ग्रामीण महिलाओं के लिए क्यों ज़रूरी है अस्पताल में महिला डॉक्टरों की तैनाती

महिला डॉक्टर न होने की वजह से महिलाओं को अपनी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के लिए आशा या एएनएम के पास जाना पड़ता है। फ़ोटोः श्रंखला पांडेय

नई दिल्ली/लखनऊ: देश में महिलाओं के ख़राब स्वास्थ्य की सबसे बड़ी वजहों में से एक है महिला डॉक्टरों की कमी। देश के ग्रामीण इलाक़ों में ज़्यादातर महिलाएं पर्दे या घूंघट में रहती हैं। उन्हें पराए मर्दों से बात करने और उनके सामने जाने तक की मनाही होती है। ऐसे में महिलाएं पुरुष डॉक्टरों को अपनी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बताने से परहेज़ करती हैं।

  

“अब कोई अंदरूनी बीमारी होती है तो आदमियों से उतना खुलकर कैसे बताएं? डॉक्टर महिला होती है तो हम खुलकर अपनी समस्याएं उन्हें बता सकते हैं, इलाज भी करवा सकते हैं। मान लीजिए हमें कभी सुई (इंजेक्शन) ही लगवानी हो तो नर्स से ही लगवाएंगे न। आदमी से कैसे लगवा लें,” उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ज़िले के देवरा गांव की बबीता सिंह का सवाल था।

 

सिर्फ़ अस्पताल होना और उसमें डॉक्टर होना ही काफ़ी नहीं है, अस्पताल में महिला डॉक्टर की मौजूदगी स्वास्थ्य सुविधाओं के इस्तेमाल पर असर डाल सकती है। स्वास्थ्य केंद्रों में महिला डॉक्टरों के न होने से महिलाएं प्रजनन और जच्चा जैसी स्वास्थ्य सेवाओं की लिए स्वास्थ्य केंद्र जाने से कतराती हैं। कोरोनावायरस के दौरान जब ग्रामीण भारत डॉक्टरों की कमी के साथ इस महामारी से लड़ रहा है, ऐसे में अस्पतालों में महिला डॉक्टर का मिलना और मुश्किल हो गया है।

“कोरोनावायरस के बाद स्वास्थ्य सेवाओं में काफी बदलाव हुए हैं। इस महामारी के दौर में भी हम उन्हीं सीमित संसाधनों में काम कर रहे हैं। उसी स्टाफ़ को कोविड की ड्यूटी भी करनी है और दूसरे मरीज़ों को भी देखना है। अब सीएचसी की महिला डॉक्टर की ड्यूटी जब कोविड में लगी है तो बाकी मरीज़ों को परेशानी तो होगी ही,”  लखनऊ के सरोजनी नगर ब्लॉक की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. पूर्णिमा घूसिया ने बताया।

महिला डॉक्टरों के होने से महिलाएं अपनी बीमारियों के बारे में खुलकर बात कर पाती हैं, ऐसा एक शोध में भी सामने आया है।

ये शोध द लैन्सेट मेडिकल जर्नल की पत्रिका, ई क्लिनिकल जर्नल में 5 मार्च 2020 को प्रकाशित हुआ। इस शोध में भारत के 18 राज्यों के 256 ज़िलों के ज़िला स्तरीय आंकड़ों का विश्लेषण किया गया।

 

“महिलाओं को लगता है कि जब सामने महिला डॉक्टर होगी तो अपनी समस्याएं खुल कर उनसे बता पाएंगी, ज़्यादा अच्छे से अपनी बात को समझा पाएंगी,” उत्तरप्रदेश के रायबरेली ज़िले के हरचंदपुर की आशा कार्यकत्री, आरती सिंह (36) ने बताया। आरती यहां 15 साल से काम कर रही हैं, ये इस इलाक़े की आशा हेड हैं और 140 आशाओं के काम की निगरानी भी करती है।

शोध के दौरान सभी 256 ज़िलों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) में महिला डॉक्टरों की उपलब्धता के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया और ये जानने कि कोशिश की गई, कि महिला डॉक्टर की मौजूदगी का स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ उठाने वाली महिलाओं पर क्या असर पड़ता है।

 

लोकसभा में दिसम्बर 2017 में पूछे गए एक सवाल के जवाब में केंद्र सरकार ने ये बात मानी थी कि देश में महिला डॉक्टरों की कमी से जुड़े आंकड़े इकट्ठ नहीं किए जाते हैं। यानी डॉक्टरों की कमी के आंकड़े उपलब्ध हैं पर प्राथमिक स्वास्थ केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और ज़िला अस्पतालों में महिला डॉक्टरों की कितनी कमी है इसका कोई लेखा-जोखा सरकार के पास नहीं है। आंकड़े इकट्ठे् करना इसलिए बेहद ज़रूरी हो जाता है क्योंकि इन्हीं आंकड़ों के आधार पर ही सरकार नीतियां बनाती है, आपूर्तियों और ख़ामियों का आंकलन करती है और इन्हें सुधारने के लिए क़दम उठाती है।

ई क्लिनिकल जर्नल में छपे इस शोध में जिन स्वास्थ्य सुविधाओं का अध्ययन किया गया उसमें परिवार नियोजन के तरीकों का इस्तेमाल, गर्भावस्था के दौरान जच्चा (मां) की देखभाल, विशेषज्ञ की निगरानी में प्रसव, प्रसव के बाद जच्चा-बच्चा दोनों की देखभाल और बच्चे का टीकाकरण शामिल था।

शोध में ये बात भी सामने आई कि जिन ज़िलों के पीएचसी में महिला डॉक्टरों की संख्या ज़्यादा है उन ज़िलों में प्रजनन और जच्चा स्वास्थ्य सेवाओं का महिलाओं ने ज़्यादा लाभ उठाया।

“हमको बीते कुछ दिन से माहवारी को लेकर परेशानी है, सब कुछ ठीक होता तो अस्पताल जाकर डॉक्टर को दिखा लेते लेकिन कोरोना की वजह से अस्पताल में महिला डॉक्टर कभी रहती हैं तो कभी नहीं, इसलिए हम अभी घरेलू उपाय ही करते हैं। जब वो बैठने लगेंगी तभी दिखाएंगे,”  बाराबंकी की बबीता ने कहा।

