क्या वन अधिकार अधिनियम की अनदेखी बीजेपी को झारखंड में भारी पड़ गई

नई दिल्लीः झारखंड विधानसभा चुनाव में क्या बीजेपी को वन अधिकार क़ानून (एफ़आरए) की अनदेखी की कीमत सत्ता खोकर चुकानी पड़ी है? इस विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने जो 12 सीटें गंवाई हैं वह एफ़आरए के असर वाली सीटें हैं। कुछ रिसर्चर्स के विश्लेषण में यह पता चला है। इस चुनाव में बीजेपी को 25 सीटों पर जीत हासिल हुई है जबकि पिछले चुनाव (2014) में उसे 37 सीटों पर सफ़लता मिली थी।

एफ़आरए, जंगल में रहने वालों के जंगल पर उनके अधिकार को औपचारिक मान्यता देता है। इन क्षेत्रों में आदिवासी जनसंख्या का अधिक अनुपात है। उनके लिए एफ़आरए एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।

अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 28 सीटों पर एक “साफ़ बदलाव” नज़र आया है (बीजेपी को 2019 में इनमें से दो सीटों पर जीत मिली है, जबकि 2014 में उसने 11 जीती थीं), एक एनजीओ, कम्युनिटी फॉरेस्ट रिसोर्स-लर्निंग एंड एडवोकेसी (सीएफ़आर-एलए) के सदस्यों, तुषार  दाश और सुष्मिता वर्मा की ओर से किए गए विश्लेषण में यह पाया गया। इन्होंने यह विश्लेषण सीएफ़आर-एलए से अलग किया।

इंडियास्पेंड ने झारखंड विधानसभा चुनाव के दौरान 27 नवंबर 2019 को रिपोर्ट किया था कि जंगल में रहने वालों के जंगल पर उनके अधिकार को औपचारिक मान्यता देने वाले एफ़आरए को लागू करने की धीमी रफ़्तार, राज्य की 81 में से 62 सीटों (क़रीब 77%) पर किसी का भी खेल बना या बिगाड़ सकती है।

झारखंड के विधानसभा चुनाव के नतीजे 23 दिसंबर, 2019 को घोषित किए गए थे। सत्तारूढ़ बीजेपी ने इस चुनाव में 25 सीटें जीती, 2014 के मुक़ाबले 32.43% कम। सरकार बनाने के लिए ज़रूरी 41 सीटों का आंकड़ा हासिल करने में असफ़ल रही। झारखंड मुक्ति मोर्चा (30 सीटें), कांग्रेस (16 सीटें) और राष्ट्रीय जनता दल (1 सीट) के गठबंधन ने 47 सीटें हासिल की, 2014 में मिली 25 सीटों के मुक़ाबले 88% ज़्यादा।

विश्लेषण में बताया गया था कि जेएमएम की अगुवाई वाला गठबंधन “आदिवासियों, दलितों और अन्य कमज़ोर तबकों के ज़मीन और वन अधिकार वाले मुद्दों को उठाकर” एफ़आरए के असर वाली सीटें जीत सकता है।

जेएमएम गठबंधन ने अपने घोषणापत्र और चुनाव प्रचार में सरकार की आदिवासी विरोधी नीतियों को मुद्दा बनाया। जिनमें भारतीय वन कानून में प्रस्तावित संशोधन, सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश की वजह से आदिवासियों को जंगल से बेदख़ल करने का डर, परियोजनाओं के लिए वनों का ग़ैर क़ानूनी तौर पर इस्तेमाल, ज़मीन का अवैध अधिग्रहण और राज्य में एफ़आरए को लागू नहीं करना आदि शामिल थे। 

