बीमारी, कुपोषण के लिए अतिसंवेदनशील जनजातियों के पास सीमित स्वास्थ्य सेवाएं?

अपने 16 महीने के बेटे बबलू और 5 साल के बेटे बाबू के साथ 28 साल की सुकांति सौंतो।बबलू दिमागी मलेरिया से उबर रहा है, जिससे वह कमजोर हो गया है। सौंतो पहाड़ी भूयन जनजाति से हैं, जो ओडिशा के 13 विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूहों में से एक है।

पल्लाहारा,ओडिशा: ओडिशा के पल्लाहारा ब्लॉक के हरे-भरे जंगल में, अपनी मां की गोद में 16 महीने का बबलू सौंतो, अपनी उम्र के विपरीत, बहुत कमजोर दिखता है। बच्चा दिमागी मलेरिया से ग्रसित रहा, जिसमें उसे महीने भर तक बुखार रहा, जबरदस्त ठंड लगती रही और उल्टी और दस्त होते रहे।

गांव में कोई सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं होने के कारण, बबलू की 28 वर्षीय मां, सुकांति सौंतो 90 किमी की यात्रा के बाद कींजर के जिला अस्पताल तक पहुंची, जो सबसे नजदीक का अस्पताल था। सौंतो पहाड़ी भुइयां (शाब्दिक रूप से पहाड़ी जनजाति) है, जो ओडिशा की 13 विशेष रूप से कमजोर जनजातियों में से एक है-जो भारत के सभी मान्यता प्राप्त जनजातियों (अनुसूचित जनजातियों के रूप में जाना जाता है) में सबसे वंचित है और पल्लाहारा की पहाड़ियों में अलग-थलग ढंग से जी रह रहे हैं।

भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक ( कैग ) की 2017 की एक रिपोर्ट

के अनुसार, "स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं और परिवहन की कमी के कारण, कमजोर जनजातियां जरूरत के वक्त स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं से वंचित रह जाती हैं।" इंडियास्पेंड की एक जांच में पाया गया है कि स्थिर आय, कम पोषण, बाल देखभाल केंद्रों तक सीमित पहुंच और बढ़ती खाद्य असुरक्षा ये समस्याएं बढ़ रही हैं।

आदिवासी समूह, जो आम तौर पर बीमारी और कुपोषण के शिकार हैं, बाकी आबादी की तुलना में अधिक कमजोर हैं, उन्हें किसी समुदाय या जिला स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने के लिए 5 से 80 किमी तक की दूरी तय करनी पड़ती है, जैसा कि 2017 की कैग रिपोर्ट में कहा गया है। भारत भर में,लोगों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने के लिए औसतन 13.55 किमी की दूरी तय करनी पड़ती है।

हालांकि पिछले तीन दशकों में अनुसूचित जनजातियों के पोषण और स्वास्थ्य परिणामों में सुधार हुआ है, लेकिन बाकी आबादी की तुलना में अभी भी उनका प्रदर्शन खराब है। भारत की कुल आबादी का 8 फीसदी आदिवासी हैं, लेकिन 2015 में, मस्तिष्क मलेरिया सहित मलेरिया के सभी मामलों में उनकी 30 फीसदी हिस्सेदारी थी, और 50 फीसदी मौतें मलेरिया के कारण हुईं। 

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा 2018 की जनजातीय स्वास्थ्य रिपोर्ट के अनुसार, यह 6,000 करोड़ रुपये का आर्थिक बोझ है।

देश भर में 75 विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूहों में से, 13 कमजोर जनजातियों के साथ, ओडिशा में सबसे ज्यादा अधिक आदिवासी रहते है। नेशनल सेंटर फॉर एडवोकेसी स्टडीज के अनुसार, ये लोग - 89,208 की कुल आबादी के साथ, ओडिशा के 12 जिलों में फैले हुए हैं। 

जनजातीय मामलों के मंत्रालय की 2013 की एक रिपोर्ट के अनुसार, 5,578 की आबादी के साथ, पहाड़ी भुइयां, अपनी स्थिर जनसंख्या, साक्षरता के निम्न स्तर और प्रौद्योगिकी के पूर्व-कृषि स्तर के कारण एक कमजोर जनजाति के रूप मानी जाती है।