“डॉक्टर अगर महिला हो तो महिलाएं डॉक्टर के पास ज़्यादा जाती हैं। अगर डॉक्टर पुरुष हो तो कभी-कभी उनकी (महिलाओं की) सास या उनके पति उन्हें अकेले अस्पताल जाने से रोक देते हैं या उनके साथ ख़ुद अस्पताल जाते हैं। जबकि (महिला डॉक्टर की मौजूदगी में) महिलाएं ख़ुद अकेली ही चली जाती हैं,” आरती ने बताया। 

 

महिलाओं को अस्पताल में महिला डॉक्टर ही देखें. ऐसा उनके पति भी चाहते हैं। देवरा गांव की संध्या देवी कहती हैं उनके पति को नहीं पसंद कि महिलाओं वाली बीमारी वो किसी दूसरे पुरुष को बताएं भले ही वो डॉक्टर ही क्यों न हो। 

डॉक्टरों की कमी ग्रामीण इलाकों के लिए चिंता का विषय

ग़रीब, ग्रामीण और सूदूर इलाक़ों में डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की कमी, ना सिर्फ़ भारत में, बल्कि दुनिया भर में एक चुनौती है। भारत के ग्रामीण इलाक़ों में डॉक्टरों की कमी की वजह से भारत यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज (यूएचसी) के लक्ष्य में पिछड़ गया है और इसी वजह से भारत अपने प्रजनन और जच्चा-बच्चा स्वास्थ्य (आरएमसीएच) के लक्ष्य भी पूरे नहीं कर पाया है। 

शोध के अनुसार डॉक्टरों की कमी तो चिंता का एक बड़ा विषय है ही, इनके असामान्य वितरण का भी प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर दुष्प्रभाव देखा गया है, ख़ासकर, भारत जैसे मध्यम आय वाले देशों में।  

भारत सरकार ने महिला डॉक्टर की महत्ता समझते हुए हर पीएचसी में एक महिला मेडिकल ऑफ़िसर (एलएमओ) का पद बनाया है। एलएमओ की मुख्य ज़िम्मेदारियों में परिवार कल्याण योजनाओं का क्रियान्वन देखना शामिल है।

औसतन जिन ज़िलों के आधे से ज़्यादा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में कम से कम एक एलएमओ तैनात थी, उन ज़िलों में महिलाओं ने ज़्यादा से ज़्यादा जच्चा-बच्चा स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाया, जैसा कि हमने पहले बताया था। 

महिला डॉक्टर होने से परिवार नियोजन के इस्तेमाल में बढ़त देखी गई, साथ ही प्रसव पूर्व जांच और देखभाल, प्रसव के बाद देखभाल और विशेषज्ञ की निगरानी में प्रसव के मामलों में भी बढ़त देखी गई। लेकिन महिला डॉक्टर होने का शिशु देखभाल और टीकाकरण पर कोई ख़ास असर नहीं खा गया।

“डॉक्टरों की संख्या में अगर लैंगिक समानता लाई जाए तो ग्रामीण इलाक़ों में महिला डॉक्टर की मौजूदगी, भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं के इस्तेमाल में इज़ाफा ला सकती है.” शोध में कहा गया।

 

15 से 49 साल की विवाहित महिलाओं में परिवार नियोजन के नए तरीक़ों के इस्तेमाल में, महिला डॉक्टर की मौजूदगी से 4.06% का अंतर देखा गया। जिन ज़िलों के 50% से कम पीएचसी में एक भी महिला डॉक्टर नहीं थी वहां परिवार नियोजन के तरीक़ों का 47.04% इस्तेमाल हुआ। पर जिन ज़िलों के 50% से ज़्यादा पीएचसी में कम से कम एक महिला डॉक्टर मौजूद थी वहां परिवार नियोजन के तरीक़ों का 51.1% इस्तेमाल हुआ।

प्रसव पूर्व जांच के लिए गर्भावस्था के दौरान कम से कम चार बार अस्पताल जाने वाली महिलाओं की संख्या में 9.5% का अंतर देखा गया। जिन ज़िलों के 50% से कम पीएचसी में एक भी महिला डॉक्टर नहीं थी वहां 62.9% महिलाएं गर्भावस्था के दौरान जांच के लिए गईं लेकिन जिन ज़िलों के 50% से ज़्यादा पीएचसी में कम से कम एक महिला डॉक्टर मौजूद थी वहां 72.4% गर्भवती महिलाओं ने प्रसव पूर्व जांच सुविधाओं का लाभ उठाया।

प्रसव के दौरान विशेषज्ञ यानी डॉक्टर, नर्स, महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता (लेडी हेल्थ विज़िटर या एलएचवी), एएनएम या किसी अन्य स्वास्थ्य कार्यकर्ता की निगरानी में होने वाले प्रसव में 9.4% की बढ़त देखी गई। जिन ज़िलों के 50% से कम पीएचसी में एक भी महिला डॉक्टर नहीं थी वहां 82.5% प्रसव किसी विशेषज्ञ की निगरानी में हुए। लेकिन जिन ज़िलों के 50% से ज़्यादा पीएचसी में कम से कम एक महिला डॉक्टर मौजूद थी वहां 91.9% बच्चों का जन्म किसी विशेषज्ञ की निगरानी में हुआ।

प्रसव के बाद देखभाल (पीएनसी) यानी बच्चे के जन्म के बाद दो दिन के अंदर मां की डॉक्टर, नर्स, एलएचवी, एएनएम, दाई या किसी अन्य स्वास्थ्य कार्यकर्ता द्वारा जांच और देखरेख। जच्चा की पीएनसी में महिला डॉक्टर की मौजूदगी से पीएनसी का लाभ उठाने वाली महिलाओं में 7.4% का अंतर देखा गया। जिन ज़िलों के 50% से कम पीएचसी में एक भी महिला डॉक्टर नहीं थी वहां 65.2% महिलाओं ने पीएनसी का लाभ उठाया। लेकिन जिन ज़िलों के 50% से ज़्यादा पीएचसी में कम से कम एक महिला डॉक्टर मौजूद थी वहां 72.6% महिलाओं की प्रसव के बाद, दो दिन के अंदर देखभाल हुई।

“अगर कोई निजी बीमारी है और महिला को अस्पताल जाने में शर्म आ रही है तो हम उससे पूछकर डॉक्टर को उसकी बीमारी बता देते हैं, और उसे डॉक्टर का पर्चा लाकर दे देते हैं,” लखनऊ के रहमत नगर में काम करने वाली आशा कार्यकर्ता शिव देवी ने बताया।

