लखनऊ: उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के निजामतपुरा गाँव के रहने वाले 41 साल के अनीस अंसारी की उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव के दौरान तबियत ख़राब हुई। सर्दी, बुखार और नजले के लक्षण दिखाई दिए तो घरवालों ने कोविड टेस्ट करवाया जिसकी रिपोर्ट पॉजिटिव आयी और इस ही के साथ शुरू हुई अनीस की जान बचाने की जद्दोजहद और पैसा बहाने का सिलसिला।

कई अस्पतालों में कई दिनों तक इलाज करवाने के बाद अनीस की जान तो बच गयी लेकिन इसके लिए उनके परिवार की सारी सम्पति या तो गिरवी रख दी गयी या फिर बेच दी गयी।

कोविड की दूसरी लहर के दौरान ऐसे कई परिवार हैं जो अपने किसी न किसी सदस्य के कोरोना से इलाज के लिए क़र्ज़ ले चुके हैं या फिर अपने परिवार के भविष्य के लिए बचाई हुई लगभग सारी जमा पूँजी खर्च चुके हैं।

इंडियास्पेंड ने अपनी गंगा ट्रेल सीरीज के दौरान गंगा के आसपास के जिलों जैसे उन्नाओ, कानपुर, प्रयागराज और वाराणसी का दौरा किया तो पाया कि ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने कोविड की दूसरी लहर में अपने रिश्तेदारों, दोस्तों से उधार लेकर या साहूकारों से क़र्ज़ लेकर अपने परिवार वालों का इलाज करवाया और अब बहुत बड़े आर्थिक बोझ के तले दब चुके हैं।

"हम पहले इन्हे चांदपुर लेकर गए वहाँ पर इलाज ठीक नहीं हुआ, फिर हम इन्हें बिजनौर लेकर गए वहां पर करीब 15 दिन इलाज चला लेकिन वहां पर भी जब ठीक से रिकवरी नहीं हुई तो हमने मेरठ शिफ्ट किया, वहाँ भी करीब 15 दिन रखा। इस पूरे इलाज में हमारे करीब रुपये 12-13 लाख खर्च हो गये," अनीस के भतीजे फ़िरोज़ अंसारी कहते हैं।

 अस्पताल से वापस आने के बाद अनीस का इलाज उनके घर पर ही किया जा रहा है। फोटो: शैलेष श्रीवास्तव

अस्पताल से वापस आने के बाद अनीस का इलाज उनके घर पर ही किया जा रहा है। फोटो: शैलेष श्रीवास्तव

जब इंडियास्पेंड की टीम अनीस के घर पहुंची तो अनीस अपने घर के बरामदे बिस्तर पर लेटे हुए थे, ऑक्सीजन सिलिंडर लगा हुआ था और गर्मी के असर को कम करने के लिए चार पंखे आस-पास लगे थे। ज़ाहिर तौर पर किसी मरीज़ के लिए इस तरह की परिस्थितियों में रहना उपयुक्त नहीं है लेकिन अनीस के परिवार के पास अस्पताल के महंगे बिल से बचने के लिए के लिए इसके अलावा कोई और चारा नहीं बचा है।

अनीस दिल्ली में ब्रेडपाव की सप्लाई का काम करते थे और करीब रुपये 10,000 महीना कमाते थे। लेकिन वो फिर से काम पर कब तक जा पाएंगे इसका अंदाज़ा कोई नहीं लगा सकता।

जब फ़िरोज़ से पूछा गया कि उन्होंने इतने रुपयों का इंतेज़ाम कहाँ से किया गया, तो वो बताते हैं, "पहले तो घर में कुछ पैसा था वो लगाया लेकिन इलाज इतना महंगा था कि वो पैसा जल्दी ही ख़त्म हो गया। उसके बाद हमें उनके घर के गहने और 100 गज ज़मीन को गिरवी रख कर करीब रुपये 11 लाख का क़र्ज़ लेना पड़ा।"