2006 में लागू हुआ एफ़आरए, झारखंड के एससी और एसटी के वोटरों की ज़िंदगी पर सीधे-सीधे असर डालता है। यह झारखंड के अनुसूचित जातियों और जनजातियों (इन्हें संविधान में देश के सबसे वंचित सामाजिक-आर्थिक समूह के तौर पर माना गया है) के कम से कम 38 लाख मतदाताओं की आजीविका के लिए महत्वपूर्ण है। 2014 के आंकड़ों के मुताबिक़, राज्य में कुल 73 लाख वोटर हैं जिनमें से 52% यानी 38 लाख वोटर एससी और एसटी से आते हैं। 

एफ़आरए के असर वाली सीटों पर बदलाव

झारखंड में बीजेपी ने जो 12 सीटें गंवाई हैं वे ‘महत्वपूर्ण’, ‘गंभीर’ और ‘अनुकूल’ श्रेणी में थीं। रिसर्चर्स ने एफ़आरए प्रभाव के स्तर के अनुसार  इन सीटों का वर्गीकरण किया था। ‘महत्वपूर्ण’ सीटों पर एफ़आरए से मतदाताओं की सबसे अधिक संख्या प्रभावित थी, इनमें ज़्यादा आबादी आदिवासियों की है, और एक बड़ा क्षेत्र वनों के तहत आता है। ‘अनुकूल’ वर्ग वाले विधानसभा क्षेत्रों में इसकी तुलना में आदिवासी लोगों की जनसंख्या और वनों के तहत आने वाला क्षेत्र कम है।

विश्लेषण के अनुसार, ‘महत्वपूर्ण’ और ‘गंभीर’ वर्ग वाले विधानसभा क्षेत्रों में, जेएमएम ने सात सीटें जीती, कांग्रेस को पांच पर सफ़लता मिली और बीजेपी ने छह सीटें गंवाईं।

इन तीनों वर्गों की सीटें कुल मिलाकर 62 होती हैं जो झारखंड की कुल 81 विधानसभा सीटों का 77% से ज़्यादा है। बीजेपी ने 2014 में इन 62 सीटों में से 26 जीती थीं, 2019 में यह संख्या घटकर 14 रह गई। 

अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों के नतीजे

जैसा हमने पहले बताया, अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित 28 सीटों में से, बीजेपी को नौ सीटों का नुकसान हुआ। उसने 2014 में 11 सीटें जीती थीं, 2019 में उसे दो सीटों पर सफ़लता मिली ।

दूसरी तरफ़, जेएमएम को 2019 के चुनाव में सात सीटों का फ़ायदा हुआ। उसके उम्मीदवारों को इन 28 सीटों में से 20 पर सफ़लता मिली, 2014 में जेएमएम को 13 सीटें मिली थीं। इस बार कांग्रेस ने इनमें से छह सीटें जीती, जबकि पिछले चुनाव में उसे इन 28 में से एक भी सीट नहीं मिली थी।

झारखंड अब मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों के साथ शामिल हो गया है, जहां 2018-19 के दौरान विधानसभा चुनावों में वन और ज़मीन अधिकारों और खेती का संकट जैसे बड़े मुद्दे चुनावों पर हावी रहे। विश्लेषकों का मानना है कि इन मुद्दों की वजह से यहां सत्तारूढ़ दल को हार का सामना करना पड़ा।

महाराष्ट्र में अक्टूबर 2019 में विधानसभा चुनाव हुआ था, वहां उस वक़्त सत्ता में रही बीजेपी ने एफ़आरए के असर वाली लगभग 22%   सीटें गंवा दी थी और सरकार बनाने के लिए बहुमत के आंकड़े तक नहीं पहुंच सकी थी। 

सीएफ़आर-एलए के विधानसभा चुनाव विश्लेषण के अनुसार, इसी तरह 2018 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में बीजेपी की हार का एक कारण एफ़आरए रहा था।  

(भास्कर, इंडियास्पेंड के साथ रिपोर्टिंग फ़ेलो हैं।)

