महामारी के दौरान यूपी-बिहार में दलितों और मुसलमानों के साथ भेदभाव बढ़ा: रिपोर्ट

नई दिल्ली: जब देश भर में लॉकडाउन का ऐलान हुआ तो शहनाज़ (30 साल) गर्भवती थी। घर में ख़ुशियों का माहौल था। उत्तर प्रदेश के चित्रकूट ज़िले के सरधुआ गांव की रहने वाली शहनाज़, प्रसव से ठीक पहले अपने पति समीन के साथ चेकअप के लिए ज़िला अस्पताल पहुंचती हैं। शहनाज़ को पहला झटका तब लगा जब अस्पताल में उन्हें और उनके पति को दूर बैठा दिया गया। अस्पताल में उनका अल्ट्रासाउंड हुआ लेकिन पूरे दिन इंतज़ार करने के बावजूद उन्हें अल्ट्रासाउंड की रिपोर्ट नहीं दी गई और शाम को उन्हें वापस घर भेज दिया गया। 30 अप्रैल को शहनाज़ ने अस्पताल में एक बच्चे को जन्म दिया। 

शहनाज़ ने बताया कि वो प्रसव के दौरान भारी मुसीबतों से गुज़री। “30 अप्रैल को ऑपरेशन से बच्चा बाहर निकालने के बाद, मुझे बिना टांके लगाए ऐसे ही छोड़ दिया गया, क्योंकि टांके का धागा ख़त्म हो चुका था। कुछ घंटे के बाद टांके लगाए गए तब तक मेरा बच्चा बिना देखभाल के पड़ा रहा और मैं दर्द में करहाती रही,” शहनाज़ ने बताया।

बच्चा सर में एक फोड़े के साथ पैदा हुआ था। लिहाज़ा टांके लगवाते ही डॉक्टर की सलाह पर शहनाज़ अपने बच्चे को दिखाने के लिए प्रयागराज के अस्पताल पहुंची।

“इलाहाबाद (प्रयागराज) के अस्पताल में बोला गया कि ये कोविड-वार्ड है, इसलिए झांसी जाना पड़ेगा। झांसी में तीन अन्य महिलाओं के साथ मैं भूखी-प्यासी अपना बच्चा लेकर इंतज़ार करती रही। लॉकडाउन की वजह से आसपास खाने के लिए कुछ भी नहीं था। मैं और मेरे घरवाले दो दिन तक भूखे रहे,” शहनाज़ ने आगे कहा।

किसी तरह से बच्चे का ऑपरेशन हुआ लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका। ऑपरेशन के तीन दिन बाद शहनाज़ के बच्चे की मौत हो गयी। 

प्रसव  के बाद जो पोषाहार माताओं को दिया जाता है, शहनाज़ को वो कुछ नहीं दिया गया, ना ही कोई आयरन आदि की गोलियां मिली। शहनाज़ का आरोप है कि अस्पतालों में उनके साथ सौतेला व्यवहार होने के पीछे की वजह उसका मुसलमान होना था। 

“हम मुसलमान बस्ती में रहते हैं इसलिए कोरोना की ख़बर शुरू होते ही आसपास की आशा और एएनएम ने पहले ही आना बंद कर दिया था। अस्पताल में भी हमें दूर, अलग बैठाया गया, बच्चे के जन्म के तुरंत बाद कोई देखभाल के लिए नहीं आया,” शहनाज़ ने बताया। 

शहनाज़ की कहानी सुनने के बाद मन में सवाल उठा कि क्या वाक़ई शहनाज़ के साथ ऐसा व्यवहार होने की वजह उसका मुसलमान होना था? लॉकडाउन के दौरान देश के कई हिस्सों से इस तरह की ख़बरें सुनने और पढ़ने को मिली थीं। 

इसी बीच रिसर्च संगठनों के एक समूह, कम्युनिटी कलेक्ट के एक सर्वे में सामने आया कि लॉकडाउन के दौरान जो समुदाय हाशिए पर हैं ख़ासकर दलित और मुस्लिम, उनकी स्थिति सबसे ज़्यादा ख़राब थी। 

 

कम्युनिटी कलेक्ट ने बिहार और उत्तर प्रदेश के 26 ज़िलों की 90 बस्तियों से जो आंकड़े एकत्रित किए उनसे पता चलता है कि दलितों और मुसलमानों को लॉकडाउन के दौरान और इसके बाद भेदभाव का सामना करना पड़ा। इन्हें सरकारी राहत योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाया, इनके मोहाल्लो में राशन या तो पहुंचा नहीं या बेहद कम मात्रा में पहुंचा। इन समुदायों को स्वास्थ्य केंद्रों में भी परेशानियों का सामना करना पड़ा।