फ़िरोज़ ये भी बताते हैं कि उन दिनों में अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी थी और उन्हें अस्पताल में करीब रुपये 30,000 हर दिन के खर्च के बाद ऑक्सीजन का इंतज़ाम भी खुद ही करना पड़ता था जो उन्होंने चंडीगढ़ जैसे दुसरे शहरों से मंगवाए और हर एक सिलिंडर के लिए उन्होंने कम से कम रुपये 10,000 खर्च किये।

 अनीस की ज़मीन जिसे उनके परिवार को उनके इलाज के लिए गिरवी रखना पड़ा। फोटो: शैलेष श्रीवास्तव

अनीस की ज़मीन जिसे उनके परिवार को उनके इलाज के लिए गिरवी रखना पड़ा। फोटो: शैलेष श्रीवास्तव

उत्तर प्रदेश सरकार ने कोविड के मरीजों को मुफ्त इलाज करने की घोषणा की थी परन्तु अस्पतालों में भीड़ के चलते कई परिवारों को गैर सरकारी अस्पतालों में इलाज करवाना पड़ा था जिसकी वजह से उनकी जेब पर भारी असर पड़ा था और अंसारी परिवार के जैसे वो भी कर्ज के तले दब गए है।

आमदनी में कमी और कोविड इलाज का भारी खर्च

कोविड महामारी के दौरान इसके इलाज पर होने वाला भारी खर्च ग्रामीण भारत के लिए दोहरा बोझ साबित हुआ है। देश के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग जो कृषि और मजदूरी पर बहुत हद तक निर्भर हैं कोरोना की पहली लहर में देश व्यापी लॉकडाउन से बेरोज़गार हो गए वहीं दूसरी लहर में उनके परिवार की जमा पूँजी कोरोना के इलाज में ख़त्म हो गयी।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के मुताबिक कोरोना की दूसरी लहर में 1 करोड़ से भी ज़्यादा भारतीयों की नौकरी चली गयी है और पूरे कोरोनाकाल में 97% लोगों की आमदनी में गिरावट आई है।

"जब अप्रैल 2020 में भारत कोरोना महामारी से प्रभावित हुआ, तो लगभग 12.6 करोड़ लोगों की नौकरियां गईं। यह संख्या बहुत बड़ी है। इसमें लगभग 9 करोड़ लोग ऐसे थे जो दिहाड़ी मजदूर थे। हालांकि, लॉकडाउन के बाद लौटने पर यह हुआ कि उनकी कमाई कम हो गई। अब यह होने लगा कि काम वे अब भी वही कर रहे थे, लेकिन पैसा कम मिलने लगा। साथ ही, यह भी हुआ कि अब काम भी कम मिलने लगा," सीएमआईई के सीईओ महेश व्यास ने इंडियास्पेंड को एक इंटरव्यू में बताया।

कोविड की दूसरी लहर ने गरीबी की ओर धकेला

भारत के ग्रामीण इलाकों में अधिकतर लोग सरकारी स्वास्थ व्यवस्था पर निर्भर होते हैं लेकिन कोरोना की दूसरी लहर में कोरोना के इलाज के लिए चिन्हित अस्पतालों के काफी दूर होने, अस्पतालों में जगह ना मिलने और कोविड जांच में आभाव में लोगों को गैर सरकारी अस्पतालों में जाना पड़ा जो कि उनके लिए बहुत ही महंगा साबित हुआ।

पिउ रिसर्च सेंटर की एक स्टडी के मुताबिक भारत में कोविड की वजह से आई मंदी ने 7.5 करोड़ लोगों को गरीबी की तरफ धकेला है। ये वह परिवार है जिनकी दैनिक आय $2 (रुपये 140) या उससे कम है।

उन्नाओ जिले के बलाई गॉंव के रहने वाले बाबूलाल पासी के 22 साल के बेटे श्यामू को कई दिनों से बुखार था, बाबूलाल उसे अचलगंज के सामुदायिक स्वस्थ केंद्र पर कोविड टेस्टिंग के लिए लेकर गए लेकिन वहाँ पर उनकी जांच नहीं की गयी और कुछ दवाएं दे दी गयी। श्यामू की तबियत जब और बिगड़ने लगी तो बाबूलाल ने उसका इलाज प्राइवेट डॉक्टर से करवाया जिसमे उनका करीब रुपये 40,000 का खर्च आया लेकिन वो फिर भी श्यामू को बचा नहीं सके और श्यामू की घर पर ही मृत्यु हो गयी।