“इस शोध के नतीजे और विश्व-स्तरीय शोधों से पता चलता है कि महिला डॉक्टरों के होने से महिलाएं अस्पताल जाने में ज़्यादा सहज महसूस करती हैं और अपने लिए स्वास्थ्य सुविधाओं का ज़्यादा इस्तेमाल करती हैं,” इस शोध की मुख्य लेखक और कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑन जेंडर इक्वटी एंड हेल्थ में रिसर्च साइंटिस्ट, नंदिता भान ने इंडियास्पेंड को बताया।

 

लखनऊ जिले के बक्शी तालाब ब्लॉक के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर  तैनात महिला डॉक्टर ममता राजपूत के बाकी सहकर्मियों की कोरोना में ड्यूटी लगी है। डॉ ममता पीएचसी पर ही ड्यूटी कर रही हैं। “जब शहरों में ये हाल है कि महिलाएं अपनी कुछ स्वास्थ्य समस्याएं सिर्फ़ महिला डॉक्टर से ही बता पाती हैं तो गांव का अंदाजा ख़ुद ही लगाया जा सकता है कि वो कैसे पुरुष डॉक्टरों के आगे बात कर पाएंगी। महिलाओं की कई  ऐसी बीमारियां हैं जो छुपाने और लंबे समय तक इलाज न होने की वजह से गंभीर हो जाती हैं। ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि उनके आस-पास कोई महिला डॉक्टर नहीं होती है,” डॉ. ममता ने कहा। 

महिला डॉक्टर से महिलाएं बेझिझक बीमारियों की बात करती हैं 

दुनिया भर में ये पाया गया है कि महिलाएं अपनी निजी बीमारियों के बारे में बात करते हुए एक महिला डॉक्टर के साथ ज़्यादा सहज महसूस करती हैं। 

“ज़्यादा महिला डॉक्टरों वाले स्वास्थ्य केंद्र एक वातावरण पैदा करते हैं जो महिलाओं की ज़रूरतों के लिए ज़्यादा उपयुक्त होता है। ये सुनिश्चित करता है महिला डॉक्टरों की भागीदारी, ना सिर्फ़ एक चिकित्सक की होती है बल्कि ग्रामीण महिलाओं के बीच वो एक रोल मॉडल और लीडर की तरह काम करती है,” शोध में कहा गया।

“कोई भी महिला किसी भी पुरुष डॉक्टर के सामने असहज तो महसूस करती ही है, इसीलिए जितने भी गायनेकॉलोजिस्ट या स्त्री रोग के पुरुष डॉक्टर हैं वो गांव में अपने साथ हमेशा किसी महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता को साथ में बिठाते हैं,” उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती के सिरसिया सीएचसी में कम्युनिटी हेल्थ ऑफ़िसर (सीएचओ) के पद पर तैनात सौरभ यादव (30) ने बताया। सौरभ दो साल से सीएचओ के पद पर काम कर रही हैं, इसके पहले वो नर्स के तौर पर काम करती थीं। 

कई अन्य शोधों में भी ये पाया गया है कि महिलाएं प्रजनन सेवाओं और यौन स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं के लिए महिला डॉक्टर के पास जाना ही बेहतर समझती हैं। यौन स्वास्थ्य से जुड़ी बीमरियां या ऐसी समस्याएं जिन्हें निजी माना जाता है, सामाजिक तौर पर संवेदनशील हैं या इनसे कोई शर्म या कलंक जुड़ा होता है, ऐसे मामलों में सामाजिक धारणा होती है कि एक महिला ही महिला की ज़रूरत को बेहतर समझ पाएगी और सही सुझाव दे पाएगी।

“औरतें आपस में आराम से बात कर पाती हैं, डॉक्टर का भी तो पति होता है, वो सब दिक्कत समझ पाती हैं। अब जैसे नसबंदी के लिए अच्छा हो अगर कोई महिला डॉक्टर आए पर आमतौर पर पुरुष सर्जन ही आते हैं,” श्रावस्ती ज़िले में कार्यरत आशा हेड आरती ने बताया।

ये भी देखा गया है कि ज़्यादातर महिला डॉक्टर खुल कर बात करती हैं, इलाज के साथ अक्सर सुझाव भी देती हैं, ज़्यादा संवेदनशील होती हैं और बेहतर तरीक़े से मरीज़ का ख़याल रख पाती हैं। इस शोध का कहना है कि महिला डॉक्टर को चुनने या उन्हें बेहतर मानने के पीछे, उनका तकनीकी ज्ञान नहीं बल्कि समाज की लैंगिक धारणाएं हैं।

“अगर जांच की बात करें तो जैसे स्तन कैंसर की जांच हुई, ये जांच पहले स्तनों को छूकर की जाती है कि कहीं कोई गांठ है या नहीं, अब अगर डॉक्टर पुरुष है तो वो एएनएम की मदद लेंगे उन्हें बताएंगे कि क्या कैसे करना है, अगर कोई लम्प्स महसूस होते हैं तो आगे बड़े डॉक्टर के पास उन्हें भेज देंगे। लेकिन अगर डॉक्टर महिला है तो वो ख़ुद ही ठीक से जांच कर सकती है,” महिला सीएचओ सौरभ यादव ने बताया।

ऐसे समाज में जहां के रिवाज़ लड़कियों को बांध कर रखते हैं और महिलाओं के पास डॉक्टर चुनने या अपनी इच्छा से बाहर जाने की भी आज़ादी न के बराबर होती है, ऐसे में अगर महिला डॉक्टर की उपलब्धता हो तो महिलाओं के लिए स्वास्थ्य व्यवस्था तक पहुंचना और इसका लाभ उठाना सरल हो जाता है।

 

‘’जहां महिला डॉक्टर बैठती हैं, तो महिलाएं उन्हीं के पास जाती हैं, कभी अगर वो छुट्टी पर हैं या नहीं बैठी हैं तो महिलाएं यह बोलकर वापस चली जाती हैं, कि कल आएंगे,” श्रावस्ती की आशा हेड, आरती ने बताया।

शोध में ये भी कहा गया है कि न सिर्फ़ महिलाएं महिला डॉक्टर के प्रति ज़्यादा रुझान दिखाती हैं बल्कि वो पुरुष स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के पास भी कम जाती हैं। आरती भी ऐसा ही बताती हैं, "ओपीडी में भीड़ बहुत होती है, आस-पास काफ़ी सारे आदमी होते हैं, अब वहां पुरुष डॉक्टर बैठा हो तो महिलाएं कहां खुल के बात कर पाएंगी।”