डेटा की कमी

विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूहों के विकास के परिणामों पर कोई डेटा नहीं है, जैसे कि ओडिशा में पहाड़ी भुइयां। विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूहों पर आदिवासी मंत्रालय द्वारा स्थापित, Xaxa समिति द्वारा 2014 की रिपोर्ट के अनुसार, ये समूह अन्य अनुसूचित जनजातियों की तुलना में बदतर हैं और उनका स्वास्थ्य गंभीर रूप से उपेक्षित है। 2018 के आदिवासी मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है, "आदिवासी विभिन्न समुदायों की स्वास्थ्य स्थिति पर डेटा का पूर्ण अभाव है।"

2018 की जनजातीय मंत्रालय की रिपोर्ट कहती है कि, अनुसूचित जनजाति के लिए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के आंकड़ों को भी कम करके आंका जा सकता है, जैसा कि वे एक छोटे आकार के नमूने पर आधारित हैं।

2015-16 में,अनुसूचित जनजातियों में, शिशु मृत्यु दर (आईएमआर, एक वर्ष से कम, प्रति 1,000 जन्म पर मृत्यु दर ) 44.4 थी, यानी शेष जनसंख्या (32.1) की तुलना में 30 फीसदी अधिक, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों को छोड़कर, जैसा कि एनएफएचएस के आंकड़ों से पता चलता है।

उनके अनुमानों के आधार पर, 2018 मंत्रालय की रिपोर्ट कहती है कि भारत की आईएमआर अनुसूचित जनजातियों के लिए प्रति 1,000 जन्मों पर 44.4 और 74 मौतों के बीच कहीं भी हो सकती है।

एक दशक से 2015-16 तक अनुसूचित जनजातियों के लिए आईएमआर बाकी आबादी की तुलना में अधिक तेजी से घटा है। 2005-06 में, अनुसूचित जनजातियों के लिए आईएमआर 62.1 था, जबकि बाकी की आबादी के लिए 38.9 था, जैसा कि एनएफएचएस के आंकड़ों से पता चलता है।

स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त स्टाफ नहीं, केंद्रों की दूरी ज्यादा

बबलू के पिता, 32 वर्षीय चरद सौंतो पहाड़ी भूईयां जनजाति में अन्य लोगों की तरह, खेती करते हैं, और उनकी कोई स्थिर आय नहीं है। आखिरकार, चरद सौंतो को अपने बेटे की दवाइयों के भुगतान के लिए एक निजी साहूकार से पैसे उधार लेने पड़े। सौतो ने कहा, "डॉक्टर ने 800 रुपये की दवाइयां दीं। मुझे साहूकार को 1,500 रुपये वापस देने होंगे।"

असुरक्षित आजीविका, और सरकारी सेवाओं तक पहुंच की कमी से अनुसूचित जनजातियों के स्वास्थ्य नुकसान है। पहाड़ी भुइयां जनजातियों के बौराड़िया गांव के 35 वर्षीय सरपंच (ग्राम प्रधान), धूमाती देहुरे ने कहा, “माता-पिता अपने बच्चों को एक साल की आयु से ही जंगल में भोजन इकट्ठा करने के लिए साथ ले जाते हैं और उनमें ऐसी बीमारियों का पता चलता है, जो उनकी जान ले सकते हैं, जैसे कि मलेरिया, डेंगू और अन्य मच्छर जनित बीमारियां।”

स्वास्थ्य सेवा केंद्र गांव से बहुत दूर है, और प्राय कम गुणवत्ता वाला है। सौंतो को, जैसा कि हमने कहा, बबलू का इलाज करने के लिए निकटतम अस्पताल तक पहुंचने में 90 किमी का सफर तय करना पड़ा। 2018 के आदिवासी मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 82.3 फीसदी विशेषज्ञ पद, 32.6 फीसदी तकनीशियन पद, और आदिवासी क्षेत्रों में सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में 27.9 फीसदी नर्स पद रिक्त थे, जैसा कि 2018 के आदिवासी मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है।

