‘नल से जल’ योजना के लिए चुनौती हैं यूपी और बिहार

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण इलाक़ों में आबादी का बड़ा हिस्सा पीने के पानी के लिए हैण्डपम्प या ट्यूबवेल के पानी का इस्तेमाल करता है। हाल ही में आई नेशनल सैम्पल सर्वे ऑफ़िस (एनएसएसओ) की रिपोर्ट में ये सामने आया है। 

नवंबर 23, 2019, को जारी इस रिपोर्ट के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश के 87.8% घरों में पीने के पानी का सबसे बड़ा ज़रिया हैण्डपम्प है, बिहार में ये आंकड़ा 94.3% है, जबकि देश का कुल औसत 42.9% है।

हैण्डपम्प के बाद पीने के पानी का दूसरा बड़ा ज़रिया है ट्यूबवेल। देश के 10.9% ग्रामीण घर पीने के पानी के लिए ट्यूबवेल पर निर्भर हैं। बिहार में 2.9% ग्रामीण परिवार ट्यूबवेल का इस्तेमाल करते हैं और उत्तर प्रदेश में ये आंकड़ा 6.1% है।

इन घरों के पीने के पानी के लिए ट्यूबवेल या हैण्डपम्प पर निर्भर होने का सबसे बड़ा कारण है इन घरों तक पाइपलाइन ना पहुंचना या फिर नलों में पानी की सप्लाई ना आना। एनएसएसओ के आंकड़ों के अनुसार बिहार के 1.7% और उत्तर प्रदेश के 3.8% ग्रामीण घरों में नलों से पीने के पानी की सुविधा उपलब्ध है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि देश के 18.41% यानी 3.29 करोड़ ग्रामीण घरों में ही अब तक पानी की पाइपलाइन पहुंच पाई है। केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2020 के बजट के दौरान ‘नल से जल’ योजना का ऐलान किया। इस योजना के तहत सरकार का लक्ष्य 2024 तक हर ग्रामीण घर में 55 लीटर पानी, प्रति व्यक्ति, प्रति दिन, नलों से पहुंचाने का है। लेकिन यूपी और बिहार के आंकड़े इस योजना के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है।

हैण्डपम्प और ट्यूबवेल का पानी प्रदूषित हो सकता है

ग्राउंड वाटर यानी ज़मीन के नीचे के जिस पानी को लोग साफ़ मान कर पीने के लिए इस्तेमाल करते हैं, वो अपने साथ कई बीमारियों को ला सकता है। 

द एनर्जी एंड रिसोर्स इंस्टीटूट्यूट (टेरी)  की मई 2019 की एक रिसर्च के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाक़ों में रहने वाले 2.34 करोड़ लोग जिस ग्राउंड वाटर का इस्तेमाल करते हैं उसमें आर्सेनिक रसायन ख़तरनाक स्तर पर पाया गया है।

उत्तर प्रदेश की 78% जनसंख्या ग्रामीण इलाक़ों में रहती है जिसमें से 80% के लिए पानी का ज़रिया ग्राउंड वाटर ही है। पाइप से पानी की  सप्लाई ना होने की वजह से लोगों में आर्सेनिक प्रदूषण के असर का ख़तरा बढ़ जाता है।

रिसर्च के मुताबिक़, यूपी के कुल 40 ज़िलों के ग्राउंड वाटर में आर्सेनिक प्रदूषण पाया गया। बलिया, गोरखपुर, बाराबंकी, ग़ाज़ीपुर, गोंडा, फ़ैज़ाबाद और लखीमपुर खीरी में हालात सबसे ख़राब है क्योंकि यहाँ के ग्राउंड वाटर में आर्सेनिक की मात्रा ज़्यादा है। आर्सेनिक प्रदूषण से जूझ रहे ज़्यादातर ज़िले गंगा, राप्ति और घाघरा नदी के आसपास के हैं। 

जल प्रदूषण से जूझने वाला उत्तर प्रदेश अकेला राज्य नहीं है, टेरी की रिसर्च के मुताबिक़, देशभर में क़रीब 10 करोड़ लोग पानी में आर्सेनिक प्रदूषण से जूझ रहे हैं। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़ आर्सेनिक प्रदूषण से जूझने वाले लोगों की कुल संख्या 13.8 करोड़ है।  