महिला डॉक्टरों के साथ ज़्यादा सहज होती हैं ग्रामीण महिलाएं

“महिला डॉक्टर होने से आसानी तो होती है पर महिला डॉक्टर हैं कहां इतनी, उनको दिखाने के लिए बैठे रहो तो बैठे रहो”, आरती सिंह ने कहा।  

‘’हम जब महिलाओं को डॉक्टर के पास दिखाने ले जाते हैं अगर डॉक्टर महिला होती है वो सवाल पूछती है और महिलाएं आराम से जवाब देती हैं लेकिन अगर कभी कोई पुरुष डॉक्टर उनसे कुछ पूछ ले तो वो शरमा  जाती हैं। कई बार सही जवाब भी नहीं पाती हैं और मुझसे कहती हैं कि दीदी डॉक्टर बेशर्म था कैसे औरतों वाली बातें कर रहा था,” लखनऊ ज़िले के कटरा बक्कास की आशा बहू पुष्पा भारती ने बताया। 

ग्रामीण अस्पतालों में महिला डॉक्टरों की कमी एक बड़ी चुनौती है। शोध में शामिल 2012-13 के आंकड़ो के मुताबिक़, 28% यानी 256 में से सिर्फ़ 72 ज़िलों में 50% से ज़्यादा पीएचसी में महिला डॉक्टर मौजूद थीं। 

“शोध के आंकड़े 2012-13 के हैं, जहां हम बड़ी संख्या में ख़ाली पदों देख सकते हैं। हो सकता है 2020 तक कोई सुधार आया हो। अगर ऐसा हुआ है तो हमें हैरानी होगी। क्योंकि महिला डॉक्टर की ट्रेनिंग और ग्रामीण इलाक़ों में इनके रहने की व्यवस्था आदि की ओर कोई क़दम नहीं उठाए गए हैं और ये देश की प्राथमिकता है ही नहीं,” शोध की मुख्य लेखक नंदिता भान ने बताया। 

महिला डॉक्टरों की कमी के कई कारण है। 2011 के आंकड़ों के मुताबिक़, मेडिकल कॉलेजों में दाखिला लेने वालो में 51% लड़कियां थीं लेकिन पोस्ट-ग्रेजुएशन तक आते आते सिर्फ़ एक तिहाई लड़कियां ही बची थीं यानी सिर्फ़ 17% एलोपैथिक डॉक्टर।

 

“अकेले काम कर रही महिला डॉक्टर को काफ़ी दिक़्क़तों का सामना करना पड़ता है, अगर सीनियर जैसे प्रभारी मेडिकल अधिकारी का सहयोग न हो तो कई बार ग्रामीण इलाक़ों में रहना बहुत कठिन होता है,” सौरभ बताती हैं। 

साथ ही महिला डॉक्टर, नर्स और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकत्रियां  नौकरी के दौरान कई चुनौतियों का सामना करती हैं। शोध के अनुसार ये चुनौतियां हैं कम आय, अधिकार की कमी, हिंसा की धमकी आदि जिसकी वजह से नौकरियां कम दी जाती हैं और नौकरियां छोड़ने की दर भी ज़्यादा है। 

“महिलाएं (डॉक्टर) अक्सर अपनी सुरक्षा और ग्रामीण इलाक़ों में रहने के लिए सही परिवेश से जुड़ी चिंताएं ज़ाहिर करती हैं, जो कि पुरुष अक्सर नहीं करते हैं,” शोध की सह-लेखक अनिता राज ने बताया। 

शोध में कुछ अस्पतालों में किए गए एक अध्ययन में का भी ज़िक्र किया गया। इस अध्ययन में पाया गया कि अस्पतालों में काम करने वाले स्टाफ़ (जिसमें महिलाएं भी शामिल हैं) में से 41% ने मौखिक उत्पीड़न, 45% ने मानसिक उत्पीड़न, 15% ने अश्लील इशारों और अश्लील हरकतों और 27% ने अनचाहे स्पर्श (27%) का सामना किया। 

“गांव में कई तरह के मरीज़ आते हैं, कभी कोई गांव के आदमी आ गए, आप पूरे अस्पताल में अकेले बैठी हैं और वो बदतमीज़ी से बात करें तो सीनियर की मदद चाहिए होती है, वो किसी लोकल व्यक्ति को या प्रधान को अस्पताल भेजते हैं, वरना अकेले कोई क्या कर लेगा,” सौरभ ने बताया। 

साथ ही मेडिकल ट्रेनिंग स्कूल ज़्यादातर शहरी इलाक़ों में होते हैं जहां महिला डॉक्टर काम और घरेलू ज़िम्मेदारियां एक साथ निभा लेती हैं, ऐसे में महिलाएं अक्सर अपने घर-परिवार से दूर किसी अस्पताल में तैनाती से बचती हैं, अक्सर परिवार की ओर से भी उन पर दबाव होता है।

“मेरी पोस्टिंग भी यहां एकदम ग्रामीण इलाक़े में हैं, मेरे साथ जो दूसरी महिला डॉक्टर हैं उनका परिवार लखनऊ में रहता हैं, बच्चे स्कूल जाते हैं, यहां कहां स्कूल है तो उन्होंने अपना परिवार लखनऊ में छोड़ रखा है और ख़ुद अकेले यहां नौकरी कर रही हैं, बच्चों के साथ समय नहीं बिता पातीं, सिर्फ़ छुट्टी पर ही घर जाना होता है, परिवार सहयोग कर रहा है तो कर पा रही हैं,” महिला सीएचओ सौरभ यादव ने बताया।

इन समस्याओं के समाधान के लिए भारत सरकार ने कॉन्ट्रेक्ट पर रखने, सुदूर इलाक़ों में काम करने लिए ज़्यादा मानदेय देना शुरू किया और राज्यों से कहा कि अस्पतालों के कर्मचारियों में हाशिये पर पड़े तबक़ों जैसे महिलाओं को शामिल किया जाए। शोध के अनुसार इस सब के बाद भी प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था में महिलाओं की कमी बनी हुई है। 