 

देश की आबादी आबादी में मुसलमानों का हिस्सा 13.4% है और ये देश का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय भी है। दलित या अनुसूचित जाति के समुदायों की आबादी 16.6% है और ये ऐतिहासिक रूप से भारत में हाशिए पर रहे हैं। इंडियास्पेंड इन समुदायों के साथ लॉकडाउन के दौरान हुए भेदभाव पर लगातार रिपोर्ट करता रहा है, ये रिपोर्ट्स आप यहां, यहां और यहां पढ़ सकते हैं। 

 

मुस्लिम बस्तियों में यह सर्वे बिहार के 14 ज़िलों के 32 गांवों और उत्तर प्रदेश के 2 ज़िलों के 2 गांवों में किया गया। दलित बस्तियों में यह सर्वे बिहार के 5 ज़िलों के 21 गांवों और उत्तर प्रदेश के 5 ज़िलों के 35 गांवों में किया गया। 

मुस्लिम बस्तियों में राशन और पोषाहार मिलने में कठिनाई

सरकार ने लॉकडाउन के दौरान देश भर में मुफ़्त राशन देने के कार्यक्रम चलाए। स्कूल बंद होने पर बच्चों को मिड-डे मील मिलना भी बंद हो गया तो सरकार ने इसके बदले इन्हें भी पोषक राशन दिए जाने का निर्देश दिया। नवजात बच्चों, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिओं और छोटे बच्चों को आंगनबाड़ी से पोषाहार उपलब्ध कराने का प्रबंधन किया गया, पर ये सारे लाभ मुस्लिम और दलित समुदायों तक ये नहीं पहुंच सके।

 

उत्तर प्रदेश के चित्रकूट ज़िले में मुस्लिम और दलित समुदाय के बीच काम करने वाली संस्था, प्रगति माध्यम समिति की अध्यक्ष, सहरोज फ़ातिमा, बताती हैं कि मुस्लिम और दलित समुदायों के साथ ना सिर्फ़ भेद हुआ, बल्कि इन्हें अस्पतालों में दुर्व्यवहार झेलना पड़ा और सभी योजनाओं में इन्हें सबसे कम हिस्सा दिया गया। 

“शायद राशन की कमी थी या राशन सबके लिए आ नहीं रहा था पर राशन कार्ड होने के बावजूद दलितों और ख़ासकर मुसलमानों को ये राशन नहीं दिया गया। लिस्ट में से इनके नाम हटा दिए गए और जब ये राशन की दुकान पर जाते तो कहा जाता कि आप इस राशन के लिए अपात्र घोषित किए गए हैं, आपको नहीं मिलेगा,” सहरोज ने बताया, कारण पूछने पर कोई जवाब नहीं दिया गया सिर्फ़ ये कहा गया कि जितना है उतना ही तो बंटेगा, “पर अगर कमी थी तो बाक़ी समुदाय के लोग भी अपात्र होने चाहिए थे, सिर्फ़ मुसलमान ही क्यों अपात्र घोषित किए गए?”

जिन बस्तियों में ये सर्वे हुआ उनमें से औसतन 3 से 6% मुस्लिम बस्तियों में सूखा राशन किसी को नहीं मिला, जबकि 26% बस्तियों में कुछ ही लोगों को राशन मिल पाया। मासिक राशन के ऊपर अतिरिक्त राशन 30 से 38% बस्तियों में किसी को नहीं मिला। उत्तर प्रदेश और बिहार की 65 से 88% मुस्लिम बस्तियों में जिन लोगों के पास राशन कार्ड नहीं था, उन्हें आदेश होने के बावजूद, राशन नहीं मिला। जिन्हें राशन मिला उसमें भी 18 से 24% बस्तियों में इसकी क्वालिटी बेहद ख़राब थी।

 

स्कूल जाने वाले 6 से 14 साल के बच्चों को मिड-डे मील के बदले जो राशन मिलना था वो लगभग किसी भी मुस्लिम बस्ती में किसी को भी नहीं मिला। गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं और शिशुओं को आंगनबाड़ी से मिलने वाला पोषाहार 76% मुस्लिम बस्तियों में किसी को भी नहीं दिया गया। 