देश में ज़मीन के ऊपर मौजूद कुल पानी का 37% प्रतिशत इस्तेमाल करने के लायक है, बाक़ी में आर्सेनिक और उस जैसे ही अन्य हानिकारक रसायन मौजूद हैं। इसी तरह देश में मौजूद ग्राउंड वाटर में से 58% इस्तेमाल के लायक है। ये आँकड़े इंडियास्पेंड ने 5 जून, 2019 की अपनी एक रिपोर्ट में नीति आयोग के हवाले से दिए थे। 

 

प्रदूषित पानी का सेहत पर सीधा असर   

टेरी स्कूल ऑफ़ एड्वान्स्ड स्टडीज़ के असिसटेंट प्रोफ़ेसर और आर्सेनिक प्रदूषण पर हुई रिसर्च के सह-लेखक, डॉ. चंदर कुमार सिंह ने इंडियास्पेंड को बताया, “आर्सेनिक (प्रदूषण) से कई बीमारियां होती हैं, कई रिसर्च के अनुसार इस तरह का पानी पीने से कई तरह के कैंसर हो सकते हैं। सबसे आम होता है लिवर, फेफड़े, किडनी और स्किन का कैंसर। कैंसर का पहला लक्षण अक्सर स्किन की बीमारियां होती हैं।”

टेरी की रिपोर्ट के मुताबिक़ आर्सेनिक प्रदूषित पानी पीने से व्यक्ति की उम्र कम हो जाती है, इससे दिल की बीमारी होने का ख़तरा भी बढ़ जाता है। 

डॉ. चंदर ने बताया, “इसका सबसे बुरा असर बच्चों पर होता है, आर्सेनिक प्रदूषित पानी पीने वाले बच्चों के मानसिक स्वास्थ पर भी असर पड़ता है, इन बच्चों का मानसिक विकास ठीक से नहीं हो पाता  और इनका आइ-क्यू लेवल कम रहता है।” रिपोर्ट के मुताबिक़ ये शिशुओं की मौत का भी एक बड़ा कारण हो सकता है।

डॉ. चंदर बताते हैं, “हालांकि आर्सेनिक इन प्रदूषकों में सबसे मुख्य है पर सिर्फ़ आर्सेनिक ही नहीं, इन प्रदूषकों में फ़्लोरायड और मायक्रोबीयल प्रदूषक भी शामिल हैं। जिन इलाक़ों में धान की खेती होती है वहां के ग्राउंड वाटर में नाइट्रेट भी पाया गया है।”

फ़्लोराईड एक खनिज होता है, जिसकी ज़्यादा मात्रा इंसान को फ़्लूरोसिस जैसी बीमारी का शिकार बना सकती है, जिसमें इंसान की हड्डियां कमज़ोर और टेढ़ी होने लगती हैं। बिहार में 9.6 लाख लोग इस बीमारी से जूझ रहे हैं।

इसी तरह मुख्यतः खेती में रासायनिक खाद के ज़्यादा इस्तेमाल के कारण नाइट्रेट आयन रिसकर ग्राउंड वाटर को प्रदूषित करता है, जिसको पीने से बच्चों में गंभीर बीमारियां हो सकती हैं।

“सरकारी आंकड़ों के अनुसार सबसे ज़्यादा बच्चों की मौतें पीने के पानी में मायक्रोबीयल प्रदूषण होने की वजह से होती हैं।” मायक्रोबीयल प्रदूषण से होनी वाली सबसे आम बीमारी है, डायरिया।  जिस से हर साल भारत के 6 साल तक की उम्र के 1.58 लाख बच्चों की मौत हो जाती है।

माइक्रोब, यानी बैक्टीरिया या कवक जैसे रोगाणु जो पानी के साथ शरीर में जाकर टायफ़ाइड, कोलेरा और हेपेटाइटिस जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं।

प्रदूषित पानी सामाजिक और आर्थिक जीवन पर भी असर डालता है  

प्रदूषित पानी पीने से सिर्फ़ व्यक्ति के स्वास्थ्य ही नहीं, सामाजिक जीवन और आर्थिक उत्पादकता पर भी भारी असर पड़ता है। ऐसे लोगों को अक्सर बीमारियां होती रहती हैं और उन्हें अंदाज़ा भी नहीं होता कि इसका कारण क्या है। अक्सर लोगों की उम्र इलाज में ही बीत जाती है और उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा बीमारियों के इलाज पर ही ख़र्च हो जाता है। 