(साधिका, इंडियास्पेंड के साथ प्रिन्सिपल कॉरेस्पॉंडेंट हैं। इस रिपोर्ट में लखनऊ से श्रंखला पांडेय का इनपुट शामिल है। श्रंखला, लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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नई दिल्ली/लखनऊ: देश में महिलाओं के ख़राब स्वास्थ्य की सबसे बड़ी वजहों में से एक है महिला डॉक्टरों की कमी। देश के ग्रामीण इलाक़ों में ज़्यादातर महिलाएं पर्दे या घूंघट में रहती हैं। उन्हें पराए मर्दों से बात करने और उनके सामने जाने तक की मनाही होती है। ऐसे में महिलाएं पुरुष डॉक्टरों को अपनी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बताने से परहेज़ करती हैं।

  

“अब कोई अंदरूनी बीमारी होती है तो आदमियों से उतना खुलकर कैसे बताएं? डॉक्टर महिला होती है तो हम खुलकर अपनी समस्याएं उन्हें बता सकते हैं, इलाज भी करवा सकते हैं। मान लीजिए हमें कभी सुई (इंजेक्शन) ही लगवानी हो तो नर्स से ही लगवाएंगे न। आदमी से कैसे लगवा लें,” उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ज़िले के देवरा गांव की बबीता सिंह का सवाल था।

 

सिर्फ़ अस्पताल होना और उसमें डॉक्टर होना ही काफ़ी नहीं है, अस्पताल में महिला डॉक्टर की मौजूदगी स्वास्थ्य सुविधाओं के इस्तेमाल पर असर डाल सकती है। स्वास्थ्य केंद्रों में महिला डॉक्टरों के न होने से महिलाएं प्रजनन और जच्चा जैसी स्वास्थ्य सेवाओं की लिए स्वास्थ्य केंद्र जाने से कतराती हैं। कोरोनावायरस के दौरान जब ग्रामीण भारत डॉक्टरों की कमी के साथ इस महामारी से लड़ रहा है, ऐसे में अस्पतालों में महिला डॉक्टर का मिलना और मुश्किल हो गया है।

“कोरोनावायरस के बाद स्वास्थ्य सेवाओं में काफी बदलाव हुए हैं। इस महामारी के दौर में भी हम उन्हीं सीमित संसाधनों में काम कर रहे हैं। उसी स्टाफ़ को कोविड की ड्यूटी भी करनी है और दूसरे मरीज़ों को भी देखना है। अब सीएचसी की महिला डॉक्टर की ड्यूटी जब कोविड में लगी है तो बाकी मरीज़ों को परेशानी तो होगी ही,”  लखनऊ के सरोजनी नगर ब्लॉक की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. पूर्णिमा घूसिया ने बताया।

महिला डॉक्टरों के होने से महिलाएं अपनी बीमारियों के बारे में खुलकर बात कर पाती हैं, ऐसा एक शोध में भी सामने आया है।

ये शोध द लैन्सेट मेडिकल जर्नल की पत्रिका, ई क्लिनिकल जर्नल में 5 मार्च 2020 को प्रकाशित हुआ। इस शोध में भारत के 18 राज्यों के 256 ज़िलों के ज़िला स्तरीय आंकड़ों का विश्लेषण किया गया।

 

“महिलाओं को लगता है कि जब सामने महिला डॉक्टर होगी तो अपनी समस्याएं खुल कर उनसे बता पाएंगी, ज़्यादा अच्छे से अपनी बात को समझा पाएंगी,” उत्तरप्रदेश के रायबरेली ज़िले के हरचंदपुर की आशा कार्यकत्री, आरती सिंह (36) ने बताया। आरती यहां 15 साल से काम कर रही हैं, ये इस इलाक़े की आशा हेड हैं और 140 आशाओं के काम की निगरानी भी करती है।

शोध के दौरान सभी 256 ज़िलों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) में महिला डॉक्टरों की उपलब्धता के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया और ये जानने कि कोशिश की गई, कि महिला डॉक्टर की मौजूदगी का स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ उठाने वाली महिलाओं पर क्या असर पड़ता है।

 

लोकसभा में दिसम्बर 2017 में पूछे गए एक सवाल के जवाब में केंद्र सरकार ने ये बात मानी थी कि देश में महिला डॉक्टरों की कमी से जुड़े आंकड़े इकट्ठ नहीं किए जाते हैं। यानी डॉक्टरों की कमी के आंकड़े उपलब्ध हैं पर प्राथमिक स्वास्थ केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और ज़िला अस्पतालों में महिला डॉक्टरों की कितनी कमी है इसका कोई लेखा-जोखा सरकार के पास नहीं है। आंकड़े इकट्ठे् करना इसलिए बेहद ज़रूरी हो जाता है क्योंकि इन्हीं आंकड़ों के आधार पर ही सरकार नीतियां बनाती है, आपूर्तियों और ख़ामियों का आंकलन करती है और इन्हें सुधारने के लिए क़दम उठाती है।

ई क्लिनिकल जर्नल में छपे इस शोध में जिन स्वास्थ्य सुविधाओं का अध्ययन किया गया उसमें परिवार नियोजन के तरीकों का इस्तेमाल, गर्भावस्था के दौरान जच्चा (मां) की देखभाल, विशेषज्ञ की निगरानी में प्रसव, प्रसव के बाद जच्चा-बच्चा दोनों की देखभाल और बच्चे का टीकाकरण शामिल था।

शोध में ये बात भी सामने आई कि जिन ज़िलों के पीएचसी में महिला डॉक्टरों की संख्या ज़्यादा है उन ज़िलों में प्रजनन और जच्चा स्वास्थ्य सेवाओं का महिलाओं ने ज़्यादा लाभ उठाया।

“हमको बीते कुछ दिन से माहवारी को लेकर परेशानी है, सब कुछ ठीक होता तो अस्पताल जाकर डॉक्टर को दिखा लेते लेकिन कोरोना की वजह से अस्पताल में महिला डॉक्टर कभी रहती हैं तो कभी नहीं, इसलिए हम अभी घरेलू उपाय ही करते हैं। जब वो बैठने लगेंगी तभी दिखाएंगे,”  बाराबंकी की बबीता ने कहा।

“डॉक्टर अगर महिला हो तो महिलाएं डॉक्टर के पास ज़्यादा जाती हैं। अगर डॉक्टर पुरुष हो तो कभी-कभी उनकी (महिलाओं की) सास या उनके पति उन्हें अकेले अस्पताल जाने से रोक देते हैं या उनके साथ ख़ुद अस्पताल जाते हैं। जबकि (महिला डॉक्टर की मौजूदगी में) महिलाएं ख़ुद अकेली ही चली जाती हैं,” आरती ने बताया। 

