लखनऊ। ब‍िहार की राजधानी पटना से लगभग 100 क‍िलोमीटर दूर गया ज‍िले के एकता कॉलोनी में रहने वाले आर्मी से सेवानिवृत्त विनोद कुमार अभी भी मानने को तैयार नहीं हैं क‍ि उनका बेटा वाल्मीकि कुमार आत्‍महत्‍या कर सकता है।

"एक साल पहले ही तो कोटा गया था जेईई आईआईटी की तैयारी करने। पढ़ने में अच्‍छा था। हमें तो पता ही नहीं चल पाया क‍ि आख‍िर उसने आत्‍महत्‍या की क्‍यों। हमने तो जांच की भी मांग की थी। लेकिन क‍िसी ने कुछ क‍िया ही नहीं।" व‍िनोद कुमार फोन पर बताते हैं। वाल्मीकि कुमार ने राजस्‍थान के कोटा में 15 अगस्‍त 2023 को हॉस्‍टल के अपने कमरे में आत्‍महत्‍या कर ली।

तमाम कवायदों के बावजूद कोटा में छात्रों की आत्‍महत्‍या करने का स‍िलस‍िला थमने का नाम नहीं ले रहा। लेक‍िन इसके पीछे की वजह क्‍या है? यही जानने, समझने के लिए सामाजिक विज्ञान और मानविकी पर शोध करने वाली एक भारतीय संस्थान लोकनीति-सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) ने अक्टूबर 2023 के पहले और दूसरे सप्ताह के बीच कोटा में रहकर एनईईटी और जईई की तैयारी करने वाले 1,000 से अधिक छात्रों के बीच बतौर केस स्‍टडी एक सर्वे क‍िया। सर्वे में 30% छात्राएं शामिल थीं। हिंदी में हुए इस सर्वे में अलग-अलग तरह के सवाल पूछे गये और एक सर्वे में 15-20 मिनट का समय लगा। सर्वे के कई नतीजे चौंकाने वाले हैं।

कोचिंग हब के रूप में पहचान बना चुका कोटा प‍िछले कुछ वर्षों से छात्रों की आत्‍महत्‍या को लेकर चर्चा में है। कोटा पुल‍िस के अनुसार इस साल अब तक ( 9 नवंबर तक) कोटा में 23 छात्र आत्‍महत्‍या कर चुके हैं। राजस्‍थान व‍िधानसभा में राज्‍य सरकार ने एक सवाल के जवाब में बताया था क‍ि कोटा में 2022 में 22 और 2020 में 4 छात्रों ने सुसाइड क‍िया था। 2021 का आंकड़ा उपलब्‍ध नहीं है।

तनाव में जी रहे कोटा में तैयारी करने वाले छात्र

सीएसडीएस-लोकनीति के एक इस अध्ययन से पता चलता है कि अधिकांश छात्र अकेले रहते हैं और अधिक पढ़ाई करने के लिए कम सोते हैं और उन्‍हें घर की याद भी आती है। 85% छात्र हर दिन कोचिंग सेंटरों में 6 से 7 घंटे तक का समय बिताते हैं। जेईई और एनईईटी के छात्र में से 80% से अधिक छात्र ने बताया कि वे कोचिंग सेंटर में प्रतिदिन छह से सात घंटे बिताते हैं। जबकि घर से दूसरी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले 63% छात्र ही पढ़ाई में इतना समय देते हैं।

कोटा में कोचिंग जाने वाले छात्रों को क्‍लास के अलावा सेंटरों पर होनी वाली परीक्षाओं में भी शामिल होना पड़ता है। हालांकि इसके बारे में आधे से अधिक (54%) छात्रों ने कहा कि साप्ताहिक परीक्षा से उनकी तैयारी अच्‍छी होती है। जबकि प्रत्येक 10 छात्रों में से एक ने कहा कि उन्हें सप्‍ताह में होने वाली परीक्षा तनावपूर्ण लगते हैं और प्रत्येक 10 में से तीन ने कहा कि ऐसी परीक्षाएं कभी-कभी के लिए ठीक हैं। तनाव से बचने के लिए प्रत्‍येक 10 में से 8 से अधिक छात्रों ने कहा क‍ि कोचिंग सेंटरों में कम से कम एक द‍िन का सप्‍ताह‍िक अवकाश होना चाह‍िए। इस अध्ययन के समय एक-तिहाई छात्र लगभग 1 साल से कोटा में थे, जबकि एक-चौथाई 2 वर्षों से कोटा में थे। उनमें से एक-तिहाई से कुछ अधिक ने कहा कि उन्हें अक्सर घर की याद आती है, जबकि आधे के करीब ने कहा कि उन्हें समय-समय पर घर की याद आती है।