जनजातीय आबादी अधिक कुपोषित

2009-10 में, पूरे भारत में 33.8 फीसदी की तुलना में ग्रामीण भारत में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली अनुसूचित जनजाति की आबादी का अनुपात 47.4 फीसदी था। शहरी क्षेत्रों में, अनुसूचित जनजातियों के लिए अनुपात 30.4 फीसदी और पूरी आबादी के लिए 20.9 फीसदी था।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली से अपने मासिक राशन लेने के लिए, निकटतम उचित मूल्य की दुकान तक पहुंचने के लिए, सौंतो को12 किमी यानी दो घंटे की पैदल यात्रा करनी पड़ती है, क्योंकि यह फिंगरप्रिंट प्रमाणीकरण के साथ निकटतम केंद्र है। अपने रास्ते में, वे बीहड़ पहाड़ी इलाके से होते हुए 35 किलो राशन लाते हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, आदिवासी समूहों द्वारा पोषक तत्वों का दैनिक सेवन अनुशंसित दैनिक स्तर से नीचे है और जनजातीय आबादी के बीच बढ़ती खाद्य असुरक्षा को दर्शाता है। 2008 के एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, कमजोर आदिवासी समूहों को कुपोषण के लिए अतिसंवेदनशील माना जाता है।

1975 से, सरकार का एक पूरक पोषण कार्यक्रम है,समेकित बाल विकास सेवाओं के तहत, जो आंगनवाड़ी केंद्रों पर तीन से छह साल के बच्चों के लिए गर्म पका भोजन उपलब्ध कराने के साथ-साथ गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं और बच्चों के लिए घर ले जाने के लिए राशन ( ओडिशा के मामले में चटुआ, अंडे और दालें प्रदान करता है ) प्रदान करता है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने अगस्त 2019 में बताया है।

यह बच्चे के पहले 1,000 दिनों में विकास में मदद करता है। बचपन में वृद्धि और संज्ञानात्मक विकास अधिकतम होता है।

बबलू सौंतो की मां भी गांव के आंगनवाड़ी केंद्र से महीने में एक बार चटुआ, अंडे और दालों का घर-घर राशन लेती है, लेकिन उसके 5 साल के बड़े बेटे को गर्म, पका हुआ भोजन नहीं मिल पाता है, क्योंकि आंगनबाड़ी रोजाना जाना बहुत आसान नहीं, जगह बहुत दूर है। जिस दिन इंडियास्पेंड ने दौरा किया, उस दिन आंगनबाड़ी बंद था, ग्रामीणों ने बताया कि यह बहुत कम खुला रहता है।

45 वर्षीय आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, मुंदाराम प्रधान ने जोर देकर कहा कि कि यह केंद्र केवल उस दिन बंद था। उन्होंने कहा, "मैं आज आंगनवाड़ी नहीं खोल सकता था, क्योंकि मुझे नई ममता लाभार्थियों ( गर्भवती माताओं के लिए एक सीधा नकद हस्तांतरण कार्यक्रम ) के पंजीकरण के लिए 50 किमी दूर पल्हारा ब्लॉक में बाल विकास कार्यालय जाना था।" 

16 महीनों में, दो बार वे स्वास्थ्य पोषण दिवस पर बच्चों को टीका लगवाने और विटामिन ए की नियमित खुराक के लिए गए हैं। यह गांव में आंगनवाड़ी (बच्चे की देखभाल) केंद्र में हर महीने एक बार आयोजित किया जाना चाहिए। सुकांति सौंतो ने कहा, "हम जागरूक नहीं हैं और न ही हमें सूचित किया जाता है ,जब गांव में स्वास्थ्य पोषण दिवस का आयोजन किया जाता है।"

निकटतम आंगनवाड़ी केंद्र सौंतो के गांव से 3 किमी दूर है; ओडिशा में 226 विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूह के गांवों में केंद्र स्थापित नहीं किए गए हैं, जैसा कि 2017 की कैग रिपोर्ट से पता चला है। रिपोर्ट के अनुसार, निकटतम आंगनवाड़ी केंद्र से 3 से 8 किमी की दूरी पर सोलह गांव हैं।

2013 में, कुपोषण के कारण 19 शिशुओं की मृत्यु हो गई, जब ओडिशा सरकार ने कमजोर आदिवासी समूहों के विकास के लिए एक विशेष परियोजना चलाई, और पौड़ी भुइयां विकास की स्थापना की। परियोजना के तहत, 216 बच्चों की पहचान गंभीर रूप से कम वजन और गंभीर तीव्र कुपोषण से पीड़ित के रूप में की गई थी, लेकिन इनमें से 60 को किसी भी अस्पताल में नहीं भेजा गया, जैसा कि 2017 की कैग रिपोर्ट से पता चलता है, जोकि विशेष रूप से इस मुद्दे पर सबसे नवीनतम रिपोर्ट है। रिपोर्ट में कहा गया है कि “कुपोषण को मिटाने के लिए सूक्ष्म परियोजनाओं द्वारा कोई सुधारात्मक उपाय नहीं किए गए।”