यह रिपोर्ट मूलत: अंग्रेज़ी में 27 दिसंबर 2019 को IndiaSpend पर प्रकाशित हुई है।

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

नई दिल्लीः झारखंड विधानसभा चुनाव में क्या बीजेपी को वन अधिकार क़ानून (एफ़आरए) की अनदेखी की कीमत सत्ता खोकर चुकानी पड़ी है? इस विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने जो 12 सीटें गंवाई हैं वह एफ़आरए के असर वाली सीटें हैं। कुछ रिसर्चर्स के विश्लेषण में यह पता चला है। इस चुनाव में बीजेपी को 25 सीटों पर जीत हासिल हुई है जबकि पिछले चुनाव (2014) में उसे 37 सीटों पर सफ़लता मिली थी।

एफ़आरए, जंगल में रहने वालों के जंगल पर उनके अधिकार को औपचारिक मान्यता देता है। इन क्षेत्रों में आदिवासी जनसंख्या का अधिक अनुपात है। उनके लिए एफ़आरए एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।

अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 28 सीटों पर एक “साफ़ बदलाव” नज़र आया है (बीजेपी को 2019 में इनमें से दो सीटों पर जीत मिली है, जबकि 2014 में उसने 11 जीती थीं), एक एनजीओ, कम्युनिटी फॉरेस्ट रिसोर्स-लर्निंग एंड एडवोकेसी (सीएफ़आर-एलए) के सदस्यों, तुषार  दाश और सुष्मिता वर्मा की ओर से किए गए विश्लेषण में यह पाया गया। इन्होंने यह विश्लेषण सीएफ़आर-एलए से अलग किया।

इंडियास्पेंड ने झारखंड विधानसभा चुनाव के दौरान 27 नवंबर 2019 को रिपोर्ट किया था कि जंगल में रहने वालों के जंगल पर उनके अधिकार को औपचारिक मान्यता देने वाले एफ़आरए को लागू करने की धीमी रफ़्तार, राज्य की 81 में से 62 सीटों (क़रीब 77%) पर किसी का भी खेल बना या बिगाड़ सकती है।

झारखंड के विधानसभा चुनाव के नतीजे 23 दिसंबर, 2019 को घोषित किए गए थे। सत्तारूढ़ बीजेपी ने इस चुनाव में 25 सीटें जीती, 2014 के मुक़ाबले 32.43% कम। सरकार बनाने के लिए ज़रूरी 41 सीटों का आंकड़ा हासिल करने में असफ़ल रही। झारखंड मुक्ति मोर्चा (30 सीटें), कांग्रेस (16 सीटें) और राष्ट्रीय जनता दल (1 सीट) के गठबंधन ने 47 सीटें हासिल की, 2014 में मिली 25 सीटों के मुक़ाबले 88% ज़्यादा।

विश्लेषण में बताया गया था कि जेएमएम की अगुवाई वाला गठबंधन “आदिवासियों, दलितों और अन्य कमज़ोर तबकों के ज़मीन और वन अधिकार वाले मुद्दों को उठाकर” एफ़आरए के असर वाली सीटें जीत सकता है।

जेएमएम गठबंधन ने अपने घोषणापत्र और चुनाव प्रचार में सरकार की आदिवासी विरोधी नीतियों को मुद्दा बनाया। जिनमें भारतीय वन कानून में प्रस्तावित संशोधन, सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश की वजह से आदिवासियों को जंगल से बेदख़ल करने का डर, परियोजनाओं के लिए वनों का ग़ैर क़ानूनी तौर पर इस्तेमाल, ज़मीन का अवैध अधिग्रहण और राज्य में एफ़आरए को लागू नहीं करना आदि शामिल थे। 

