देश का हर चौथा पुरुष अनीमिक: अनीमिया मुक्त भारत के लिए पुरुषों पर भी ध्यान देना ज़रूरी

नई दिल्ली: 15 से 54 साल की उम्र के बीच का हर चौथा पुरुष अनीमिया का शिकार है। अनीमिया यानी शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं की कमी। अनीमिया का मुख्य कारण अक्सर शरीर में आयरन की कमी को माना जाता है, हालाँकि विटामिन B12, विटामिन A और फ़ोलेट की कमी और लम्बे समय तक रहने वाली सूजन, परजीवी संक्रमण और वंशगत बीमारियाँ भी अनीमिया का कारण हो सकते हैं। इससे खून की शरीर के विभिन्न अंगों तक ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता कम हो जाती है और स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याएं पैदा होती हैं। कई मामलों में मृत्यु तक हो जाती है।

अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका, द लैंसेट में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 23.5% पुरुष अनीमिक हैं। ये शोध जनवरी 2015 से दिसम्बर 2016 तक किया गया जिसमें सामने आया कि भारत के 18% पुरुष थोड़े अनीमिक हैं, 5% पुरुष मध्यम रूप से अनीमिक हैं और 0.5% बहुत ज़्यादा अनीमिक हैं।

अनीमिक व्यक्ति को किसी स्वस्थ व्यक्ति के मुक़ाबले ज़्यादा थकान, आलस और कमज़ोरी महसूस होती है, साथ ही उन्हें चक्कर आते हैं और हर समय थोड़ी-थोड़ी नींद रहती है। 

भारत की आबादी में अनीमिया काफ़ी आम है, दुनिया भर के अनीमिया के मरीज़ों में से एक चौथाई लोग भारत में रहते हैं। 

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण या NFHS-4 के साल 2015-16 के आंकड़ों के अनुसार देश में 6 से 59 महीने की उम्र के 58.6% बच्चे अनीमिक हैं और इनके शरीर में हीमोग्लोबिन की मात्रा 11gm/dcl से कम है। हीमोग्लोबिन की मात्रा शरीर में आयरन की कमी का एक माप है, हालांकि अनीमिया सिर्फ़ आयरन की कमी से नहीं होता पर हीमोग्लोबिन का माप, अनीमिया को पहचानने का सबसे सरल और आम तौर पर इस्तेमाल किया जाने वाला तरीका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार 6 से 59 महीने के बच्चों में हीमोग्लोबिन की स्वस्थ मात्रा एक डेसीलीटर (एक लीटर का दसवाँ हिस्सा) ख़ून में 11 ग्राम होनी चाहिए।

भारत में 15 से 49 साल की 53.1% महिलाएँ अनीमिक हैं। इसी उम्र की 50.4% गर्भवती महिलाएँ अनीमिक हैं और इनके शरीर में हीमोग्लोबिन की मात्रा 11.0 से कम है। कुल महिलाएँ जो गर्भवती नहीं हैं उनमें से 53.2% अनीमिक हैं और इनके शरीर में हीमोग्लोबिन की मात्रा 12.0 से कम है। 

डब्ल्यूएचओ के अनुसार अनीमिया का सबसे ज़्यादा ख़तरा गर्भवती महिलाओं और बच्चों में होता है, इसीलिए देश में अनीमिया कम करने के लिए सबसे ज़्यादा ध्यान गर्भवती महिलाओं और बच्चों पर दिया जाता है। हाल ही में आया ये शोध कहता है कि पुरुषों में भी भारी संख्या में अनीमिया की बीमारी पाई जाती है, और उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

NFHS-4 के अनुसार देश के 15 से 49 साल के 22.7% पुरुष अनीमिक हैं हालांकि लैन्सेट पत्रिका में छपी रिपोर्ट के अनुसार ये आँकड़ा 23.5% है। स्वस्थ पुरुषों में हीमोग्लोबिन की मात्रा 13.0 या इस से अधिक होनी चाहिए। शोध के अनुसार 20 से 30 साल की उम्र के भारतीय पुरुषों में अनीमिया होने की सम्भावना सबसे कम होती है। इस शोध में नेशनल न्यूट्रीशन मॉनीटरिंग ब्यूरो के 2004-05 में नौ राज्यों के ग्रामीण इलाक़ों में किए गए एक और शोध का ज़िक्र किया गया है जिसके अनुसार भारत के 55% पुरुष अनीमिक हैं। ये शोध 3,397 पुरुषों पर किया गया। 