डॉ. चंदर ने बताया, “MIT की एक रिसर्च मुताबिक़ आर्सेनिक प्रदूषित पानी पीने वाला व्यक्ति, अपनी पूरी उम्र में अपनी कुल कमाई का 9% ही अपने ऊपर ख़र्च कर पाता है। ज़्यादातर कमाई सिर्फ़ इलाज में ही ख़र्च होती रहती है।” इसका असर सिर्फ़ एक व्यक्ति की आमदनी और ख़र्च पर ही नहीं पड़ता, अक्सर एक आदमी, अकेले पूरे परिवार का ख़र्च उठाता है और इसका असर पूरे परिवार पर पड़ता है।   

 

डॉ. चंदर बताते हैं, “बिहार के कई इलाक़ों में प्रदूषित पानी पी रहे लोग ये जानते हैं कि उन्हें स्किन की कोई बीमारी या कैंसर हो सकता है। इसकी वजह से यहाँ बीमारी को लोकलाज से जोड़ दिया गया है।” 

 

उन्होंने कहा कि जिन परिवारों में किसी सदस्य में स्किन की बीमारी दिखती है या किसी की मौत हो जाती है, उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाता है, सब उनसे कतराने लगते हैं, इन घरों के साथ कोई रिश्ता भी नहीं जोड़ना चाहता। 

डॉ. चंदर आगे कहते हैं, “हमने देखा है कि पिछड़ी जातियों के ज़्यादातर ग़रीब लोग अक्सर इन बीमारियों के बारे में दी जा रही जानकारी ध्यान से सुनते हैं और उन्हें जो सुझाव दिए जाते हैं जैसे हैण्डपम्प का इस्तेमाल बंद करना, आदि, वो उन्हें मानते हैं। वो अपने घरों की दीवार पर इन मुद्दों से जुड़ी जानकारी लिखवाने से भी अक्सर इंकार नहीं करते हैं। मगर अगड़ी जाति या अमीर लोग इन बातों से कतराते हैं, घर में अगर किसी को कुछ हो जाए तो छुपाते हैं, अगर उन्हें बताया भी जाए कि जो पानी वो पी रहे हैं वो प्रदूषित है, तो भी वो उसे ही पीते रहते हैं, क्योंकि उन्हें ये लगता है कि ये मानना कि वो प्रदूषित पानी पी रहे हैं, एक शर्म की बात मानी जाएगी।” 

(साधिका, इंडियास्पेंड के साथ प्रिन्सिपल कॉरेस्पॉंडेंट हैं)

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण इलाक़ों में आबादी का बड़ा हिस्सा पीने के पानी के लिए हैण्डपम्प या ट्यूबवेल के पानी का इस्तेमाल करता है। हाल ही में आई नेशनल सैम्पल सर्वे ऑफ़िस (एनएसएसओ) की रिपोर्ट में ये सामने आया है। 

नवंबर 23, 2019, को जारी इस रिपोर्ट के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश के 87.8% घरों में पीने के पानी का सबसे बड़ा ज़रिया हैण्डपम्प है, बिहार में ये आंकड़ा 94.3% है, जबकि देश का कुल औसत 42.9% है।

हैण्डपम्प के बाद पीने के पानी का दूसरा बड़ा ज़रिया है ट्यूबवेल। देश के 10.9% ग्रामीण घर पीने के पानी के लिए ट्यूबवेल पर निर्भर हैं। बिहार में 2.9% ग्रामीण परिवार ट्यूबवेल का इस्तेमाल करते हैं और उत्तर प्रदेश में ये आंकड़ा 6.1% है।

इन घरों के पीने के पानी के लिए ट्यूबवेल या हैण्डपम्प पर निर्भर होने का सबसे बड़ा कारण है इन घरों तक पाइपलाइन ना पहुंचना या फिर नलों में पानी की सप्लाई ना आना। एनएसएसओ के आंकड़ों के अनुसार बिहार के 1.7% और उत्तर प्रदेश के 3.8% ग्रामीण घरों में नलों से पीने के पानी की सुविधा उपलब्ध है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि देश के 18.41% यानी 3.29 करोड़ ग्रामीण घरों में ही अब तक पानी की पाइपलाइन पहुंच पाई है। केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2020 के बजट के दौरान ‘नल से जल’ योजना का ऐलान किया। इस योजना के तहत सरकार का लक्ष्य 2024 तक हर ग्रामीण घर में 55 लीटर पानी, प्रति व्यक्ति, प्रति दिन, नलों से पहुंचाने का है। लेकिन यूपी और बिहार के आंकड़े इस योजना के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है।