 

महिलाओं को अस्पताल में महिला डॉक्टर ही देखें. ऐसा उनके पति भी चाहते हैं। देवरा गांव की संध्या देवी कहती हैं उनके पति को नहीं पसंद कि महिलाओं वाली बीमारी वो किसी दूसरे पुरुष को बताएं भले ही वो डॉक्टर ही क्यों न हो। 

डॉक्टरों की कमी ग्रामीण इलाकों के लिए चिंता का विषय

ग़रीब, ग्रामीण और सूदूर इलाक़ों में डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की कमी, ना सिर्फ़ भारत में, बल्कि दुनिया भर में एक चुनौती है। भारत के ग्रामीण इलाक़ों में डॉक्टरों की कमी की वजह से भारत यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज (यूएचसी) के लक्ष्य में पिछड़ गया है और इसी वजह से भारत अपने प्रजनन और जच्चा-बच्चा स्वास्थ्य (आरएमसीएच) के लक्ष्य भी पूरे नहीं कर पाया है। 

शोध के अनुसार डॉक्टरों की कमी तो चिंता का एक बड़ा विषय है ही, इनके असामान्य वितरण का भी प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर दुष्प्रभाव देखा गया है, ख़ासकर, भारत जैसे मध्यम आय वाले देशों में।  

भारत सरकार ने महिला डॉक्टर की महत्ता समझते हुए हर पीएचसी में एक महिला मेडिकल ऑफ़िसर (एलएमओ) का पद बनाया है। एलएमओ की मुख्य ज़िम्मेदारियों में परिवार कल्याण योजनाओं का क्रियान्वन देखना शामिल है।

औसतन जिन ज़िलों के आधे से ज़्यादा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में कम से कम एक एलएमओ तैनात थी, उन ज़िलों में महिलाओं ने ज़्यादा से ज़्यादा जच्चा-बच्चा स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाया, जैसा कि हमने पहले बताया था। 

महिला डॉक्टर होने से परिवार नियोजन के इस्तेमाल में बढ़त देखी गई, साथ ही प्रसव पूर्व जांच और देखभाल, प्रसव के बाद देखभाल और विशेषज्ञ की निगरानी में प्रसव के मामलों में भी बढ़त देखी गई। लेकिन महिला डॉक्टर होने का शिशु देखभाल और टीकाकरण पर कोई ख़ास असर नहीं खा गया।

“डॉक्टरों की संख्या में अगर लैंगिक समानता लाई जाए तो ग्रामीण इलाक़ों में महिला डॉक्टर की मौजूदगी, भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं के इस्तेमाल में इज़ाफा ला सकती है.” शोध में कहा गया।

 

15 से 49 साल की विवाहित महिलाओं में परिवार नियोजन के नए तरीक़ों के इस्तेमाल में, महिला डॉक्टर की मौजूदगी से 4.06% का अंतर देखा गया। जिन ज़िलों के 50% से कम पीएचसी में एक भी महिला डॉक्टर नहीं थी वहां परिवार नियोजन के तरीक़ों का 47.04% इस्तेमाल हुआ। पर जिन ज़िलों के 50% से ज़्यादा पीएचसी में कम से कम एक महिला डॉक्टर मौजूद थी वहां परिवार नियोजन के तरीक़ों का 51.1% इस्तेमाल हुआ।

प्रसव पूर्व जांच के लिए गर्भावस्था के दौरान कम से कम चार बार अस्पताल जाने वाली महिलाओं की संख्या में 9.5% का अंतर देखा गया। जिन ज़िलों के 50% से कम पीएचसी में एक भी महिला डॉक्टर नहीं थी वहां 62.9% महिलाएं गर्भावस्था के दौरान जांच के लिए गईं लेकिन जिन ज़िलों के 50% से ज़्यादा पीएचसी में कम से कम एक महिला डॉक्टर मौजूद थी वहां 72.4% गर्भवती महिलाओं ने प्रसव पूर्व जांच सुविधाओं का लाभ उठाया।

प्रसव के दौरान विशेषज्ञ यानी डॉक्टर, नर्स, महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता (लेडी हेल्थ विज़िटर या एलएचवी), एएनएम या किसी अन्य स्वास्थ्य कार्यकर्ता की निगरानी में होने वाले प्रसव में 9.4% की बढ़त देखी गई। जिन ज़िलों के 50% से कम पीएचसी में एक भी महिला डॉक्टर नहीं थी वहां 82.5% प्रसव किसी विशेषज्ञ की निगरानी में हुए। लेकिन जिन ज़िलों के 50% से ज़्यादा पीएचसी में कम से कम एक महिला डॉक्टर मौजूद थी वहां 91.9% बच्चों का जन्म किसी विशेषज्ञ की निगरानी में हुआ।

प्रसव के बाद देखभाल (पीएनसी) यानी बच्चे के जन्म के बाद दो दिन के अंदर मां की डॉक्टर, नर्स, एलएचवी, एएनएम, दाई या किसी अन्य स्वास्थ्य कार्यकर्ता द्वारा जांच और देखरेख। जच्चा की पीएनसी में महिला डॉक्टर की मौजूदगी से पीएनसी का लाभ उठाने वाली महिलाओं में 7.4% का अंतर देखा गया। जिन ज़िलों के 50% से कम पीएचसी में एक भी महिला डॉक्टर नहीं थी वहां 65.2% महिलाओं ने पीएनसी का लाभ उठाया। लेकिन जिन ज़िलों के 50% से ज़्यादा पीएचसी में कम से कम एक महिला डॉक्टर मौजूद थी वहां 72.6% महिलाओं की प्रसव के बाद, दो दिन के अंदर देखभाल हुई।

“अगर कोई निजी बीमारी है और महिला को अस्पताल जाने में शर्म आ रही है तो हम उससे पूछकर डॉक्टर को उसकी बीमारी बता देते हैं, और उसे डॉक्टर का पर्चा लाकर दे देते हैं,” लखनऊ के रहमत नगर में काम करने वाली आशा कार्यकर्ता शिव देवी ने बताया।