इसके अलावा 19% छात्रों ने स्वीकार किया कि कोटा में उनके कोई दोस्त नहीं है जिनके साथ वे अपना सुख-दुख साझा कर सकें। प्रत्येक 10 छात्रों में से केवल दो ने ही कहा कि वे दोस्तों के साथ अपना रूम शेयर करते हैं। जबकि पर‍िवार के क‍िसी सदस्‍य के साथ रहने वालों की संख्‍या बेहद कम रही। अकेले रहने वाले ऐसे छात्रों की संख्‍या 67% है जो एक बार परीक्षा में बैठ चुके हैं। दो बार परीक्षा दे चुके ऐसे छात्रों की संख्या बढ़कर 71% हो जाती है। 63% छात्र ऐसे भी हैं जो अभी तक परीक्षा में बैठे भी नहीं हैं। लेकिन वे अकेले रहते हैं।

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कोटा में तैयारी करने वाले छात्र भेदभाव के भी श‍िकार हो रहे हैं। 21% छात्र जाति और 26% ने आर्थिक स्‍थ‍ित‍ि के कारण हो रहे भेदभाव‍ की श‍िकायत की। तनाव कम करने के लिए अधिकांश छात्र (68%) अपने परिजन से बात करते हैं जबकि बहुत से लोग सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं या दोस्तों से मिलते हैं। आधे से भी कम (46%) ने कहा कि वे हर दिन फिल्में देखते हैं या गाना सुनते हैं। केवल 26% ही अपनी दैनिक अध्ययन दिनचर्या को संतुलित करने के लिए खेल या शारीरिक व्यायाम की ओर रुख करते हैं। कोटा जाने के बाद से अधिकांश छात्रों (50%) ने माना क‍ि वे अब रात को देर से सोते हैं जबकि 32% ने कहा कि वे अब पहले की तुलना में जल्‍दी उठते हैं।

महज 3% छात्र ही मानसिक स्वास्थ्य व‍िशेषज्ञों के पास गये

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों पर नजर डालें तो देश में हर साल सैकड़ों छात्रों की मौत आत्महत्या की वजह से हो रही। आंकड़े साल दर साल बढ़ते जा रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो एक सरकारी एजेंसी है और यह देशभर में होने वाली आपराधिक गत‍िव‍िध‍ियों का र‍िकॉर्ड जुटाने का काम करती है। वर्ष 2021 में भारत में आत्महत्या से मरने वाले छात्रों की हिस्सेदारी आत्महत्या से होने वाली कुल मौतों की संख्या का 8% थी।

कोटा में पढ़ रहे छात्रों में से 7% ने कम से कम एक बार अपना जीवन समाप्त करने पर विचार जरूर क‍िया। 10 में से दो छात्र अक्सर परीक्षा के बाद आने वाले र‍िजल्‍ट को परेशान रहते हैं। सर्वे में शामिल एक-तिहाई से अधिक छात्रों ने कहा क‍ि उनके मन में ऐसा व‍िचार कभी ना कभी आया जबकि प्रत्येक 10 में से दो ने कहा कि वे ऐसा कभी-कभार ही करते हैं। 10 में से एक छात्र अक्सर माता-पिता के दबाव का अनुभव करते हैं। छात्राओं की संख्‍या इनमें ज्‍यादा है।