Source: NFHS 1, NFHS 2, NFHS 3, NFHS 4 and 2018 Tribal Health Report by the Ministry of Tribal Affairs Note: 1. Health indicators for scheduled tribes in 2015-16 are an estimation and have been calculated from districts where more than 50% of the population belongs to Scheduled Tribes. 2. ‘General Population’ excludes scheduled castes, scheduled tribes and other backward castes.

गैर-लक्षित योजनाओं के लिए के लिए फंड

आदिवासियों के कल्याण के लिए एक समर्पित कोष है, आबादी में उनके अनुपात से जुड़ा हुआ है जो कहीं और आवंटित नहीं किया जा सकता है।

भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के तहत, आदिवासी उप-योजना व्यय 2014-15 में 32,387 करोड़ रुपये से घटकर 2015-16 में 20,000 करोड़ रुपये और 2016-17 में 24,005 करोड़ रुपये हो गई, जैसा कि इंडियास्पेंड ने अप्रैल 2019 की रिपोर्ट में बताया है। 2017-18 में आवंटन बढ़कर 31,920 करोड़ रुपये हो गया, लेकिन सरकार ने गैर-लक्षित (जेनेरिक / प्रशासनिक) व्यय (जैसे बुनियादी ढाँचा रखरखाव, कृषि ऋण माफी, गुड गवर्नेंस फ़ंड, भारतीय खेल प्राधिकरण आवंटन आदि) के लिए धन आवंटित किया, जो अनुसूचित जनजाति की ओर नहीं जाते हैं, जैसा कि दलित मानवाधिकार-दलित आर्थिक अधिकार पर नेश्नल कैंपन द्वारा एक दलित आदिवासी बजट विश्लेषण में बताया गया है।

2019-20 में, आदिवासी आबादी के लिए केंद्र सरकार द्वारा कुल 52,885 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे। दलित आदिवासी बजट विश्लेषण में पाया गया है कि आदिवासी आबादी को लक्षित करने वाली योजनाओं के लिए आधे से भी कम (40.9 फीसदी) था।

Of Total Budget, Rs 31,257 Crore For Schemes Which Don’t Directly Benefit Scheduled Tribes
Central Government Budget for Scheduled Tribes Allocation in Rs (crore), 2019-2020
Due budget for central schemes and centrally sponsored schemes targeted to STs 76,592
Allocation to schemes targeted towards STs 21,628
Allocation to Non Targeted Schemes 31,257
Gap in allocation between prescribed allocation to targeted schemes and actual allocation 23,707

Source: Dalit Adivasi Budget Analysis, 2019-2020, National Campaign on Dalit Human Rights-Dalit Arthik Adhikar Andolon

2014 Xaxa समिति की रिपोर्ट के अनुसार, “आदिवासी क्षेत्रों में वितरण संस्थानों के कमजोर पड़ने, खराब प्रदर्शन, कम वित्तीय आवंटन का एक आत्म-चक्र बना दिया है,बदले में, केंद्र प्रायोजित योजनाओं के तहत कम खर्च और माल और सेवाओं की खराब डिलीवरी के परिणामस्वरूप, बाद के आवंटन में कमी आई। "

उदाहरण के लिए, 2014 में, ओडिशा की अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति विभाग में महिला और बाल विकास विभाग द्वारा 56.17 लाख रुपये जारी किए गए, ताकि विशेष जनजातियों के स्वास्थ्य और पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा किया जा सके। लेकिन विभाग ने इस धन का उपयोग जनशक्ति की कमी के कारण नहीं किया, और इसे अप्रैल 2015 में महिला और बाल मंत्रालय को वापस कर दिया गया,जैसा कि 2017 की कैग रिपोर्ट में पाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, 2014 में कमजोर आदिवासी समूहों के लिए स्वास्थ्य शिविरों के संचालन के लिए 4.28 करोड़ रुपये के बजट में से केवल 6.25 लाख रुपये का उपयोग किया गया था।