“इस शोध के नतीजे और विश्व-स्तरीय शोधों से पता चलता है कि महिला डॉक्टरों के होने से महिलाएं अस्पताल जाने में ज़्यादा सहज महसूस करती हैं और अपने लिए स्वास्थ्य सुविधाओं का ज़्यादा इस्तेमाल करती हैं,” इस शोध की मुख्य लेखक और कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑन जेंडर इक्वटी एंड हेल्थ में रिसर्च साइंटिस्ट, नंदिता भान ने इंडियास्पेंड को बताया।

 

लखनऊ जिले के बक्शी तालाब ब्लॉक के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर  तैनात महिला डॉक्टर ममता राजपूत के बाकी सहकर्मियों की कोरोना में ड्यूटी लगी है। डॉ ममता पीएचसी पर ही ड्यूटी कर रही हैं। “जब शहरों में ये हाल है कि महिलाएं अपनी कुछ स्वास्थ्य समस्याएं सिर्फ़ महिला डॉक्टर से ही बता पाती हैं तो गांव का अंदाजा ख़ुद ही लगाया जा सकता है कि वो कैसे पुरुष डॉक्टरों के आगे बात कर पाएंगी। महिलाओं की कई  ऐसी बीमारियां हैं जो छुपाने और लंबे समय तक इलाज न होने की वजह से गंभीर हो जाती हैं। ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि उनके आस-पास कोई महिला डॉक्टर नहीं होती है,” डॉ. ममता ने कहा। 

महिला डॉक्टर से महिलाएं बेझिझक बीमारियों की बात करती हैं 

दुनिया भर में ये पाया गया है कि महिलाएं अपनी निजी बीमारियों के बारे में बात करते हुए एक महिला डॉक्टर के साथ ज़्यादा सहज महसूस करती हैं। 

“ज़्यादा महिला डॉक्टरों वाले स्वास्थ्य केंद्र एक वातावरण पैदा करते हैं जो महिलाओं की ज़रूरतों के लिए ज़्यादा उपयुक्त होता है। ये सुनिश्चित करता है महिला डॉक्टरों की भागीदारी, ना सिर्फ़ एक चिकित्सक की होती है बल्कि ग्रामीण महिलाओं के बीच वो एक रोल मॉडल और लीडर की तरह काम करती है,” शोध में कहा गया।

“कोई भी महिला किसी भी पुरुष डॉक्टर के सामने असहज तो महसूस करती ही है, इसीलिए जितने भी गायनेकॉलोजिस्ट या स्त्री रोग के पुरुष डॉक्टर हैं वो गांव में अपने साथ हमेशा किसी महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता को साथ में बिठाते हैं,” उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती के सिरसिया सीएचसी में कम्युनिटी हेल्थ ऑफ़िसर (सीएचओ) के पद पर तैनात सौरभ यादव (30) ने बताया। सौरभ दो साल से सीएचओ के पद पर काम कर रही हैं, इसके पहले वो नर्स के तौर पर काम करती थीं। 

कई अन्य शोधों में भी ये पाया गया है कि महिलाएं प्रजनन सेवाओं और यौन स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं के लिए महिला डॉक्टर के पास जाना ही बेहतर समझती हैं। यौन स्वास्थ्य से जुड़ी बीमरियां या ऐसी समस्याएं जिन्हें निजी माना जाता है, सामाजिक तौर पर संवेदनशील हैं या इनसे कोई शर्म या कलंक जुड़ा होता है, ऐसे मामलों में सामाजिक धारणा होती है कि एक महिला ही महिला की ज़रूरत को बेहतर समझ पाएगी और सही सुझाव दे पाएगी।

“औरतें आपस में आराम से बात कर पाती हैं, डॉक्टर का भी तो पति होता है, वो सब दिक्कत समझ पाती हैं। अब जैसे नसबंदी के लिए अच्छा हो अगर कोई महिला डॉक्टर आए पर आमतौर पर पुरुष सर्जन ही आते हैं,” श्रावस्ती ज़िले में कार्यरत आशा हेड आरती ने बताया।

ये भी देखा गया है कि ज़्यादातर महिला डॉक्टर खुल कर बात करती हैं, इलाज के साथ अक्सर सुझाव भी देती हैं, ज़्यादा संवेदनशील होती हैं और बेहतर तरीक़े से मरीज़ का ख़याल रख पाती हैं। इस शोध का कहना है कि महिला डॉक्टर को चुनने या उन्हें बेहतर मानने के पीछे, उनका तकनीकी ज्ञान नहीं बल्कि समाज की लैंगिक धारणाएं हैं।

“अगर जांच की बात करें तो जैसे स्तन कैंसर की जांच हुई, ये जांच पहले स्तनों को छूकर की जाती है कि कहीं कोई गांठ है या नहीं, अब अगर डॉक्टर पुरुष है तो वो एएनएम की मदद लेंगे उन्हें बताएंगे कि क्या कैसे करना है, अगर कोई लम्प्स महसूस होते हैं तो आगे बड़े डॉक्टर के पास उन्हें भेज देंगे। लेकिन अगर डॉक्टर महिला है तो वो ख़ुद ही ठीक से जांच कर सकती है,” महिला सीएचओ सौरभ यादव ने बताया।

ऐसे समाज में जहां के रिवाज़ लड़कियों को बांध कर रखते हैं और महिलाओं के पास डॉक्टर चुनने या अपनी इच्छा से बाहर जाने की भी आज़ादी न के बराबर होती है, ऐसे में अगर महिला डॉक्टर की उपलब्धता हो तो महिलाओं के लिए स्वास्थ्य व्यवस्था तक पहुंचना और इसका लाभ उठाना सरल हो जाता है।

 

‘’जहां महिला डॉक्टर बैठती हैं, तो महिलाएं उन्हीं के पास जाती हैं, कभी अगर वो छुट्टी पर हैं या नहीं बैठी हैं तो महिलाएं यह बोलकर वापस चली जाती हैं, कि कल आएंगे,” श्रावस्ती की आशा हेड, आरती ने बताया।

शोध में ये भी कहा गया है कि न सिर्फ़ महिलाएं महिला डॉक्टर के प्रति ज़्यादा रुझान दिखाती हैं बल्कि वो पुरुष स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के पास भी कम जाती हैं। आरती भी ऐसा ही बताती हैं, "ओपीडी में भीड़ बहुत होती है, आस-पास काफ़ी सारे आदमी होते हैं, अब वहां पुरुष डॉक्टर बैठा हो तो महिलाएं कहां खुल के बात कर पाएंगी।”