कोटा में पढ़ रहे छात्रों कोटा में रहते हुए. अन्य एक-चौथाई समय-समय पर इससे गुजरते हैं। इस दबाव का अनुभव करने वाली लड़कियों की संख्या लड़कों की तुलना में थोड़ी अधिक है। आर्थिक स्‍थ‍ित‍ि भी तनाव की एक वजह है। 6% छात्र अक्सर वित्तीय दबाव महसूस करते हैं जबकि अन्य एक-चौथाई कभी-कभी दबाव महसूस करते हैं। प्रतिस्पर्धा की बढ़ती भावना छात्रों को प्रभावित कर रही है। 4% ने कहा कि वे अक्सर साथियों के दबाव का अनुभव करते हैं और प्रत्येक 10 में से दो ने कहा कि वे समय-समय पर इसका अनुभव करते हैं। 53% छात्र समय-समय पर अकेलेपन का अनुभव करते हैं। लगभग आधे (46%) समय-समय पर तनाव महसूस करते हैं जबकि 12% ने अक्सर तनाव महसूस करते हैं।

सर्वे में पता चला क‍ि छात्र तनाव से उबरने की कोश‍िश भी कर रहे हैं। 13% छात्र तनावग्रस्त होने पर पढ़ाई फिर से शुरू करते हैं। 5% ऐसे भी हैं जो तनाव से लड़ने के लिए धूम्रपान की ओर रुख करते हैं और 2% शराब पीते हैं। 10 में से करीब 3 छात्र को लगता है कि कोचिंग शुरू करने के बाद उनका मानसिक स्वास्थ्य खराब हो गया है। पढ़ाई के लिए कोटा जाने के बाद प्रत्येक 10 में से चार से अधिक लोग अधिक थकान महसूस करते हैं। इनमें से 45% लड़कियां हैं। लगभग 10 में से तीन को लगता है कि वे हाल के दिनों में अधिक घबराए हुए हैं और अकेला महसूस करते हैं। 10 में से तीन (29%) को लगता है कि उनका गुस्सा बढ़ गया है। 10 में से लगभग दो को यह भी लगता है कि कोटा आने के बाद वे अधिक निराश, भयभीत और दुखी हैं।

खराब मानसिक स्वास्थ्य के लक्षण बावजूद केवल 3% छात्रों ने कहा कि वे किसी मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर से मिले हैं। लगभग आधे (48%) छात्रों को लगता है क‍ि इसके‍ लिए क‍िसी पेशेवर के पास जाने की जरूरत नहीं है।

तैयारी करने कोटा कौन जाता है?

कोटा के कोचिंग सेंटरों में पढ़ने वाले अधिकांश छात्र बिहार (32%), उत्तर प्रदेश (23%), राजस्थान (18%) और मध्य प्रदेश (11%) से आते हैं। उनमें से लगभग आधे शहरों और छोटे कस्बों से हैं। 14% गांवों से हैं। ज्‍यादातर मध्यवर्गीय पर‍िवार से हैं। 27% छात्रों के पर‍िजन सरकारी नौकरी में हैं जबकि 21% व्‍यवसायी और 14% कृषक पर‍िवार से आते हैं।

पुणे की कंसल्टेंसी फर्म इंफिनियम ग्लोबल रिसर्च ने वर्ष 2022 में एक रिसर्च रिपोर्ट जारी की। उन्होंने इंडिया स्पेंड को मेल पर बताया कि भारत के कोचिंग उद्योग का बाजार वर्ष 2021 में ही 58,088 करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है और इस इंडस्ट्री का पूरा कारोबार 2028 तक 1,33,955 करोड़ रुपए तक पहुंचने का अनुमान है। इस दौरान इसका कम्पाउंडेड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) 13.03% तक रह सकता है। इंफिनियम ने आगे बताया कि उन्होंने बड़े कोचिंग संचालकों से बात करके और उनकी सालाना रिपोर्ट, ट्रेड जर्नल, रिसर्च एजेंसी और सरकारी रिपोर्ट्स के आधार पर ये रिसर्च किया है।