बाबूलाल के बेटे श्यामू की मौत कोविड की दूसरी लहर के दौरान हुई जिसके इलाज के लिए उन्हें अपनी फसल का बड़ा हिस्सा सस्ते दामों पर बेचना पड़ा। फोटो: सौरभ शर्मा

बाबूलाल के बेटे श्यामू की मौत कोविड की दूसरी लहर के दौरान हुई जिसके इलाज के लिए उन्हें अपनी फसल का बड़ा हिस्सा सस्ते दामों पर बेचना पड़ा। फोटो: सौरभ शर्मा

बाबूलाल की दो संतानें हैं और वो अपने छोटे से खेत की आमदनी पर निर्भर हैं। श्यामू के इलाज के लिए उन्होंने अपनी फसल का 20 क्विंटल गेंहू बेचना पड़ा था।

श्यामू को क्या बीमारी थी, इस बात पर बाबूलाल कहते हैं, "इस गाँव में सभी को बुखार आ रहा था, हर घर में बुखार आया था। उसको कोरोना ही था, उसको इसके पहले कभी ऐसा बुखार नहीं आया।"

प्राइवेट अस्पतालों कि मनमानी और सरकारी व्यवस्थाओं का आभाव

भारत में प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर होने वाला सरकारी खर्च सिर्फ रुपये 1,112 प्रति वर्ष है जो कि दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में बंगलादेश, नेपाल और म्यांमार के बाद चौथा सबसे कम व्यय है। भारत का यह प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य व्यय अधिकांश लोगों को स्वास्थ पर अपनी जेब से प्राइवेट अस्पतालों में मोटी रकम खर्च करने के लिए मजबूर करता है।

भारत कम-मध्यम आय वाले 50 देशों में छठा ऐसा देश है जहां के लोग स्वास्थ्य पर अपनी जेब से सबसे ज़्यादा खर्च करते हैं और इस ही वजह से, कई अध्ययनों के अनुसार, हर साल 3.2-3.9 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं।

वाराणसी के सुजाबाद इलाके की झुग्गी बस्ती में रहने वाले गुलाब की 4 साल की बच्ची माला को मई के महीने में अचानक बुखार आया उसके बाद आई बारिश में घर गीला होने की वजह से माला को निमोनिआ हुआ और इस ही से 1 जून को माला की मौत हो गयी।

गुलाब और उनका परिवार बांस की टोकरियां बनाने का काम करते हैं और लॉकडाउन के दौरान उनकी आमदनी का कोई जरिया नहीं बचा है। इस बस्ती के लोग महीनों से समाजसेवी संस्थाओं के द्वारा बांटे जाने वाले राशन पर निर्भर थे उस ही बीच माला की बीमारी ने गुलाब को आसपास के लोगों से उधार लेने पर मजबूर कर दिया।

गुलाब वाराणसी में अपनी झोपडी के बाहर। फोटो: शैलेष श्रीवास्तव

गुलाब वाराणसी में अपनी झोपडी के बाहर। फोटो: शैलेष श्रीवास्तव

"उसको सर्दी ज़ुकाम हुआ था, कुछ बुखार हुआ था उसके बाद वो गले से कुछ खा ही नहीं रही थी। मेरे पास इतना पैसा ही नहीं था कि डॉक्टर के पास जाकर इलाज करवाऊं। घरेलु कुछ इलाज करते थे, झोला छाप डॉक्टर को दिखाया उसके चार पांच दिन बाद माला मर गयी," गुलाब बताते हैं।

माला के इलाज पर आये खर्च के बारे में वो कहते हैं, "पैसा तो हमारे पास जो भी था वो हमने खर्च किया। कोई हज़ार दिया, कोई पांच सौ दिया ऐसे करके ही सब किया है। सबसे कहते थे कि भैय्या अगर तुम खाओ ना तो हमें दे दो हम अपना बच्चा जिला लें!"

"बेटी तो मर गयी। कर्ज करीब 8 -10 हज़ार का है। लॉकडाउन खुले तो उसे चुकाने का सोचा जाए।"

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