हैण्डपम्प और ट्यूबवेल का पानी प्रदूषित हो सकता है

ग्राउंड वाटर यानी ज़मीन के नीचे के जिस पानी को लोग साफ़ मान कर पीने के लिए इस्तेमाल करते हैं, वो अपने साथ कई बीमारियों को ला सकता है। 

द एनर्जी एंड रिसोर्स इंस्टीटूट्यूट (टेरी)  की मई 2019 की एक रिसर्च के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाक़ों में रहने वाले 2.34 करोड़ लोग जिस ग्राउंड वाटर का इस्तेमाल करते हैं उसमें आर्सेनिक रसायन ख़तरनाक स्तर पर पाया गया है।

उत्तर प्रदेश की 78% जनसंख्या ग्रामीण इलाक़ों में रहती है जिसमें से 80% के लिए पानी का ज़रिया ग्राउंड वाटर ही है। पाइप से पानी की  सप्लाई ना होने की वजह से लोगों में आर्सेनिक प्रदूषण के असर का ख़तरा बढ़ जाता है।

रिसर्च के मुताबिक़, यूपी के कुल 40 ज़िलों के ग्राउंड वाटर में आर्सेनिक प्रदूषण पाया गया। बलिया, गोरखपुर, बाराबंकी, ग़ाज़ीपुर, गोंडा, फ़ैज़ाबाद और लखीमपुर खीरी में हालात सबसे ख़राब है क्योंकि यहाँ के ग्राउंड वाटर में आर्सेनिक की मात्रा ज़्यादा है। आर्सेनिक प्रदूषण से जूझ रहे ज़्यादातर ज़िले गंगा, राप्ति और घाघरा नदी के आसपास के हैं। 

जल प्रदूषण से जूझने वाला उत्तर प्रदेश अकेला राज्य नहीं है, टेरी की रिसर्च के मुताबिक़, देशभर में क़रीब 10 करोड़ लोग पानी में आर्सेनिक प्रदूषण से जूझ रहे हैं। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़ आर्सेनिक प्रदूषण से जूझने वाले लोगों की कुल संख्या 13.8 करोड़ है।  

देश में ज़मीन के ऊपर मौजूद कुल पानी का 37% प्रतिशत इस्तेमाल करने के लायक है, बाक़ी में आर्सेनिक और उस जैसे ही अन्य हानिकारक रसायन मौजूद हैं। इसी तरह देश में मौजूद ग्राउंड वाटर में से 58% इस्तेमाल के लायक है। ये आँकड़े इंडियास्पेंड ने 5 जून, 2019 की अपनी एक रिपोर्ट में नीति आयोग के हवाले से दिए थे। 

 

प्रदूषित पानी का सेहत पर सीधा असर   

टेरी स्कूल ऑफ़ एड्वान्स्ड स्टडीज़ के असिसटेंट प्रोफ़ेसर और आर्सेनिक प्रदूषण पर हुई रिसर्च के सह-लेखक, डॉ. चंदर कुमार सिंह ने इंडियास्पेंड को बताया, “आर्सेनिक (प्रदूषण) से कई बीमारियां होती हैं, कई रिसर्च के अनुसार इस तरह का पानी पीने से कई तरह के कैंसर हो सकते हैं। सबसे आम होता है लिवर, फेफड़े, किडनी और स्किन का कैंसर। कैंसर का पहला लक्षण अक्सर स्किन की बीमारियां होती हैं।”

टेरी की रिपोर्ट के मुताबिक़ आर्सेनिक प्रदूषित पानी पीने से व्यक्ति की उम्र कम हो जाती है, इससे दिल की बीमारी होने का ख़तरा भी बढ़ जाता है। 

डॉ. चंदर ने बताया, “इसका सबसे बुरा असर बच्चों पर होता है, आर्सेनिक प्रदूषित पानी पीने वाले बच्चों के मानसिक स्वास्थ पर भी असर पड़ता है, इन बच्चों का मानसिक विकास ठीक से नहीं हो पाता  और इनका आइ-क्यू लेवल कम रहता है।” रिपोर्ट के मुताबिक़ ये शिशुओं की मौत का भी एक बड़ा कारण हो सकता है।

डॉ. चंदर बताते हैं, “हालांकि आर्सेनिक इन प्रदूषकों में सबसे मुख्य है पर सिर्फ़ आर्सेनिक ही नहीं, इन प्रदूषकों में फ़्लोरायड और मायक्रोबीयल प्रदूषक भी शामिल हैं। जिन इलाक़ों में धान की खेती होती है वहां के ग्राउंड वाटर में नाइट्रेट भी पाया गया है।”