2006 में लागू हुआ एफ़आरए, झारखंड के एससी और एसटी के वोटरों की ज़िंदगी पर सीधे-सीधे असर डालता है। यह झारखंड के अनुसूचित जातियों और जनजातियों (इन्हें संविधान में देश के सबसे वंचित सामाजिक-आर्थिक समूह के तौर पर माना गया है) के कम से कम 38 लाख मतदाताओं की आजीविका के लिए महत्वपूर्ण है। 2014 के आंकड़ों के मुताबिक़, राज्य में कुल 73 लाख वोटर हैं जिनमें से 52% यानी 38 लाख वोटर एससी और एसटी से आते हैं। 

एफ़आरए के असर वाली सीटों पर बदलाव

झारखंड में बीजेपी ने जो 12 सीटें गंवाई हैं वे ‘महत्वपूर्ण’, ‘गंभीर’ और ‘अनुकूल’ श्रेणी में थीं। रिसर्चर्स ने एफ़आरए प्रभाव के स्तर के अनुसार  इन सीटों का वर्गीकरण किया था। ‘महत्वपूर्ण’ सीटों पर एफ़आरए से मतदाताओं की सबसे अधिक संख्या प्रभावित थी, इनमें ज़्यादा आबादी आदिवासियों की है, और एक बड़ा क्षेत्र वनों के तहत आता है। ‘अनुकूल’ वर्ग वाले विधानसभा क्षेत्रों में इसकी तुलना में आदिवासी लोगों की जनसंख्या और वनों के तहत आने वाला क्षेत्र कम है।

विश्लेषण के अनुसार, ‘महत्वपूर्ण’ और ‘गंभीर’ वर्ग वाले विधानसभा क्षेत्रों में, जेएमएम ने सात सीटें जीती, कांग्रेस को पांच पर सफ़लता मिली और बीजेपी ने छह सीटें गंवाईं।

इन तीनों वर्गों की सीटें कुल मिलाकर 62 होती हैं जो झारखंड की कुल 81 विधानसभा सीटों का 77% से ज़्यादा है। बीजेपी ने 2014 में इन 62 सीटों में से 26 जीती थीं, 2019 में यह संख्या घटकर 14 रह गई। 

अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों के नतीजे

जैसा हमने पहले बताया, अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित 28 सीटों में से, बीजेपी को नौ सीटों का नुकसान हुआ। उसने 2014 में 11 सीटें जीती थीं, 2019 में उसे दो सीटों पर सफ़लता मिली ।

दूसरी तरफ़, जेएमएम को 2019 के चुनाव में सात सीटों का फ़ायदा हुआ। उसके उम्मीदवारों को इन 28 सीटों में से 20 पर सफ़लता मिली, 2014 में जेएमएम को 13 सीटें मिली थीं। इस बार कांग्रेस ने इनमें से छह सीटें जीती, जबकि पिछले चुनाव में उसे इन 28 में से एक भी सीट नहीं मिली थी।

झारखंड अब मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों के साथ शामिल हो गया है, जहां 2018-19 के दौरान विधानसभा चुनावों में वन और ज़मीन अधिकारों और खेती का संकट जैसे बड़े मुद्दे चुनावों पर हावी रहे। विश्लेषकों का मानना है कि इन मुद्दों की वजह से यहां सत्तारूढ़ दल को हार का सामना करना पड़ा।

महाराष्ट्र में अक्टूबर 2019 में विधानसभा चुनाव हुआ था, वहां उस वक़्त सत्ता में रही बीजेपी ने एफ़आरए के असर वाली लगभग 22%   सीटें गंवा दी थी और सरकार बनाने के लिए बहुमत के आंकड़े तक नहीं पहुंच सकी थी। 

सीएफ़आर-एलए के विधानसभा चुनाव विश्लेषण के अनुसार, इसी तरह 2018 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में बीजेपी की हार का एक कारण एफ़आरए रहा था।  

(भास्कर, इंडियास्पेंड के साथ रिपोर्टिंग फ़ेलो हैं।)

यह रिपोर्ट मूलत: अंग्रेज़ी में 27 दिसंबर 2019 को IndiaSpend पर प्रकाशित हुई है।

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।


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