कोटा में पढ़ने वाले 13% छात्रों के परिवार का कोई ना कोई सदस्य कोटा में पढ़ता है जबकि 28% के दूर के रिश्तेदार ने कोटा में पढ़ाई की है। इन छात्रों ने कोटा के बारे में अपने इन रिश्तेदारों से ही सुना था। 44 प्रतिशत छात्रों को कोटा के बारे सोशल मीड‍िया से पता चला जबकि लगभग आधे छात्र (46%) कोचिंग सेंटरों की प्रतिष्ठा के कारण कोटा चले गए। 39% अपने माता-पिता के कहने पर और 10% अपने दोस्‍तों के प्रभाव में आकर कोटा गये।

हालांकि नई शिक्षा नीति (National education policy 2020-NEP) में कोचिंग संस्कृति को हानिकारक बताते हुए इसे क की वकालत करता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 स्कूली बच्चों को निजी ट्यूशन और कोचिंग कक्षाओं से दूर करना चाहती है। नीति में लिखा है कि आज की कोचिंग संस्कृति को प्रोत्साहित करने बजाय बच्चों में सीखने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है। एनईपी में सीबीएसई बोर्ड की परीक्षाओं को और आसान बनाने की भी बात है ताकि छात्र स्कूल की पढ़ाई के दम पर ही बोर्ड की परीक्षा पास कर सकें।

सीएसडीएस सर्वे र‍िपोर्ट के अनुसार कोटा में पढ़ने वाले अधिकांश छात्र लड़के हैं। लड़कियों की भागीदारी महज 37% ही है। अधिकांश छात्रों की उम्र 15-19 वर्ष के बीच है। मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए एनईईटी की तैयारी करने वाले छात्रों की संख्या सबसे अधिक है और 59% छात्र इसकी तैयारी के लिए कोटा में कोचिंग करते हैं। इनमें से 76% लड़कियाँ हैं। इसके बाद इंजीनियरिंग में प्रवेश के लिए जेईई की तैयारी करने वाले छात्रों की संख्‍या 35% है। यह परीक्षा लड़कों के बीच अधिक लोकप्रिय है। महज 16% लड़कियां इसकी तैयारी करती हैं।

तैयारी करने के अलावा छात्रों को बोर्ड परीक्षा भी पास करना होता है। बोर्ड की पढ़ाई करने वाले केवल 16% छात्र ही नियमित स्कूल जाते हैं। आश्चर्यजनक रूप से 81% कोचिंग सेंटर के छात्र इसके बजाय डमी स्कूलों में नामांकित हैं।

35% प्रतिशत को लगता है कि जेईई या एनईईटी पास करने से उनका जीवन अच्छे सेटल हो जायेगा। 22% का मानना है कि समाज में उनका सम्मान बढ़ेगा और 16% को उम्मीद है कि उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार होगा।

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उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में डॉ. मोहम्मद फैजी, कॉमर्स विज नाम से कोचिंग सेंटर का संचालन करते हैं और यूजीसी नेट की तैयारी करवाते हैं। इसके अलावा 12वीं के छात्रों को कॉमर्स भी पढ़ाते हैं। वे कहते हैं कि वाल्‍मिकी जैसे न जाने कितने बच्चे हर साल सपने लिए घर से दूर निकल जाते हैं। लेकिन गलाकाट प्रतिस्पर्धा और मानसिक दबाव के चलते उनका रास्ता कठिन हो जाता है।

मोहम्मद फैजी कहते हैं, "पढ़ाई अब पहले जैसी नहीं रही है। हमारे स्कूलों यहां तक कि डिग्री कॉलेज में भी पुराने तरीके से पढ़ाई हो रही है। किताबों का कंटेंट वैसा नहीं है जिसे बच्‍चे पढ़कर किसी प्रतियोगी परीक्षा को पास कर सकें। ऐसे में कोचिंग के अलावा उनके और परिजन के सामने कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता। 10वीं, 12वीं या आगे की पढ़ाई के लिए कोचिंग में बच्चों का प्रवेश हर साल बढ़ता ही जा रहा। ऐसे में अगर बेसिक एजुकेशन स‍िस्‍टम में बदलाव नहीं हुआ तो ये तस्वीर बदलने वाली नहीं है।"

नोट: डाटा लोकनीति-सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज।

अतिरिक्त योगदान मिथिलेश धर दुबे।