यह कहानी यहां Health Check पर पहली बार प्रकाशित हुई थी।

(अली इंडियास्पेंड में रिपोर्टिंग फेलो हैं।)

यह आलेख 07 सितंबर 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

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पल्लाहारा,ओडिशा: ओडिशा के पल्लाहारा ब्लॉक के हरे-भरे जंगल में, अपनी मां की गोद में 16 महीने का बबलू सौंतो, अपनी उम्र के विपरीत, बहुत कमजोर दिखता है। बच्चा दिमागी मलेरिया से ग्रसित रहा, जिसमें उसे महीने भर तक बुखार रहा, जबरदस्त ठंड लगती रही और उल्टी और दस्त होते रहे।

गांव में कोई सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं होने के कारण, बबलू की 28 वर्षीय मां, सुकांति सौंतो 90 किमी की यात्रा के बाद कींजर के जिला अस्पताल तक पहुंची, जो सबसे नजदीक का अस्पताल था। सौंतो पहाड़ी भुइयां (शाब्दिक रूप से पहाड़ी जनजाति) है, जो ओडिशा की 13 विशेष रूप से कमजोर जनजातियों में से एक है-जो भारत के सभी मान्यता प्राप्त जनजातियों (अनुसूचित जनजातियों के रूप में जाना जाता है) में सबसे वंचित है और पल्लाहारा की पहाड़ियों में अलग-थलग ढंग से जी रह रहे हैं।

भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक ( कैग ) की 2017 की एक रिपोर्ट

के अनुसार, "स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं और परिवहन की कमी के कारण, कमजोर जनजातियां जरूरत के वक्त स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं से वंचित रह जाती हैं।" इंडियास्पेंड की एक जांच में पाया गया है कि स्थिर आय, कम पोषण, बाल देखभाल केंद्रों तक सीमित पहुंच और बढ़ती खाद्य असुरक्षा ये समस्याएं बढ़ रही हैं।

आदिवासी समूह, जो आम तौर पर बीमारी और कुपोषण के शिकार हैं, बाकी आबादी की तुलना में अधिक कमजोर हैं, उन्हें किसी समुदाय या जिला स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने के लिए 5 से 80 किमी तक की दूरी तय करनी पड़ती है, जैसा कि 2017 की कैग रिपोर्ट में कहा गया है। भारत भर में,लोगों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने के लिए औसतन 13.55 किमी की दूरी तय करनी पड़ती है।

हालांकि पिछले तीन दशकों में अनुसूचित जनजातियों के पोषण और स्वास्थ्य परिणामों में सुधार हुआ है, लेकिन बाकी आबादी की तुलना में अभी भी उनका प्रदर्शन खराब है। भारत की कुल आबादी का 8 फीसदी आदिवासी हैं, लेकिन 2015 में, मस्तिष्क मलेरिया सहित मलेरिया के सभी मामलों में उनकी 30 फीसदी हिस्सेदारी थी, और 50 फीसदी मौतें मलेरिया के कारण हुईं। 

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा 2018 की जनजातीय स्वास्थ्य रिपोर्ट के अनुसार, यह 6,000 करोड़ रुपये का आर्थिक बोझ है।

देश भर में 75 विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूहों में से, 13 कमजोर जनजातियों के साथ, ओडिशा में सबसे ज्यादा अधिक आदिवासी रहते है। नेशनल सेंटर फॉर एडवोकेसी स्टडीज के अनुसार, ये लोग - 89,208 की कुल आबादी के साथ, ओडिशा के 12 जिलों में फैले हुए हैं। 

जनजातीय मामलों के मंत्रालय की 2013 की एक रिपोर्ट के अनुसार, 5,578 की आबादी के साथ, पहाड़ी भुइयां, अपनी स्थिर जनसंख्या, साक्षरता के निम्न स्तर और प्रौद्योगिकी के पूर्व-कृषि स्तर के कारण एक कमजोर जनजाति के रूप मानी जाती है।