अनीमिया होने से व्यक्ति की उत्पादकता कम हो जाती है और जिंदगी पर आर्थिक बोझ बढ़ जाता है। वर्ष 2016 में, अनीमिया से जीडीपी में 22.64 बिलियन डॉलर (1.50 लाख करोड़ रुपए) के नुकसान का अनुमान लगाया गया था, जो वर्ष 2017-18 के लिए जारी स्वास्थ्य बजट से तीन गुना से ज़्यादा था।

अनीमिया पर हुए ज़्यादातर शोध अक्सर महिलाओं और बच्चों पर ही केंद्रित होते हैं और पुरुषों में अनीमिया पर ध्यान नहीं दिया जाता है। हालांकि पुरुषों के स्वास्थ्य पर भी अनीमिया का भारी दुष्प्रभाव होता है और उनकी आर्थिक उत्पादकता पर भी असर पड़ता है। द लैंसेट पत्रिका में छपे इस शोध का मकसद भारतीय पुरुषों में अनीमिया की समस्या की तरफ़ ध्यान आकर्षित करना था। इस शोध में भारत के पब्लिक हेल्थ फ़ाउंडेशन, संयुक्त राष्ट्र के वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम और कई विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं ने मिलकर काम किया, जिसमें 15 से 54 के साल के 1,06,298 भारतीय पुरुषों पर अध्ययन किया गया। 

पुरुषों में अनीमिया के स्तर में अलग-अलग राज्यों में काफ़ी अंतर है। मणिपुर में सबसे कम, 9.2%, पुरुष अनीमिक हैं जबकि बिहार में सबसे ज़्यादा, 32.9%, पुरुष अनीमिक हैं। नीचे दिए गए मानचित्र में भारत के अलग-अलग राज्यों में पुरुषों में अनीमिया का स्तर दिखाया गया है। बिहार में गाढ़ा बैंगनी रंग दर्शाता है कि राज्य में अनीमिक पुरुषों की संख्या सबसे ज़्यादा है। । 

Map: Prevalence of Anaemia In Indian States

Source: The Lancet 

कम शिक्षित, ग्रामीण इलाक़ों में रहने वाले, कम आमदनी वाले घरों में रहने वाले, धूम्रपान और तम्बाकू का सेवन करने वाले और कम वज़न के पुरुषों में अनीमिया ज़्यादा पाया गया। 

अक्सर पुरुषों में अनीमिया का पता इसलिए भी नहीं चल पाता है क्योंकि उनकी जाँच ही नहीं होती, जबकि गर्भावस्था के दौरान महिलाओं की अस्पताल में जाँच हो जाती है। 

अनीमिया मुक्त भारत

भारत ने देशभर में अनीमिया की रोकथाम और इलाज के लिए कई बड़ी योजनाएँ चलाईं, जिनमे से नेशनल न्यूट्रीशनल अनीमिया प्रिवेंशन प्रोग्राम मुख्य है। इस योजना के तहत बच्चों, गर्भवती महिलाओं और नई माताओं को आयरन और फ़ोलिक एसिड की मुफ़्त गोलियां 1970 से बांटी जा रही हैं। 2013 में शुरु हुई राष्ट्रीय आयरन प्लस पहल के तहत 10 से 19 साल के लड़कों को भी आयरन और फ़ोलिक एसिड की गोलियां बांटनी शुरू कर दी गईं। शोध के अनुसार नेशनल न्यूट्रीशनल अनीमिया प्रिवेंशन प्रोग्राम किसी भी उम्र के लोगों में अनीमिया कम नहीं कर पाया है और असफल रहा है। 