महिला डॉक्टरों के साथ ज़्यादा सहज होती हैं ग्रामीण महिलाएं

“महिला डॉक्टर होने से आसानी तो होती है पर महिला डॉक्टर हैं कहां इतनी, उनको दिखाने के लिए बैठे रहो तो बैठे रहो”, आरती सिंह ने कहा।  

‘’हम जब महिलाओं को डॉक्टर के पास दिखाने ले जाते हैं अगर डॉक्टर महिला होती है वो सवाल पूछती है और महिलाएं आराम से जवाब देती हैं लेकिन अगर कभी कोई पुरुष डॉक्टर उनसे कुछ पूछ ले तो वो शरमा  जाती हैं। कई बार सही जवाब भी नहीं पाती हैं और मुझसे कहती हैं कि दीदी डॉक्टर बेशर्म था कैसे औरतों वाली बातें कर रहा था,” लखनऊ ज़िले के कटरा बक्कास की आशा बहू पुष्पा भारती ने बताया। 

ग्रामीण अस्पतालों में महिला डॉक्टरों की कमी एक बड़ी चुनौती है। शोध में शामिल 2012-13 के आंकड़ो के मुताबिक़, 28% यानी 256 में से सिर्फ़ 72 ज़िलों में 50% से ज़्यादा पीएचसी में महिला डॉक्टर मौजूद थीं। 

“शोध के आंकड़े 2012-13 के हैं, जहां हम बड़ी संख्या में ख़ाली पदों देख सकते हैं। हो सकता है 2020 तक कोई सुधार आया हो। अगर ऐसा हुआ है तो हमें हैरानी होगी। क्योंकि महिला डॉक्टर की ट्रेनिंग और ग्रामीण इलाक़ों में इनके रहने की व्यवस्था आदि की ओर कोई क़दम नहीं उठाए गए हैं और ये देश की प्राथमिकता है ही नहीं,” शोध की मुख्य लेखक नंदिता भान ने बताया। 

महिला डॉक्टरों की कमी के कई कारण है। 2011 के आंकड़ों के मुताबिक़, मेडिकल कॉलेजों में दाखिला लेने वालो में 51% लड़कियां थीं लेकिन पोस्ट-ग्रेजुएशन तक आते आते सिर्फ़ एक तिहाई लड़कियां ही बची थीं यानी सिर्फ़ 17% एलोपैथिक डॉक्टर।

 

“अकेले काम कर रही महिला डॉक्टर को काफ़ी दिक़्क़तों का सामना करना पड़ता है, अगर सीनियर जैसे प्रभारी मेडिकल अधिकारी का सहयोग न हो तो कई बार ग्रामीण इलाक़ों में रहना बहुत कठिन होता है,” सौरभ बताती हैं। 

साथ ही महिला डॉक्टर, नर्स और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकत्रियां  नौकरी के दौरान कई चुनौतियों का सामना करती हैं। शोध के अनुसार ये चुनौतियां हैं कम आय, अधिकार की कमी, हिंसा की धमकी आदि जिसकी वजह से नौकरियां कम दी जाती हैं और नौकरियां छोड़ने की दर भी ज़्यादा है। 

“महिलाएं (डॉक्टर) अक्सर अपनी सुरक्षा और ग्रामीण इलाक़ों में रहने के लिए सही परिवेश से जुड़ी चिंताएं ज़ाहिर करती हैं, जो कि पुरुष अक्सर नहीं करते हैं,” शोध की सह-लेखक अनिता राज ने बताया। 

शोध में कुछ अस्पतालों में किए गए एक अध्ययन में का भी ज़िक्र किया गया। इस अध्ययन में पाया गया कि अस्पतालों में काम करने वाले स्टाफ़ (जिसमें महिलाएं भी शामिल हैं) में से 41% ने मौखिक उत्पीड़न, 45% ने मानसिक उत्पीड़न, 15% ने अश्लील इशारों और अश्लील हरकतों और 27% ने अनचाहे स्पर्श (27%) का सामना किया। 

“गांव में कई तरह के मरीज़ आते हैं, कभी कोई गांव के आदमी आ गए, आप पूरे अस्पताल में अकेले बैठी हैं और वो बदतमीज़ी से बात करें तो सीनियर की मदद चाहिए होती है, वो किसी लोकल व्यक्ति को या प्रधान को अस्पताल भेजते हैं, वरना अकेले कोई क्या कर लेगा,” सौरभ ने बताया। 

साथ ही मेडिकल ट्रेनिंग स्कूल ज़्यादातर शहरी इलाक़ों में होते हैं जहां महिला डॉक्टर काम और घरेलू ज़िम्मेदारियां एक साथ निभा लेती हैं, ऐसे में महिलाएं अक्सर अपने घर-परिवार से दूर किसी अस्पताल में तैनाती से बचती हैं, अक्सर परिवार की ओर से भी उन पर दबाव होता है।

“मेरी पोस्टिंग भी यहां एकदम ग्रामीण इलाक़े में हैं, मेरे साथ जो दूसरी महिला डॉक्टर हैं उनका परिवार लखनऊ में रहता हैं, बच्चे स्कूल जाते हैं, यहां कहां स्कूल है तो उन्होंने अपना परिवार लखनऊ में छोड़ रखा है और ख़ुद अकेले यहां नौकरी कर रही हैं, बच्चों के साथ समय नहीं बिता पातीं, सिर्फ़ छुट्टी पर ही घर जाना होता है, परिवार सहयोग कर रहा है तो कर पा रही हैं,” महिला सीएचओ सौरभ यादव ने बताया।

इन समस्याओं के समाधान के लिए भारत सरकार ने कॉन्ट्रेक्ट पर रखने, सुदूर इलाक़ों में काम करने लिए ज़्यादा मानदेय देना शुरू किया और राज्यों से कहा कि अस्पतालों के कर्मचारियों में हाशिये पर पड़े तबक़ों जैसे महिलाओं को शामिल किया जाए। शोध के अनुसार इस सब के बाद भी प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था में महिलाओं की कमी बनी हुई है। 

(साधिका, इंडियास्पेंड के साथ प्रिन्सिपल कॉरेस्पॉंडेंट हैं। इस रिपोर्ट में लखनऊ से श्रंखला पांडेय का इनपुट शामिल है। श्रंखला, लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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