डेटा की कमी

विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूहों के विकास के परिणामों पर कोई डेटा नहीं है, जैसे कि ओडिशा में पहाड़ी भुइयां। विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूहों पर आदिवासी मंत्रालय द्वारा स्थापित, Xaxa समिति द्वारा 2014 की रिपोर्ट के अनुसार, ये समूह अन्य अनुसूचित जनजातियों की तुलना में बदतर हैं और उनका स्वास्थ्य गंभीर रूप से उपेक्षित है। 2018 के आदिवासी मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है, "आदिवासी विभिन्न समुदायों की स्वास्थ्य स्थिति पर डेटा का पूर्ण अभाव है।"

2018 की जनजातीय मंत्रालय की रिपोर्ट कहती है कि, अनुसूचित जनजाति के लिए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के आंकड़ों को भी कम करके आंका जा सकता है, जैसा कि वे एक छोटे आकार के नमूने पर आधारित हैं।

2015-16 में,अनुसूचित जनजातियों में, शिशु मृत्यु दर (आईएमआर, एक वर्ष से कम, प्रति 1,000 जन्म पर मृत्यु दर ) 44.4 थी, यानी शेष जनसंख्या (32.1) की तुलना में 30 फीसदी अधिक, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों को छोड़कर, जैसा कि एनएफएचएस के आंकड़ों से पता चलता है।

उनके अनुमानों के आधार पर, 2018 मंत्रालय की रिपोर्ट कहती है कि भारत की आईएमआर अनुसूचित जनजातियों के लिए प्रति 1,000 जन्मों पर 44.4 और 74 मौतों के बीच कहीं भी हो सकती है।

एक दशक से 2015-16 तक अनुसूचित जनजातियों के लिए आईएमआर बाकी आबादी की तुलना में अधिक तेजी से घटा है। 2005-06 में, अनुसूचित जनजातियों के लिए आईएमआर 62.1 था, जबकि बाकी की आबादी के लिए 38.9 था, जैसा कि एनएफएचएस के आंकड़ों से पता चलता है।

स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त स्टाफ नहीं, केंद्रों की दूरी ज्यादा

बबलू के पिता, 32 वर्षीय चरद सौंतो पहाड़ी भूईयां जनजाति में अन्य लोगों की तरह, खेती करते हैं, और उनकी कोई स्थिर आय नहीं है। आखिरकार, चरद सौंतो को अपने बेटे की दवाइयों के भुगतान के लिए एक निजी साहूकार से पैसे उधार लेने पड़े। सौतो ने कहा, "डॉक्टर ने 800 रुपये की दवाइयां दीं। मुझे साहूकार को 1,500 रुपये वापस देने होंगे।"

असुरक्षित आजीविका, और सरकारी सेवाओं तक पहुंच की कमी से अनुसूचित जनजातियों के स्वास्थ्य नुकसान है। पहाड़ी भुइयां जनजातियों के बौराड़िया गांव के 35 वर्षीय सरपंच (ग्राम प्रधान), धूमाती देहुरे ने कहा, “माता-पिता अपने बच्चों को एक साल की आयु से ही जंगल में भोजन इकट्ठा करने के लिए साथ ले जाते हैं और उनमें ऐसी बीमारियों का पता चलता है, जो उनकी जान ले सकते हैं, जैसे कि मलेरिया, डेंगू और अन्य मच्छर जनित बीमारियां।”

स्वास्थ्य सेवा केंद्र गांव से बहुत दूर है, और प्राय कम गुणवत्ता वाला है। सौंतो को, जैसा कि हमने कहा, बबलू का इलाज करने के लिए निकटतम अस्पताल तक पहुंचने में 90 किमी का सफर तय करना पड़ा। 2018 के आदिवासी मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 82.3 फीसदी विशेषज्ञ पद, 32.6 फीसदी तकनीशियन पद, और आदिवासी क्षेत्रों में सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में 27.9 फीसदी नर्स पद रिक्त थे, जैसा कि 2018 के आदिवासी मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है।