मार्च 2018 में सरकार ने बड़े स्तर पर अनीमिया कम करने के लिए एक बड़ा अभियान शुरू किया जिसका नाम है, ‘अनीमिया मुक्त भारत’। ये अभियान, सरकार के पोषण (POSHAN--Prime Minister’s Overarching Scheme for Holistic Nutrition) अभियान का हिस्सा है। इस अभियान का मक़सद बच्चों, गर्भवती महिलाओं और 10 से 19 साल की बच्चियों और किशोरियों तक पहुँचना है। इस योजना के तहत कई तरीक़ों का इस्तेमाल किया जाता है जिसमें आयरन और फ़ोलिक एसिड की गोलियां, पेट में कीड़े साफ़ करने की गोलियां, स्कूलों में खाने में पोषक तत्वों को अलग से मिलाना और मलेरिया की नियमित जाँच शामिल है। इस अभियान का लक्ष्य साल 2022 तक 45 करोड़ लोगों को फ़ायदा पहुंचाना है और हर साल देश में अनीमिया के आँकड़े को तीन percentage points नीचे लाना है। 

लैन्सेट में छपे शोध का निष्कर्ष है कि अनीमिया मुक्त भारत तब तक हासिल नहीं किया जा सकता है जब तक कि इस योजना के तहत पुरुषों को भी शामिल ना कर लिया जाए, ख़ासकर उन राज्यों में जहाँ काफ़ी ज़्यादा पुरुष अनीमिक हैं, जैसे बिहार। 

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि अनीमिया के ख़िलाफ़ जो कार्यक्रम जारी हैं अगर उन्हीं में पुरुषों को शामिल कर लिया जाए तो बिना ज़्यादा ख़र्च के पुरुषों के स्वास्थ्य में भी सुधार हो सकता है। इसके साथ ही ज़्यादा शोध की ज़रूरत है ताकि ये पता लगाया जा सके की किस तरह अनीमिया से जुड़े अभियान सबसे अच्छे तरीके से पुरुषों तक पहुँच सकते हैं।

(साधिका इंडियास्पेंड के साथ प्रिन्सिपल कॉरेस्पोंडेंट हैं)

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

नई दिल्ली: 15 से 54 साल की उम्र के बीच का हर चौथा पुरुष अनीमिया का शिकार है। अनीमिया यानी शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं की कमी। अनीमिया का मुख्य कारण अक्सर शरीर में आयरन की कमी को माना जाता है, हालाँकि विटामिन B12, विटामिन A और फ़ोलेट की कमी और लम्बे समय तक रहने वाली सूजन, परजीवी संक्रमण और वंशगत बीमारियाँ भी अनीमिया का कारण हो सकते हैं। इससे खून की शरीर के विभिन्न अंगों तक ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता कम हो जाती है और स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याएं पैदा होती हैं। कई मामलों में मृत्यु तक हो जाती है।

अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका, द लैंसेट में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 23.5% पुरुष अनीमिक हैं। ये शोध जनवरी 2015 से दिसम्बर 2016 तक किया गया जिसमें सामने आया कि भारत के 18% पुरुष थोड़े अनीमिक हैं, 5% पुरुष मध्यम रूप से अनीमिक हैं और 0.5% बहुत ज़्यादा अनीमिक हैं।

अनीमिक व्यक्ति को किसी स्वस्थ व्यक्ति के मुक़ाबले ज़्यादा थकान, आलस और कमज़ोरी महसूस होती है, साथ ही उन्हें चक्कर आते हैं और हर समय थोड़ी-थोड़ी नींद रहती है। 

भारत की आबादी में अनीमिया काफ़ी आम है, दुनिया भर के अनीमिया के मरीज़ों में से एक चौथाई लोग भारत में रहते हैं। 

