा गया जिसमें से 6.9% यानी 375 करोड़ रुपए मोहल्ला क्लीनिक के लिए आवंटित किए गए। 

“दिल्ली जैसे शहर में ज़मीन का नियंत्रण अर्बन लोकल बॉडीज़ के पास होता है, मोहल्ला क्लीनिक के लिए ज़मीन की पहचान कर, उसपर मंज़ूरी मिलना और फिर ज़मीन मिलना एक बड़ी समस्या रही है। योजना में दो साल की रुकावट भी आयी क्योंकि उप-राज्यपाल से इजाज़त नहीं मिल रही थी,” लहरिया ने बताया। “देरी के ज़्यादतर कारण प्रशासनिक ही रहे हैं।”

इन क्लीनिक का डिजिटाईज़ेशन करने की कोशिश भी की गई जिसका मक़सद था इन क्लीनिक में काग़ज़ का इस्तेमाल बंद करना। मरीज़ का पंजीकरण, परामर्श, जांच का इतिहास और डॉक्टर के पर्चे का हर मरीज़ का रिकॉर्ड एक टैब्लेट पर रखा जाता है। पर प्रजा की रिपोर्ट के अनुसार यह व्यवस्था सिर्फ़ कुछ ही क्लीनिक में ठीक से काम कर रही है। उत्तर दिल्ली ज़िले के सीडीएमओ या चीफ़ डिस्ट्रिक्ट मेडिकल ऑफ़िसर का कहना है कि इन टैब्लेट पर रखा गया कोई भी डाटा और रिकॉर्ड उनके पास नहीं है। 

टीकाकरण और एंटी-नेटल जांच उपलब्ध नहीं 

मोहल्ला क्लीनिक में दो बड़ी और महत्वपूर्ण सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, टीका-करण और एंटी-नेटल जांच यानी गर्भवती महिलाओं के लिए प्रसव पूर्व देखभाल की सुविधाएं।

“गर्भवती मांओं की जांच हमारे काम का हिस्सा नहीं है, पर ऐसी कोई मनाही भी नहीं है। अगर कोई गर्भवती महिला अस्पताल आती है तो मैं उसकी प्राथमिक जांच कर देती हूं,” मोहल्ला क्लीनिक की एक डॉक्टर ने बताया, जो अपना नाम नहीं बताना चाहती हैं। “आयरन, फ़ॉलिक एसिड (की गोलियां) वग़ैरह दे देती हूं और उसको बोल देती हूं कि टीका लगवा ले। इस से ज़्यादा हम कुछ नहीं कर सकते,” उन्होंने बताया।

“यह बात साफ़ है कि मोहल्ला क्लीनिक एक व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा नहीं दे पा रहे हैं। स्वास्थ्य व्यवस्था का प्रिवेंटिव, क्यूरटिव और कम्यूनिटी बेस्ड होना बहुत ज़रूरी है। पर मोहल्ला क्लीनिक इन सुविधाओं के लिए बने ही नहीं थे, वो वही सुविधाए दे रहे हैं जिनके लिए इन्हें बनाया गया था,” लहरिया ने बताया। “पर दिल्ली की पूरी स्वास्थ्य प्रणाली मिलकर लगभग हर इलाक़े में सभी सुविधाएं पहुंचा पा रही है, आने वाले समय में ज़रूरी है कि इन सभी सुविधाओं में तालमेल हो,” उन्होंने कहा।

ढाई साल की ज़ोया परवीन अपनी मां, नसीम ख़ानम (24) के साथ पास के जगदम्बा कैम्प इलाक़े से, पंचशील विहार के मोहल्ला क्लीनिक में आई है। नसीम बताती है कि वो अपनी बच्ची को सर्दी-ज़ुकाम की वजह से यहां लाई है और साथ में अपनी दवाई भी लेनी है। ”मेरी सर दर्द की दावा चलती है, कभी प्राइवेट से ले लेती हूं वरना अस्पताल में तो लंबी लाइन में लगना पड़ता है सुबह सात बजे से, पूरा दिन निकल जाता है भीड़ में खड़े-खड़े, यहां आराम से गोली मिल जाती है,” नसीम ने बताया।

चंद्रकांत लहरिया ने इस व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कई सुझाव भी दिए। “हर नागरिक को एक मोहल्ला क्लीनिक से जोड़ना, उसका वहां रजिस्ट्रेशन करवाना ज़रूरी है। क्लीनिक को हर मरीज़ का एक रिकॉर्ड रखना ज़रूरी है ताकि बाद में इस जानकारी को प्रिवेंटिव या निवारक स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के लिए इस्तेमाल किया जा सके।”

अगर शहर के हर इलाक़े में बड़ी बीमारियों की पहचान संभव हो जाए तो इन बीमारियों को रोकना और उनका बेहतर इलाज कर पाना आसान होगा।

देश के 12 दूसरे राज्यों ने मोहल्ला क्लीनिक पर आधारित इसी तरह के क्लीनिक खोलने शुरू कर दिए हैं। “मोहल्ला क्लीनिक ने सबसे बड़ा काम यह किया है कि स्वास्थ्य व्यवस्था पर राजनैतिक ध्यान आकर्षित करना शुरू किया है। लोगों को लगने लगा है कि प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था पहुंचाना सरकार की ज़िम्मेदारी है, और यह एक बड़ा परिवर्तन है। अभी तक देश में स्वास्थ्य व्यवस्था सरकार के नज़रिए से बनाई गई थी, सुविधा देने वाले के दृष्टिकोण से बनाई गई थी, मोहल्ला क्लीनिक ने स्वास्थ्य व्यवस्था की परिकल्पना बदल दी है, यह जनता के हिसाब से, उनकी ज़रूरतों को ध्यान में रख कर बनाए गए हैं,” लहरिया ने बताया।

“प्राइवेट में जाते थे तो नम्बर जल्दी आ जाता था, पर पैसे ख़र्च करने पड़ते थे, अब यह सुविधा घर के पास है आज बुख़ार आया तो दवाई लेने आ गए, कहीं दूर नहीं जाना पड़ा,” खिड़की एक्सटेंशन में रहने वाले 43 साल के विकास अरोड़ा ने बताया। ”ऐसे और क्लीनिक खुलने चाहिए बड़े अस्पतालों में भीड़ कम हो जाएगी, प्राइवेट अस्पतालों में पैसे बचेंगे और ग़रीब आदमी का भला हो जाएगा,“ विकास कहते हैं।

(साधिका, इंडियास्पेंड के साथ प्रिन्सिपल कॉरेस्पॉंडेंट हैं।) 

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