जनजातीय आबादी अधिक कुपोषित

2009-10 में, पूरे भारत में 33.8 फीसदी की तुलना में ग्रामीण भारत में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली अनुसूचित जनजाति की आबादी का अनुपात 47.4 फीसदी था। शहरी क्षेत्रों में, अनुसूचित जनजातियों के लिए अनुपात 30.4 फीसदी और पूरी आबादी के लिए 20.9 फीसदी था।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली से अपने मासिक राशन लेने के लिए, निकटतम उचित मूल्य की दुकान तक पहुंचने के लिए, सौंतो को12 किमी यानी दो घंटे की पैदल यात्रा करनी पड़ती है, क्योंकि यह फिंगरप्रिंट प्रमाणीकरण के साथ निकटतम केंद्र है। अपने रास्ते में, वे बीहड़ पहाड़ी इलाके से होते हुए 35 किलो राशन लाते हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, आदिवासी समूहों द्वारा पोषक तत्वों का दैनिक सेवन अनुशंसित दैनिक स्तर से नीचे है और जनजातीय आबादी के बीच बढ़ती खाद्य असुरक्षा को दर्शाता है। 2008 के एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, कमजोर आदिवासी समूहों को कुपोषण के लिए अतिसंवेदनशील माना जाता है।

1975 से, सरकार का एक पूरक पोषण कार्यक्रम है,समेकित बाल विकास सेवाओं के तहत, जो आंगनवाड़ी केंद्रों पर तीन से छह साल के बच्चों के लिए गर्म पका भोजन उपलब्ध कराने के साथ-साथ गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं और बच्चों के लिए घर ले जाने के लिए राशन ( ओडिशा के मामले में चटुआ, अंडे और दालें प्रदान करता है ) प्रदान करता है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने अगस्त 2019 में बताया है।

यह बच्चे के पहले 1,000 दिनों में विकास में मदद करता है। बचपन में वृद्धि और संज्ञानात्मक विकास अधिकतम होता है।

बबलू सौंतो की मां भी गांव के आंगनवाड़ी केंद्र से महीने में एक बार चटुआ, अंडे और दालों का घर-घर राशन लेती है, लेकिन उसके 5 साल के बड़े बेटे को गर्म, पका हुआ भोजन नहीं मिल पाता है, क्योंकि आंगनबाड़ी रोजाना जाना बहुत आसान नहीं, जगह बहुत दूर है। जिस दिन इंडियास्पेंड ने दौरा किया, उस दिन आंगनबाड़ी बंद था, ग्रामीणों ने बताया कि यह बहुत कम खुला रहता है।

45 वर्षीय आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, मुंदाराम प्रधान ने जोर देकर कहा कि कि यह केंद्र केवल उस दिन बंद था। उन्होंने कहा, "मैं आज आंगनवाड़ी नहीं खोल सकता था, क्योंकि मुझे नई ममता लाभार्थियों ( गर्भवती माताओं के लिए एक सीधा नकद हस्तांतरण कार्यक्रम ) के पंजीकरण के लिए 50 किमी दूर पल्हारा ब्लॉक में बाल विकास कार्यालय जाना था।" 

16 महीनों में, दो बार वे स्वास्थ्य पोषण दिवस पर बच्चों को टीका लगवाने और विटामिन ए की नियमित खुराक के लिए गए हैं। यह गांव में आंगनवाड़ी (बच्चे की देखभाल) केंद्र में हर महीने एक बार आयोजित किया जाना चाहिए। सुकांति सौंतो ने कहा, "हम जागरूक नहीं हैं और न ही हमें सूचित किया जाता है ,जब गांव में स्वास्थ्य पोषण दिवस का आयोजन किया जाता है।"

निकटतम आंगनवाड़ी केंद्र सौंतो के गांव से 3 किमी दूर है; ओडिशा में 226 विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूह के गांवों में केंद्र स्थापित नहीं किए गए हैं, जैसा कि 2017 की कैग रिपोर्ट से पता चला है। रिपोर्ट के अनुसार, निकटतम आंगनवाड़ी केंद्र से 3 से 8 किमी की दूरी पर सोलह गांव हैं।

2013 में, कुपोषण के कारण 19 शिशुओं की मृत्यु हो गई, जब ओडिशा सरकार ने कमजोर आदिवासी समूहों के विकास के लिए एक विशेष परियोजना चलाई, और पौड़ी भुइयां विकास की स्थापना की। परियोजना के तहत, 216 बच्चों की पहचान गंभीर रूप से कम वजन और गंभीर तीव्र कुपोषण से पीड़ित के रूप में की गई थी, लेकिन इनमें से 60 को किसी भी अस्पताल में नहीं भेजा गया, जैसा कि 2017 की कैग रिपोर्ट से पता चलता है, जोकि विशेष रूप से इस मुद्दे पर सबसे नवीनतम रिपोर्ट है। रिपोर्ट में कहा गया है कि “कुपोषण को मिटाने के लिए सूक्ष्म परियोजनाओं द्वारा कोई सुधारात्मक उपाय नहीं किए गए।”

Source: NFHS 1, NFHS 2, NFHS 3, NFHS 4 and 2018 Tribal Health Report by the Ministry of Tribal Affairs
Note: 1. Health indicators for scheduled tribes in 2015-16 are an estimation and have been calculated from districts where more than 50% of the population belongs to Scheduled Tribes.
2. ‘General Population’ excludes scheduled castes, scheduled tribes and other backward castes.