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण या NFHS-4 के साल 2015-16 के आंकड़ों के अनुसार देश में 6 से 59 महीने की उम्र के 58.6% बच्चे अनीमिक हैं और इनके शरीर में हीमोग्लोबिन की मात्रा 11gm/dcl से कम है। हीमोग्लोबिन की मात्रा शरीर में आयरन की कमी का एक माप है, हालांकि अनीमिया सिर्फ़ आयरन की कमी से नहीं होता पर हीमोग्लोबिन का माप, अनीमिया को पहचानने का सबसे सरल और आम तौर पर इस्तेमाल किया जाने वाला तरीका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार 6 से 59 महीने के बच्चों में हीमोग्लोबिन की स्वस्थ मात्रा एक डेसीलीटर (एक लीटर का दसवाँ हिस्सा) ख़ून में 11 ग्राम होनी चाहिए।

भारत में 15 से 49 साल की 53.1% महिलाएँ अनीमिक हैं। इसी उम्र की 50.4% गर्भवती महिलाएँ अनीमिक हैं और इनके शरीर में हीमोग्लोबिन की मात्रा 11.0 से कम है। कुल महिलाएँ जो गर्भवती नहीं हैं उनमें से 53.2% अनीमिक हैं और इनके शरीर में हीमोग्लोबिन की मात्रा 12.0 से कम है। 

डब्ल्यूएचओ के अनुसार अनीमिया का सबसे ज़्यादा ख़तरा गर्भवती महिलाओं और बच्चों में होता है, इसीलिए देश में अनीमिया कम करने के लिए सबसे ज़्यादा ध्यान गर्भवती महिलाओं और बच्चों पर दिया जाता है। हाल ही में आया ये शोध कहता है कि पुरुषों में भी भारी संख्या में अनीमिया की बीमारी पाई जाती है, और उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

NFHS-4 के अनुसार देश के 15 से 49 साल के 22.7% पुरुष अनीमिक हैं हालांकि लैन्सेट पत्रिका में छपी रिपोर्ट के अनुसार ये आँकड़ा 23.5% है। स्वस्थ पुरुषों में हीमोग्लोबिन की मात्रा 13.0 या इस से अधिक होनी चाहिए। शोध के अनुसार 20 से 30 साल की उम्र के भारतीय पुरुषों में अनीमिया होने की सम्भावना सबसे कम होती है। इस शोध में नेशनल न्यूट्रीशन मॉनीटरिंग ब्यूरो के 2004-05 में नौ राज्यों के ग्रामीण इलाक़ों में किए गए एक और शोध का ज़िक्र किया गया है जिसके अनुसार भारत के 55% पुरुष अनीमिक हैं। ये शोध 3,397 पुरुषों पर किया गया। 

अनीमिया होने से व्यक्ति की उत्पादकता कम हो जाती है और जिंदगी पर आर्थिक बोझ बढ़ जाता है। वर्ष 2016 में, अनीमिया से जीडीपी में 22.64 बिलियन डॉलर (1.50 लाख करोड़ रुपए) के नुकसान का अनुमान लगाया गया था, जो वर्ष 2017-18 के लिए जारी स्वास्थ्य बजट से तीन गुना से ज़्यादा था।

अनीमिया पर हुए ज़्यादातर शोध अक्सर महिलाओं और बच्चों पर ही केंद्रित होते हैं और पुरुषों में अनीमिया पर ध्यान नहीं दिया जाता है। हालांकि पुरुषों के स्वास्थ्य पर भी अनीमिया का भारी दुष्प्रभाव होता है और उनकी आर्थिक उत्पादकता पर भी असर पड़ता है। द लैंसेट पत्रिका में छपे इस शोध का मकसद भारतीय पुरुषों में अनीमिया की समस्या की तरफ़ ध्यान आकर्षित करना था। इस शोध में भारत के पब्लिक हेल्थ फ़ाउंडेशन, संयुक्त राष्ट्र के वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम और कई विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं ने मिलकर काम किया, जिसमें 15 से 54 के साल के 1,06,298 भारतीय पुरुषों पर अध्ययन किया गया। 