फ़्लोराईड एक खनिज होता है, जिसकी ज़्यादा मात्रा इंसान को फ़्लूरोसिस जैसी बीमारी का शिकार बना सकती है, जिसमें इंसान की हड्डियां कमज़ोर और टेढ़ी होने लगती हैं। बिहार में 9.6 लाख लोग इस बीमारी से जूझ रहे हैं।

इसी तरह मुख्यतः खेती में रासायनिक खाद के ज़्यादा इस्तेमाल के कारण नाइट्रेट आयन रिसकर ग्राउंड वाटर को प्रदूषित करता है, जिसको पीने से बच्चों में गंभीर बीमारियां हो सकती हैं।

“सरकारी आंकड़ों के अनुसार सबसे ज़्यादा बच्चों की मौतें पीने के पानी में मायक्रोबीयल प्रदूषण होने की वजह से होती हैं।” मायक्रोबीयल प्रदूषण से होनी वाली सबसे आम बीमारी है, डायरिया।  जिस से हर साल भारत के 6 साल तक की उम्र के 1.58 लाख बच्चों की मौत हो जाती है।

माइक्रोब, यानी बैक्टीरिया या कवक जैसे रोगाणु जो पानी के साथ शरीर में जाकर टायफ़ाइड, कोलेरा और हेपेटाइटिस जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं।

प्रदूषित पानी सामाजिक और आर्थिक जीवन पर भी असर डालता है  

प्रदूषित पानी पीने से सिर्फ़ व्यक्ति के स्वास्थ्य ही नहीं, सामाजिक जीवन और आर्थिक उत्पादकता पर भी भारी असर पड़ता है। ऐसे लोगों को अक्सर बीमारियां होती रहती हैं और उन्हें अंदाज़ा भी नहीं होता कि इसका कारण क्या है। अक्सर लोगों की उम्र इलाज में ही बीत जाती है और उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा बीमारियों के इलाज पर ही ख़र्च हो जाता है। 

डॉ. चंदर ने बताया, “MIT की एक रिसर्च मुताबिक़ आर्सेनिक प्रदूषित पानी पीने वाला व्यक्ति, अपनी पूरी उम्र में अपनी कुल कमाई का 9% ही अपने ऊपर ख़र्च कर पाता है। ज़्यादातर कमाई सिर्फ़ इलाज में ही ख़र्च होती रहती है।” इसका असर सिर्फ़ एक व्यक्ति की आमदनी और ख़र्च पर ही नहीं पड़ता, अक्सर एक आदमी, अकेले पूरे परिवार का ख़र्च उठाता है और इसका असर पूरे परिवार पर पड़ता है।   

 

डॉ. चंदर बताते हैं, “बिहार के कई इलाक़ों में प्रदूषित पानी पी रहे लोग ये जानते हैं कि उन्हें स्किन की कोई बीमारी या कैंसर हो सकता है। इसकी वजह से यहाँ बीमारी को लोकलाज से जोड़ दिया गया है।” 

 

उन्होंने कहा कि जिन परिवारों में किसी सदस्य में स्किन की बीमारी दिखती है या किसी की मौत हो जाती है, उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाता है, सब उनसे कतराने लगते हैं, इन घरों के साथ कोई रिश्ता भी नहीं जोड़ना चाहता। 

डॉ. चंदर आगे कहते हैं, “हमने देखा है कि पिछड़ी जातियों के ज़्यादातर ग़रीब लोग अक्सर इन बीमारियों के बारे में दी जा रही जानकारी ध्यान से सुनते हैं और उन्हें जो सुझाव दिए जाते हैं जैसे हैण्डपम्प का इस्तेमाल बंद करना, आदि, वो उन्हें मानते हैं। वो अपने घरों की दीवार पर इन मुद्दों से जुड़ी जानकारी लिखवाने से भी अक्सर इंकार नहीं करते हैं। मगर अगड़ी जाति या अमीर लोग इन बातों से कतराते हैं, घर में अगर किसी को कुछ हो जाए तो छुपाते हैं, अगर उन्हें बताया भी जाए कि जो पानी वो पी रहे हैं वो प्रदूषित है, तो भी वो उसे ही पीते रहते हैं, क्योंकि उन्हें ये लगता है कि ये मानना कि वो प्रदूषित पानी पी रहे हैं, एक शर्म की बात मानी जाएगी।” 

(साधिका, इंडियास्पेंड के साथ प्रिन्सिपल कॉरेस्पॉंडेंट हैं)

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