गैर-लक्षित योजनाओं के लिए के लिए फंड

आदिवासियों के कल्याण के लिए एक समर्पित कोष है, आबादी में उनके अनुपात से जुड़ा हुआ है जो कहीं और आवंटित नहीं किया जा सकता है।

भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के तहत, आदिवासी उप-योजना व्यय 2014-15 में 32,387 करोड़ रुपये से घटकर 2015-16 में 20,000 करोड़ रुपये और 2016-17 में 24,005 करोड़ रुपये हो गई, जैसा कि इंडियास्पेंड ने अप्रैल 2019 की रिपोर्ट में बताया है। 2017-18 में आवंटन बढ़कर 31,920 करोड़ रुपये हो गया, लेकिन सरकार ने गैर-लक्षित (जेनेरिक / प्रशासनिक) व्यय (जैसे बुनियादी ढाँचा रखरखाव, कृषि ऋण माफी, गुड गवर्नेंस फ़ंड, भारतीय खेल प्राधिकरण आवंटन आदि) के लिए धन आवंटित किया, जो अनुसूचित जनजाति की ओर नहीं जाते हैं, जैसा कि दलित मानवाधिकार-दलित आर्थिक अधिकार पर नेश्नल कैंपन द्वारा एक दलित आदिवासी बजट विश्लेषण में बताया गया है।

2019-20 में, आदिवासी आबादी के लिए केंद्र सरकार द्वारा कुल 52,885 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे। दलित आदिवासी बजट विश्लेषण में पाया गया है कि आदिवासी आबादी को लक्षित करने वाली योजनाओं के लिए आधे से भी कम (40.9 फीसदी) था।

Of Total Budget, Rs 31,257 Crore For Schemes Which Don’t Directly Benefit Scheduled Tribes
Central Government Budget for Scheduled Tribes Allocation in Rs (crore), 2019-2020
Due budget for central schemes and centrally sponsored schemes targeted to STs 76,592
Allocation to schemes targeted towards STs 21,628
Allocation to Non Targeted Schemes 31,257
Gap in allocation between prescribed allocation to targeted schemes and actual allocation 23,707

Source: Dalit Adivasi Budget Analysis, 2019-2020, National Campaign on Dalit Human Rights-Dalit Arthik Adhikar Andolon

2014 Xaxa समिति की रिपोर्ट के अनुसार, “आदिवासी क्षेत्रों में वितरण संस्थानों के कमजोर पड़ने, खराब प्रदर्शन, कम वित्तीय आवंटन का एक आत्म-चक्र बना दिया है,बदले में, केंद्र प्रायोजित योजनाओं के तहत कम खर्च और माल और सेवाओं की खराब डिलीवरी के परिणामस्वरूप, बाद के आवंटन में कमी आई। "

उदाहरण के लिए, 2014 में, ओडिशा की अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति विभाग में महिला और बाल विकास विभाग द्वारा 56.17 लाख रुपये जारी किए गए, ताकि विशेष जनजातियों के स्वास्थ्य और पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा किया जा सके। लेकिन विभाग ने इस धन का उपयोग जनशक्ति की कमी के कारण नहीं किया, और इसे अप्रैल 2015 में महिला और बाल मंत्रालय को वापस कर दिया गया,जैसा कि 2017 की कैग रिपोर्ट में पाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, 2014 में कमजोर आदिवासी समूहों के लिए स्वास्थ्य शिविरों के संचालन के लिए 4.28 करोड़ रुपये के बजट में से केवल 6.25 लाख रुपये का उपयोग किया गया था।

यह कहानी यहां Health Check पर पहली बार प्रकाशित हुई थी।

(अली इंडियास्पेंड में रिपोर्टिंग फेलो हैं।)

यह आलेख 07 सितंबर 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

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