पुरुषों में अनीमिया के स्तर में अलग-अलग राज्यों में काफ़ी अंतर है। मणिपुर में सबसे कम, 9.2%, पुरुष अनीमिक हैं जबकि बिहार में सबसे ज़्यादा, 32.9%, पुरुष अनीमिक हैं। नीचे दिए गए मानचित्र में भारत के अलग-अलग राज्यों में पुरुषों में अनीमिया का स्तर दिखाया गया है। बिहार में गाढ़ा बैंगनी रंग दर्शाता है कि राज्य में अनीमिक पुरुषों की संख्या सबसे ज़्यादा है। । 

Map: Prevalence of Anaemia In Indian States

Source: The Lancet 

कम शिक्षित, ग्रामीण इलाक़ों में रहने वाले, कम आमदनी वाले घरों में रहने वाले, धूम्रपान और तम्बाकू का सेवन करने वाले और कम वज़न के पुरुषों में अनीमिया ज़्यादा पाया गया। 

अक्सर पुरुषों में अनीमिया का पता इसलिए भी नहीं चल पाता है क्योंकि उनकी जाँच ही नहीं होती, जबकि गर्भावस्था के दौरान महिलाओं की अस्पताल में जाँच हो जाती है। 

अनीमिया मुक्त भारत

भारत ने देशभर में अनीमिया की रोकथाम और इलाज के लिए कई बड़ी योजनाएँ चलाईं, जिनमे से नेशनल न्यूट्रीशनल अनीमिया प्रिवेंशन प्रोग्राम मुख्य है। इस योजना के तहत बच्चों, गर्भवती महिलाओं और नई माताओं को आयरन और फ़ोलिक एसिड की मुफ़्त गोलियां 1970 से बांटी जा रही हैं। 2013 में शुरु हुई राष्ट्रीय आयरन प्लस पहल के तहत 10 से 19 साल के लड़कों को भी आयरन और फ़ोलिक एसिड की गोलियां बांटनी शुरू कर दी गईं। शोध के अनुसार नेशनल न्यूट्रीशनल अनीमिया प्रिवेंशन प्रोग्राम किसी भी उम्र के लोगों में अनीमिया कम नहीं कर पाया है और असफल रहा है। 

मार्च 2018 में सरकार ने बड़े स्तर पर अनीमिया कम करने के लिए एक बड़ा अभियान शुरू किया जिसका नाम है, ‘अनीमिया मुक्त भारत’। ये अभियान, सरकार के पोषण (POSHAN--Prime Minister’s Overarching Scheme for Holistic Nutrition) अभियान का हिस्सा है। इस अभियान का मक़सद बच्चों, गर्भवती महिलाओं और 10 से 19 साल की बच्चियों और किशोरियों तक पहुँचना है। इस योजना के तहत कई तरीक़ों का इस्तेमाल किया जाता है जिसमें आयरन और फ़ोलिक एसिड की गोलियां, पेट में कीड़े साफ़ करने की गोलियां, स्कूलों में खाने में पोषक तत्वों को अलग से मिलाना और मलेरिया की नियमित जाँच शामिल है। इस अभियान का लक्ष्य साल 2022 तक 45 करोड़ लोगों को फ़ायदा पहुंचाना है और हर साल देश में अनीमिया के आँकड़े को तीन percentage points नीचे लाना है। 

लैन्सेट में छपे शोध का निष्कर्ष है कि अनीमिया मुक्त भारत तब तक हासिल नहीं किया जा सकता है जब तक कि इस योजना के तहत पुरुषों को भी शामिल ना कर लिया जाए, ख़ासकर उन राज्यों में जहाँ काफ़ी ज़्यादा पुरुष अनीमिक हैं, जैसे बिहार। 

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि अनीमिया के ख़िलाफ़ जो कार्यक्रम जारी हैं अगर उन्हीं में पुरुषों को शामिल कर लिया जाए तो बिना ज़्यादा ख़र्च के पुरुषों के स्वास्थ्य में भी सुधार हो सकता है। इसके साथ ही ज़्यादा शोध की ज़रूरत है ताकि ये पता लगाया जा सके की किस तरह अनीमिया से जुड़े अभियान सबसे अच्छे तरीके से पुरुषों तक पहुँच सकते हैं।

(साधिका इंडियास्पेंड के साथ प्रिन्सिपल कॉरेस्पोंडेंट हैं)

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