मुसलमानों के ख़िलाफ़ कोरोना से जुड़ी फैली अफ़वाहों की वजह से कई जगह इन्हें पैसे होने के बावजूद, किराने की दुकानों से भी व्यापारियों ने राशन देने से इंकार किया। साथ ही जो मुसलमान अपनी बस्ती के बाहर राशन की दुकानों पर गए उन्हें वहां से भगा दिया गया, “स्थिति इतनी ख़राब थी कि मैं ऐसे कम से कम डेढ़ हज़ार परिवारों को जानती हूं जो चार से सात दिन भूखे रहे क्योंकि उनके पास खाना ही नहीं था,” सहरोज ने बताया।

जिन बस्तियों में ये सर्वे हुआ उनमें से लगभग 4% दलित बस्तियों में किसी को भी सूखा राशन नहीं मिला, जबकि 50% बस्तियों में सिर्फ़ कुछ ही लोगों को राशन मिला। 10 से 20% बस्तियों में मासिक राशन के ऊपर अतिरिक्त राशन किसी को भी नहीं मिला।  उत्तर प्रदेश और बिहार की लगभग 60% दलित बस्तियों में जिन लोगों के पास राशन कार्ड नहीं था, उन्हें आदेश होने के बावजूद, राशन नहीं दिया गया। जिन दलित बस्तियों में राशन पहुंचाया गया उसमें अप्रैल में सिर्फ़ 14% बस्तियों में इसकी क्वालिटी अच्छी थी, ये आंकड़ा जून तक गिरकर 7% पर आ गया। 

स्कूल जाने वाले 6 से 14 साल के बच्चों को मिड-डे मील के बदले जो राशन मिलना था वो औसतन 90% दलित बस्तियों में किसी को भी नहीं मिला। गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं और शिशुओं को आंगनबाड़ी से मिलने वाला पोषाहार औसतन 60% दलित बस्तियों में किसी को भी नहीं दिया गया। 

“यहां वापस आने वाले प्रवासी मज़दूरों को स्कूलों में रखा जा रहा था और उन्हें पूरे दिन में खाने के लिए सिर्फ़ दो समोसे दिए गए थे,” उत्तर प्रदेश के चित्रकूट ज़िले के बारे में कम्युनिटी कलेक्ट की रिपोर्ट में बताया गया। ये रिपोर्ट मुसलमानों की स्थिति पर थी।

 

सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित दलित और मुस्लिम 

केंद्र सरकार ने मार्च के महीने में जिस 1.7 लाख करोड़ रुपए के आर्थिक पैकेज का ऐलान किया था वो पुरानी योजनाओं का ही बदला हुआ रूप था और ये अपने मक़सद को पूरा करने के लिए काफ़ी कम था, इंडियास्पेंड ने मार्च में ये रिपोर्ट किया था।

इसी सर्वे की राष्ट्रीय रिपोर्ट के अनुसार ये पाया गया कि जो समुदाय हाशिए पर हैं सरकार उन तक इन योजनाओं को पहुंचाने के लिए कुछ ख़ास नहीं कर रही है। उत्तर प्रदेश और बिहार में दो सबसे बड़े कारण जो मुसलमानों और दलितों को इन योजनाओं से दूर रख रहे थे, वो थे दस्तावेज़ों की कमी और भेदभाव के डर से सरकार तक पहुंचने में झिझक। साथ ही जानकारी की कमी, भ्रष्टाचार और घूसख़ूरी भी इस सूची में शामिल थे। 

“मुसलमान किसी भी सरकारी संस्थान से किसी योजना के लाभ के लिए या भेदभाव के ख़िलाफ़ मदद मांगने से कतराते हैं”, मुसलमानों पर कम्युनिटी कलेक्ट की रिपोर्ट में पाया गया। 

इसी रिपोर्ट में दलितों पर किए गए शोध में पाया गया कि सिर्फ़ वो दलित ही योजनाओं का लाभ उठा पाते हैं, जो बेहतर आय-वर्ग से हैं या जो अपना हक़ मांगने में सक्षम हैं, इस वजह से सबसे कमज़ोर दलितों को उनका हक़ नहीं मिल पाता।

उत्तर प्रदेश और बिहार की औसत 32% मुस्लिम बस्तियों में किसी को भी उज्ज्वला योजना के तहत गैस सिलेंडर सब्सिडी नहीं मिली। 35 से 41% मुस्लिम बस्तियों में किसी भी विधवा महिला को विधवा पेंशन योजना के तहत कोई राशि नहीं मिली। 35 से 38% बस्तियों में किसी भी विकलांग मुस्लिम को विकलांग पेंशन नहीं मिली और 29 से 35% बस्तियों में किसी को भी बुज़ुर्ग मुस्लिम को वृद्धावस्था पेंशन नहीं मिली। औसतन 40% मुस्लिम बस्तियों में सिर्फ़ कुछ ही लोगों को अपने जन धन अकाउंट में 500 रुपए की राशि मिली। 

लगभग 9 से 18% दलित बस्तियों में किसी को भी उज्ज्वला योजना के तहत गैस सिलेंडर सब्सिडी नहीं मिली। 23 से 25% दलित बस्तियों में किसी भी विधवा महिला को विधवा पेंशन योजना के तहत कोई राशि नहीं मिली। 32 से 39% बस्तियों में किसी भी विकलांग दलित को विकलांग पेंशन नहीं मिली और 23 से 27% दलित बस्तियों में किसी भी दलित बुज़ुर्ग को भी वृद्धावस्था पेंशन नहीं मिली। औसतन 70% दलित बस्तियों में सिर्फ़ कुछ ही लोगों को अपने जन धन अकाउंट में 500 रुपए की राशि मिली।

नौकरी ना होने और सरकारी नौकरी के अभाव में 86% दलित बस्तियों में और 44% मुस्लिमों बस्तियों में क़र्ज़ लेने वाले लोगों की संख्या में इज़ाफा हुआ। 

ये क़र्ज़, ज़्यादातर नियोक्ता, पड़ोसी, रिश्तेदार या साहूकार से काफ़ी ज़्यादा ब्याज दर पर लिया जाता है। ये कर्ज़, कई प्रकार के समाजिक और आर्थिक शोषण की वजह बनता है, ये बंधुआ मज़दूरी, बाल मज़दूरी और मानव तस्करी को भी जन्म देता है, कम्युनिटी कलेक्ट की रिपोर्ट में कहा गया।

जहां सर्वे करने वाली टीम पहुंची उनमें से किसी भी मुस्लिम बस्ती में बच्चों को मुफ़्त किताबें नहीं बांटी गई और 62% बस्तियों में बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई में हिस्सा नहीं ले पाए। दलित बस्तियों में 96% बच्चों को मुफ़्त किताबें नहीं मिली और 79% बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई में हिस्सा नहीं ले पाए।

स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव और अस्पतालों में भेदभाव 

“मुस्लिम अस्पताल जाने से डरते थे, उनके साथ सही से बर्ताव नहीं किया गया, लोग कहते थे कि तुम सब कोरोना फ़ैलाओगे, दलितों के साथ भी बरसों से चला आ रहा छुआछूत अब और ज़्यादा बढ़ गया है, अस्पताल के कर्मचारी भी दुत्कार के बात करते हैं,” सहरोज ने बताया।

 

उत्तरप्रदेश और बिहार की 38% मुस्लिम बस्तियों के पास कोई भी सरकारी स्वास्थ्य केंद्र या तो मौजूद नहीं था या बंद पड़ा था। जिन बस्तियों में स्वास्थ्य केंद्र था, उनमें से लगभग 6% बस्तियों में लोगों को इलाज और दवाएं कभी नहीं मिली और 29% में सिर्फ़ कभी कभार ही मिली। 65% मुस्लिम बस्तियों के सरकारी अस्पतालों में लोग मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी किसी भी सुविधा का लाभ नहीं उठा पाए। 

 

अप्रैल, मई और जून के महीने में उत्तर प्रदेश और बिहार की 59% मुस्लिम बस्तियों में किसी भी बच्चे का टीकाकरण नहीं किया गया, जबकि 32% बस्तियों में कुछ बच्चों का टीकाकरण किया गया और सिर्फ़ 9% बस्तियों में सभी बच्चों का टीकाकरण किया गया। 

दोनों राज्यों की 64% दलित बस्तियों के आस-पास कोई भी सरकारी स्वास्थ्य केंद्र या तो मौजूद नहीं था या बंद पड़ा था। जिन बस्तियों में स्वास्थ्य केंद्र था, उनमें से भी 4% बस्तियों में लोगों को इलाज और दवाएं कभी नहीं मिली और 20% में सिर्फ़ कभी कभार ही मिली। 73% दलित बस्तियों के सरकारी अस्पतालों में लोग मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी किसी भी सुविधा का लाभ नहीं उठा पाए, जबकि 23% में ये सुविधाएं कभी-कभी उपलब्ध थी। 

अप्रैल, मई और जून के महीने में उत्तर प्रदेश और बिहार की 57% दलित बस्तियों में किसी भी बच्चे का टीकाकरण नहीं किया गया, जबकि 32% बस्तियों में कुछ बच्चों का टीकाकरण किया गया और सिर्फ़ 11% बस्तियों में सभी बच्चों का टीकाकरण किया गया। 

लगभग 18% मुस्लिम बस्तियों में किसी भी स्वास्थ्य कर्मचारी को कोरोनवायरस से बचने के लिए किसी भी प्रकार के मास्क, दस्ताने या पीपीई किट्स नहीं दिए गए जबकि 44% बस्तियों में सिर्फ़ कुछ लोगों को ही ये दिए गए। साथ ही  21% दलित बस्तियों में ये सामग्री किसी को नहीं दी गयी जबकि 54% बस्तियों में ये सामग्री सिर्फ़ कुछ को ही दी गई। 

लगभग 26% मुस्लिम बस्तियों में और 36% दलित बस्तियों में किसी भी सफ़ाई कर्मचारी को सुरक्षा के लिए मास्क और दस्ताने नहीं दिए गए। जबकि 53% मुस्लिम बस्तियों में और 64% दलित बस्तियों में सफ़ाई कर्मचारी सेप्टिक टैंक साफ़ करने और मैला उठाने का काम अपने हाथों से कर रहे थे। 

 

मुसलमानों और दलितों के साथ सामाजिक भेदभाव और बहिष्कार 

कम्युनिटी कलेक्ट की राष्ट्रीय रिपोर्ट के अनुसार लॉक़ाउन के दौरान ना सिर्फ़  मुसलमानों और दलितों की आर्थिक स्थिति ख़राब हुई बल्कि इनके ख़िलाफ़ सामाजिक भेदभाव और छुआछूत और भी बढ़ गया। 

 

मुसलमान कई सारे मानव विकास सूचकांको पर पहले से ही पिछड़े हुए हैं पर लॉकडाउन के दौरान कई जगहों पर इनका बहिष्कार किया गया और इन पर कोरोनावायरस फैलाने वाले समुदाय के तौर पर भी इल्ज़ाम  लगाए गए। दिल्ली के निज़ामुद्दीन में हुए तबलिग़ी जमात के कार्यक्रम को देश भर में वायरस फैलाने के लिए ज़िम्मेदार बताती हुई झूठी ख़बरें चलाई गई। फ़ैक्ट-चेक करने वाले संस्थानों ने इस विषय में जिन ख़बरों को फ़ेक न्यूज़ और ग़लत साबित किया उनकी संख्या 16 मार्च को 15 थी जो 30 मार्च को बढ़कर 33 हो गई, इंडियास्पेंड की मई की इस रिपोर्ट के अनुसार। 

लगभग 6% दलित बस्तियों से उनकी जाति के द्वारा कोरोनावायरस फैलाए जाने का डर सामने आया, ये भी बताया गया कि ये अपनी जाति की वजह से गांव के शमशान घाट तक इस्तेमाल नहीं कर पा रहे थे। चित्रकूट से सहरोज ने भी बताया कि मुस्लिम समुदाय के लोगों को क़ब्रिस्तान जाने से पहले पुलिस से इजाज़त लेनी पड रही थी और इनके साथ सख़्ती बरती जा रही थी जबकि बाक़ी किसी समुदाय के साथ ऐसा नहीं हो रहा था।

 

“हिंदू गांवों के बाहर बैरियर लगाए गए थे ताकि मुस्लिम बस्ती से कोई वहां जा ना सके, मुस्लिम बस्ती में सारे घरों पर दवाई (सेनेटाइज़र) स्प्रे की जा रही थी, सारी झोपड़ियों पर भी सबको बोल-बोल कर कि तुम तो कोरोना फ़ैलाओगे,” सहरोज ने बताया। 

“मथुरा, झांसी, बरेली, अलीगढ़ और चित्रकूट में कई जगहों पर बोर्ड लगे थे जिन पर लिखा था की मुस्लिम वेंडर्स (ठेलेवालों और दुकानदारों) का आना माना है”, कम्युनिटी कनेक्ट की उत्तर प्रदेश की रिपोर्ट में बताया गया। 

सहरोज भी बताती हैं कि जो दलित और मुसलमान उनके ज़िले में ठेले पर सब्ज़ी, फल आदि बेचने का काम करते थे, उन्हें भी अपनी बस्ती से बाहर नहीं जाने दिया जा रहा था। 

(साधिका, इंडियास्पेंड के साथ प्रिन्सिपल कॉरेस्पॉंडेंट हैं।)

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